ध्यानचंद के डर से ब्रिटेन ने टाल दिया था ओलंपिक में खेलना

संजय श्रीवास्तव

लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं।

क्या आपको मालूम है कि वर्ष 1928 के एमस्टर्डम ओलंपिक में जाने के लिए ब्रिटेन की टीम पूरी तैयारी कर चुकी थी। लेकिन उसने अंतिम मौके पर अपना नाम एक शख्स की वजह से प्रतियोगिता से वापस ले लिया। ये शख्स कोई और नहीं बल्कि हॉकी के जादूगर ध्यानचंद थे। हुआ ये कि जब भारतीय टीम पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए रवाना हुई तो वह कुछ दिनों के लिए ब्रिटेन में रुकी, ताकि वहां कुछ अभ्यास मैचों में हिस्सा ले सके। अंग्रेजों को लगता था कि इन अभ्यास मैचों में भारतीय टीम की बुरी दुर्गति होगी। इसके बाद भारत को हराकर ब्रिटेन की टीम जब ओलंपिक में जाएगी तो उसके हौसले पूरी तरह बुलंद होंगे। लेकिन हुआ उल्टा। ध्यानचंद की अगुवाई में भारत ने ब्रिटेन में उनकी टीम को इस कदर धोया कि उनके सिर झुक गए। जब से वह भारत पर राज कर रहे थे, तब से कभी उन्हें इस कदर अपमान का अनुभव नहीं हुआ था, जैसा इस बार हॉकी मैदान पर। कहां तो वह श्रेष्ठता और गोरी चमड़ी पर बहुत गुमान करते थे और उन्हें लगता था कि जिन भारतीयों पर वो राज कर रहे हैं, वो उनके सामने कहां ठहरेंगे, उन्हीं भारतीयों ने हॉकी के मैचों में लगातार उनकी ऐसी बोलती बंद की कि उन्हें लगा कि ओलंपिक में फिर अपना अपमान कराने से अच्छा है कि इसमें हिस्सा ही मत लो। दरअसल ओलंपिक में हार का एक अलग संदेश भी पूरी दुनिया में जाता कि जिस देश पर ब्रिटेन राज कर रहा है, उसी देश ने उन्हें धो दिया। उनकी श्रेष्ठता के दावों को इससे बड़ा झटका सार्वजनिक तौर पर और क्या लग सकता था। ब्रितानी हुक्मरानों को भी लगा कि ये ठीक नहीं होगा। बस रातों रात मंत्रणा की गई और ब्रिटेन ने ओलंपिक की हॉकी स्पर्धा में नहीं उतरने का फैसला कर लिया। ये पहला मौका था जब किसी ने अंग्रेजों के घंमड को चूर चूर कर दिया था और वह ध्यानचंद ही थे। जो ब्रिटेन के मैदान पर इस कदर हीरो बनकर उभरे कि महारानी से लेकर हर कोई उनका लोहा मान गया।

दरअसल वर्ष 1928 में होने वाले एमस्टर्डम ओलंपिक से पहले भारतीय हॉकी संघ छोटे रूप में अस्तित्व में आ चुका था। इसने धीरे धीरे अपनी सक्रियता बढ़ानी शुरू की और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी को समझाने की कोशिश की गई कि हाकी को ओलंपिक में शामिल किया जाए। दरअसल वर्ष 1920 के एंटवर्प ओलंपिक खेलों के बाद हॉकी को ओलंपिक से हटा दिया गया था। वर्ष 1924 के पेरिस ओलंपिक में हॉकी को नहीं रखा गया था।  जब ये चर्चाएं चल रही थीं कि हॉकी को फिर से ओलंपिक में फिर से शामिल कर लिया जाएगा, तब हिन्दुस्तानी रेजीमेंट में ये चर्चाएं भी होती थी कि अगर हिन्दुस्तान ने ओलंपिक में अपनी टीम भेजी तो उसमें ज्यादातर खिलाड़ी सेना के ही होंगे और उसमें ध्यानचंद का चयन पक्का होगा। हॉकी संघ के कर्ताधर्ता अंग्रेज सैनिक अधिकारी ही थे। तत्कालीन भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष मेजर बर्न मुर्डोक थे। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने भारत के अनुरोध को मान लिया और हॉकी को दोबारा ओलंपिक खेलों में जगह मिल गई। भारत ने इसमें अपनी टीम भेजने का फैसला किया। समस्या ये थी कि किस तरह देश की सर्वश्रेष्ठ टीम चुनी जाए बल्कि किस तरह चयन प्रतियोगिता की जगह तय की जाए। भारतीय हॉकी संघ ने कोलकाता (तत्कालीन नाम कलकत्ता) में परीक्षण मैच कराने का फैसला किया। ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा गोल में कई बार जिक्र किया है कि वह अपने जीवन में अंग्रेजों की दो बातों से बहुत प्रभावित रहे। पहला ये कि अंग्रेज खिलाडिय़ों और सैनिक अधिकारियों ने औपनिवेशिक काल और नस्ली श्रेष्ठता के दौरे में भी हॉकी खेल को भेदभाव और रंगभेद से दूर रखा। उन्होंने बगैर पक्षपात उन खिलाडिय़ों को सेना की टीम में जगह दी, जो इस लायक थे। इस टीम में ध्यानचंद को भी शामिल किया गया। ओलंपिक खेलों में भाग लेने के लिए भारतीय खिलाडिय़ों को चुनना अंग्रेजों की खेल के प्रति बेहतर भावना को भी दर्शाता है। भले ही अंग्रेजों ने भारतीय राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में दमन और शोषण का रवैया अपनाया लेकिन खेल को इससे दूर रखा।

दूसरी बात जिसके प्रति ध्यानचंद हमेशा आभारी रहे, वो कोलकाता शहर था, क्योंकि इस शहर ने अगर तब भारतीय हॉकी का आगे बढकऱ सहयोग नहीं किया होता तो कौन भारतीय हॉकी और ध्यानचंद को जानता। उसके सहयोग के बगैर न तो तब भारतीय हॉकी चयन प्रतियोगिता ही हो पाती और न भारतीय टीम ओलंपिक में जा पाती। हॉकी को लोकप्रिय बनाने में बंगाल और कोलकाता की खास भूमिका रही है। बंगाल हॉकी संघ देश का सबसे पुराना हॉकी संघ था। ओलंपिक के लिए भारतीय हॉकी टीम की चयन प्रतियोगिता कोलकाता में होनी तय हुई। ये जगह इसलिए भी मुफीद मानी गई क्योंकि उस समय भारतीय हॉकी संघ को पैसे की बहुत जरूरत थी, जिसकी पूर्ति बंगाल से ही संभव थी। पहले अंतरप्रांतीय हॉकी टूर्नामेंट में पांच प्रांतीय टीमों ने शिरकत की। बंगाल हॉकी संघ ने हरसंभव कोशिश करके इस प्रतियोगिता को सफल आयोजन में बदल दिया। इसमें आर्थिक पहलू की भूमिका सबसे ज्यादा अहम थी। अगर वर्ष 1928 में बंगाल हॉकी संघ ने  आर्थिक सहयोग और समर्थन नहीं दिया होता, तो शायद ही भारतीय टीम एमस्टर्डम के लिए रवाना हो पाती। टूर्नामेंट में पंजाब, यूपी (संयुक्त प्रांत), बंगाल, राजपुताना और सेंट्रल प्रोविंस ने हिस्सा लिया। बंबई और मद्रास जैसे दो बडे प्रदेश इसलिए हिस्सा नहीं ले सके, क्योंकि वहां कोई हॉकी संघ नहीं था।

इस टूर्नामेंट में फाइनल में दो टीमें पहुंची-संयुक्त प्रांत और राजपूताना। फाइनल मैच संयुक्त प्रांत की टीम के लिए अविस्मरणीय दिन साबित हुआ। उसने ये मैच जीतकर पहली बार राष्ट्रीय चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। हालांकि यूपी टीम को लगातार तीन दिनों में तीन मैच खेलने पड़े थे और वह बुरी तरह थक चुकी थी लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपने जज्बे को बनाए रखा। अब तो दुनिया की शायद ही कोई ऐसी टीम हो जो लगातार तीन दिनों में तीन मैच खेलकर अपनी श्रेष्ठता को बरकरार रख पाए। फाइनल मैच यूपी ने 3-1 से जीता। फाइनल मैच तक हर कोई ध्यानचंद के खेलकौशल का दीवाना हो चला था। हर किसी को लगने लगा था कि वह खिलाड़ी से कहीं ज्यादा विलक्षण खिलाड़ी हैं। उन्होंने जैसा खेल दिखाया, उसके आसपास भी दूसरा कोई खिलाड़ी नहीं था। ये भारतीय टीम के लिए वरदान कहा जाएगा कि उन्हें ऐसा खिलाड़ी मिल गया था।

प्रतियोगिता के आधार पर 13 खिलाडिय़ों की उस टीम को चुना गया, जिसे एमस्टर्डम ओलंपिक में शिरकत करना था। लेकिन असल समस्या धन की थी। बगैर इसके सभी खिलाडिय़ों का ओलंपिक जाना संभव नहीं दीख रहा था। दो खिलाडिय़ों के जाने के लिए जरूरी धन अभी नहीं जुट पाया था। भारतीय हॉकी संघ ने देशभर में कोष के लिए अपील की। कम से कम 15 हजार रूपए की राशि कम पड़ रही थी। उस जमाने के लिहाज से ये छोटी-मोटी रकम भी नहीं थी। ऐसे समय में भी बंगाल ने इस धनराशि को जुटाकर भारतीय टीम की जाने की मुकम्मल व्यवस्था कर दी। इस तरह साधनविहीन और सुविधाविहीन भारतीय हॉकी टीम वर्ष 1928 के ओलंपिक में जाने की तैयारियों में जुट गई। उन दिनों खिलाडिय़ों को अपनी किट और गर्म कपड़ो की व्यवस्था खुद करनी होती थी। लिहाजा हर खिलाड़ी इसे पूरा करने में लग गया। ध्यानचंद के परिवार में खुशी का माहौल था। वह एक बार फिर से विदेश यात्रा पर जा रहे थे और वह भी राष्ट्रीय टीम में चयनित होकर। उन्हें बधाइयां मिल रही थीं। रेजीमेंट के साथियों और अफसरों ने उन्हें बधाई दी और उम्मीद जाहिर की वह ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन करेंगे। किसे पता था कि भारतीय हॉकी टीम पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लेने ही नहीं जा रही है बल्कि इतिहास बनाने जा रही है। खेलों का नया स्वर्णिम अध्याय ये टीम खोलने वाली है।

घ्यानचंद के परिवार ने उन्हें लंबी यात्रा पर खुशी खुशी रवाना किया। हालांकि सभी की आंखों में खुशी के आंसू थे। मां ने आशीर्वाद दिया। 10 मार्च 1928 को ये कैसर ए हिन्द जहाज पर सवार होकर जब मुंबई से रवाना हुई तो महज तीन लोग उन्हें विदा करने आए थे। ये तीन लोग थे भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष बर्न मुर्डोक, उपाध्यक्ष चाल्र्स न्यूहैम और बंगाल हॉकी संघ के संस्थापक एस भट्टाचार्य। इसके बाद जहाज चल पड़ा। तीन सप्ताह समुद्र की लहरों को चीरकर जहाज आगे बढता रहा। इसका अगला पड़ाव था इंग्लैंड का तिलवरी बंदरगाह, जहां भारतीय हॉकी टीम को उतरना था और इंग्लैंड में कुछ प्रदर्शन मैचों में हिस्सा लेना था। 30 मार्च 1928 को जब जहाज ने सुबह के समय तिलवरी पर लंगर डाला, तो उन्हें लेने के लिए इंग्लिश हॉकी संघ के सचिव डब्ल्यू एफ स्मिथ आए हुए थे। ठंड बहुत ज्यादा थी। टीम के पास जो गर्म कपड़े थे, उसने वही पहने हुए थे। भारतीय हॉकी टीम को इंग्लैंड़ के हॉकी महोत्सव यानि फोकस्टोन उत्सव में शिरकत करना था। ये महोत्सव 31 मार्च से 21 अप्रैल तक चला। इस दौरान भारत ने 11 मैच खेले, नौ मैच जीते, एक हारे और एक ड्रा हुआ।

हालांकि पहले मैच में जब भारतीय टीम खेलने उतरी तो वह यात्रा की थकान से न केवल थकी हुई थी बल्कि नए देश के मौसम के साथ तालमेल बिठाने में भी उसे कठिनाई महूसस हो रही थी। उसे इंग्लैंड पहुंचने के अगले ही दिन मैच खेलना पड़ा, जिसमें संयुक्त सेना ने उसे 1-2 से हरा दिया। ये अकेला मैच था, जिसमें भारतीय टीम ने हार का स्वाद चखा। इसके बाद ध्यानचंद और टीम को जबरदस्त झटका लगा। उन्होंने प्रण किया कि अब वो जब मैदान पर उतरेंगे तो हर हाल में जीत के लिए खेलेंगे। वाकई टीम ने फिर वैसा ही किया। उन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वियों को जिस तरह एक के बाद एक हराना शुरू किया उससे इंग्लैंड के लोग हैरत में आ गए। ध्यानचंद की स्टिक तो कमाल ही कर ही थी। उनके पास गेंद आने का मतलब होता था गोल का हर हाल में होना। विरोधी टीम का कोई खिलाड़ी न तो उनसे गेंद छीन पाता और न ही उन्हें आगे बढऩे से रोक पाता। इंग्लैंड की सबसे मजबूत अंग्रेज हॉकी संघ को उन्होंने  दो के मुकाबले 5 गोलों से हराया तो ओल्ड रोसालियंस की टीम को 17-0 से। अंग्रेज खिलाड़ी और ब्रितानिया हुकुमत के सिर शर्म से झुक गए। भारतीय हॉकी टीम और ध्यानचंद से साबित कर दिया कि बेशक भारत गुलामी की जंजीरों से जकड़ा हो लेकिन अंग्रेज अपराजेय नहीं हैं। ये हार अंग्रेजों के आत्मविश्वास पर बहुत गहरी चोट थी। वहीं भारत का आत्मगौरव पहली बार इंग्लैंड में इस कदर बढ़ा था। इस हार का झटका इंग्लैंड के लिए इतना जबरदस्त था कि उसने ओलंपिक में टीम नहीं उतारने का फैसला लिया। उन्हें डर था कि अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर कहीं उन्हें शर्मिंदगी का मुंह न देखना पड़े। उन्हें महसूस हो गया था कि इस भारतीय हॉकी टीम से वो कतई नहीं जीतने वाले।

हां, इसी दौरान एक और रोचक वाकया हुआ। इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ एक मैच देखने आईं। मैच के दौरान भारतीय हॉकी टीम बहुत बढिया खेल दिखा रही थी। ध्यानचंद हमेशा की तरह शानदार तरीके से खेल रहे थे। उनकी हॉकी का प्रदर्शन इतना चमत्कृत करने वाला था कि हर कोई वाह-वाह कर रहा था। हाफ टाइम के बाद जब उन्हें महारानी से मिलाया गया तो उन्होंने उनके खेल की बहुत तारीफ की। फिर अपना छाता उन्हें देते हुए कहा कि इसकी हॉकी की तरह मुड़ी हुई मूठ से भी ऐसा ही खेलकर वह शानदार प्रदर्शन दिखा सकते हैं। ये चुनौती थी। ध्यानचंद ने मुस्कुराते हुए इसे कबूल किया। इससे भी वह ऐसा खेले मानो वह अपनी स्टिक से ही खेल रहे हों। केवल यही नहीं वह इससे भी दो गोल करने में सफल रहे। इसके बाद तो उनका लोहा इस कदर जमा कि इंग्लैंड के मीडिया ने उन्हें हॉकी का जादूगर बता दिया। ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर का विशेषण सबसे पहली बार इंग्लैंड की मीडिया ने इन्हीं प्रदर्शन मैचों के दौरान दिया। फिर उसके बाद ज्यों ज्यों उनका खेल दुनिया के सामने आया, हर किसी ने यही कहा, वाकई वह हॉकी के जादूगर ही हैं। उनके आसपास कोई नहीं है।

इंग्लैंड में शानदार प्रदर्शन के बाद भारतीय टीम उत्साह में भर गई। उसका आत्मविश्वास इंग्लैंड दौरे में हासिल जीत ने खूब बढ़ाया। जब टीम ओलंपिक में पहुंची तो उसका खेल और आत्मविश्वास दोनों ही निखरा हुआ था। सारे खिलाड़ी चुस्त दुरुस्त थे। एमस्टर्डम ओलंपिक में भारत का पहला मुकाबला आस्ट्रिया एकादश से था। भारत को छह गोलों से जीत मिली। ध्यानचंद ने चार गोल करके प्रतिद्वंद्वी टीमों के लिए खतरे की घंटी बजा दी।

अगला मैच बेल्जियम से था। इसमें भारत ने बेल्जियम को 9-0 से हराया। 20 मई को भारतीय टीम ने डेनमार्क को 5-0 से पराजित किया। भारतीय टीम के तेजतर्रार खेल और ध्यानचंद जैसे जबरदस्त फारवर्ड का कोई तोड़ किसी भी टीम के पास नहीं था। भारत तीन मैच खेल चुका था और किसी में भी उसके ऊपर एक भी गोल हो सका था। आगे होने वाले सेमीफाइनल और फाइनल मैचों की कहानी भी यही रही।

सेमीफाइनल मैच स्विटजरलैंड के खिलाफ 22 मई को खेला गया, जिसमें प्रतिद्वंद्वी टीम को भारत ने 6-0 से रौंद दिया। फाइनल मैच 26 मई को हालैंड के खिलाफ था। फाइनल मैच से पहले भारतीय टीम के कई खिलाड़ी बीमार हो गए। खुद ध्यानचंद को तेज बुखार था। इसके बाद भी उन्होंने तय कर लिया था कि वह मैदान में जरूर उतरेंगे और वह मैदान में उतरे। वह एक सैनिक थे और सैनिक की तरह ये मैच उनके और देश के लिए करो या मरो वाला मुकाबला था। मैच जबरदस्त हुआ। हालैंड की टीम ने भी कड़ा संघर्ष किया। आखिरकार भारत को 3-0 से जीत मिली, जिसमें दो गोल ध्यानचंद ने किए। इस तरह भारत ने इतिहास बना लिया। भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक का पहला स्वर्ण पदक जीतकर एक ऐसा सफर शुरू किया, जिसकी धमक दशकों तक सुनाई देने वाली थी। इस जीत ने भारत और भारतवासियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा सम्मान दिया, जिसके वो वाकई हकदार थे। भारतीयों ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दी थी। लेकिन सबसे बड़ी बात थी ध्यानचंद का एक नायक की उभरना। मीडिया जिस तरह उन्हें हाथों हाथ ले रहा था, उसके सामने ओलंपिक के दूसरे हीरो और विजेता फीके नजर आ रहे थे। इंग्लैंड के समाचार पत्र ने लिखा, ये हॉकी का खेल नहीं बल्कि एक जादू था और इसके जादूगर थे ध्यानचंद। एक अन्य समाचार पत्र ने लिखा, मुख्य बात ये नहीं है कि ध्यानचंद ने कितने गोल किए बल्कि ये देखना चाहिए कि उन्होंने ये गोल कैसे किए।

घ्यानचंद अपनी तेजी, फुर्ती, ड्रिबलिंग, गति और टीमवर्क के मामले में अलबेले थे। वह कभी भी व्यक्तिगत खेल नहीं खेलते थे बल्कि टीमवर्क का पूरा ख्याल रखते थे। ओलंपिक फाइनल में जीत के बाद जब भारतीय खिलाडिय़ों को स्वर्ण पदक पहनाया गया तो वह गर्व से फूल उठे। उन्हें लगा कि वाकई उन्होंने अपने देश के लिए कुछ किया है। भारतीय टीम फिर इंग्लैंड होते हुए भारत लौटी। भारत में जब ये लौटी तो उसके स्वागत के लिए नजारा ही बदला हुआ था। जब भारतीय टीम ओलंपिक के लिए रवाना हुई थी तो उससे किसी को कोई उम्मीद नहीं थी और महज तीन लोग उसे विदा करने गए थे। अब वापसी पर बंबई का माले स्टेशन खचाखच भरा हुआ था, जिधर देखो उतर सिर ही सिर नजर आ रहे थे। हर कोई भारतीय हॉकी टीम के जादूगर को एक नजर देख लेना चाहता था। बड़े बड़े लोग टीम के स्वागत के लिए पहुंचे थे, जिसमें शहर के महापौर भी थे। बंबई के गवर्नर ने टीम को बधाई देने के लिए खासतौर पर अपना प्रतिनिधि भेजा था।  

(अगली बार पढिए कैसे देखते ही देखते ध्यानचंद बन गए देश के हीरो और अगले ओलंपिक में क्या किया भारतीय हॉकी टीम ने)

 

अपने घर में ध्यानचंद

ध्यानचंद की छोटी बहू डॉ. उमेश मीना ध्यानचंद याद करती हैं कि उनकी नजर में कैसे ससुर थे उनके बाबू जी-बात उस समय की है जब मेरी नई-नई शादी सन 1969 में हुई थी। घर में कुछ मेहमान बाहर से आए थे। उनके आने के बाद मुझे बैठक में बुलाया गया। नई नई होने के कारण मुझे कुछ समझ में नहीं आया और मैं नीचे जमीन पर बैठ गई। उसी समय अचानक बाबू जी (ध्यानचंद) वहां आए। उन्होंने मुझे जमीन पर बैठे हुए देख लिया। उन्हें ये बात बहुत नागवार गुजरी। उन्होंने मेहमानों के सामने ही घर के अन्य सदस्यों से कहा-तुम लोगों ने ध्यान नहीं दिया, मेरे घर की बहू जमीन पर बैठी है और तुम लोग कुर्सी पर। उन्होंने उसी क्षण मुझे नीचे से उठाकर कुर्सी पर बिठाया। वह बताती हैं कि उन्होंने घर में कभी लडक़े और लड़कियों में भेदभाव नहीं किया। वह दोनों के समान अधिकारों, समान शिक्षा और समान व्यवहार के पक्षधर थे।

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एक और वाकया है, ध्यानचंद का परिवार बड़ा और संयुक्त होने के कारण घर में दिनभर खाना बनता रहता था। ध्यानचंद को बहुओं का दिनरात रसोईं में रहना कतई पसंद नहीं था। सेना के अनुशासन की तरह वह समय की पाबंदी के कायल थे। जब वह रिटायर होकर घर लौटे तो घर के हर सदस्य को अल्टीमेटम दे दिया कि सभी लोग अपना काम समय पर किया करेंगे। अपनी पत्नी से नाराज होते हुए उन्होंने साफ साफ कहा था, ये दिनभर का खाना बनना बंद कराओ। उनके डांटने के बाद बहुएं और घर की महिलाएं धीरे से वहां आकर खाना बनाया करती थीं। हालांकि ध्यानचंद अक्सर चेक किया करते थे कि दिन में रसोईं में क्या गतिविधि चल रही है। एक बार उन्होंने रसोई की चेकिंग करते हुए बहुओं को खाना बनाते देख लिया। ये देखकर वह बहुत गुस्से में आ गए। उन्होंने नाराजगी में सबको वहां से निकाला और ताला लगा दिया। फिर अपनी पत्नी को हिदायत दी कि अब रसोई समय से खुलेगी और बंद होगी। घर के सभी सदस्य समय पर नाश्ता और खाना बनाएंगे। उन्होंने सभी को घरेलू कार्यों के लिए अनुशासित और समयबद्ध करने के लिए टाइमटेबल भी बनाकर दीवार पर टांग दिया। बेशक ऊपर से ये लगेगा कि उन्होंने अनुशासन की कड़ाई के चलते ये सब किया लेकिन अंदर छिपा था बहुओं के लिए कोमल भाव और प्यार कि उनकी इस कड़ाई से बहुओं को भी दिनभर खाना बनाने से छु्टटी मिलेगी और वे आराम कर सकेंगी।