हेमन्त ऋतु चर्या (22 अक्टूबर 2013 से 21 दिसंबर 2013)

प्रयोग करें
हेमन्त ऋतु में पौष्टिकता तथा मधुर रसप्रधान आहार लेना चाहिए।

  • पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरम व स्निग्ध प्रकृति के घी से बने पदार्थों का यथायोग्य सेवन करना चाहिए। मूंगफली, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिघाड़ा, आंवला आदि पौष्टिक पदार्थ हैं।
  • बच्चों को कुमारकल्याणरस का सेवन करना चाहिए।
  • स्वास्थ्य रक्षा हेतु शक्ति का भंडार एकत्रित करने के लिए उड़दपाक सोंठपाक जैसे वाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए।
  • मौसमी फल व शाक,दूध, रबड़ी, घी, मक्खन, मट्ठा, शहद, उड़द, खजूर, तिल, खोपरा, मेथी, पीपर, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में योग्य माने जाते हैं।
  • हरी पत्तीदार सबिजयों को तेल में बनाना अच्छा रहता है।
  • लहसुन की 3-4 कलिया या तो ऐसे ही निगल जाया करें या चबाकर खा लें या दूध में उबालकर खा लें। सूती, मोटे तथा गर्म वस्त्र इस मौसम में उपयोगी होते हैं।
  • कमरे एवं शरीर को थोड़ा गर्म रखें।
  • प्रात:काल सूर्य की किरणों का सेवन करें। पैर ठंडे न हों, इस हेतु जूते पहनें। त्वचा की रूखेपन को दूर करने के लिए मलाई या शहद को नीबू के रस में मिलाकर लगाएं।
  • शरीर की चंपी करवाना एवं यदि कुश्ती अथवा अन्य कसरतें करना लाभप्रद है।
  • तेल मालिश के बाद शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करना हितकारी होता है।
  • प्रतिदिन प्रात:काल दौड़ लगाना, शुद्ध वायुसेवन हेतु भ्रमण, शरीर की तेल-मालिश, कसरत व योगासन करने चाहिए।
  • ताजा दही, छाछ, नीबू आदि का सेवन कर सकते हैं किन्तु रात्रि में इनका सेवन न करें। 
  • रात को सोते समय दूध अवश्य पीना चाहिए। यदि दूध न मिले रात को सोते समय 25-25 ग्राम देसी चने व गुड़ खूब चबा-चबा कर खाए और मुंह साफ कर सो जाएं।
  • मूंगफली का सेवन करना चाहिए।
  • प्रात: सेवन हेतु रात को भिगोये हुए कच्चे चने (खूब चबा-चबाकर खाये)
  • पीने में उष्ण जल का प्रयोग करें।
  • बाजरे की खिचड़ी भरपूर घी और गुड़ के साथ सेवन करना चाहिए।
  • कच्ची पतली मूली को तेल में बना कर खाना चाहिए।
  • अंगार पर भुना बैंगन जिसे फिर तेल में पकाया गया हो उष्णता के लिए अच्छा रहता है।
  • प्रयोग न करें
  • ठंडी हवा से बचें। स्कूटर, मोटरसाइकिल जैसे खुले वाहनों की बजाय बस रेल कार जैसे वाहनों से ही सफर करने का प्रयास करें।
  • सूती व हल्के कपड़े न पहनें।
  • उपवास अधिक न करें और न ही अधिक समय तक भूखे रहें अन्यथा जठराग्रि (जो कि इस ऋतु में अत्यधिक तीव्र रहती है) शरीर की धातुओं को जलाने लगेगी। शरीर में वात कुपित होगा और वातजन्य व्याधियां उत्पन्न हो जाएगी।
  • इन दिनों में खटाई का अधिक प्रयोग न करें ताकि कफ के प्रकोप और खांसी, दमा, नजला, जुकाम जैसी बीमारियों से बचे रहें।
  • शीत प्रकृति के पदार्थों के सेवन से बचें।
  • इस ऋतु में बर्फ अथवा फ्रिज का पानी, रूखे, कसैले, तीखे तथा कड़वे रसप्रधान द्रव्यों, वातकारक और बासी पदार्थ एवं जो पदार्थ आपकी प्रकृति के अनुकूल नहीं हों, उनका सेवन न करें।
  • सुबह देर तक न सोएं। इससे शरीर की बढऌ़ी हुई गर्मी सिर, आंख, पेट, पित्ताशय, मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय आदि अंगों पर बुरा असर डालती है जिससे कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।