पाठकों के लिए संपादक का पत्र

प्रिय पाठको,
सितम्बर मास में भारतीय धरोहर संस्थान अपने विकास यात्रा के 10 वर्ष पूरे कर रहा है। इन दस वर्षों में प्राचीन भारत के समृद्ध ज्ञान विज्ञान को आज की परिस्थितियों में प्रासंगिक बनाने के विविध प्रकार के प्रयोग हुए हैं। वह चाहे गोष्ठियों के माध्यम से हों या फिर प्रकाशन के द्वारा हों। प्राचीन भारतीय विषयों को लेकर जब संस्थान ने काम करना प्रारम्भ किया था, तब आंखों में एक स्वप्न था कि समाज प्राचीन भारत में ऋषियों-वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए अनुसंधानों का उपयोग करके सुखी और सम्पन्न बने। हमारा हमेशा से उद्देश्य रहा है कि अपने पूर्वजों का उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए सम्मान मिलना चाहिए, उनकी प्रतिष्ठा होनी चाहिए यहां जीवन के प्रत्येक पहलू पर विचार हुआ है। शिक्षा, आर्थिक सामाजिक, वैज्ञानिक, आकाश-पाताल, समृद्धि, स्वास्थ्य जैसे अनेक पहलू उनके कार्य क्षेत्र रहे हैं। छोटी-छोटी बातों से उनके कार्यों को समझा जा सकता है।
शिक्षा संवेदनशील मनुष्य को महान बनाती है जबकि असंवेदनशील व्यक्ति समाजहंता के रूप में कुख्यात हो जाता है। यहां पर गांवों में घर कच्चे और एक तले के रहते थे और आज भी रहते है। कीड़़े-मकोड़े आने का भय हमेशा रहता है। इनसे बचने के लिए चूने और हल्दी से दरवाजे के बाहर बहुत ही सुन्दर अल्पनाएं बनाई जाती हैं। हल्दी चूने के कारण किसी भी प्रकार के जीव जन्तु घर में नहीं घुसते और घर की सज्जा अलग से हो जाती है। भारत के विज्ञान को समझने के लिए ऐसे छोटे-छोटे कार्य समझने आवश्यक हैं।
मनुष्य जीवन भर स्वस्थ रहे, इसकी योजना भारतीय खानपान, रहन सहन में सम्मिलित रही है। आज की आपा-धापी के युग में लोग इससे दूर होने लगे हैं। इसका परिणाम हमें अनेक अनाम बीमारियों के रूप में मिल रहा है। प्रत्येक देश को समृद्ध एवं तकनीकियुक्त बनाने में वहां की स्वस्थ और प्रतिभाशाली नागरिकों की बड़ी भूमिका होती है। इसलिए अब कुछ देशों ने (जेनेटिक साइंस) पर काम करना प्रारम्भ किया है ताकि जन्म से ही बच्चा प्रतिभाशाली और स्वस्थ जन्म लें। भारत में यह विज्ञान प्राचीन समय से ही रहा है। भारतीय धरोहर ने उत्तम संतान भारतीय विज्ञान के नाम से यह कार्य प्रारम्भ किया है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति का ज्ञान अवश्य होना चाहिए किन्तु जानकारी न होने से हम अपने विषय में नहीं जान पाते। संस्थान इसके लिए एक वेबसाइट के माध्यम से तथा गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को उनकी प्रकृति की जानकारी उपलब्ध कराने के प्रयास में सक्रिय है। भारत में वैज्ञानिक अनुसंधानों को मनुष्य के जीवन में सहजता से उतारने की प्रक्रिया रही है। उपभोग की वस्तुएं, संगीत, पर्व त्योहार, खान-पान, आमोद-प्रमोद, भवन निर्माण, सैन्य विज्ञान, परिवहन, मृदा विज्ञान, कृषि, लौह अयस्क, वस्त्र बनाना, स्वर्ण रजत ऐसे अनेकों विषयों पर उन्होंने अनुसंधान किया था। सेम्युअल हंटिंगटन ने अपनी पुस्तक दी क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में लिखा है कि 1750 में भारत का उत्पादन समूचे यूरोप और सोवियत संघ से अधिक था। भारत का हिस्सा 24.5 प्रतिशत था जबकि यूरोप का 18.2 प्रतिशत तथा सोवियत संघ का 5.0 प्रतिशत था। इन आंकड़ों को देने का तात्पर्य है कि जब भारत की उत्पादन क्षमता अधिक तथा उत्कृष्ट होगी तभी वितरण अधिक था। उन्नत उत्पादन बिना विकसित तकनीकि के संभव नहीं। भारतीय धरोहर भारतीय विज्ञान की ऐसी ही प्राचीन उपलब्धियों को उकेरने का कार्य कर रही है। आप सभी का इन दस वर्षों में जो सहयोग मिला है उसके लिए हम आभारी हैं।