गर्भावस्था और योग

भारत देश में अनेक संस्कार हमारी संस्कृति से जुड़े हुए है। गर्भाधान उनमें से एक प्रमुख संस्कार है। नारी जाति को हमारे देश में माँ का स्थान दिया गया है। प्रकृति में नए प्राणी को जन्म देना नारी का ही गुण है, जो उसे संसार में महत्वपूर्ण स्थान पर रखता है।
आज की नारी पुरुषो के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। शहरों में और खासकर बड़े शहरों में महिलाएं आमतौर पर विवाह और संतान की बजाय कैरियर और धनोपार्जन पर अधिक ध्यान देती हैं। परन्तु कैरियर की चाह और काम के तनाव में रहने से वह ममता का गुण भूल गई है। कई शारीरिक एवं मानसिक रोग के कारण आज नारियां गर्भ धारण करने के लिए तैयार नहीं हो पा रही है। ऐसे में योगाभ्यास एक महत्वपूर्ण माध्यम है जो माँ के साथ-साथ बच्चे का भी शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक विकास के लिए उपयुक्त परिस्थितियां और पृष्ठभूमि तैयार करता है।
यह सत्य है कि संयमी माता-पिता ही प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले बच्चे को जन्म दे सकते हैं। जिनकी विचारशक्ति, चरित्रवान जीवन रचनात्मक विचार की आवश्यकता है। साधारणतया ऐसा देखने को नहीं मिलता, परन्तु हम जच्चा-बच्चा के स्वस्थ जीवन की कामना तो कर ही सकते है।
बच्चे की चाहत करने वाले माता-पिता को संसर्ग के 6 महीने पहले से अपने तनाव को दूर करने व स्वस्थ्य प्राप्त करने वाले योगाभ्यास का प्रारंभ करना चाहिए।
एक स्त्री को गर्भाधान से पहले शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से स्वस्थ होने अनिवार्य है। पूर्ण स्वस्थ्य की प्राप्ति के लिए कुछ योगासनों का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है, जो इस प्रकार है-
सूक्ष्म यौगिक क्रियाएं- पैरो की अंगुलियाँ मोडऩा, टखने मोडऩा व घुमाना, घुटने मोडऩा, कमर को घड़ी की सुई की दिशा में व उल्टी दिशा में घुमाना, वक्ष विकासक क्रिया, हाथो की अंगुलियाँ मोडऩा व हिलाना, कलाई को वृत्ताकार घुमाना, कोहनियों को मोडऩा व सीधा करना, कंधो को वृत्ताकार दोनों दिशओं में घुमाना, गर्दन को ऊपर- नीचे, दाये-बाये व वृत्ताकार हिलाना।
खड़े हो कर करने वाले आसन- ताड़ासन, तिर्यकताड़ासन, काटिचक्रासन।
पीठ के बल लेट कर किये जाने वाले आसन- उत्थानपादासन, पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, हलासन।
पेट के बल लेट कर किये जाने वाले आसन- भुजंगासन, शलभासन, नौकासन, धनुरासन।
बैठ कर किये जाने वाले आसन- तितलीआसन, वज्रासन, शशांकासन, सुप्तवज्रासन, मार्जारीआसन।
उपर्युक्त सभी आसनों के अभ्यास से उदर प्रदेश, श्रोणी प्रदेश, पीठ व मेरु दंड शक्तिशाली बनते है, जो सफल गर्भाधान व प्रसूति के लिए अनिवार्य है। नए लोग भी इन योगासनों को आसानी से कर सकते है।
प्राणायाम- कपालभाती, अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका, भ्रामरी।
शुद्धिक्रियाएं
धौति – इसके अभ्यास से अनेक उदर रोग ठीक होते है।
नेति – यह अभ्यास नासिका की अशुद्धियों व जीवाणु-पूरित श्लेष्मा का निष्कासन करता है।
बस्ति – यह गुदामार्ग के शुद्धि की क्रिया है।
नौली – उदर प्रदेश और प्रजनन-सम्बन्धी विकारो को दूर करने में मदद करता है।
त्राटक – शारीरिक रूप से न्यून दृष्टि-दोष दूर करता है तथा एकाग्रता को बढ़ाता है।
ध्यान – नाद ध्यान प्रक्रिया।
गर्भावस्था की संपूर्ण अवधि के लिए आसन व प्राणायाम- गर्भावस्था की संपूर्ण अवधि 9 माह की होती है। इस संपूर्ण अवधि को हम 3 भागो में विभाजित करते है, प्रथम 3 माह, द्वितीय 3 माह और अंतिम 3 माह।
प्रथम 3 माह के आसन व प्राणायाम
सूक्ष्म यौगिक क्रियाएं – उत्क्रमात्मक सभी क्रियाएं जारी रखी जा सकती है।
खड़े होने वाले आसन – ताड़ासन, तिर्यकताड़ासन।
लेट कर किये जाने वाले आसन – शवासन।
बैठकर किये जाने वाले आसन – वज्रासन, शशांकासन, मार्जारी आसन, तितली आसन।
प्राणायाम – कपालभाती, अनुलोम-विलोम,भ्रामरी।
ध्यान – नाद ध्यानप्रक्रिया।
द्वितीय 3 माह के आसन व प्राणायाम
सूक्ष्म यौगिक क्रियाएं- उप्क्रत्मक सभी क्रियाए।
लेटकर किये जाने वाले आसन – शवासन, पवनमुक्तासन।
बैठ कर किये जाने वाले आसन- कालीआसन, वज्रासन, कौआचाल, लकड़ी काटना, नमस्करासना, मार्जारी आसन।
प्राणायाम- अनुलोम-विलोम, शीतली, शीतकारी, भ्रामरी।
ध्यान- नाद ध्यान प्रक्रिया
अंतिम 3 माह के आसन व प्राणायाम।
सूक्ष्म यौगिक क्रियाए- उत्क्रमात्मक सभी क्रियाएं।
लेटकर किये जाने वाले आसन- शवासन।
बैठकर किये जाने वाले आसन- सभी पाल थी मारकर किये जाने वाले आसन जैसे सुखासन, स्वस्तिकासन, पद्मासना, अर्धपद्मासना।
इसके अलावा उकडू बैठकर किये जाने वाले आसन जैसे प्रणामासन, कौआचाल, लकड़ी काटना व नमस्कारासन अत्यंत उपयोगी है।
मार्जारी आसन भी अंतिम समय तक कर सकते है।
प्राणायाम – अनुलोम-विलोम, शीतली, शीतकारी, भ्रामरी।
ध्यान- नादध्यान प्रक्रिया।