हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार
महाशिवरात्रि के अंतिम अमृत स्नान के साथ ही प्रयागराज का महाकुंभ समाप्त हो गया। 45 दिन तक चले विश्व के इस सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में सनातन धर्म के प्रति आस्था और आकर्षण का इंद्रधनुष जैसा सप्तरंगी रंग दिखायी पड़ा। सनातन धर्म की परम्परा, संस्कृति और विचारों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में विदेशियों ने पद, परिवार और वैभव का परित्याग कर संगम तट पर धर्माचार्यों से सनातन धर्म की विधिवत दीक्षा ली। अमेरिका, कनाडा, जापान, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, रूस, यूक्रेन, इजरायल, स्विट्जरलैंड, इटली, स्लावेनियां आदि देशों से बड़ी संख्या में आये विदेशियों का सनातन से जुड़ाव ने एक बार फिर पूरे विश्व के सामने यह साबित किया कि दुनिया में सनातन धर्म से ज्यादा सहज, सरल और शांति देने वाला कोई अन्य धर्म नहीं है।
महाकुंभ में सनातन के प्रति आस्थावान विदेशियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। कितने विदेशियों ने सनातन से नाता जोड़ा इसका कोई आंकड़ा नहीं है, लेकिन सरकार के आंकड़ों के अनुसार 15 लाख से अधिक विदेशी महाकुंभ में आये। इसमें पर्यटन के लिये आये विदेशी भी शामिल है। संतों के अनुसार अधिकांश विदेशी पहले से ही किसी न किसी धर्माचार्य के सम्पर्क में रह कर सनातन धर्म को जानने,समझने का प्रयास कर रहे थे और संतुष्ट होने के बाद महाकुंभ में सनातन से विधिवत जुड़ गये। महाकुंभ में निर्मोही अनी अखाड़े से जुड़ी साईं मां का शिविर एकलौता शिविर था, जहां सभी 9 महामंडलेश्वर विदेशी थे। इनमें अनंत दास, श्री देवी मां परमेश्वर दास, त्रिवेणी दास, ललिता श्री मां अमेरिका से जयेन्द्र दास और जीवन दास फ्रांस से दयानंद दास इजरायल और राजराजेश्वरी मां जापान से जुड़ी हैं। इन सभी को 2019 के प्रयागराज कुंभ में महामंडलेश्वर बनाया गया था। इसके साथ साईं मां के शिविर में लगभग 100 की संख्या में विदेशी भक्त भी सनातन को जानने और समझने आये थे।
45 दिन के महाकुंभ में तमाम चर्चित हस्तियों ने अपने धन, धर्म, पद और वैभव को दरकिनार कर सनातन का चोला पहन कर यह संदेश दिया कि जीवन में सुख—शांति सनातन की राह पर चल कर मिलेगी। आज की प्रचलित भोगवादी संस्कृति मानव और समाज को रसातल में ले जा रही है। आईफोन, कंप्यूटर, टीवी आदि बनाने वाली अमेरिका की बहुराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी कंपनी ‘एप्पल’ के पूर्व सीईओ स्व. स्टीव जॉब्स की पत्नी लॉरेन पॉवेल जॉब्स द्वारा महाकुंभ में सनातन धर्म से जुडऩे की खबर पूरे विश्व में सुर्खिंयों में रही। लॉरेन पॉवेल अपने गुरु श्रीनिरंजनी अखाड़े के आचार्य महामंड़लेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी के सान्निध्य में तीन दिन तक महाकुंभ में स्थित उनके शिविर में रुकीं। इसके पहले उन्होंने अपने गुरु के साथ काशी जाकर बाबा विश्वनाथ जी का दर्शन और पूजा—अर्चना की। महाकुंभ में गुरु द्वारा उन्हें पहले सनातनी नाम ‘कमला’ तथा अपना अच्युत गोत्र दिया गया जो संन्यासियों का होता है। इसके बाद पॉवेल ने गुरु से विधिवत दीक्षा ले ली। पॉवेल की सनातन धर्म के प्रति आस्था के सवाल पर स्वामी जी ने कहा कि वह बहुत ही सरल और धार्मिक हैं, हमारी परम्परा को सीखना और उससे जुडऩा चाहती हैं। उल्लेखनीय है कि लारेन पॉवेल के पति स्व. स्टीव जॉब्स भी हिन्दू और बौद्ध धर्म से जुड़ाव रखते थे। विख्यात संत नीम करोड़ी महराज को वह अपना गुरु मानते थे और उन्हीं के कहने पर अपनी कम्पनी का नाम एप्पल रखा था। वह भारत की आध्यात्मिकता और संस्कति से जुडऩे के लिये कुंभ में आने की इच्छा जाहिर कर चुके थे, लेकिन वह संभव नहीं हो पाया था। अब पॉवेल उस आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ा रही हैं।
महाकुंभ में आये जिन प्रमुख विदेशी संतों को पद, पदवी देकर सनातन धर्म के प्रचार—प्रसार का दायित्व सौंपा गया, उनमें म्यांमार के भी एक संत शामिल हैं। श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी ने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुये म्यांमार के संत स्वामी विवेकानंद गिरि को अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया। उन्हें म्यांमार के साथ नेपाल और थाईलैंड में सनातन के प्रचार—प्रसार का दायित्व दिया गया है। यह म्यांमार के पहले ऐसे संत हैं, जिन्हें किसी अखाड़े में महामंडलेश्वर बनाया गया है। स्वामी विवेकानंद सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से आचार्य की डिग्री प्राप्त करके वेद-पुराणों के अध्ययन में लम्बे अवधि से लगे हुये हैं। स्वामी जी ने कहा कि उनकी प्राथमिकता म्यांमार में हिन्दू देवी—देवताओं की पूजा, मन्दिर निर्माण और वेद विद्यालयों की स्थापना के माध्यम से सनातन धर्म का विस्तार है। उन्होंने कहा कि म्यांमार में 10 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जिनके बीच रह कर सनातन को मजबूत करेंगे।
सनातनी अखाड़ों में महामंडलेश्वर का पद पाना संतों के लिये सदैव से गौरव का विषय रहा है। विदेशी साधु—सतों के लिये तो यह राह और कठिन है, लेकिन निरंजनी अखाड़े के पंच परमेश्वरों द्वारा सनातन धर्म के प्रचार—प्रसार में मग्न विदेशी संत स्वामी वेद व्यासानंद को भी महामंडलेश्वर बनाया। वेद व्यासानंद का पुराना नाम टाम है और वह अमेरिका के पूर्व आर्मी चीफ के पुत्र हैं। टाम ने 2003 में स्वामी कैलाशानंद से दीक्षा ली थी, उसी समय उन्हें वेद व्यासानंद का नाम मिला। सनातन की दीक्षा लेने के बाद व्यासानंद भारतीय साधना,परम्परा, संस्कृति और योग के प्रमुख प्रचारक बन गये। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और मनसा देवी मन्दिर ट्रस्ट के अध्यक्ष रवीन्द्र पुरी ने कहा कि अब वे महामंडलेश्वर वेद व्यासानंद के नाम से जाने जायेंगे।
श्री पंच दशनाम शंभू अटल अखाड़ा से जुड़ी अंजना गिरी इटली की रहने वाली हैं। अंजना गिरी का नाम एंजेला था। पहले पिता फिर 17 वर्ष की उम्र में मां का निधन हो गया। ईसाई परिवार में जन्मी एंजेला को एक दिन अपने मां के कपड़ों में लिपटी हुयी ‘अवधूत गीता’ पुस्तक मिली। अद्वैत वेदांत के सिद्धांत पर आधारित संस्कृत ग्रंथ को पढऩा एंजेला के लिये आसान नहीं था, लेकिन एंजेला ने धीरे—धीरे दो साल में उसका अध्ययन किया। इस पुस्तक ने उनके मन—मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाला कि वे अध्यात्म के पथ पर चल पड़ीं। 1994 में वह पहली बार भारत आयीं और देश में कश्मीर, उत्तराखंड़, आगरा ,काशी आदि के भ्रमण के बाद गुजरात गईं जहां उनकी मुलाकात माता संतोष गिरी से हुयी जिनके माध्यम से वह संत रामेश्वर गिरी से मिलीं। 1995 में एंजेला ने दीक्षा ली और नाम मिला अंजना गिरी। महाकुंभ में गेरुवा वस्त्रधारी अंजना गिरि गुरु के अखाड़े श्री पंच दशनाम अटल अखाड़ा में रह कर गंगा स्नान, ध्यान, यज्ञ, हवन आदि धार्मिक कर्मकांड़ों में शामिल हुईं।
न्यूयार्क के बफैलो शहर की एक कंपनी में फूड सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत क्रिस्टीना को सनातन संस्कृति इतना रास आयी कि वह अब अमृता माता बन कर सनातन का प्रचार कर रही हैं। क्रिस्टीना का जीवन भी विदेशी जीवनशैली पर आधारित था, लेकिन कनाडा में क्रिया योग के एक अभ्यास शिविर में शामिल होने के बाद उनके जीवन के सभी पक्षो में बदलाव आने लगा। क्रिया योग साधना का ऐसा रंग चढ़ा कि माता—पिता भी आश्चर्य में डूब गये। अंतत: एक दिन क्रिस्टीना के माता—पिता उसे लेकर क्रिया योग साधना के गुरु स्वामी योगी सत्यम के आश्रम आ गये। योग साधना में मन लगने के बाद क्रिस्टीना ने गुरु योगी सत्यम से विधिवत दीक्षा लेकर अमृता माता बन गई हैं। अमृता माता अब सनातन धर्म के प्रति समर्पित हैं और देश—विदेश में सनातन धर्म का प्रचार—प्रसार करती हैं।
सनातन धर्म की संस्कृति और परम्परा यूरोपीय देश स्लोवेनिया के डारजियो और क्रोएशिया के ब्लेज को ऐसी रास आयी कि वे 1998 में सनातनी बन गये। सनातन धर्म के प्रति आकर्षित डारजिओ और ब्लेज को 1998 के हरिद्वार कुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी महेश्वरानंद ने दीक्षा देकर नामकरण किया। सनातन संस्कृति के आधार पर गुरु द्वारा डारजिओ को दत्तात्रेय और ब्लेज को रामानंद नाम दिया गया। गुरु दीक्षा और नामकरण के बाद दोनों गुरु भाई के साथ ही एक—दूसरे के दोस्त बन गये हैं। 2001 के कुंभ से लेकर 2025 के महाकुंभ तक एक साथ रहते आ रहे हैं। बातचीत में बताया कि अब तक दोनों लोग प्रयागराज के महाकुंभ, 2001 और 2013 तथा कुंभ 2007 तथा 2019 में आ चुके हैं। सनातन धर्म के प्रति आकर्षण का कारण पूछने पर कहा कि सनातन संस्कृति जैसी कोई संस्कृति पूरे विश्व में नहीं है। मैंने सनातन को जितना जाना—समझा उससे कहीं ज्यादा गुरु जी की दीक्षा और नामकरण के बाद जीवन को मिला। दत्तात्रेय ने कहा कि जीवन में बहुत बदलाव आ गया। अब मै रोज हनुमान चालीसा पढता हॅू और हर—हर गंगे बोल लेता हूं। दत्तात्रेय और रामानंद अपने देश में लोगों को सनातन धर्म और संस्कृति के बारे में बताते हैं। इनका परिवार भी सनातन के प्रति आस्थावान है। दत्तात्रेय कहते हैं कि प्रयागराज के लिए चला तो परिवार ने कहा कि गंगा जल लेकर जरूर आइयेगा।
बाबा मोक्षपुरी का वास्तविक नाम माइकल है। उनका जन्म अमेरिका के न्यू मैक्सिको सिटी में हुआ है। वह अमेरिकी सेना में वायुसैनिक थे, लेकिन नौकरी रास नहीं आयी तो चल पड़े शान्ति की तलाश में और आ गये भारत। आज वह सैनिक से संत बन कर बाबा मोक्षपुरी के नाम से विख्यात हैं और जूना अखाड़े से जुड़ कर सनातन धर्म की पताका देश—विदेश में लहरा रहे हैं। मोक्षपुरी बताते हैं कि वह पहली बार 2000 में परिवार के साथ भारत आये और यहां आकर योग,साधना के साथ ही सनातन को नजदीक से जाना। थोड़े दिनों की यात्रा में भारत की संस्कृति और परम्परा ने मुझे अंदर तक प्रभावित किया। यहीं से मेरी आध्यात्मिक चेतना जागृत हुयी जो शायद ईश्वर कृपा ही थी। बाबा मोक्षपुरी के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव 2015 में आया जब उनकी पत्नी का निधन हो गया। लेकिन ध्यान और योग ने उन्हें इस विपत्ति से बाहर निकालने में मदद की। इस घटना से बाबा मोक्षपुरी को अनुभूति हुयी कि जीवन में कुछ भी स्थाई नहीं है, बस इसके बाद उन्होंने अपना जीवन अध्यात्म को समर्पित कर दिया। 2016 के उज्जैन कुंभ में संन्यास दीक्षा लेने के बाद उन्होंने प्रत्येक महाकुंभ में आने का संकल्प लिया है। बाबा मोक्षपुरी की योजना न्यू मैक्सिको शहर में एक आश्रम खोलने की है, जहां वह भारतीय धर्म दर्शन और योग का प्रचार करेंगे। जूना अखाड़े से जुड़े बाबा मोक्षपुरी देश—विदेश में सनातन धर्म की जीवन—पद्धति और परम्पराओं का प्रचार—प्रसार कर रहे हैं।





