गर्भवती कौशल्या का तप

महाराजा दशरथ के यहाँ पुत्र नहीं था तो उन्होंने एक पुत्रेष्टि याग कराया था। मुझे यह याग स्मरण आ रहा है। वशिष्ठ मुनि महाराज ने महर्षि श्रृंगी से पुत्रेष्टि याग कराने की प्रार्थना की। कजली वनों से संबंधित औषधियां लाई गईं और उसे उचित पद्धति से खरल किया गया और आवश्यक समिधाएं एकत्रित की गयी, इसी प्रकार का साकल्य एकत्रित किया गया और फिर सभी ने एक-एक वर्ष तक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहते हुए ब्रह्म का चिन्तन किया।
तब महाराजा दशरथ के यहाँ पुत्रेष्टि याग हुआ। गुडाकेशम्, सुधनकेतु और मरीचिका नामक औषधि को ले करके उसको खरल बनाया और उसको गो घृत और गो दुग्ध में साकल्य व समिधा वाली अग्नि में तन्दुलों (चावलों) के साथ पकाया गया और वह औषधि बन गई। जब वह माताओं को प्रदान की गई तो उनके गर्भस्थलों की शुद्धि हो गई और वे धारया बन गईं।
सर्वप्रथम राजा दशरथ का ही निदान किया गया। फिर राजा दशरथ और उनकी रानियों ने एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पृथ्वी का आसन बनाया। उन्हें पीपल का पंचांग और अष्टांग का पान कराया गया। इस प्रकार एक एक औषधि से उनका निदान करते हुए पुत्रेष्टि याग संपन्न कराया गया।
कौशल्या द्वारा राष्ट्रीय अन्न-त्याग
पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात माता कौशल्या के गर्भ की स्थापना हो गयी। गर्भ की स्थापना हो जाने के पश्चात् माता कौशल्या का यही नियम था कि वे स्वयं कला कौशल करती और उसके द्वारा जो द्रव्य आता उसे ग्रहण करके सन्तुष्ट रहती। उसने संकल्प धारण किया था कि मैं राष्ट्र (राज्य) का कोई अन्न ग्रहण करना नहीं चाहती, क्योकि राष्ट्र में आकर ऊँचे बालक को उसी काल में जन्म दे सकती हूँ जब मेरे मन की प्रवृत्तियां पुरुषार्थी होंगी, महान् होंगी, पवित्र होंगी और अन्न की जो प्रतिभा है वह ऊँची होगी, क्योंकि अन्न से मन की प्रतिभा उत्पन्न होती है।
जब कौशल्या के हृदय में यह धारणा हुई कि मैं गर्भ से जिस शिशु को जन्म देना चाहूँगी, वह महान् होना चाहिये तो माता कौशल्या भयंकर वनों में जाकर सोमलता लाती और उसका पान करती। खरल करते करते उसके हृदय में जो पुरातत नाम की नाड़ी है, जिसका समन्वय शिशु के हृदय से होता है, उससे, उसकी तरंगें जा-जा करके बालक की पुरातत नाम की नाड़ी से समन्वय हो करके, उस नाड़ी का समन्वय मस्तिष्क से होता हुआ, हृदय अगम्यता को प्राप्त होता रहा है। वह माता अपने में विचित्रता को अनुभव करती रही है। उसके हृदय में जो शिशु विद्यमान है, वह महान पवित्रत्व को प्राप्त होता रहा है।
राष्ट्रीय अन्न-त्याग से चिन्तित दशरथ
जब वह गृह में आ पहुँची तो राजा को कुछ समय बाद यह प्रतीत हुआ कि कौशल्याजी राष्ट्रीय अन्न को ग्रहण नहीं कर रही है। एक दिन राजा दशरथ कौशल्या के कक्ष में पहुँचे और उन्होंने कहा- ”हे देवी ! मैंने यह सुना है कि तुम राष्ट्रीय अन्न को ग्रहण नहीं कर रही हो ?” उन्होंने कहा- ”हाँ प्रभु! मैं ग्रहण नहीं कर रही हूँ।” उन्होंने कहा -”क्यों नहीं कर रही हो ?” माता ने कहा- राष्ट्र का जो अन्न होता है, वह रजोगुण और तमोगुण से सना होता है। चूंकि राष्ट्र का अन्न पवित्र नहीं होता, इसलिए मैं इसको ग्रहण नहीं कर पाऊँगी। मेरे जो पूज्यपाद गुरुदेव हैं, जिनको मैंने दक्षिणा प्रदान की है, अन्नादि के लिए, उन्होंने मुझे यह कथा सुनाई थी कि एक समय में वह (ऋषि श्रृंगी) अपने कुछ ब्रह्मचारियों सहित महाराजा अश्वपति के यहाँ पहुँचे और उन्होंने महाराजा अश्वपति के राष्ट्र का अन्न ग्रहण नहीं किया था। मेरी भी यह मनोकामना है, मै राष्ट्र के अन्न को ग्रहण करना नहीं चाहती हूँ क्योंकि मै यह चाहती हूँ कि मेरे गर्भस्थल में जो शिशु पनप रहा है, देवता उसकी रक्षा कर रहे हैं। देखो मेरी अन्तरात्मा यह कहती है कि मैं राष्ट्र के अन्न को ग्रहण न करुँ।” इस पर राजा ने कहा, ”देवी! यह तो अकृता हो जायेगी, क्योंकि राजा के राष्ट्र के अन्न को न ग्रहण करना, यह तो बड़ा अनर्थ है।” कौशल्या ने कहा, ”प्रभु! मैं तो संकल्पवादी हूँ और संकल्प ही बड़ा पवित्र होता है, क्योंकि आप राजा जो हो वह केवल संकल्पमात्र से हो और प्रभु ! संकल्प ही तुम्हें राष्ट्रीय प्रणाली में ऊध्र्वगमन करा रहा है।”
उन्होंने कहा, ” हे देवी ! मैं तुम्हारे व्याख्यान को व्याख्यान के द्वारा परास्त नही कर सकता। मेरी तो एक ही प्रार्थना है कि तुम अन्न को ग्रहण करो।” देवी ने कहा-”प्रभु! मैं अन्न को ग्रहण नहीं करुँगी, क्योंकि मैंने आचार्यों को यज्ञ में दक्षिणा दी है और दक्षिणा का हृदय से ही समन्वय रहता है और हृदय से उद्घोष होता है।” राजा ने विचारा कि ”यह तो अकृता है, यह देवी मेरे वाक्य को स्वीकार नहीं करेगी। मैं आज महात्मा वशिष्ठ और माता अरुन्धती के द्वार पर पहुँचूँगा और ये दोनों ही उसको अन्नादि ग्रहण करा सकते हैं।”
इसके बाद राजा दशरथ के अनुरोध पर ऋषि वशिष्ठ और माता अरुंधती ने भी माता कौशल्या को राज्य का अनेन लेने के लिए प्रेरित किया परंतु माता कौशल्या ने उन्हें भी विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। इस पर ऋषि वशिष्ठ और माता अरुंधती ने राजा दशरथ को कहा कि कौशल्या का संकल्प दृढ़ है और उसे इस संकल्प से नहीं डिगाना चाहिए। एक बार गुँक ऋषि ने उनसे पूछा कि वे राष्ट्र का अन्न व व क्यों ग्रहण नहीं करतीं। उस समय माता कौशल्या ने कहा था कि वे अपने गर्भ से श्रेष्ठ पुत्र चाहती हैं। इसलिए वे नहीं चाहती कि उनके पुत्र के शरीर में किसी प्रकार भी ऐसा अन्न न चला जाए जिससे उसका जीवन राजसी बन जाए और वह राजसी बन कर राज्य के ऐश्वर्य में भूल कर प्रजा का कल्याण न कर सके। माता कौशल्या गान गाती थी। जब माता कौशल्या गान गा रही है, वह मधु-विद्या का गान गा रही है, जब गर्भाशय में भगवान् राम विद्यमान हैं। आठ लाख वर्षों से भी अधिक वर्ष हो गये, आज तक माता कौशल्या को माता कहा जा रहा है। यदि माता कौशल्या के राम जैसा पुत्र नहीं होता तो कौन माता कहता? यदि माता गान नहीं गाती तो राम कैसे जन्म लेते? राम जैसी पुण्य आत्मा कैसे आती इस संसार में? उसका परिणाम यह हुआ कि उनको आज तक माता ही कहकर पुकारा जाता है!
ब्रह्मचारी कृष्णदत्त : एक परिचय
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद में मुरादनगर के निकट स्थित खुर्रमपुर-सलीमाबाद गाँव में, एक निर्धन, अशिक्षित, कबीर पन्थी जुलाहे के घर ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी का जन्म हुआ था। गाँव के अशिक्षित परिवेश में इनके जन्म-समय का कोई निश्चित संकेत नहीं मिलता। फिर भी उनके परिवार के सदस्यों उनके गाँव के समवायी शिक्षित महानुभावों के संकेतों और अन्य तथ्यों के आधार पर ऐसी प्रतीत होता है कि इनका जन्म,सन् 1942 में हुआ। कहते हैं, जब पूज्य ब्रह्मचारीजी लगभग दो मास की अवस्था के ही थे, एक दिन उनकी माता ने उन्हें शवासन में लेटा दिया। कुछ समय उपरान्त शिशु की गर्दन दोनों ओर हिलने लगी और होठ फडफ़ड़ाने लगे। इस अवस्था में शिशु को पाकर परिवार के सदस्य चकित हुए। इस क्रिया की पुनरावृत्ति होने पर गाँव के ओझा-पण्डित का सहारा लिया गया और भूत प्रेत का प्रभाव मानकर तदनुरूप शिशु का उपचार प्रारम्भ हो गया। परन्तु उस विशेष अवस्था में होने की घटनाएँ बढ़ती रहीं। आयु बढऩे के साथ वाणी स्पस्ट होने पर जब भी बाल्य ब्रह्मचारी जी उस विशेष अवस्था में जाते तो मन्त्र पाठ और कथा वाचन स्पस्ट सुनाई देते। धीरे धीरे गाँव के लोगों को उनकी कथाएँ समझ आने लगीं। उनके पिता उनकी इस अवस्था में जाने से बहुत चिन्तित रहते थे।
एक दिन, इनकी कथा प्रक्रिया के पश्चात पिता द्वारा अत्यधिक पिटाई किये जाने पर इनके मन में विचार आया कि- यहाँ कष्ट पाते रहने से तो अच्छा है, कहीं जाकर अपना इलाज कराया जाये, अन्यथा जीवन समाप्त कर दिया जाये! लगभग 15 वर्ष की अवस्था में, शीत काल की मध्य रात्रि में लगभग एक बजे, अपने परिवार और गाँव को छोड़कर भाग खड़े हुए। उपचार की आशा में एक डेढ़ इधर उधर भटकते हुए, वरनावा में श्री धर्मवीर त्यागी के घर जा पहुँचे। परिवार इन्हें जानता था। वहाँ उनकी कथा होती रहती। कई मास कथा चलती रही। ग्रामीण लोग आते और सुनते रहते थे, कुछ श्रद्धा से समझते हुए सुनते और अन्य कौतुहल से। उनके प्रवचनों से स्पष्ट हुआ कि ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी पूर्व जन्मों में श्रंृगी ऋषि रहे हैं और महानन्द जी उनके सूक्ष्मशरीरधारी योगसिद्ध शिष्य रहे हैं। लोग इनके प्रवचनों की सार्थकता समझने लगे और धीरे धीरे इनकी लोकप्रियता बढऩे लगी। समीपवर्ती गाँवों में उन्हें प्रवचन के लिए बुलाया जाने लगा। आर्य जगत् के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान् अशिक्षित ग्रामीण युवक की विचित्र अवस्था, दिव्य प्रवचन शैली और प्रवचनों में विलक्षण वैदिक प्रभाव को देखकर इनकी ओर आकर्षित हुए। उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा से सम्बन्धित आचार्य सुरेन्द्र शर्मा जी गौड़ ने साप्ताहिक पत्र आर्यमित्र में इनके विषय को प्रकाशित कराया। 1 जनवरी 1962 को इनके प्रवचन को प्रथम बार टेप रिकॉर्ड किया गया। प्रत्येक दिन नवीन विषय होता था। धीरे धीरे प्रवचनों को सुनने वालों की संख्या बढऩे लगी। ब्रह्मचारी जी की योग मुद्रा में जाने की प्रक्रिया पर गम्भीर अनुसन्धान की आवश्यकता है। उस विशेष समाधि अवस्था में दिये जाने वाले इनके प्रवचन, अन्तरिक्ष स्थित ऋषि मण्डल में सूक्ष्म शरीरधारी योगसिद्ध आत्माओं को सम्बोधित होते थे और उनका यह शरीर एक दिव्य यन्त्र की भान्ति उस आकाशवाणी से पृथ्वीमण्डल पर हम लोगों की प्ररेणार्थ योजित करता था। उनकी यह प्रवचन प्रक्रिया यौगिक थी, जिसे प्राणसत्ता और योग को जानने वाले ही ग्रहण कर सकते हैं।