अमावस्या की रात्रि : मुंशी प्रेमचन्द

दीवाली की संध्या थी। श्रीनगर के घरों और खंडहरों के भी भाग्य चमक उठे थे। कस्बे के लड़के और लड़कियां सुसज्जित थालियों में दीपक लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। दीपों से उनके मुखारविंद प्रकाशमान थे। प्रत्येक गृह रोशनी से जगमगा रहा था। केवल पंडित देवदत्त का

सताधारा भवन भयंकर रूप में खड़ा था। गम्भीर इसलिए कि उसमें अपनी उन्नति के दिन न थे, भयंकर इसलिए कि यह जगमगाहट मानो उसे चिढ़ा रही थी। एक समय वह था जब कि ईष्र्या भी उसे देख देखकर हाथ मलती थी और एक समय यह है जब कि घृणा भी उस पर कटाक्ष करती है। द्वार पर द्वारपाल की जगह अब मदार और एरंड के वृक्ष खड़े थे। दीवानखाने में एक मतंग सांड अकड़ता था। ऊपर के घरों में जहां सुंदर रमणियां मनोहर संगीत गाती थीं, वहां आज जंगली कबूतरों के मधुर स्वर सुनायी देते थे। किसी अंग्रेजी मदरसे के विद्यार्थी के आचरण की भांति जड़ें हिल गई थीं और दीवारें किसी विधवा स्त्री के हृदय की भांति विदीर्ण हो रही थीं।
पर समय को हम कुछ नहीं कह सकते। समय की निंदा व्यर्थ है, यह मूर्खता और अदूरर्शिता का फल था।
अमावस्या की रात्रि थी। प्रकाश से पराजित होकर मानो अंधकार ने उसी विशाल भवन में शरण ली थी। पंडित देवदत्त अपने अद्र्ध अंधकार वाले कमरे में मौन, परंतु ंिचंता से निमग्न थे। आज एक महीने से उनकी पत्नी गिरिजा की जिंदगी को निर्दय काल ने खिलवाड़ बना लिया है। पंडित जी दरिद्रता और दु:ख को भुगतने के लिए तैयार थे। भाग्य का भरोसा उन्हें धैर्य बंधाता था। किंतु यह नई विपत्ति सहन शक्ति से बाहर थी। बेचारे दिन के दिन गिरिजा के सिरहाने बैठे हुए उसके मुरझाये हुए मुख को देखकर कुढ़ते और रोते थे। गिरिजा जब अपने जीवन से निराश होकर रोती तो वह उसे समझाते गिरिजा रोओ मत, शीघ्र ही अच्छी हो जाओगी।
पंडित देवदत्त के पूर्वजों का कारोबार बहुत विस्तृत था। वे लेन-देन किया करते थे। अधिकतर उनके व्यवहार बड़े-बड़े चकलेदारों और रजवाड़ो के साथ थे। उस समय ईमान इतना सस्ता नहीं बिकता था। सादे पत्रों पर लाखों की बातें हो जाती थीं। मगर सन् 59 ईस्वी के बलवे ने कितनी ही रियासतों और राज्यों को मिटा दिया और उनके साथ ही तिवारियों का यह अन्न धन पूर्ण परिवार भी मिट्टी में मिल गया। खजाना लुट गया, बही खाते पंसारियों के काम आये। जब कुछ शांति हुई, रियासतें फिर संभलीं तो समय पलट चुका था। वचन लेख के अधीन हो रहा था तथा लेख में भी सादे और रंगीन का भेद होने लगा था।
जब देवदत्त ने होश संभाला तब उनके पास इस खंडहर के अतिरिक्त और कोई सम्पत्ति न थी। अब निर्वाह के लिए कोई उपाय न था। कृषि में परिश्रम और कष्ट था। वाणिज्य के लिए धन और बुद्धि की आवश्यकता थी। विद्या भी ऐसी नहीं थीं कि कहीं नौकरी करते, परिवार की प्रतिष्ठा दान लेने में बाधक थी। अस्तु, साल में दो-तीन बार अपने पुराने व्यवहारियों के घर बिना बुलाये पाहुनों की भांति जाते और कुछ विदाई तथा मार्ग व्यय पाते उसी पर गुजारा करते। पैतृक प्रतिष्ठा का चिन्ह यदि कुछ शेष था, तो वह पुरानी चि_ी पत्रियों का ढेर तथा हुंडियों का पुलिंदा, जिनकी स्याही भी उनके मंद भाग्य की भांति फीकी पड़ गई थी। पंडित देवदत्त उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय समझते। द्वितीया के दिन जब घर-घर लक्ष्मी की पूजा होती है, पंडित जी ठाट-बाट से इन पुलिंदों की पूजा करते। लक्ष्मी न सही, लक्ष्मी का स्मारक चिन्ह ही सही। दूज का दिन पंडित जी के प्रतिष्ठा के श्रद्धा का दिन था। इसे चाहे विडंबना कहो, चाहे मूर्खता, परंतु श्रीमान पंडित महाशय को उन पत्रों पर बड़ा अभिमान था। जब गांव में कोई विवाद छिड़ जाता तो यह सड़े गले कागजों की सेना ही बहुत काम कर जाती और प्रतिवादी शत्रु को हार माननी पड़ती। यदि सत्तर पीढिय़ों से शस्त्र की सूरत न देखने पर भी लोग क्षत्रिय होने का अभिमान करते हैं, तो पंडित देवदत्त का उन लेखों पर अभिमान करना अनुचित नहीं कहा जा सकता, जिसमें सत्तर लाख रुपयों की रकम छिपी हुई थी।
वही अमावस्या की रात्रि थी किंतु दीपमालिका अपनी अल्प जीवनी समाप्त कर चुकी थी। चारों ओर जुआरियों के लिए यह शकुन की रात्रि थी क्योंकि आज की हार साल भर की हार होती है। लक्ष्मी के आगमन की धूम थी। कौडिय़ों पर अशर्फियां लुट रही थीं। भट्ठियों में शराब के बदले पानी बिक रहा था। पंडित देवदत्त के अतिरिक्त कस्बे में कोई ऐसा मनुष्य नहीं था, जो कि दूसरों की कमाई समेटने की धुन में न हो। आज भोर से ही गिरिजा की अवस्था शोचनीय थी। विषम ज्वर उसे एक-एक क्षण में मूर्छित कर रहा था। एकाएक उसने चौंक कर आंखें खोलीं और अत्यंत क्षीण स्वर में कहा आज तो दीवाली है।
देवदत्त ऐसा निराश हो रहा था कि गिरिजा को चैतन्य देखकर भी उसे आनंद नहीं हुआ। बोला-हां आज दिवाली है। गिरिजा ने आंसू-भरी दृष्टि से इधर-उधर देखकर कहा हमारे घर में क्या दीपक न जलेंगे? देवदत्त फूट-फूटकर रोने लगा। गिरिजा ने फिर उसी स्वर में कहा, देखो, आज बरस भर के दिन भी घर अंधेरा रह गया। मुझे उठा दो, मैं भी अपने घर दिये जलाऊंगी। ये बातें देवदत्त के हृदय में चुभी जाती थीं। मनुष्य की अंतिम घड़ी लालसाओं और भावनाओं में व्यतीत होती है।
इस नगर में लाला शंकरदास अच्छे प्रसिद्ध वैद्य थे। अपने प्राणसंजीवन औषधालय में दवाओं के स्थान पर छापने का प्रेस रखे हुए थे। दवाइयां कम बनती थीं, इश्तहार अधिक प्रकाशित होते थे।
वे कहा करते थे कि बीमारी केवल रईसों का ढकोसला है और पोलिटिकल एकानोमी के (राजनीतिक अर्थशास्त्र के) अनुसार इस विलास पदार्थ से जितना अधिक सम्भव हो, टैक्स लेना चाहिए। यदि कोई निर्धन है तो हो। यदि कोई मरता है तो मरे। उसे क्या अधिकार है कि बीमार पड़े और मुफ्त में दवा कराये? भारतवर्ष की यह दशा अधिकतर मुफ्त दवा कराने से हुई है। इसने मनुष्यों को असावधान और बलहीन बना दिया है। देवदत्त महीने भर नित्य उनके निकट दवा लेने आता था, परंतु वैद्य जी कभी उसकी ओर इतना ध्यान नहीं देते थे कि वह अपनी शोचनीय दशा प्रकट कर सके। वैद्य जी के हृदय के कोमल भाग तक पहुंचने के लिए देवदत्त ने बहुत कुछ हाथ पैर चलाये। वह आंखों में अंांसू भरे आता, किन्तु वैद्य जी का हृदय ठोस था, उसमें कोमल भाव था ही नहीं। वहीं अमावस्या की डरावनी रात थी। गगन-मंडल में तारे आधी रात के बीतने पर और भी अधिक प्रकाशित हो रहे थे मानो श्रीनगर की बुझी हुई दीवाली पर कटाक्षयुक्त आनंद के साथ मुस्करा रहे थे। देवदत्त बेचैनी की दशा में गिरिजा के सिरहाने से उठे और वैद्य जी के मकान की ओर चले। वे जानते थे कि लाला जी बिना फीस लिये कदापि नहीं आयेंगे। किंतु हताश होने पर भी आशा पीछा नहीं छोड़ती। देवदत्त कदम आगे बढ़ाते चले जाते थे।
हकीम जी उस समय अपने रामबाण बिंदु का विज्ञापन लिखने में व्यस्त थे। उस विज्ञापन की भावप्रद भाषा तथा आकर्षणशक्ति देखकर कह नहीं सकते थे कि वे वैद्य शिरोमणि थे या सुलेखक विद्यावारिधि। हकीम जी को पहले तो तरस आया, किंतु वह जुगनू की चमक थी जो शीघ्र स्वार्थ के विशाल अंधकार में विलीन हो गई।
वही अमावस्या की रात्रि थी। वृक्षों पर सन्नाटा छा गया था। जीतने वाले अपने बच्चों को नींद से जगाकर इनाम देते थे। हारने वाले अपनी रुष्ट और क्रोधित स्त्रियों से क्षमा के लिए प्रार्थना कर रहे थे। इतने में घंटी के लगातार शब्द वायु और अंधकार को चीरते हुए कान में आने लगे। उनकी सुहावनी ध्वनि इस निस्तब्ध अवस्था में अत्यंत भली प्रतीत होती थी। यह शब्द समीप हो गए और अंत में पंडित देवदत्त के समीप आकर उस खंडहर में डूब गए। पंडित जी उस समय निराशा के अथाह समुद्र में गोते खा रहे थे। शोक में इस योग्य भी नहीं थे कि प्राणों से भी अधिक प्यारी गिरिजा की दवा दरपन कर सकें। क्या करें? इस निष्ठुर वैद्य को यहां कैसे लायें? जालिम, मैं सारी उमर तेरी गुलामी करता। तेरे इश्तिहार छापता। आज पंडित जी को यह ज्ञात हुआ कि सत्तर लाख की चि_ी पत्रियां इतनी कौडिय़ों के मोल भी नहीं। पैतृक प्रतिष्ठा का अहंकार अब आंखों से दूर हो गया। उन्होंने उस मखमली थैले को संदूक से बाहर निकाला और उन चि_ी पत्रियों को, जो बाप दादों की कमाई का शेषांश थीं और प्रतिष्ठा की भांति जिनकी रक्षा की जाती थी, एक-एक करके दीयों को अर्पण करने लगे। जिस तरह सुख और आनंद से पालित शरीर चिता की भेंट हो जाता है, उसी प्रकार वह कागजी पुतलियां भी उस प्रज्वलित दीये के धधकते हुए मुंह का ग्रास बनती थीं। इतने में किसी ने बाहर से पंडित जी को पुकारा। उन्होंने चौंक कर सिर उठाया। वे नींद से, अंधेरे में टटोलते हुए दरवाजे तक आए। देखा कि कई आदमी हाथ में मशाल लिए हुए खड़े हैं और एक हाथी अपनी सूंड से उन एरंड के वृक्षों को उखाड़ रहा है, जो द्वार पर द्वारपालों की भांति खड़े थे। हाथी पर एक सुंदर युवक बैठा है जिसके सिर पर केसरिया रंग की रेशमी पाग है। माथे पर अर्धचंद्राकार चंदन, भाले की तरह तनी हुई नोकदार मूंछें, मुखारविंद से प्रभाव और प्रकाश टपकता हुआ, कोई सरदार मालूम पड़ता था। उसका कलीदार अंगरखा और चुनावदार पैजामा, कमर में लटकती हुई तलवार और गर्दन में सुनहरे कंठ और जंजीर उसके सजीले शरीर पर अत्यंत शोभा दे रहे थे। पंडित जी को देखते ही उसने रकाब पर पैर रखा और नीचे उतरकर उनकी वंदना की। उसके इस विनीत भाव से कुछ लज्जित होकर पंडित जी बोले, आपका आगमन कहां से हुआ?
नवयुवक ने बड़े नम्र शब्दों में जवाब दिया। उसके चेहरे से भलमनसाहत बरसती थी, मैं आपका पुराना सेवक हूं। दास का घर राजनगर है। मैं वहां का जागीरदार हूँ। मेरे पूर्वजों पर आपके पूर्वजों की कृपा और दया का परिणाम है। मैंने अपने अनेक स्वजनों से आपका नाम सुना था और मुझे बहुत दिनों से आपके दर्शनों की आकांक्षा थी। आज वह सुअवसर भी मिल गया। अब मेरा जन्म सफल हुआ।
पंडित देवदत्त की आंखों में आंसू भर आएं। पैतृक प्रतिष्ठा का अभिमान उनके हृदय का कोमल भाग था। वह दीनता जो उनके मुख पर छायी हुई थी, थोड़ी देर के लिए विदा हो गई। वे गम्भीर भाव धारण करके बोले, यह आपका अनुग्रह है जो ऐसा कहते हैं। नहीं तो मुझ जैसे कपूत में तो इतनी भी योग्यता नहीं है जो अपने को उन लोगों की संतति कह सकूं। इतने में नौकरों ने आंगन में फर्श बिछा दिया। दोनों आदमी उस पर बैठे और बातें होने लगीं, वे बातें जिनका प्रत्येक शब्द पंडित जी के मुख को इस तरह प्रफुल्लित कर रहा था जिस तरह प्रात: काल की वायु फूलों को खिला देती है। पंडित जी के पितामह ने नवयुवक ठाकुर के पितामह को पच्चीस सहस्त्र रुपये दिए थे। ठाकुर अब गया में जाकर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करना चाहता था, इसलिए जरूरी था कि उसके जिम्मे जो कुछ ऋण हो उसकी एक-एक कौड़ी चुका दी जाए। ठाकुर को पुराने बही खाते में यह ऋण दिखायी दिया। पच्चीस के अब पचहत्तर हजार हो चुके थे। वही ऋण चुका देने के लिए ठाकुर आया था। धर्म ही वह शक्ति है जो अंत:करण में ओजस्वी विचारों को पैदा करती है। हां इस विचार को कार्य में लाने के लिए पवित्र और बलवान आत्मा की आवश्यकता है। नहीं तो वे ही विचार क्रूर और पापमय हो जाते हैं। अंत में ठाकुर ने कहा, आपके पास तो वे चि_ियां होगी?
देवदत्त का दिल बैठ गया। वे संभलकर बोले-सम्भवत: हों। कुछ कह नहीं सकते। ठाकुर ने लापरवाही से कहा-ढूंढि़ए, यदि मिल जायें तो हम लेते जायेंगे। पंडित देवदत्त उठे, लेकिन हृदय ठंडा हो रहा था। शंका होने लगी कि कहीं भाग्य हरे बाग न दिखा रहा हो। कौन जाने वह पुर्जा जलकर राख हो गया या नहीं। यदि न मिला तो रुपये कौन देता है। शोक कि दूध का प्याला सामने आकर हाथ से छूट जाता है! हे भगवान्! वह पत्री मिल जाये। हमने अनेक कष्ट पाये हैं, अब हम पर दया करो। इस प्रकार आशा और निराशा की दशा में देवदत्त भीतर गए और दीया के टिमटिमाते हुए प्रकाश में बचे हुए पत्रों को उलट पुलट कर देखने लगे। वे उछल पड़े और उमंग में भरे हुए पागलों की भांति आनंद की अवस्था में दो तीन बार कूदे। तब दौड़कर गिरिजा को गले से लगा लिया और बोले प्यारी, यदि ईश्वर ने चाहा तो तू अब बच जायेगी। उन्मत्तता में उन्हें एकदम यह नहीं जान पड़ा कि गिरिजा अब नहीं है, केवल उसकी लाश है।
देवदत्त ने पत्री को उठा लिया और द्वार तक वे इसी तेजी से आये मानो पांवों में पर लग गए। परंतु यहां उन्होंने अपने को रोका और हृदय में आनंद की उमड़ती हुई तरंग को रोककर कहा, यह लीजिए, वह पत्री मिल गई। संयोग की बात है, नहीं तो सत्तर लाख के कागज दीयों के आहार बन गए होते!
आकस्मिक सफलता में कभी-कभी संदेह बाधा डालता है। जब ठाकुर ने उस पत्री के लेने को हाथ बढ़ाया तो देवदत्त को संदेह हुआ कि कहीं वह उसे फाड़कर फेंक न दे। यद्यपि यह संदेह निरर्थक था, किंतु मनुष्य कमजोरियों का पुतला है। ठाकुर ने उनके मनोभाव को ताड़ लिया। उसने बेपरवाही से पत्री को लिया और मशाल के प्रकाश में देखकर कहा अब मुझे विश्वास हुआ। यह लीजिए, आपका रुपया आपके समक्ष है, आशीर्वाद दीजिए कि मेरे पूर्वजों की मुक्ति हो जाये। यह कहकर उसने अपनी कमर से एक थैला निकाला और उसमें से एक-एक हजार के पचहत्तर नोट निकालकर देवदत्त को दे दिये। पंडित जी का हृदय बड़े वेग से धड़क रहा था। नाड़ी तीव्र गति से कूद रही थी। उन्होंने चारों ओर चौकन्नी दृष्टि से देखा कि कहीं कोई दूसरा तो नहीं खड़ा है और तब कांपते हुए हाथों से नोटों को ले लिया। अपनी उच्चता प्रकट करने की व्यर्थ चेष्टा में उन्होंने नोटों की गणना भी नहीं की। केवल उड़ती हुई दृष्टि से देखकर उन्हें समेटा और जेब में डाल लिया।
वही अमावस्या की रात्रि थी। स्वर्गीय दीपक भी धुंधले हो चले थे। उनकी यात्रा सूर्यनारायण के आने की सूचना दे रही थी। उदयाचल फिरोजी बाना पहन चुका था। अस्ताचल में भी हल्के श्वेत रंग की आभा दिखायी दे रही थी। पंडित देवदत्त ठाकुर को विदा करके घर चले। उस समय उनका हृदय उदारता के निर्मल प्रकाश से प्रकाशित हो रहा था। कोई प्रार्थी उस समय उनके घर से निराश नहीं जा सकता था। सत्यनारायण की कथा धूमधाम से सुनने का निश्चय हो चुका था। गिरिजा के लिए कपड़े और गहने के विचार ठीक हो गये। अंत:पुर में ही उन्होंने शालिग्राम के सम्मुख मनसा वाचा कर्मणा सिर झुकाया और तब शेष चि_ी पत्रियों को समेट कर उसी मखमली थैले में रख दिया। किंतु अब उनका यह विचार नहीं था कि संभवत: उन मुर्दों में भी कोई जीवित हो उठे। वरन् जीविका से निश्चिंत हो अब वे पैतृक प्रतिष्ठा पर अभिमान कर सकते थे। उस समय वे धैर्य और उत्साह के नशे में मस्त थे। बस, अब मुझे जिंदगी में अधिक सम्पदा की जरूरत नहीं। ईश्वर ने मुझे इतना दे दिया है। इसमें मेरी और गिरिजा की जिंदगी आनंद से कट जायेगी। उन्हें क्या खबर थी कि गिरिजा की जिंदगी पहले कट चुकी है। उनके दिल में यह विचार गुदगुदा रहा था कि जिस समय गिरिजा इस आनंद समाचार को सुनेगी उस समय अवश्य उठ बैैठेगी। चिंता और कष्ट ने ही उसकी ऐसी दुर्गति बना दी है। जिसे भर पेट कभी रोटी नसीब न हुई, जो कभी नैराश्यमय धैर्य और निर्धनता के हृदय विदारक बंधन से मुक्त न हुई, उसकी दशा इसके सिवा और हो ही क्या सकती है? यह सोचते हुए वे गिरिजा के पास गये और आहिस्ता से हिलाकर बोले, गिरिजा, आंखें खोलो। देखो ईश्वर ने तुम्हारी विनती सुन ली और हमारे ऊपर दया की। कैसी तबियत है?
किंतु जब गिरिजा तनिक भी न मिनकी तब उन्होंने चादर उठा दी और उसके मुंह की ओर देखा। हृदय से एक करुणात्मक ठंडी आह निकली। वे वहीं सिर थामकर बैठ गये। आंखों से शोणित की बूंद सी टपक पड़ीं। आह, क्या यह सम्पदा इतने महंगे मूल्य पर मिली है? क्या परमात्मा के दरबार से मुझे इस प्यारी जान का मूल्य दिया गया है? ईश्वर, तुम खूब न्याय करते हो। मुझे गिरिजा की आवश्यकता है, रुपयों की आवश्यकता नहीं। यह सौदा बड़ा महंगा है।
अमावस्या की अंधेरी रात गिरिजा के अंधकारमय जीवन की भांति समाप्त हो चुकी थीं। खेतों में हल चलाने वाले किसान ऊंचे और सुहावने स्वर से गा रहे थे। सर्दी से कांपते हुए बच्चे सूर्य देवता से बाहर निकलने की प्रार्थना कर रहे थे। पनघट पर गांव की अलबेली स्त्रियां जमा हो गयी थीं। पानी भरने के लिए नहीं, हंसने के लिए। कोई घड़े को कुएं में डाले हुए अपनी पोपली सास की नकल कर रही थी, कोई खम्भों से चिपटी हुई अपनी सहेली से मुस्काराकर प्रेम रहस्य की बातें करती थी। बूढ़ी स्त्रियां पोतों को गोद में लिये अपनी बहुओं को कोस रही थीं कि घंटे भर हुए अब तक कुएं से नहीं लौटीं। किंतु राजवैद्य लाला शंकरदास अभी तक मीठी नींद ले रहे थे। खांसते हुए बच्चे और कराहते हुए बूढ़े उनके औषधालय के द्वार पर जमा हो चले थे। इस भीड़ से कुछ दूर पर दो तीन सुंदर किंतु मुर्झाए हुए नवयुवक टहल रहे थे और वैैद्य जी से एकांत में कुछ बातें करना चाहते थे। इतने में पंडित देवदत्त नंगे सिर, नंगे बदन, लाल आँखें, डरावनी सूरत, कागज का एक पुलिंदा लिये दौड़ते हुए आये और औषधालय के द्वार पर इतनी जोर से हांक लगाने लगे कि वैद्य जी चौंक पड़े और कहार को पुकार कर बोले कि दरवाजा खोल दे। कहार महात्मा बड़ी रात गये किसी बिरादरी की पंचायत से लौटे थे। उन्हें दीर्घ-निद्रा का रोग था जो वैद्य जी के लगातार भाषण और फटाकर की औषधियों से भी कम न होता था। आप ऐंठते हुए उठे और किवाड़ खोलकर हुक्का चिलम की चिंता में आग ढूंढऩे चले गये। हकीम जी उठने की चेष्टा कर रहे थे कि सहसा देवदत्त उनके सम्मुख जाकर खड़ेे हो गयें और नोटों का पुलिंदा उनके आगे पटक कर बोले-वैद्य जी, ये पचहत्तर हजार के नोट हैं। यह आपका पुरस्कार और आपकी फीस है। आप चलकर गिरिजा को देख लीजिए और ऐसा कुछ कीजिए कि वह केवल एक बार आंखे खोल दे। यह उसकी एक दृष्टि पर न्योछावर है, केवल एक दृष्टि पर। आपको रुपये मनुष्य की जान से प्यारे हैं, वे आपके समक्ष हैं। मुझे गिरिजा की एक चितवन इन रुपयों से कई गुनी प्यारी है।
वैद्य जी ने लज्जामय सहानुभूति से देवदत्त की ओर देखा और केवल इतना कहा, मुझे अत्यंत शोक है, सदैव के लिए तुम्हारा अपराधी हूं। किंतु तुमने मुझे शिक्षा दे दी। ईश्वर ने चाहा तो ऐसी भूल कदापि न होगी। मुझे शोक है। सचमुच है! ये बातें वैद्य जी के अंत:करण से निकली थीं।ह्व