ब्रजेश कुमार मिश्र
पुलिस अधीक्षक, पुलिस ट्रेनिंग कालेज सुल्तानपुर (उ. प्र.)
कर्म-सिद्धांत, पुनर्जन्म, मोक्ष और अध्यात्मवाद- ये चार सिद्धांत ऐसे हैं, जिन्हें चार्वाक को छोड़कर सभी भारतीय दर्शन स्वीकार करते हैं। चाहे वह आस्तिक (जैसे-सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत) हों या नास्तिक (जैसे-जैन, बौद्ध)। कर्म—सिद्धांत का मूल तत्व यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मों का फल अवश्य मिलता है चाहे वह इस जन्म में मिले या अगले जन्म में। कर्म—सिद्धांत से ही पुनर्जन्म, मोक्ष और नैतिकता का सिद्धांत स्वत: सिद्ध होता है जिसका मूलभाव यही है कि यदि कोई मनुष्य नैतिक जीवन व्यतीत करते हुए अच्छे कर्म करता है तो वह पुनर्जन्म से मुक्त होकर मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य, अपवर्ग या स्वर्ग प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है। इस प्रकार कर्म-सिद्धांत भारतीय चिंतनधारा का सार तत्व है जिस पर उसके सारे विचार—विमर्श और वाद—प्रतिवाद टिके हुए हैं। कर्म सिद्धांत यह बताता है कि मनुष्य के कार्य उसके भविष्य को निर्धारित करते हैं। प्रत्येक कार्य का एक परिणाम होता है और इस परिणाम का प्रभाव उस व्यक्ति पर ही होता है जो उस कार्य को करता है। कर्म सिद्धांत एक प्रकार से कार्य कारण सिद्धांत भी है जिसके अनुसार अच्छे कर्मों का परिणाम सुख और सफलता होता है, जबकि बुरे कर्मों का परिणाम दु:ख और असफलता होता है। कर्म—सिद्धांत पुनर्जन्म की अवधारणा का भी समर्थन करता है। ऐसा माना जाता है कि हमारे कर्मों के कारण हमें एक जीवन के बाद दूसरा जीवन मिलता है। कर्म—सिद्धांत स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व का भी पोषक है, जो यह बताता है कि मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। हमें अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता है, लेकिन हमें पता होना चाहिए कि हमारे कर्मों के परिणाम हमारे जीवन को प्रभावित करेंगे। कर्म—सिद्धांत कर्मयोग का समर्थक है जिसके अनुसार हमें फलों की इच्छा का परित्याग कर कर्म करना चाहिए और कर्म करने पर ही मेरा अधिकार है कर्मफल पर नहीं।
कर्मवाद का बीज सर्वप्रथम वैदिक दर्शन में परिलक्षित होता है। वैदिक ऋषि और आचार्य जगत की नैतिक और आध्यात्मिक व्यवस्था में अटूट विश्वास रखते थे। वैदिक ऋषि जगत की नैतिक व्यवस्था को ‘ऋत्’ कहते थे। वेदों में ऋत् का अर्थ ब्रह्माण्ड की व्यवस्था, नियम, सत्य और संतुलन से है। इसे वेदों में एक मौलिक अवधारणा के रूप में वर्णित किया गया है जो प्राकृतिक, नैतिक और दैवीय आदेशों को संचालित करता है। ऋत् ब्रह्माण्ड का नियम है जो प्राकृतिक घटनाओं जैसे- मौसम, सूर्य और चन्द्रमा की गति और जीवन चक्र को नियंत्रित करते हैं। ऋत् मानव जीवन का मार्ग भी है, जो सत्य और न्याय का पालन करने और प्राकृतिक एवं नैतिक नियमों का सम्मान करने के लिए प्रोत्साहित करता है। वेदों में वर्णित ऋत् का यह विचार उपनिषद काल तक आते—आते कर्मवाद का रूप ले लेता है। कर्मवाद का मूल अर्थ है कि ”जैसा हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं।” इस नियम के अनुसार शुभ कर्मों का फल शुभ और अशुभ कर्मों का फल अशुभ होता है। इसके अनुसार ‘कृत प्रणाश’ अर्थात् किये हुए कर्मों का फल नष्ट नहीं होता है तथा ‘अकृतम्युपगम्’ अर्थात् बिना किये हुए कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता है। भारतीय परम्परा में सुख-दु:ख, हानि-लाभ, जय-पराजय ये सभी हमारे शुभाशुभ कर्मों का ही परिणाम हैं। इस प्रकार कर्मवाद नैतिकता के क्षेत्र में कारणता का नियम है। जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र में निहित व्यवस्था की व्याख्या कार्यकारण नियम करता है वैसे ही नैतिकता के क्षेत्र में निहित व्यवस्था की व्याख्या कर्म-सिद्धांत करता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि –
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। न भुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटि शतैरपि।।
अर्थात् मनुष्य द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मों का फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। बिना भोगे करोड़ों कल्प वर्षों में भी कर्म का फल क्षीण नहीं होता है।
प्राय: सभी भारतीय दार्शनिकों और चिंतकों ने माना है कि हमारा वर्तमान जीवन पूर्वजन्म के कर्मों का फल है तथा हमारा भविष्य जीवन वर्तमान जीवन के कर्मों का फल होगा। इस प्रकार भारतीय दर्शन अतीत, वर्तमान और भविष्य जीवनों को कारण कार्य श्रृंखला में बांधता है। यदि हम वर्तमान में दुखी हैं तो यह हमारे पूर्व जीवन के कर्मों के फल के कारण है। यदि हम दूसरे जीवन को सुखमय बनाना चाहते हैं तो हमारे लिए अपने वर्तमान जीवन में अच्छे कर्म करना आवश्यक है। मनुष्य का भाग्य उसके कर्म से निर्धारित होता है। कर्म-सिद्धांत भाग्यवाद और नियतिवाद का धुर विरोधी सिद्धांत है। कर्म—सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति का जीवन भाग्य से नियत नहीं होता है, बल्कि वह उसके शुभाशुभ कर्मों के अनुसार परिवर्तनशील होता है। कर्म ही भाग्य का निर्माता है। भाग्य और कुछ नहीं, बल्कि मनुष्य के पूर्व कर्मों का परिणाम है। भाग्य को व्यक्ति के द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के द्वारा निर्धारित होता है। व्यक्ति के वर्तमान जीवन में उत्पन्न होने वाली घटनाओं और परिस्थितियों को हम भाग्य कहते हैं, जो वस्तुत: हमारे पूर्व जन्मों का फल होती हैं। कर्म और भाग्य आपस में एक—दूसरे से जुड़े होते हैं। हमारे वर्तमान जीवन का भाग्य फल अटल है, क्योंकि वह पूर्व जन्मों का परिणाम है, लेकिन हम वर्तमान में अच्छे कर्म करके अपने भविष्य जीवन के भाग्य को अच्छा बना सकते हैं। संत तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है कि हमारे अच्छे बुरे कर्मों से ही समस्त जागतिक व्यवस्था चलती है और जो जैसा कर्म करता है वह वैसा ही फल पाता है-
कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।
भारत के विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों में कर्म-सिद्धांत की भिन्न—भिन्न रूपों में व्याख्या की गई है। न्याय वैशेषिक दर्शन में कर्म—सिद्धांत को ‘अदृष्ट’ की संज्ञा दी गयी है, क्योंकि वह दृष्टिगोचर नहीं होता है। विश्व की समस्त वस्तुएँ यहाँ तक कि परमाणु भी इस नियम से प्रभावित होते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार विश्व का निर्माण परमाणुओं के संयोजन से होता है और उनके विच्छेद से प्रलय होता है। परमाणु सृष्टि के सूक्ष्मतम तत्व हैं जो नित्य, शाश्वत, अविनाशी किन्तु गतिहीन और निष्क्रिय होते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार जीवात्माओं का अदृष्ट ही परमाणुओं में गति प्रदान करता है। जगत में जो व्यवस्था देखने को मिलती है उसका कारण जीवात्माओं का पहले का कर्म है जिसे अदृष्ट कहा जाता है। अदृष्ट नियम से प्रभावित होकर ही ईश्वर सृष्टि का कार्य सम्पादित करता है। जीवात्माओं का सुख—दु:ख भौतिक नियम के अधीन न होकर कर्म नियम के अधीन है जिसे अदृष्ट कहते हैं। ईश्वर अदृष्ट के अनुसार ही जीवात्माओं को सुख दु:ख एवं हानि लाभ प्रदान करते हैं। कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को सुख या दु:ख नहीं पहुंचा सकता है, बल्कि सभी अपने अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार सुख और दु:ख भोगते हैं।
जैमिनी, कुमारिल भट्ट और मंडन मिश्र जैसे मीमांसकों के अनुसार अच्छे कर्म (पुण्य) को करने से स्वर्ग और बुरे कर्म (पाप) करने से नरक प्राप्त होता है। वेदों में वर्णित कर्मकांड के अनुसार कार्य करना धर्म है और वेदों में निषिद्ध कार्य करना ही अधर्म है। इस प्रकार कत्र्तव्यता और अकत्र्तव्यता का आधार वैदिक वाक्य हैं। मीमांसा दर्शन में कर्म पर अत्यधिक जोर दिया गया है। मीमांसा दर्शन में पांच प्रकार के कर्मों का विवरण मिलता है—(1)-नित्य कर्म-नित्य कर्म वे कर्म हैं, जिन्हें प्रत्येक दिन व्यक्ति को करना ही पड़ता है जैसे- ध्यान, प्रार्थना, स्नान, संध्या, पूजा आदि। इन कर्मों के न करने से पाप का उदय होता है। (2)- नैमित्तिक कर्म-नैमित्तिक कर्म उन कर्मों को कहते हैं, जो विशेष अवसरों पर किये जाते हैं। जैसे, जन्म, मृत्यु, विवाह आदि अवसरों पर किया गया कर्म नैमित्तिक कर्म कहलाता है। (3)- काम्य कर्म-ऐसे कर्म जो निश्चित फल की प्राप्ति के लिए किये जाते हैं, उसे काम्य कर्म कहते हैंं। पुत्र-प्राप्ति, धन-प्राप्ति, ग्रह-शान्ति, स्वर्ग-प्राप्ति आदि के लिए जो यज्ञ, हवन आदि किये जाते हैं वे काम्य कर्म के उदाहरण हैं। (4) निषिद्ध कर्म- जिन कर्मों के करने पर वेदों में निषेध किया गया है उन्हें निषिद्ध कर्म कहते हैं जैसे- असत्य का अनुगमन करना, वेदों का उपहास उड़ाना, जीवों को पीड़ा पहुँचाना आदि। (5)- प्रायश्चित कर्म-यदि कोई मनुष्य निषिद्ध कर्म करता है तो उसके अशुभ फल से बचने के लिये प्रायश्चित कर्म किया जाता है।
भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग का वर्णन किये बिना भारतीय दर्शन के कर्म-सिद्धांत का विवेचन अधूरा है। गीता में सकाम और निष्काम- इन दो प्रकार के कर्मों का विवेचन विशेष रूप से मिलता है। सकाम कर्म फल की इच्छा से किये जाते हैं, जबकि निष्काम कर्म बिना फल की कामना के लोक संग्रह के लिए किये जाते हैं। सकाम कर्म बंधन का कारण होता है, जबकि निष्काम कर्म मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
अर्थात् तुम्हारा केवल कर्म करने में ही अधिकार है, फल प्राप्ति में नहीं। इसलिए तुम कर्मों के परिणाम में आसक्त न हो। कर्म का यह सिद्धांत हमें आसक्ति और मोह से मुक्त होकर कर्मों को निस्वार्थ भाव से करने की प्रेरणा देता है। निष्काम कर्मयोगी अपने कर्तव्य को पूरी तरह से निभाता है और उसे फल की इच्छा से परे रखता है। इसमें कर्तव्य के लिए कर्तव्य किया जाता है न कि फल की कामना से। जर्मनी का प्रसिद्ध दार्शनिक इमैन्युअल कांट भी मनुष्य को किसी फल की कामना से नहीं बल्कि कर्तव्य के लिए कर्तव्य की बात करता है। निष्काम कर्मयोगी सुख-दु:ख, हानि-लाभ, जय-पराजय, यश-अपयश, जीवन-मरण, भूत-भविष्य आदि मनोभावों से ऊपर उठकर केवल अपने कर्तव्य पालन में लगा रहता है। निष्काम कर्मयोगी कर्म को एक यज्ञ मानता है यानि वह कर्म को भगवान को समर्पित करता है। भगवाद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति एक भी क्षण बिना कर्म किये जीवित नहीं रहा सकता है। कर्म करना व्यक्ति का स्वभाव है, लेकिन उसका यह कर्म अपने लिए न होकर लोक कल्याण के लिए होना चाहिए। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि- न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।।
अर्थात् हे पार्थ! तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है और न ही कोई वस्तु ऐसी है जो मुझे प्राप्त करना हो, फिर भी मैं निरंतर कर्म करता रहता हूँ। सकाम कर्म सांसारिक मोह माया में लिप्त करता है जबकि निष्काम कर्म आत्मज्ञान की ओर अग्रसर कर मुक्ति का द्वार खोलता है। कर्म-सिद्धांत न तो ईश्वरवाद का विरोध करता है और न ही व्यक्ति को उसके भाग्य भरोसे छोड़ता है, बल्कि यह तो मनुष्य के पौरुष और अनन्त ऊर्जा को शुभ कर्मों में प्रेरित कर सद्गुणी समाज की स्थापना की दिशा में अपना योगदान देता है। यह सिद्धांत तो व्यक्ति को उत्तम चरित्र का बनाकर समाज सेवा के कार्यों की तरफ उन्मुख करता है। जो कर्म हम इस जीवन में करते हैं वही प्रारब्ध के रूप में अगले जन्म में मिलता है और जो शुभाशुभ कर्म हम पूर्व के जन्मों में किये रहते हैं उन्ही का फल हमें वर्तमान समय में मिलता है।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रवर्तक रामानुजाचार्य यद्यपि भक्ति को मोक्ष का मार्ग मानते हैं, लेकिन बिना चित्त-शुद्धि के के भक्ति का उदय नहीं हो सकता और चित्त शुद्धि के कर्मों के अनुष्ठान की आवश्यकता होती है। रामानुज के अनुसार कर्म ज्ञान के साथ मिलकर भक्ति का भाव उदभूत करता है। यद्यपि वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यों में कर्मों के अनुष्ठान के विषय में पर्याप्त मतभेद है, फिर भी कर्म का महत्व अधिकांश आचार्यों को मान्य रहा है। मध्वाचार्य के द्वैत वेदांत में कर्म दस पदार्थों में से एक माना गया है। उन्होंने कर्म का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया है – विहित, निषिद्ध एवं उदासीन। आचार्य वल्लभ के शुद्धा द्वैत में भगवान के त्रय रूपानुसार भगवत प्राप्ति के तीन मार्ग बताये गये हैं- कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग और पुष्टिमार्ग। कर्ममार्ग आधिभौतिक है और बल्लभ के मत में इसको पर्याप्त महत्व दिया गया है।
इस प्रकार भारतीय चिंतनधारा में कर्म-सिद्धांत को पर्याप्त महत्व दिया गया है। कर्म—सिद्धांत मानव मस्तिष्क में निराशा का भाव दूर कर आशा एवं उत्साह का संचार करता है। यह सिद्धांत इस भाव को प्रतिष्ठित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है और वह अपने वर्तमान जीवन के शुभ कर्मों के द्वारा स्वर्णिम भविष्य का निर्माण कर सकता है। कर्म सिद्धांत समाज में व्याप्त विषमता की भी तर्कपूर्ण व्याख्या करता है। प्रत्येक व्यक्ति सामान्यत: समान परिस्थितियों में जन्म लेते हैं किन्तु अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण उनमें से कोई राजा होता है तो कोई रंक; कोई विद्वान बन जाता है तो कोई मूर्ख ही रहा जाता है; कोई सुखी जीवन व्यतीत करता है तो कोई दुखी जीवन जीता है; कोई जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है तो कोई हमेशा विफल होता रहता है। इसका कारण और कुछ नहीं, बल्कि उसका भाग्य यानि पूर्व जन्मों का शुभाशुभ कर्म है। कर्म-सिद्धांत मनुष्य में यह उत्तरदायित्व का भाव उत्पन्न करता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के लिए स्वतंत्र है और जैसा कर्म करेगा वैसा ही फल पायेगा। कर्म-सिद्धांत को स्वीकार कर लेने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय के लिए दूसरे को उत्तरदायी नहीं ठहरा सकता।





