वेद आधारित व्यवस्था से होगा विश्व का कल्याण

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:ख भाग्भवेत्।।
दुनिया की सबसे प्राचीन संस्कृति होने के कारण भारत अनेक सम-विषम परिस्थितियों से दो-चार होते हुए तथा उनके परिणाम भोगते हुए परिपक्व हुआ है। समस्त प्रकार का विकास करते हुए भारत ने यह भाव भी विकसित किया था कि विश्व के सभी जन सुखी हों तथा सभी हमारे भाई हैं। भारत का इस ब्रह्मांड को देखने का दृष्टिकोण हमेशा से सकारात्मक रहा है। प्राचीन भारत में विज्ञान और तकनीक की काफी प्रगति हुई थी परंतु हमारे मनीषियों ने यह समझ लिया था कि विज्ञान और तकनीक मनुष्य को सुखी नहीं कर सकते और इसलिए भारत में जीवन का एक अत्याधुनिक दर्शन विकसित हुआ था जिसमें इनकी आवश्यकता न्यूनतम थी। वे यह समझ चुके थे कि भौतिक विज्ञान के आविष्कार अंतिम सत्य नहीं होते। उनमें नए-नए अनुसंधान होते हैं, नए-नए बदलाव आते रहते हैं। इसलिए अतिंम सत्य यह भौतिक विज्ञान तो नही हो सकता। आखिर हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए, इसी के आधार पर भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की परम्परा रही हैं। जिन्होंने भारत की विकास यात्रा का अध्ययन नही किया है, वे प्राचीन भारत की उपलब्धियों को झूठा ठहराते रहे हैं। परंतु आज नवीन अनुसंधानों ने भारतीय उपलब्धियों की ऐतिहासिकता को सिद्ध कर दिया है।
भारत की दुनिया को एक बड़ी देन है वेद। वेद ज्ञान-विज्ञान का मूल हैं। आज की अस्त-व्यस्त और बहकती दुनिया के लिए भारत समाधान का केन्द्र बन सकता है, क्योंकि वेद ही वह रास्ता है जो समृद्धि का पूर्ण माध्यम है। सकारात्मक विकास के लिए सभी रास्ते वेद से निकलते हैं। वेद सुख-समृद्वि का द्वार सभी के लिए खोलते हैं, चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब। अगर सम्पूर्णता की तरफ जाना है तो वेद के अलावा दूसरा रास्ता है ही नहीं। यहां तक कि वेदों की शिक्षा का पहला पाठ ही कहता है कि स्वयं के बारे में जानो, अन्यथा अधूरा ज्ञान प्राप्त होगा। दुनिया ने पूंजीवाद की भाषा भी देखी है और साम्यवाद की भी। ये दोनों ही व्यवस्थाएं आज असफल हो चुकी हैं। मानव न पूंजीवाद से सुखी हो पाया है, न साम्यवाद से। वेद इन दोनों से ही भिन्न व्यवस्था देते हैं। वेदों की व्यवस्था में इन दो के अलावा और भी जितने वाद हो सकते हैं, सभी के सकारात्मक पक्ष उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, वेदों के अनुसार धन का उपार्जन अधिक से अधिक किया जाना चाहिए, परंतु उपभोग न्यून से न्यून। धन का उपयोग दूसरों के उपकार के लिए किया जाना चाहिए। वेदों में कहा है – शत हस्त समाहर, सहस्र हस्त संकिर अर्थात् सौ हाथों से कमाओ, हजार हाथों से बांटो। यह वेदों का समाजवाद है।
कई बार लगता है कि लोकतंत्र, राजतंंत्र आदि लुभावनी राज्य व्यवस्थाओं को पिछले कुछ सौ वर्षो में हमने गढ़ा है। किन्तु ये व्यवस्थाएं सनातन है। भारतीय इतिहास (पुराणों) में बार-बार इन्द्र के मंत्रिमण्डल की विस्तार से चर्चा की गई हैं। अग्नि, वरूण, वायु, देवता इन्द्र की राज्यवव्यवस्था के प्रमुख अंग बताए गए हैं। कहा जा सकता है कि सनातन व्यवस्था में अग्नि की शुद्धता, शुद्ध वायु तथा जल की उपलब्धता सभी प्राणियों को अबाध हो, इसकी चिन्ता की गई है। वास्तव आधुनिक व्यवस्था में इन्हें खरीदना पड़ रहा है जो समभाव की स्थिति नहीं कही जा सकती। इसलिए वेदों की ओर लौटने से न केवल हमें एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता है, बल्कि समाज में व्यवस्था, सौहाद्र्र और समभाव पैदा करने के उपाय भी।