वर्षा त्रतुचर्या 21 जून से 20 अगस्त, 2014

(सायणमान के अनुसार) ऋतुचर्या बताने का सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस की जानकारी के अभाव में हम सामान्यत: मौसम के मिजाज को समझते नहीं है और बदलते मौसम में शरीर के लिए अनुकूल आहार-विहार क्या है और प्रतिकूल आहार-विहार क्या-क्या है इससे अनभिज्ञ रह जाते हैं। परिणामत: सामान्यजन बीमार हो जाता है।

वर्षा ऋतु को ‘चौमासाÓ कहा जाता है। आयुर्वेदज्ञों ने इस ऋतु में स्वास्थ्य रक्षा के लिए ‘ऋतु चर्या  के कुछ नियम बनाये हैं। उनका पालन करने पर इस ऋतु में स्वस्थ रहा जा सकता है।

आयुर्वेद के ग्रन्थ चरक संहिता के सूत्रस्थान में कहा गया है-

भूवाष्पान्मेघनिष्यन्दात् पाकादम्लाज्जलस्य च।

वर्षा स्वग्नि बलेक्षीणे कुप्यन्ति पवनादय:।।

अर्थात् वर्षा का जल गर्म भूमि पर गिरने से भूमि से निकलने वाले वाष्पों से, पानी बरसने से तथा जल का अम्लविपाक होने से जब पाचक अग्नि क्षीण होती है तब वात दोष कुपित होता है। आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में पित्त का संचय होता है, कफ शान्त रहता है, वात (वायु) का प्रकोप रहता है और पाचक अग्नि दुर्बल रहती है। यह वर्षा ऋतु का गुण प्रभाव है।

वर्षा ऋतु में हमारी जठराग्नि कमजोर रहती है और वात प्रकोप रहता है वात के कुपित होने से इस से जुड़े पित्त और कफ भी कुपित हो जाते हैं। इसलिए इस ऋतु में सभी नियमों का पालन करते हुए उचित आहार विहार करना चाहिए। इस का अर्थ है कि हम त्रिदोष नाशक और अग्निदीपक आहर-विहार करें। ध्यान रहे कि आहार की मात्रा और जठराग्नि का परस्पर बड़ा गैरा सम्बंध होता है। आहार की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की पाचन शक्ति पर निर्भर रहती है। अर्थात् जितनी मात्रा में आहार ठीक से और समय से पच जाए, उतनी ही मात्रा में आहार लेना, आहार की उचित मात्रा है। इस के अतिरिक्त शाम का भोजन जल्दी करना चाहिए ताकि सोने के वक्त तक भोजन ठीक तरह से पच जाए।

वर्षा ऋतु में वात दोष कुपित होता है, अत: बुजर्गों और वातजन्य रोगों के मरीजों को विशेष रूप से वातवर्धक खानपान और रहन सहन से बचना चाहिए।

सम्भावित रोग

पाचन शक्ति का कम होना, शारीरिक कमज़ोरी, रक्तविकार, वायुदोष, जोड़ों का दर्द, सूजन, त्वचा-विकार, दाद कृमिरोग, ज्वर, मलेरिया, पेचिश तथा अन्य वायरस एवं जीवाणुजन्य रोग होने की सम्भावना रहती है।

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