डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
लेखक इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी हैं।
वर्ष 2018 में प्रकाशित एक शोध से एक रोचक बात सामने आयी कि हल्दी में पाया जाने वाला कर्कुमिन न केवल स्वयं एंटीमाइक्रोबियल द्रव्य है, बल्कि इसके साथ ही यह एंटीबायोटिक-प्रतिरोध को भी तोडऩे में सहायक है (फाइटोथेरेपी रिसर्च, 2018, 32: 488-495)। यह एक महत्वपूर्ण खोज थी। एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध और विवेकहीन प्रयोग के कारण ढीठ हो रहे बैक्टीरिया या बैक्टीरियल प्रतिरोध का वैश्विक स्वास्थ्य बोझ या आगे आने वाली आफत का पूरा पूरा अंदाजा अभी भी नहीं है। इतना जरूर ज्ञात है कि एंटीबायोटिक-प्रतिरोध के कारण एंटीबायोटिक उपचार की विफलता के कारण होने वाली मौतों की संख्या आज विकराल समस्या बनती जा रही है। एंटीबायोटिक दवाओं की वैश्विक खपत 70 बिलियन खुराक प्रति वर्ष से अधिक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार, अकेले यूरोप में ही एंटी-माइक्रोबियल-प्रतिरोध से जुड़े संक्रमणों से लगभग 25,000 लोग मर जाते हैं। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े यह भी बताते हैं कि वर्ष 2016 में 490,000 लोग मल्टी-ड्रग-रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस से संक्रमित हुये हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक मल्टी-ड्रग-प्रतिरोध के कारण प्रतिवर्ष 10 मिलियन से अधिक मौत होने की आशंका है, जो उसी काल में कैंसर से जुड़ी मौतों की संख्या 8.2 मिलियन प्रति वर्ष से भी ज्यादा होगी। प्रारंभिक शोध का अनुमान है कि एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के कारण वर्ष 2050 तक आर्थिक बोझ 100 ट्रिलियन डालर सालाना तक पहुँच सकता है। आंकड़े बहुत हैं पर एक बात साफ़ है एंटीबायोटिक प्रतिरोध या एंटी-माइक्रोबियल-प्रतिरोध 21वीं सदी की सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं में से एक बड़ी समस्या है।
ऐसी दशा में मल्टी-ड्रग-रेसिस्टेंट पैथोजेन्स के उन्मूलन तथा उनके कारण होने वाले घातक घातक संक्रमणों को प्रबंधित करने के लिये प्रभावी और विश्वसनीय विकल्प खोजना अत्यंत आवश्यक है। आज की चर्चा पुन: इसी विषय पर नवीन शोध को दृष्टिगत रखते हुये की जा रही है। एंटीबायोटिक-प्रतिरोध दुनिया भर की समस्या है पर भारत के बराबर विकरालता अन्यत्र कहीं नहीं है। डॉ. रमणन लक्ष्मीनारायण और रंजीत रायचौधरी द्वारा की गयी शोध से पता चलता है कि आज भारत में संक्रामक रोगों के कारण मृत्यु दर 416 प्रति एक लाख व्यक्ति है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में उस समय की दर से भी दो गुना ज्यादा है जब वहां एंटीबायोटिक दवाओं की शुरुआत की गयी थी। तब अमेरिका में यह दर एक लाख लोगों में 200 ही थी।
भारत में एंटीबायोटिक सर्वाधिक उपयोग ही प्रतिरोध विकसित होने का एक प्रमुख कारक है। वर्ष 2010 के आंकड़े बताते हैं कि भारत मानव स्वास्थ्य के लिये एंटीबायोटिक दवाओं का विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता था और आज भी है। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकेतकों का बुरी स्थिति में होना, बढ़ती हुई व्यक्तिगत आमदनी, और बिना किसी प्रिस्क्रिप्शन के सस्ती एंटीबायोटिक दवाओं की उपलब्धता आदि के कारण भारत में अधिक पचड़ा है।
इस समस्या पर इलाहबाद में आयुर्वेदपुरम के संस्थापक और विश्व-प्रसिद्ध क्षारसूत्र सर्जन डॉ. वी.बी. मिश्रा का अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है कि डॉ. मिश्रा पाइल्स, फिस्टुला, सेंटीनेल टैग (सेंटिनेल पाइल्स), फिशर्स, पिलोनिडल सायनस, रेक्टल पॉलीप्स आदि से पीडि़त 25,000 से अधिक रोगियों की सफल सर्जरी आयुर्वेद के माध्यम से कर चुके हैं। डॉ. वी.बी. मिश्रा का कहना है कि एंटीबायोटिक-प्रतिरोध से उबरना असल में हम सबके हाथों में है। आज अस्पताल से लगाने वाले इन्फेक्शन (हॉस्पिटल-अक्वायर्ड इन्फेक्शन) से किसी भी क्षण दुनिया भर में 1.4 मिलियन से अधिक लोग भुगत रहे होते हैं। इनमें लगभग 7 प्रतिशत उच्च आय वाले देशों में और और 15 प्रतिशत कम व मध्यम आय वाले देशों में होते हैं। इस समस्या से मृत्यु दर भी 10 प्रतिशत के बराबर है। अस्पतालों में मल्टीड्रग-प्रतिरोधी इन्फेक्शन का ऐसा अभूतपूर्व प्रसार है कि बीटा-लैक्टेमेज उत्पन्न करने वाले इशेरेशिया कोलाइ और कार्बापेनेम-प्रतिरोधी क्लेबसाइला न्यूमोनिये, एसिनेटोबैक्टर बामानाई और स्यूडोमोनोस ऑरोजिनोसा जैसे जीवाणु तो बेहद चिंताजनक हैं। इनके संक्रमण से जूझने वाले मरीजों की चिकित्सा के लिये अब सीमित चिकित्सीय विकल्प जो बचे हैं वे असल में आयुर्वेद के पास ही हैं। अस्पतालों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के फैलाव को रोकने और नियंत्रित करने के लिये तत्काल आयुर्वेदिक दखल अनिवार्य है, क्योंकि मल्टीड्रग-प्रतिरोधी जीवाणुओं से संक्रमित लोगों के इलाज के लिये उपलब्ध एंटीबायोटिक्स की संख्या सीमित है और निकट भविष्य में किसी नई एंटीबायोटिक्स के आने की अभी उम्मीद नहीं दिखाई देती।
डॉ. वी.बी. मिश्रा का कहना है कि लोग साधारण स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार में भी प्राय: एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक, एन्टीपाइरेटिक, म्यूकोलाइटिक, खांसी-निवारक तथा कन्जेशन निवारक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग करने लगे हैं। एन्टीबायोटिक्स का दुरुपयोग तो बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि अध्ययनों और अनुभव से यह सिद्ध हो चुका है कि कॉमन-कोल्ड या सर्दी-खांसी, फैरिन्जाइटिस, गले की खराश, खांसी, एलर्जिक राइनाइटिस या साइनोसाइटिस आदि में एन्टीबायोटिक्स का कोई खास लाभ नहीं है। फिर भी लोग खाये जा रहे हैं और डॉक्टर लिखे जा रहे हैं। इस दुरूपयोग के कारण रोगाणुओं में एंटीबायोटिक-प्रतिरोध विकसित हो रही है जो आने वाले समय में एंटीबायोटिक को पूर्णत: निष्प्रभावी कर सकती है। डॉ. वी.बी. मिश्रा का मानना है कि ऐसी दशा में रोगों से बचे रहने के लिये संहिताओं, साइंस और अनुभव को साथ लेकर आधुनिक वैज्ञानिक विधियों से निर्मित आयुर्वेदिक औषधियों जैसे जेरलाइफ-एम, जेरलाइफ-डब्ल्यू, अश्वरति, कोल्डकैल, एलेरकैल, त्विषामृत, याज्यामृत जैसी अनेक डबल-स्टैंडर्डाइज़्ड मल्टीस्पेक्ट्रम आयुर्वेदिक रसायन व औषधियाँ तथा त्रिफला-गुग्गुलु, आरोग्यवर्धनी वटी, पञ्चतिक्त घृत गुग्गुलु, गुडूची, तुलसी, आमलकी, हल्दी, शुंठी, चिरायता, लहसुन आदि औषधियाँ एंटीबायोटिक्स की जगह बचाव और उपचार का अच्छा साधन हैं। स्थानीय और बाहरी उपयोग के लिये एंटीबायोटिक्स की जगह जात्यादि तेल जैसी आयुर्वेदिक औषधियाँ अत्यंत उपयोगी हैं।
इस सब चर्चा का आम आदमी के जीवन में क्या महत्त्व है? पहली बात तो यह है कि प्रिवेंटिव रसायन और औषधियों का आयुर्वेदाचार्यों की सलाह के अनुसार प्रयोग करते रहने से हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता ठीक रहती है। तब न बीमार होंगे न एंटीबायोटिक्स से मुलाकात होगी! प्रिवेंटिव औषधियों में कालमेघ, तुलसी, शुंठी, गुडूची प्रमुख हैं जो व्याधिक्षमत्व बढ़ाती हैं। अपने आयुर्वेदाचार्य की सलाह से इन औषधियों का काढ़ा भी बनाकर लिया जा सकता है। उदाहरण के लिये हर डॉक्टर को पता है कि वायरल इन्फेक्शन में एंटीबायोटिक्स का खास लाभ नहीं है, फिर भी कॉमन कोल्ड में ही एंटीबायोटिक्स लिख बैठते हैं। वायरल संक्रमण के परिप्रेक्ष्य में जिन आयुर्वेदिक औषधियों में आधुनिक वैज्ञानिक शोध हुई है, उनमें अश्वगंधा, शुण्ठी, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची, पुदीना, हल्दी, यष्टिमधु, बिभीतकी, लहसुन, तुलसी, सहजन, चित्रक, कालमेघ, वासा, सप्तचक्र (सैलेसिया रेटीकुलाटा), दूधी (राइटिया टिंक्टोरिया) का क्षीर, आदि प्रमुख हैं। शहतूत की नई टहनियों में पाया जाने वाला आक्सीरेसवेराट्राल भी वाइरस रेप्लीकेशन को रोकता है। अश्वगंधा, कालमेघ आदि की न्यूरामिनिडेज-इन्हिबिटर एक्टिविटी ठीक वैसी ही है जैसी कि आधुनिक औषधियों जानामिविर, ओसेल्टामिविर व पेरामिविर की है। आधुनिक औषधियों के प्रति रेजिस्टैंट वायरस स्ट्रेन या अन्य माइक्रोब्स के स्ट्रेन विकसित हो जाने पर आयुर्वेद की औषधियाँ ही प्रभावी होती हैं। साथ ही आहार ऐसा हो जिससे जठराग्नि सदैव सम रहे एवं व्याधिक्षमत्व बढ़ा रहे। आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भ में कहें तो ऐसा आहार जो ऑक्सीडेंटिव स्ट्रेस लोड को कम से कम बढ़ाये, वही व्याधिक्षमत्व बढ़ा सकता है। रेसवेराट्रॉल एवं ऑक्सीरेसवेराट्राल युक्त खाद्य एवं पेय जैसे द्राक्षासव, ग्रीन-टी, द्राक्षा, अनार, आमलकी या आँवला, संतरे व अनन्नास आदि व्याधिक्षमत्व बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं क्योंकि ये एंटीऑक्सीडेंट तो हैं ही, इनमें एंटीवायरल और एंटीमाइक्रोब गुण भी हैं। हालाँकि अभी और शोध की आवश्यकता है, परन्तु ये औषधीय द्रव्य एंटीबायोटिक-प्रतिरोध को भी तोडऩे में सक्षम पाये गये हैं।
रोगप्रतिरोधक क्षमता बढऩे के साथ ही घर, बाज़ार, अस्पताल आदि से संक्रमण पकड़ लेने की संभावना को भी दूर करना जरूरी है। इस सन्दर्भ में महर्षि सुश्रुत द्वारा औपसर्गिक रोगों के सन्दर्भ में दिया गया संक्रामन्ति-नरान्नरम्-सिद्धांत सभी इन्फेक्शन्स के लिये महत्वपूर्ण है (सु.नि. 5.33-34): प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निश्वासात् सहभोजनात्। सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात्।। कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च। औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम्।। तात्पर्य यह है यौन संपर्क, शरीर से संपर्क, हाथ मिलाना, छोटी बूंदों से संक्रमण, पहले से संक्रमित व्यक्ति के साथ भोजन करना, संक्रमित व्यक्ति के साथ बैठना या सोना, संक्रमित व्यक्तियों के कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन और गहनों का उपयोग आदि से संक्रमण की आशंका रहती है। ऐसे संक्रामक या औपसार्गिक रोग एक से दूसरे व्यक्ति में संचारी होते हैं। अत: आचार्य सुश्रुत की बात मानते हुये संक्रमण स्रोतों से दूर रहना चाहिये।
इसके अलावा सम्यक दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का पालन करते रहना सदा उपयोगी है। भगदड़ के कारण स्वास्थ्य के लिये समय न देने का परिणाम अस्वस्थ रहकर खटिया में पड़े पड़े भोगना पड़ता है। अत: नस्य, व्यायाम, पैदल चलना, अभ्यंग, शरीर की सफाई, स्नान, साफ़-सुथरे कपड़े पहनना, योग, प्राणायाम, रात में सात घंटे की नींद आदि आवश्यक हैं। संक्रमण काल, ऋतु-संधिकाल, वर्षा, शरद और वसंत ऋतु में अणुतेल का प्रतिमर्श नस्य लेना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिये सुबह-शाम साफ़ अँगुली में अणुतेल की कुछ बूंदें डालकर नासाछिद्र में लगाना चाहिये। यह आरोग्य और दृढ़ता देती है। तमाम तरह के संक्रमण को भी रोकती है। इसके अलावा जैसा कि मैं कहता आया हूँ, आयुर्वेद के इतिहास में पिज्ज़ादिवर्ग, बर्गरादिवर्ग, कुर्कुरादिवर्ग, फिंगरचिप्सादिवर्ग, मैग्यादिवर्ग या उष्णकुत्तादि वर्ग जैसे आहार द्रव्य वर्णित नहीं हैं। इन्हें कभी-कभार लेना तो समझ में आता है पर दैनिक जीवन का हिस्सा न बनाने में ही भलाई है।
इस मसाले में डॉक्टर्स की व्यक्तिगत आदतें भी सुधारनी होंगी। वर्ष 2017 में वैश्विक हाथ स्वच्छता दिवस 5 मई के दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रोगाणुरोधी-प्रतिरोध से जूझने का आह्वान किया है। यह अस्पताल से लगने वाले या अधिग्रहीत संक्रमणों को रोकने, स्वास्थ्य-देखभाल सुविधाओं में रोगाणु-रोध के प्रसार को कम करने, और संक्रमण की ठोस रोकथाम व नियंत्रण पर केन्द्रित है। कहने को तो यह बार बार डॉक्टर्स को हॉस्पिटल में हाथ धोने की सलाह है, पर अभी भी संक्रमण की दर देखते हुये ऐसा लगता है कि डॉक्टर्स ने हाथ धोने के बजाय समस्या से ही हाथ धो लिया है।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध से जूझना कठिन चुनौती है। आप इस पचड़े में नहीं पडऩा चाहते तो आयुर्वेद की ओर रुख कीजिये। युक्ति से उम्र बढ़ाई जा सकती है और इसी युक्ति का नाम आयुर्वेद है। एंटीबायोटिक-प्रतिरोध के कारण चिकित्सा की विफलता का बचाव आयुर्वेद से ही संभव है। स्वास्थ्य की छोटी-मोटी जरूरतों के लिये एंटीबायोटिक लेना आत्मघाती है।





