क्या है फलित ज्योतिष?…एक सांकेतिक विज्ञान या मात्र अंधविश्वास!!

संगीता पुरी

लेखिका गत्यात्मक ज्योतिष की विशेषज्ञ हैं।

आसमान के विभिन्न भागों में विभिन्न ग्रहों की स्थिति के कारण पृथ्वी पर या पृथ्वी के जड़ चेतन पर पडऩेवाले प्रभाव का अध्य्यन फलित ज्योतिष कहलाता है। यह विज्ञान है या अंधविश्वास, इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं, भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। वे ज्योातिष को मानते हुए सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर कर देते  है। दूसरी ओर वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत ज्योतिष को जीवनभर न मानने वाले व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं।

ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मैं सरकार,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानती हूं। इन्होंने आजतक ज्योतिष को न तो अंधविश्वास ही सिद्ध किया और न ही विज्ञान? सरकार यदि ज्योतिष को अंधविश्वास समझती तो जन्मकुंडली बनवाने या जन्मपत्री मिलवाने के काम में लगे ज्योतिषियों पर कानूनी अड़चनें आ सकती थी। यज्ञ हवन करवाने या तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनेवाले ज्योतिषियों के कार्य में बाधाएं आ सकती थी। सभी पत्रिकाओं में राशि-फल के प्रकाशन पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ, मद्यपान, बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। मैं पूछती हूं, आखिर क्यों??

क्या सरकार ज्योतिष को विज्ञान समझती है? नहीं, अगर वह इस विज्ञान समझती तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, सेमिनार आदि का आयोजन होता तथा विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। परंतु आजतक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू, भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य?

जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें, उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए। उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों,पत्रिकाओं में स्थान मिलना चाहिए। परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है, जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।

ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंड़ल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है? पर बात ऐसी नहीं है। जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है, ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं, वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं, अमुक शहर आ गया।ं जिस पृथ्वी में हम रहते हैं, उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है?

ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है, पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं। इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि अलग अलग विज्ञान में एक ही शब्द का अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकता हैं। अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड़ में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। प्राचीन खगोल शास्त्रियों को इन बातों की जानकारी थी, तभी तो सबकी सटीक गणना के सूत्र विकसित किए जा सके थे, किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंड़ल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है। सूर्य, चंद्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी, उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह यानि पृथ्वी  के जड़ चेतन पर प्रभाव डालनेवाला कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।

तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है, जबकि ये ग्रह नहीं हैं। ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही। ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं। अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड़ की छाया दूसरे पिंडों पर पडऩे से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते देखा, तो वे इसके कारण ढूंढऩे लगे। दोनो ही समय इन्होने पाया कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी एवं सूर्य, चंद्र के परिभ्रमण-पथ पर कटनेवाले दोनो विन्दु लम्बवत् हैं।

बस उन्होने समझ लिया कि इन्हीं बिन्दुओं के फलस्वरुप खास अमावस्या को सूर्य तथा पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र आकाश से लुप्त हो जाता है। उन्होंने इन बिन्दुओं को महत्वपूर्ण पाकर इन बिन्दुओं का नामकरण राहूं और केतुं कर दिया। इस स्थान पर उन्होंने जो गलती की, उसका खामियाजा ज्योतिष विज्ञान अभी तक भुगत रहा है, क्योंकि राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड हैं ही नहीं और हमलोग ग्रहों की जिस उर्जा से भी प्रभावित हों, गुरुत्वाकर्षण, गति, किरण या विद्युत-चुम्बकीय शक्ति, राहू और केतु इनमें से किसी का भी उत्सर्जन नहीं कर पाते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यही कारण है कि राहू और केतु पर आधारित भविष्यवाणी सही नहीं हो पाती। ‘गत्यात्मक ज्योतिषÓ के जनक श्री विद्या सागर महथा जी ने अपने 45 वर्षों के शोध में कहीं भी राहू केतु का प्रभाव नहीं पाया।

चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया, पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी। महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया।

अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया। फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है, इसके कुल 10-12 सूत्र हैं, सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है, पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं – एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए, तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है, तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही।

अगला तर्क यह है कि आजकल सभी पत्रिकाओं में राशिफल की चर्चा रहती है। एक राशि में जन्म लेनेवाले लाखों लोगों का भाग्य एक जैसा कैसे हो सकता है? यह वास्तव में आश्चर्य की बात है, किन्तु यह सच है कि किसी ग्रह का प्रभाव एक राशि वालो पर एक जैसा पड़ता है, उससे भी अधिक एक लग्न के लाखों करोड़ों लोगों पर किसी ग्रह का एक जैसा फल देखा गया है। एक जैसे फल से एक स्वभाव वाले फल का बोध होगा, न कि मात्रा में समानता का। मात्रा का स्तर तो उसकी जन्मकुंड़ली एवं अन्य स्तर पर निर्भर करता है, जैसे किसी खास समय किसी लग्न के लिए धन का लाभ एक मजदूर के लिए 50-100रु का तथा एक बड़े व्यवसायी के लिए लाखों-करोड़ों का हो सकता है।

इसी तरह गणित की सुविधा के लिए किए गए आकाश के 12 काल्पनिक भागों के आधार पर भी ज्योतिष को गलत साबित करने की दलील दी जाती है। यदि इसे सही माना जाए तो आक्षांस और देशांतर रेखाओं पर आधारित भूगोल को भी गलत माना जा सकता है। आकाश के इन काल्पनिक 12 भागों की पहचान के लिए इनकें विस्तार में स्थित तारासमूहों के आधार पर किया जानेवाला नामकरण पर किया जानेवाला विवाद का भी कोई औचित्य नहीं हैं, क्योंकि आकाश के 360 डिग्री को 12 भागों में बॉट देने से अनंत तक की दूरी एक ही राशि में आ जाती है।

पूजा-पाठ या ग्रह की शांति से भाग्य को बदल दिए जाने की बात भी वैज्ञानिको के गले नहीं उतरती है। हमारे विचार से भी ऐसा कर पाना असंभव दिखता है। किसी बालक के जन्म के समय की सभी ग्रहों सहित आकाशीय स्थिति के अनुसार जो जन्मकुंड़ली बनती है, उसके अनुसार उसके पूरे जीवन की रुपरेखा निश्चित हो जाती है, ऐसा हमने अपने अनुभव में पाया है। पूजा पाठ या ग्रह-शांति से भाग्य में बदलाव लाया जा सकता, तो प्राचीन काल से इसका सर्वाधिक लाभ पंडित वर्ग के लोग ही उठाते और समाज के अन्य वर्गों की तरक्की में रुकावटें आती। लेकिन यह सत्य है कि पूजा-पाठ, यज्ञ-जाप, मंगला-मंगली, मुहूत्र्त  आदि अवांछित तथ्यों एवं हस्त्रेखा, हस्तांक्षर विज्ञान, तंत्र-, जादू-टोना, भूत-प्रेत, झाडफ़ूंक, न्यूतमरोलोजी, फेंगसुई, वास्तु, टैरो कार्ड, लाल किताब आदि ज्योतिष से इतर विधाओं के भी ज्योकतिष माने जाने से ही ज्योतिष विज्ञान की तरक्की में बाधा पहुंची है। ज्योतिष विज्ञान ग्रहों की स्थिति का मात्र पृथ्वी के जड़ चेतन से संबंध रखता मूलत: संकेतों का विज्ञान है, यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं।