नमस्कार महामंत्र के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य

नमस्कार महामंत्र के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य

कल्पना कराला :हमारा संसार रहस्यों से भरा पड़ा है। इसमें अनन्त के रहस्य छिपे पड़े है। वे ही व्यक्ति कुछ करने में सफल हो पाते हैं, जो रहस्यों की खोज करते हैं। जिन लोगो ने रहस्यों को खोजा, उन लोगो ने संसार को बहुत बड़ी देन दी एवं संसार को विकास-क्रम में आगे बढ़ाने में मदद की। विज्ञान, आज इसलिए सफल हो रहा है, क्योंकि वह प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों की खोज में निरंतर प्रयासरत है। रहस्यों को खोजने के नये-नयें प्रयोग चल रहे है। आज के वैज्ञानिक असल में पुराने काल के ऋषि-मुनियों के समान ही है। अध्यात्म के आचार्यों ने भी अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का अनुसंधान किया इसलिए उन्होंने ऐसे नए-नए मार्ग सुझाए, जो सचमुच आश्चर्यचकित करने वाले है।

किन्तु, वैज्ञानिक प्रयोग आज भी चालू है,  दूसरी तरफ  अध्यात्म के अनुसंधान एवं प्रयोग अतीत के गर्भ में छिप गये है। अध्यात्म में अनुसंधान की प्रवृत्ति छूट गई, इसलिए जो नये तथ्य सामने आने चाहिए थे, वे बंद हो गए। जब हम अध्यात्म और विज्ञान को समानान्तर दृष्टि से देखते हैं, तब हम पाते है कि आज के बहुत सारे तथ्य जो वैज्ञानिक खोज रहे है, वे अध्यात्म के आचार्यो ने पहले ही खोज लिए थे।

नमस्कार महामंत्र की आराधना के साथ वर्णों (रंग) का बड़ा गहरा संबंध है। पांच पदो के क्रमश पांच रंग है – श्वेत, लाल, पीला, नीला या हरा और कस्तूरी जैसा काला। वैसे नमस्कार महामंत्र की आराधना अनेक रूपों मे की जाती है। जैसे पदो के रूप में बीजाक्षरों के साथ। एक-एक पदों की एक-एक चैतन्य केन्द्र के साथ एवं रंगो के साथ। नमस्कार महामंत्र की साधना का समग्र दृष्टिकोण हैं- आत्मा का जागरण। किन्तु इस जागरण की प्रक्रिया के साथ-साथ साधक को यह देखना होगा कि वह किस बीमारी से अधिक ग्रस्त है, क्रोध की बीमारी, अभिमान की बीमारी, भय या हीनभावना की बीमारी, चिन्ता की बीमारी। जो बीमारी ज्यादा सताती हैं, उसे ही पहले मिटाना है। यह सच है, कि साधना का मूल लक्ष्य है – आत्मा का जागरण, पूरी चेतना को जगाना, शक्ति केन्द्रो को जागृत करना, आनन्द के महासागर में डूबना। किन्तु इन सब से पहले यह भी जानना जरूरी है कि कौन सा आध्यात्मिक दोष अधिक सता रहा है, एवं उसे समाप्त करने का रास्ता कौन सा है?

जब भी याद आए तब इसका स्मरण करें, जाप करें, ध्यान करें, कोई अचडऩ नहीं हैं। किन्तु जब आप किसी एक रोग-विशेष को ही मिटाना चाहते हैं तो विशेष पद्धति का ही अनुसरण करना होगा। एक ही पद्धति से सभी रोग नहीं मिटाये जा सकते। प्रत्येक रोग के लिए नमस्कार महामंत्र की विशेष आराधना करनी होगी, जिसके द्वारा विशेष प्रकार की ध्वनि-तरंग और प्रकंपनों के माध्यम से रोगो की गांठ खुलेगी और बीमारियाँ जड़ से समाप्त हो पायेगी।

शारीरिक स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, मन का स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, आवेगों की कमी और वृद्धि, ये सभी निर्भर करता है, कि हम किस प्रकार के रंगों का समांयोजन करते है। जैसे, नीला रंग शरीर में कम होगा तो क्रोध अधिक आयेगा। नीले रंग की पूर्ति हो जाने पर गुस्सा कम हो जाता है। श्वेत रंग की कमी होती है तब अस्वास्थ्य बढ़ता है। लाल रंग की कमी होने पर आलस्य और जड़ता पनपती है। पीले रंग की कमी होने पर ज्ञान-तंतु निष्क्रिय बन जाते है। काले रंग की कमी होने पर प्रतिरोध का शक्ति कम हो जाती है।

महामंत्र कहता है, जब ज्ञान तंतु निष्क्रिय हो जाएं तब ज्ञानकेन्द्र में दस मिनट तक पीले रंग का ध्यान करें। ऐसा करने से ज्ञान-तंतु सक्रिय हो जायेगे। व्यक्ति बहुत बड़ी समस्या में उलझा हुआ हो, समाधान प्राप्त नहीं हो रहा हो तो हृदय केन्द्र (आनन्द केन्द्र) में दस मिनट का पीले रंग के साथ ध्यान करें, समाधान सामने दीखने लगेगा।

रंगो के साथ मनुष्य के मन का, मनुष्य के शरीर का जितना गहरा संबंध है, उसे जब तक हम जान नही लेते तब तक नमस्कार महामंत्र की रंगो के साथ साधना की बात हमारी समझ में नही आ सकती।

हम ज्ञान केन्द्र Óणमो अरहंताणंÓ का ध्यान श्वेत वर्ण के साथ करते हैं। श्वेत वर्ण हमारी आन्तरिक शक्तियों को जगाने वाला है। इससे ज्ञान की सोयी हुई जागृत होती है, चेतना का जागरण होता है। इसलिए इस पद की आराधना के साथ ज्ञान केन्द्र और सफेद वर्ण (रंग) की समायोजना की गई है। स्वास्थ्य के लिए कोई भी ध्यान करना हों, तो उसे सफेद रंग के साथ करना चाहिए। श्वेत रंग स्वास्थ्य का प्रतीक है।

‘णमो सिद्धाणं’ का ध्यान दर्शन केन्द्र में लाल रंग के साथ किय जाता है। बालसूर्य जैसा लाल रंग। लाल रंग हमारी आन्तरिक दृष्टि को जागृत करने वाला है। तृतीय नेत्र, पिच्यूटरी ग्लैण्ड और उसके स्रावों को नियंत्रित करने के लिए लाल रंग बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

‘णमो आयरियाणं’ मंत्र पद के द्वारा हमारी मन की स्थिति सक्रिय बनती है। इसका रंग पीला है। इसका स्थान विशुद्धि केन्द्र है। यह स्थान ‘चन्द्रमा’ का है। हमारे शरीर में पूरा सौरमंडल, सूरज, चांद, बुद्ध, राहु, मंगल सारे ग्रह हैं। नौ-ग्रहों की शुद्धि भी हम प्राप्त कर सकते हैं इस पद के द्वारा। विशुद्धि केन्द्र पवित्रता का प्रतीक है, यह पवित्रता की संवृद्धि करने वाला केन्द्र हैं। यहां मन पवित्र एवं निर्मल होता है।

‘णमो उवज्झायाणं’ इसका रंग नीला है। इसका स्थान है आनन्द केन्द्र। नीला रंग शान्ति देने वाला होता है। यह रंग समाधि, एकाग्रता पैदा करता है और कषायों को शान्त करता हैं। नीला रंग आत्म-साक्षातकार में सहायक होता है।

‘णमों लोए सव्वसाहूणं’ इसका रंग काला हैं। इसका स्थान है शक्ति केन्द्र। शक्ति केन्द्र यो पैरो के स्थान पर काले रंग के इस मंत्र की आराधना की जाती है। यह रंग अवशोषक होता है। काला रंग बाहर के प्रभाव को भीतर नहीं जाने देता। काला रंग बहुत महत्त्वपूर्ण रंग होता है।

नमस्कार महामंत्र के पाँच पदो ंके साथ पांच वर्णें का चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, गूढ़ है, रहस्यमय है। मैंने ऊपर केवल संकेत मात्र दिये है। पांच इन्द्रियां है और पांच उनके विषय है।

उनका आलंबन ले। हम इन्द्रियों की सूक्ष्म शक्तियों से परिचित नहीं है, उनकी स्थूल शक्तियों से परिचित है। यदि हम सूक्ष्म शक्तियों से परिचित होना चाहते है, तो हमें उन पर प्रयोग करना होगा। यदि हमें सूक्ष्म जगत की यात्रा करनी हैं, तो उनके सूक्ष्म रूप को भी समझना होगा, उसकी साधना करनी होगी।

अध्यात्म की साधना करने वाला व्यक्ति सदा जागरूक रहे। उसके मन में अपनी आंतरिक बीमारियों को मिटाने की तीव्र आकंक्षा होनी चाहिए। बीमारी उठते ही यदि इलाज हो जाता है, तो वह सहजतया मिट जाती है। एवं यदि इलाज में देरी हो तो वह भयंकर रूप धारण कर लेती है। अध्यात्म साधक का मन इतना जागरूक और संवेदनशील होना चाहिए, कि वह प्रत्येक आंतरिक बीमारी को पकड़ सके, अनुभव कर सके एवं उसे मिटाने के लिए दिशाओं को खोज सके। नमस्कार महामंत्र सभी दिशाओं में बहुत उपयोगी है, इसको समझें एवं उससे लाभ उठाएंं।