चाणक्य केवल नाटक नहीं एक आंदोलन है

 आचार्य चाणक्य अपनी कूटनीति और अर्थशास्त्र के लिए देश ही नहीं दुनिया भर में जाने जाते हैं। ऐसे विश्वविख्यात महापुरूष को रंगमंच पर साकार करते हैं प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता मनोज जोशी। मनोज जोशी अभिनीत चाणक्य एक अत्यंत ही प्रभावशाली और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत नाटक है। इसके प्रारंभ में ही जो डिस्क्लेमर यानी कि घोषणा मनोज जोशी करते हैं, वह अपने आप में इस नाटक की बेहतरीन प्रस्तावना है। इस घोषणा में जोशी कहते हैं कि यदि इस नाटक से किसी भी व्यक्ति या घटना का सादृश्य प्रतीत होता है तो यह अनायास नहीं है, यही इस नाटक का उद्देश्य है। आचार्य चाणक्य को मनोज जोशी वर्तमान संदर्भों में और वर्तमान समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पिछले दिनों भारतीय धरोहर के प्रतिनिधि सम्मेलन के अवसर पर चाणक्य के मंचन के लिए दिल्ली आए मनोज जोशी से सह संपादक रवि शंकर ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है उसके संपादित अंश :

सबसे पहले तो मैं आपको बधाई देना चाहूंगा, एक इतने प्रभावी नाटक के मंचन के लिए।

जी धन्यवाद। यह विषय सबका प्रिय है या नहीं, मुझे नहीं पता परंतु पूरे भारतवर्ष में चाणक्य के मैंने 878 शो किए हैं। हर जगह मुझे काफी अच्छा प्रतिसाद मिला है।

इसका प्रस्तुतिकरण काफी प्रभावी है। काफी प्रासंगिक भी लगता है। वास्तव में इतिहास काफी बोरिंग और पुराना जैसा प्रतीत होता है, परंतु आपका प्रस्तुतिकरण आज की परिस्थितियों के साथ काफी जुड़ता है। परंतु सबसे पहले मैं आपके व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानना चाहुँगा। आप कहां के रहने वाले हैं, शिक्षा-दीक्षा कहां हुई, अभिनय के क्षेत्र में कब और कैसे प्रवेश हुआ आदि आदि।

मैं एक वेदाभ्यासी परिवार का सदस्य हूँ। मेरे दादा, परदादा सभी वेदाध्यायी थे। इसलिए संस्कृत का प्रभाव मुझ पर बचपन से ही था। इसलिए बचपन से ही ऐसे विषयों में रूचि रही {jathumbnail off} है। मेरी पढ़ाई तो रायगढ़, महाराष्ट्र में हुई है।

मूलत: आप संभवत: गुजरात से हैं?

जी हां। मैं गुजराती हूँ। परंतु वैसे तो हम उत्तर से आए हुए हैं। लगभग 10-12 पीढ़ी पहले। वास्तव में पूरे देश में जो भी जोशी हैं, वे उत्तर से ही आए हुए हैं। यह इतिहास है। बाद में मेरे दादा महाराष्ट्र चले गए। खैर, बचपन से ही मुझे नाटकों से काफी लगाव था। मेरे पिता नारदीय परंपरा के कथाकार हैं। वे कीर्तन करते हैं परंतु नारदीय परंपरा में कीर्तन का अर्थ केवल गाना नहीं, बल्कि किसी अभ्यंग या दोहे या श्लोक पर तीन घंटों का साभिनय प्रस्तुतिकरण होता है। उसमें कई रसों का प्रदर्शन होता है। यह बचपन से देखी हुई चीज है। संभव है कि मुझमें अभिनय के गुण वहीं से आए हों। फिर मैं चित्रकार बनना चाहता था। मैंने तीन वर्षों तक पेंटिंग की पढ़ाई भी की। फिर कामर्शियल आर्टिस्ट बन गया। कुछेक समय समाचार पत्रों में भी काम किया।

अच्छा, तो आप पत्रकारिता से भी जुड़े रहे हैं?

(हंसते हुए) हां, थोड़ा सा उससे भी जुड़ा रहा हूँ। उस समय पेज कम्प्यूटर पर नहीं बना करते थे, वे हाथ से ही बनाए जाते थे। हाथों से ही सारा आर्ट वर्क करना होता था। आलेखों में इलस्ट्रेशन और कैरीकेचर आदि बनाने का काम मैं किया करता था। लेकिन नाटकों से मेरा जुड़ाव बना रहा। इंटरस्कूल और इंटरकालेज के नाटकों में मैं भाग लिया करता था। लेकिन मेरे जीवन का पहला व्यावसायिक नाटक यही चाणक्य था।

आप उस चाणक्य की बात कर रहे हैं, जो टेलीविजन पर आया था?

नहीं, मैं अपने नाटक इस चाणक्य की बात कर रहा हूँ। टी.वी. पर जो चाणक्य आया था, उससे पहले मैं इसका मंचन कर चुका था। तब यह नाटक गुजराती में था। तब मैं बीस साल का था। फिर 1994-95 में बंद कर दिया। फिर 1997 में इसे हिंदी में बनाने की सोचा। हिंदी में बनाने की प्रेरणा मुझे शफी ईनामदार ने दी। मेरे मित्र मिहिर भूता ने हिंदी में यह नाटक मेरे लिए लिखा। फिर इस नाटक को संशोधित और संवर्धित करने में हमें तीन साल लगे। हमारे पास ऐतिहासिक साक्ष्य केवल मुद्राराक्षस का था। दूसरा आधार था कौटिल्य अर्थशास्त्र। उसमें से यह बात निकाली कि चाणक्य की सोच सुराष्ट्र बनाने की थी । उसमें जो भी प्रकरण हैं, किसान, प्रजा, राजा, युद्ध, कूटनीति आदि के, उसमें से हमने यह समझने का प्रयास किया कि चाणक्य एक व्यक्ति के रूप में कैसे रहे होंगे।

दुखद यह है कि हमारे पास इसका कोई लिखा इतिहास नहीं है। केवल दंतकथाएं ही उपलब्ध हैं। उसकी संगति लगाकर और तर्क की कसौटी पर कस कर और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और सावरकर के किए वर्णनों के आधार पर हमने इस नाटक की रचना की। मेरा सौभाग्य है कि मुझे एक ऐसा दोस्त लेखक मिला जिसने मेरे लिए इस नाटक को लिखा। केवल 22 वर्ष की आयु में मैंने शुरू किया था। 23 साल में इसका पहली बार मंचन किया। टी.वी पर चाणक्य 1990 में आया था। इसे हमने 1989 में किया था 1886 में तैयारी शुरू की थी। इतने विशाल फलक को केवल ढाई-तीन घंटो में ढालना शिवधनुष को उठाने जैसा ही कष्टसाध्य काम था। इस विषय के प्रति इतना हमारा आग्रह इतना प्रबल था कि सभी बाधाओं को हम पार कर पाए।

चाणक्य को लेकर यह पैशन या आग्रह क्यों था? कोई खास उद्देश्य था या फिर कोई नाटक करने भर के लिए चाणक्य चुन लिया?

इस नाटक को करने के पीछे हमारा उद्देश्य बहुत साफ था कि लोगों तक एक राष्ट्र की भावना पहुंचाई जाए। सुराष्ट्र कैसा हो, राजनेता कैसा हो, नागरिक भी कैसे सजग हों, यह संदेश लोगों तक पहुंचाना ही इस नाटक का उद्देश्य था और है। यह नाटक मेरे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। मैं इस नाटक को करने के लिए कभी भी समय निकाल लेता हूँ। उस इतिहास की पुनरावृत्ति हम अभी भी देख सकते हैं। नरेंद्र मोदी जी भी एक सामान्य घर से हैं। इच्छाशक्ति अगर प्रबल हो और राष्ट्रप्रेम हो तो कुछ भी संभव है। मैं किसी एक का नाम नहीं लूंगा परंतु पूरे देश में इतना वंशवाद भरा हुआ है।, लेकिन नरेंद्र मोदी तो किसी भी वंश से नहीं हैं। इसलिए चाणक्य काफी प्रासंगिक हैं। न केवल विचारों से, बल्कि  राजनीति और समानता की उनकी जो सोच थी उससे भी। माक्र्स तो काफी बाद में हुए। मैं तो मानता है कि दुनिया का पहले समानतावादी चाणक्य थे, माक्र्स नहीं। उन्होंने जाति व्यवस्था को कर्मनुसार बताया।

चाणक्य कहते हैं कि कोई ब्राह्मण यदि नीच कर्म करता है तो वह ब्राह्मण नहीं रह जाता। यही वेदों के अनुकूल भी है। वे राजनीति को भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों पुरूषार्थों पर आधारित बनाया। आज यह संदेश काफी प्रासंगिक है। देश में जितने भी आक्रमणकारी आए, उन्होंने इस वर्ण-व्यवस्था का दुरूपयोग किया, उसका प्रतिकार कैसे किया जा सकता है, यह चाणक्य से हम सीख सकते हैं। एक संघ-राष्ट्र हो, इसका संदेश लोगों तक जाए, हर नागरिक के हृदय में सजगता पैदा हो, यही चाणक्य का उद्देश्य था और यही हमारे नाटक का उद्देश्य भी है। जो हमारी घरोहर है, वह लोगों तक पहुंचे। मुझे यह बताते हुए गर्व होता है कि देश के सभी प्रमुख आइएस, आइपीएस, नेतागण सभी ने इसे देखा है। यह मोदी जी का भी काफी प्रिय नाटक है। यह नाटक इतने वर्षों से अविरत चल रहा है और प्रभाव छोडऩे में भी सफल रहा है। लोगों के मनो-मस्तिष्क में प्रबल राष्ट्रभक्ति का संचार कर देता है। साथ ही दो-आठ-दस-पचीस हजार लोगों तक के बीच इसका मंचन हुआ है। आज के समय में इतनी कठिन हिंदी में होने के बावजूद लोग इसे समझ रहे हैं, इसकी प्रशंसा कर रहे हैं तो यह हमारी उपलब्धि है। भाषा हो या राजनीति हो या हमारी धरोहर हो, हम देश की सुप्त चेतना को जगाने का प्रयास कर रहे हैं।

आज टी.वी. और फिल्मों का दौर है। तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि हर चीज को आदमी मोबाइल में लिए घूमता है। क्या आपको नहीं लगता है कि ऐसी स्थिति में आप इन माध्यमों का उपयोग करते तो यह और प्रभावी और व्यापक हो पाता?

निश्चित रूप से। मैं करना भी चाहता हूँ। इस दिशा में प्रयासरत भी हूँ। कुछ दिनों में संभवत: आपको कुछ देखने को मिले भी। कुछ लोग भी हैं जो इसमें हमारे साथ हैं। लेकिन वह रहेगा लाइव। रिकार्डिंग नहीं होगी। फिल्म बनाना कोई कठिन काम नहीं है। हो सकता है कि फिल्म बनाऊं, या फिर ऐसा भी हो सकता है कि ऐसा नाटक बनाउं जो दोनों का संगम हो। लाइव भी हो और उसमें विजुअल्स भी हों जिससे जो मैं नहीं बता या दिखा पा रहा हूँ, उसे दिखा-बता पाऊं।

आप बॉलीवुड से जुड़े हुए हैं। बॉलीवुड तो पूरी तरह व्यावसायिक दुनिया है। ऐसी दुनिया में रहते हुए आप इस कार्य में कैसे जुड़े हुए हैं? इसकी प्रेरणा आपको कहां से मिलती है? दोनों में सामंजस्य कैसे बिठाते हैं?

मेरी जो परवरिश हुई है वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में हुई है। संघ के संग में जो भी जुड़ गया, वह इन उद्देश्यों को नहीं भूल सकता। मैं उससे बहुत प्रभावित हूँ। उसके विचार से उसके राष्ट्रवाद से। यह अब मेरे डीएनए में है, वहां से तो अब वह निकाली नहीं जा सकती। इसलिए मुझे जो करना है, वह मैं कर रहा हूँ। इस नाटक में मैं मुंहमांगी फीस मांग सकता हूँ। परंतु मुझे अगर केवल पैसे ही मांगने होते तो फिर चाणक्य नाटक मैं नहीं करता। व्यवसाय तो सभी के साथ जुड़ा हुआ है। 20-25 लोगों की टीम है। परंतु उसका खर्च निकल जाए, इतनी भर ही कोशिश रहती है। दूसरी बात यह है कि यह नाटक मेरी आजीविका का स्रोत नहीं है। हम कलाकारों का भी समाज के प्रति कोई दायित्व है। होना भी चाहिए। चाणक्य की एक बात बहुत कमाल की है। मैं अपने आस-पास क्या कर सकता हूँ, यह यदि मनुष्य सोचे तो ही देश आगे बढ़ेगा, यही चाणक्य की सोच है। यही सोच मेरे अंदर भी है। यह जेनेटिक है। हूँ मैं ऐसा। मुझे अच्छा भी लगता है।

यही कारण है कि इसके इतने सारे शो हो पा रहे हैं। आज जब हिंदी की इतनी दयनीय अवस्था हो चुकी है कि उसके लिए ट्यूशन लगाने पड़ते हैं, ऐसी स्थिति में माँ-बाप बच्चों को यह नाटक दिखाने लाते हैं जिसकी हिंदी इतनी क्लिष्ट है। वे कहते हैं कि इसे चलाया करो, यही मेरा बल है। इसलिए चाणक्य को मैं नाटक समझ कर करता भी नहीं, यह मेरा आंदोलन है। चाणक्य एक विचारधारा है। मैं यही यज्ञ कर सकता हूँ।

जैसा कि आपने कहा कि चाणक्य एक आंदोलन है तो क्या कुछ ऐसे प्रयास भी कर रहे हैं कि ऐसे और भी समूह खड़े हों, या फिर चाणक्य के अतिरिक्त और भी महापुरूषों जैसे कि छत्रपति महाराज शिवाजी, स्वामी विवेकानंद, महाराणा प्रताप आदि पर काम हो?

देखिए, मैं दूसरों की बात तो नहीं कर सकता, लेकिन मैं जब तक हूँ, मैं स्वयं काम करता रहूंगा। स्वामी विवेकानंद पर काम होना चाहिए। समस्या यह है कि आज की पीढ़ी काफी तेज और तेजस्वी है परंतु वह अपनी जड़ों से थोड़ा अलग हो गई है। मुझे लगता है कि यदि उनका उससे परिचय भी करवा दिया जाए तो काफी काम हो सकता है। इसमें मैं जितना कर सकता हूँ, उतना करता रहूंगा। और समूह खड़े हो जाएं तो और भी अच्छी बात है। और कर भी रहे हैं। ऐसा नहीं है कि मैं ही केवल झंडा लेकर खड़ा हूँ। मैं इस विचार में अकेला ही नहीं हूँ। और लोग भी कर रहे हैं। स्वाधीनता के बाद बीच के कालखंड में एक ऐसा समय आया जब लोग सोचने लगे कि केवल अपना देख, दूसरा भले खाई में गिरे। दूसरों से कोई लेना-देना नहीं। यह मानसिकता बहुत भयंकर है। इसे दूर करना होगा।

आप बॉलीवुड से कैसे जुड़े?

मैं नाटक के अलावा टेलीविजन के धारावाहिकों में काम कर रहा था। हरेक अभिनेता का सपना होता है कि वह बॉलीवुड में जाए। मुझे मौका मिला, तो मैं भी गया। फिल्मों ने मुझे काफी नाम  और प्रतिष्ठा दिलाई। अच्छी फिल्में कर रहा हूँ। परंतु वहां हर रोल मेरे अनुसार तो होगा नहीं और मैं एक बहुमुखी कलाकार हूँ। मैं किसी एक इमेज में बंधना नहीं चाहता। कई बार लोग चाणक्य नाटक देखने के बाद मुझसे पूछते हैं कि आप फिल्मों में वैसे रोल क्यों करते हैं। मैं कहता हूँ कि मैं करता नहीं हूँ, मुझे करने पड़ते हैं। आखिर मुझे भी अपना परिवार चलाना है। परंतु थिएटर मेरा प्यार है। उससे मुझे लगाव है। वह मुझे एक कलाकार के रूप में जिंदा रखता है। वह मेरी माँ है। बचपन से मेरा अभिनय से जुड़ाव था तो बॉलीवुड में तो जाना ही था।

बीच में आप चित्रकला की ओर मुड़ गए थे। क्या अब कभी समय निकाल पाते हैं, पेंट और ब्रश के लिए?

हां, समय निकालता हूँ। अपने लिए, अपनी आत्मा की खुशी के लिए। कई बार प्रदर्शनी देखने भी जाता हूँ। अनेक साथी चित्रकारों के साथ भी जुड़ा हुआ हूँ।

फिल्मों का जैसा क्रेज समाज में बढ़ रहा है। गांवों में भी पहले प्रवचन होते थे, नाटक होते थे। आज वहां भी उनकी जगह केवल फिल्में ही देखी जाने लगी हैं। ऐसे में रंगमंच के लिए आप कितनी संभावना देखते हैं? इसका भविष्य दिखता है कुछ?

मैं एक बात निश्चित रूप से जानता हूँ। लाइव आर्ट कभी भी नहीं मरेगा। कालीदास के जमाने से, महाभारत के समय से यह कला चली आ रही है। चाहे नृत्य हो, वादन हो या नाट्यकला हो। यदि आप कुछ सार्थक देंगे तो लोग अवश्य आते हैं। एक ही बात है कि आजकल प्रचार का युग है। यदि प्रचार ठीक से हो तो लोग निश्चित रूप से आते हैं। इसका जीवंत उदाहरण चाणक्य है। दूसरी बात यह है कि मैं अपनी फिल्मों की शूटिंग में से समय निकाल कर नाटक को पहली प्राथमिकता देता हूँ। यदि मैं प्रामाणिकता से काम करता हूँ तो लोगों तक वह उसी प्रामाणिकता के साथ पहुंचता है और तब लोग भी आते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि नाटक कभी मरेगा। यदि ऐसा मुझे लगता तो मैं स्वयं नाटक नहीं करता। लगभग सौ फिल्में करने के बाद मुझे कोई जरूरत नहीं है नाटक करने की। कई अभिनेता हैं जो अभी भी अपने व्यस्तता में भी समय निकाल कर रंगमंच पर आते हैं, नाटक करते हैं। परेश रावल साहब हैं, नसीरूद्दीन शाह हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? ऐसा है कि प्यार दोनों ओर से होना चाहिए।

आज यदि नाटक को और स्थापित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

काफी कुछ है जो किया जा सकता है। पहली बात तो यह है कि  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की देश भर में शाखाएं होनी चाहिए। अभी यह केवल दिल्ली में है। इसमें अभी पूरे भारत से 60 या 80 छात्र यहां आते हैं। इससे अच्छा है कि हरेक राज्य में इसकी शाखा हो और वहां विद्यार्थी इसका अभ्यास करें। कला तो कला है। वह तो शुद्धता की अवस्था में है। यदि उसे लोगों तक ले जाने के लिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में इसका संयोजन होना चाहिए। इसे शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए। मेरे समय तक शिक्षा का उद्देश्य तो तीन ही प्रकार की नौकरी पाना होता था – डाक्टर, इंजीनियर और शासकीय सेवा। इसके आगे की सोच ही नहीं थी। ऐसा हमारी धरोहर को नष्ट करने के लिए अंग्रेजों ने बनाया था। इसे बदलना होगा। यदि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को हर विश्वविद्यालय से जोड़ दिया जाए तो विद्यार्थियों में रूचि तो पैदा होगी ही। उनमें रचनात्मकता बढ़ेगी। और रूचि केवल कलाकारों में नहीं चाहिए, कला देखने वालों में भी रूचि होनी चाहिए। उस समय के राजा-महाराजा इसका संरक्षण करते थे, तो आज क्यों नहीं हो रहा? यह भी एक सवाल है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कितने छात्र बाद में नाटक करते हैं? वे भी बाद में फिल्मों में ही काम करते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। परंतु मेरा कहना है कि यदि सात साल आपने पढ़ाई की है और आप पर देश ने कुछ लाख रूपये खर्च किए हैं तो आपको भी इसके लिए कुछ करना चाहिए। पेट सभी के पास है, परंतु उसके साथ भी तो कुछ करना चाहिए न। आज इसी सोच को जिंदा रखने की आवश्यकता है। मैं जितनी तन्मयता से नाटक करता हूँ, लोग भी उतनी ही तन्मयता से उसे देखते हैं।

आपको लगता है कि कला को शिक्षा से जोडऩे से लोगों में संवेदनशीलता भी बढ़ेगी? उनमें दूसरों के प्रति, समाज के प्रति सोचने का भाव जगाएगी।

बिल्कुल। मुझे यह सब सोचने का भाव कला ने ही दिया है। यह संवेदना रंगमंच ने ही दी है। और फिर उसमें राष्ट्रभावना स्वयं ही आ जाती है।

भारतीय धरोहर के पाठकों के लिए आप कोई संदेश देना चाहेंगे?

मैं केवल इतना कहना चाहूंगा कि हम केवल हमारे बच्चों को अपनी धरोहर की कोई भी चीज से परिचय कराएं। पहले हम स्वयं जानें, फिर इससे अपने बच्चों को भी अवगत कराएं। केवल अपने तक इन्हें सीमित न रखें। इससे अपने बच्चों को भी जोड़ें। अपनी भाषा, अपना साहित्य, अपना ज्ञान-विज्ञान, इनकी जानकारी अपने बच्चों को दें। आज लोगों को शेक्सपीयर की जानकारी है परंतु कालीदास की नहीं। ऐसा क्यों है? हमारा धर्म कोई चौखट में बंद धर्म नहीं है। वह वैज्ञानिक और उदार है। परंतु उसकी तार्किकता, वैज्ञानिकता लोगों तक जाए। इसके लिए हरेक माँ-बाप को अपने बच्चों को इनकी जानकारी देनी चाहिए। भारतीय धरोहर के पाठकों को तो यह करना ही चाहिए।