स्मार्ट सिटी : बाजार और वास्तु

स्मार्ट सिटी : बाजार और वास्तु

रामेंद्र पांडे

उड़ीसा की नयी राजधानी बनाते समय भुवनेश्वर शहर के आस-पास की भूमि को विकसित कर नये भुवनेश्वर शहर को पूर्व नियोजित तरीके से बसाया गया था। इस शहर में आवासीय क्षेत्र कटक रोड, जनपथ रोड जैसे क्षेत्र भी समय के साथ मुख्य मार्केट के रूप में विकसित हो गये जबकि यहाँ बाजार बनाने की योजना नहीं थी। दूसरी ओर बाजार बनाने की जगह भैंसे बँधी हुई पायीं गयीं (कुछ वर्षों पहले सर्वे के दौरान स्थिति यही थी)। इसी प्रकार बिहार में लगभग 60-65 वर्ष पहले पटना का मास्टर प्लान बनाकर लागू किया गया। पटना शहर के क्षेत्रफल के लगभग बराबर क्षेत्रफल को विकसित कर दिया गया। यहाँ भी मास्टर प्लान के अनुसार इस शहर का विकास नहीं हो पाया। विकास के स्तर का जो अनुमान था वह नहीं हो पाया, प्लानिंग के अनुसार व्यापारिक गातिविधियाँ नहीं विकसित हो पायीं। कुछ क्षेत्र अविकसित क्षेत्र की श्रेणी में चले गये और कुछ स्लम एरिया में परिवर्तित हो गये।

उड़ीसा का यह उदाहरण बताता है कि बाजारों के विकास की वर्तमान योजनाओं में काफी खामियां हैं। आज देश में स्मार्ट सिटी की चर्चा हो रही है। स्मार्ट सिटी में बाजारों का विकास भी अनिवार्य है। सवाल है कि यह होगा कैसे? उल्लेखनीय है कि शहरों के विकास क्रम में शहर की आबादी में वृद्धि होने पर शहर के क्षेत्रफल के साथ-साथ नये बाजार भी विकसित होते हैं। ऐसे में विकास प्राधिकरण जैसी संस्थाएं शहर के अन्तर्गत स्थानों का चिह्रित करती हैं तथा वहाँ व्यापारिक गातिविधियाँ प्रारम्भ करने के लिए सुविधाएँ भी जुटाती हैं। हमारे शोध के परिणाम बताते हैं कि आधुनिक टाउन प्लानिंग के अनुसार आवंटित भूमि पर बाजार का बनना व व्यापारिक गतिविधियों का विकास अनिश्चित है। जबकि आधुनिक नगर नियोजन के साथ वास्तुशास्त्र के विधियों को अपनाने से यह सुनिश्चित होता है कि बाजार के लिए आवंटित भूमि पर बाजार विकसित होगा ही। देश के प्रत्येक शहर में इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। कुछेक और उदाहरण यहां प्रस्तुत हैं।

दिल्ली शहर में विकास प्राधिकरण द्वारा बनाये गये बाजार स्थल कहीं विकसित हुए तो कहीं विकसित नहीं हो पाये, कहीं 25-30 वर्षो में विकसित हो पाये। जबकि आवासीय क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधि बेतहाशा बढ़ गई। आवासीय भवनों में व्यापारिक गतिविधियों को बन्द करने के लिए उच्चतम न्यायालय को आदेश देने पड़े और एक अभियान के तहत व्यापरिक गातिविधियों को बन्द करना पड़ा। फिर भी नये कानून बनाकर उन क्षेत्रों में व्यापार की छूट देनी पड़ी। लेकिन विकास प्रधिकरण द्वारा चिह्रित किये गये व्यापारिक स्थल गातिविधियों से पूर्णत: आबाद नहीं हो सके तथा आवासीय क्षेत्रों में व्यापारिक गातिविधियां दिखती ही हैं। लगभग 50 लाख की आबादी वाले पूर्वी दिल्ली में क्षेत्रफल व आबादी के अनुपात में व्यापारिक गतिविधियाँ विकसित नहीं हो पायीं। आजादी के 65 वर्षों में लगभग 50 लाख की आबादी के बीच होटल के 65 रूम तक नहीं विकसित हो पाये थे। (कॉमनवेल्थ गेम्म आयोजन के दौरान कुछ होटल बन गये हैं।) देश की राजधानी होने के बावजूद इस क्षेत्र में देश स्तर की व्यापारिक गातिविधियाँ नहीं पायी जाती।

केरल प्रान्त में कोचीन व एर्नाकुलम एक ही शहर के दो हिस्से हैं। इन्हें अलग-अलग नामों से चिह्रित कर दिया गया हैं। मुम्बई व नवी मुम्बई की तरह प्राचीन शहर कोचीन का विकसित रूप एर्नाकुलम है। समुद्री खाड़ी की पश्चिम दिशा में कोचीन तथा पूर्व में एर्नाकुलम है। एर्नाकुलम शहर का एम.जी. रोड मार्केट अन्य शहरों के विकसित मार्केट के समान है। यहाँ बड़ी कम्पनियों के शो रूम, मॉल्स, बैंक, ऑफिसेज पाए जाते हैं। कोचीन शहर तथा आस-पास के क्षेत्रों की व्यापारिक आपूर्ति यह मार्केट करता है। इसी प्रकार के ट्विन सिटी इलाहाबाद व नैनी हैं। नैनी में सरकार की ओर से कई योजनायें क्षेत्र को विकसित करने के लिए शुरू की गयीं। औद्योगिक क्षेत्र बनाकर उद्योग शुरू किये गये, कई संस्थाएँ खोली गयीं परन्तु नैनी में व्यापारिक गातिविधियों की सफलता वहां मामूली रही। हैदराबाद में शहर से थोड़ी दूरी पर माधापुर एरिया को व्यापारिक गातिविधियों के लिए विकसित किया गया। यह क्षेत्र विकसित हुआ तथा आस-पास के क्षेत्र भी विकसित हो गये।

आधुनिक नगर नियोजन के अन्तर्गत भुवनेश्वर शहर की प्लानिंग में आवासीय क्षेत्र के बाजार में परिवर्तित हो जाने तथा बाजार के लिए आबंटित क्षेत्र में बाजार विकसित नहीं होने के अनेक तर्क व कारण दिये जा सकते हैं जो प्लानिंग की कमी न होकर अन्य कारण होंगे। कोचीन के साथ एर्नाकुलम के मार्केट डेवलपमेन्ट को प्लानिंग की सफलता कही जायेगी। वहीं इसी तर्ज पर इलाहाबाद व नैनी के असफल होने के अनेक कारण होंगे जो प्लानिंग की कमी नहीं होगी। पटना की बिगड़ी हुई स्थिति का कारण बाहर से आने वाली अत्यधिक जनसंख्या को बता दिया जाता है। हैदराबाद का डेवलपमेन्ट पुन: प्लानिंग की सफलता कही जायेगी। इस प्रकार आधुनिक नगर नियोजन विभिन्न शहरों के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की व्याख्या भिन्न-भिन्न तरीके से करता है। समय के साथ नये-नये तर्क व नयी परिभाषायें सामने आती हैं। परंतु वास्तुशास्त्र इन क्षेत्रों की प्रत्येक वर्ग मीटर भूमि की व्याख्या करता है तथा प्लानिंग के पहले ही क्षेत्र के विकास को परिभाषित करता है। क्षेत्र विशेष में किस प्रकार का विकास होगा, बाजार विकसित हो सकते हैं अथवा नहीं यदि होंगे हो किस स्तर के होंगे आदि की साफ-साफ परिभाषा करता है। साथ ही वास्तुशास्त्र विभिन्न शहरों के लिए अलग-अलग मानदण्ड भी नहीं अपनाता। सभी शहरों के लिए उसके मानदंड समान हैं, अनुभूत और सफल भी हैं। शोध के दौरान इस प्रकार के अनेक उदाहरण प्रत्येक शहर में पाये गये।

इसलिए बाजार विकसित करते समय यदि भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुणों पर भी ध्यान दिया जाय तो बाजार की किस्म निर्धारित की जा सकती है तथा बाजार विकसित होने की शत-प्रतिशत सम्भावना होती है। आधुनिक टाउन प्लानिंग में वास्तुशास्त्र का समावेश आवश्यक है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि आधुनिक टाउन प्लानिंग की पहुँच भूमि के उन गुणों तक नहीं हो पायी है जो भूमि के प्राकृतिक गुण हैं और वास्तुशास्त्र में वर्णित किये गये हैं।

वास्तुशास्त्र के अन्तर्गत नगर रचना का विस्तार से वर्णन मिलता है और इस प्राचीन भारतीय नगर रचना शास्त्र में आपण विद्या का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार भूमि चयन के उपरान्त नगर नियोजन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। रिहायशी इलाकों व व्यापारिक संस्थानों के लिए स्थान निश्चित किये जाते हैं और उन स्थानों पर निर्माण कार्य किया जाता है। वास्तुशास्त्र में भूमि का चयन भूमि के रंग, रूप, आकार, ढाल, गन्ध, स्वाद आदि को आधार बनाकर किया जाता है। इक्कीसवीं सदी में ये सभी प्रक्रियायें सम्भव नहीं रह गयी हैं। जमीन का अभाव, समय का अभाव, धन का कहीं अभाव तो कहीं इसका बहाव, सरकारी कानून-कायदे इत्यादि वास्तुशास्त्रीय परम्परा द्वारा भूमि चयन की प्रक्रिया में आड़े आते हैं। जनसंख्या की वृद्धि सभी समस्याओं पर भारी पड़ती दिखती है। शहरों में और भी अन्य कारण है जो भूमि चयन एवं बाजार को विकसित करने में प्रभावी हैं। परन्तु बाजार को विकसित करने में भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुणों के साथ-साथ अन्य सभी कारकों पर विचार करने के उपरान्त भूमि का ढाल ही सर्वाधिक प्रभावी दिखाई देता है।

चर वास्तु

वास्तुशास्त्र की पुस्तकों में भूमि के विभिन्न दिशाओं में बने ढाल के कारण उत्पन्न होने वाले गुणों का वर्णन किया गया है। वास्तुविद्या नामक ग्रन्थ में दिशाओं व उनके विपरीत दिशा व विदिशाओं के साथ बने ढाल के गुणों का भी वर्णन किया गया है। इस क्रम में ग्रन्थकार ने दक्षिण दिशा व उसके विपरीत उत्तर दिशा व विदिशाओं ईशानकोण व वायव्य कोण द्वारा बनी ढालुआँ भूमि को चर-वास्तु की संज्ञा दी है।

वास्तुविद्या 2/24/24 में कहा गया है कि उत्तर, ईशान कोण तथा वायव्य कोण में ऊँची तथा दक्षिण में नीची भूमि को चर-वास्तु कहते हैं। यह भूमि वैश्यों के लिए विशेष लाभदायक होती है। चर-वास्तु वाली भूमि पर विभिन्न प्रकार के रसायन, तेल, घी, पेन्ट, मेडिसिन आदि का व्यापार देखने को मिलता है। यह भूमि वैश्यों के लिए बतायी गयी है, लेकिन वैश्यों के अन्य व्यापार की तुलना में तेल, घी, केमिकल, मेडिसिन का व्यापार ही इस वास्तु पर वृद्धि करते हुए नजर आता है। रसायन, तेल, घी, मेडिसिन आदि का व्यापार अन्य दिशाओं की ढालुआँ भूमि पर वृद्धि करते हुए नजर नहीं आता जबकि अन्य विभिन्न प्रकार के व्यापारों की वृद्धि उत्तर या पूर्व की ढालुआँ जमीन पर देखी जाती है। पाया गया है कि सभी प्रकार के बाजारों में जैसे ही भूमि की ढाल दक्षिण की ओर परिवर्तित होती है, व्यापार की वस्तु भी केमिकल, तेल या मेडिसिन में बदल जाती है।

इस प्रकार के उदाहरण दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेत्रई, विजयवाड़ा, हैदराबाद, अमृतसर, गुवाहाटी आदि सभी शहरों के बाजारों में दिखाई देते हैं। विचारणीय है कि यह वास्तु वैश्यों के लिए कहा गया है और वैश्य सभी प्रकार की वस्तुओं का व्यापार करते हैं, परन्तु चर वास्तु पर केवल रसायन, तेल, पेन्ट, मेडिसिन आदि के ही व्यापार में वृद्धि दिखाई देता है। वैश्यों में और इस प्रकार के व्यापार में तथा चर-वास्तु में सम्बन्ध पर और शोध किए जाने की आवश्यकता है।

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता शहर में हुगली नदी के किनारे स्ट्रैण्ड रोड पर नीमतला घाट से हावड़ा ब्रिज तक पोस्ता बाजार फैला है। लगभग एक किलोमीटर लम्बे एवं आधे किलोमीटर चौड़े बाजार में विभिन्न प्रकार के तेल एवं घी का व्यापार देखने को मिलता है। सैकड़ों की संख्या में खाद्य एवं अखाद्य तेलों के गोदाम, ऑफिसेज, दुकानें स्टैण्ड रोड व गलियों में हुगली नदी के किनारे स्थित हैं। इस बाजार में तेल, घी के लिए इतनी जबरदस्त उर्जा है कि सड़क पर ही आयल टैंकरों से तेल टीनों में भर दिया जाता हैं और वहीं उन्हें सील कर उनपर किसी ब्राण्ड का लेबल लगाकर किसी दूसरे जगह के लिए भेज दिया जाता है। इन आयल टैंकरों को व्यापार करने के लिए दुकानों अथवा गोदामों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। शोध के दौरान इस बाजार की भूमि का ढाल चर वास्तु के अनुसार दिखाई देता है। पूरे बाजार का ढाल दक्षिण दिशा में हावड़ा ब्रिज की तरफ है। नीमतला घाट से हावड़ा ब्रिज तक महर्षि देवेन्द्र रोड पर लगभग 4′ का ढाल दिखाई देता है। तेल, घी का व्यापार पोस्ता बाजार एसोसिएशन कार्यालय के पास से शुरू होता दिखाई है। कार्यालय के पास की भूमि ऊँची तथा इसके सामने गली में भी हुगली नदी के तट तक इसी प्रकार ऊँची दिखाई देती है। जैसे जैसे दक्षिण दिशा की तरफ चलते जाते हैं जमीन और नीची होती जाती है। इतने बड़े क्षेत्र में फैले इस बाजार में जगनाथ लेन है और इस पूरी गली में लोहे का व्यापार पाया जाता है। जगनाथ लेन में तेल, घी की दुकानें, गोदाम या ऑफिसेज नहीं है। इस गली का ढाल दक्षिण दिशा की तरफ न होकर उत्तर दिशा की तरफ है। विचारणीय है कि इतने बड़े बाजार में तेल, घी का व्यापार है। जगन्नाथ लेन के सामने व इसके समानान्तर गालियों में भी तेल, घी का व्यापार है (भूमि का ढाल दक्षिण की तरफ है) परन्तु गली का ढाल उत्तर दिशा (जगनाथ लेन) की तरफ होते ही तेल, घी का व्यापार देखने को नहीं मिलता है।

गुजरात प्रान्त का छोटा सा शहर ऊँझा अपने तिलहन के व्यापार के लिए जाना जाता है। इस शहर के कृषि उपज मण्डी समिति में दो प्रकार की मण्डियाँ एक साथ है। एक मण्डी अनाज की है जबकि दूसरी केवल ऑयल सीड्स की। अनाज मण्डी में गेहूँ, चना, दाल आदि का व्यापार होता है और ऑयल सीड्स की मण्डी में सरसों, अरण्डी, असली, सूर्यमुखी आदि की। ऑयल सीड्स की दुकानें एवं अनाज की दुकानें एक साथ सटी हुई हैं। इन दोनों व्यापारिक संकुलों के भूमि का निरीक्षण करने पर इनके ढाल आपस में विपरीत दिशा में दिखाई देते हैं। जिस कॉम्पलैक्स में अनाज की दुकानें है उस भूमि का ढाल उत्तर दिशा की तरफ है तथा जिस कॉम्पलैक्स में ऑयल सीड्स का कारोबार है उस भूमि का ढाल दक्षिण दिशा में है। ध्यान से देखने पर इस कॉम्पलैक्स की भूमि चर वास्तु के अनुसार दिखाई देती है।

इसी प्रकार भारतवर्ष के सुदूर दक्षिण में केरल प्रान्त की राजधानी तिरूवनन्तपुरम है। इस शहर के चलई क्षेत्र के कोथुवल स्ट्रीट में तेल, घी, की दुकानें पायी जाती है। यह मार्केट कई प्रकार के वस्तुओं का है, परन्तु यहाँ भी तेल, घी की दुकानें दक्षिण ढाल वाली भूमि पर स्थित हैं। उत्तर या अन्य दिशाओं की तरफ नीची होती हुई भूमि पर तेल, घी की दुकानें नहीं है। यहाँ भी तेल,घी की दुकानों व चर वास्तु में सम्बन्ध स्थापित होता दिखाई देता है।

दिल्ली महानगर में खारी बावली रोड के उत्तर दिशा में तिलक बाजार केमिकल की मार्केट है। इस मार्केट में विभिन्न प्रकार के केमिकल्स, वैक्स क दुकानें तथा ऑफिसेज है। पूरी गली में केमिकल से सम्बन्धित कारोबार दिखाई देता है। पूरी गली में केमिकल के व्यापार करने की जबदस्त क्षमता दिखाई देती है। लगभग 100 वर्ष पुरानी दीवार की एक फीट गहरी जगह में शटर लगाकर दुकान का रूप देकर केमिकल का व्यापार करते हुए देखा जा सकता है। इस मार्केट की भूमि उत्तर, ईशान, व वायव्य कोण में ऊँची तथा दक्षिण दिशा में नीची है। तेलियाना चौराहे पर गन्धी गली में तीन दुकान तक केमिकल्स की दुकानें हैं। उसके बाद अन्य तरह की दुकानें हैं। क्योंकि वहाँ भूमि का ढाल स्पष्ट रूप् से पूर्व की तरफ देखा जा सकता है। इसी प्रकार गली हाफिज खान में भी चार-पाँच दुकानें ही केमिकल्स की हैं, उसके बाद भूमि का ढाल बदल गया है तथा दुकानों की वस्तुयें भी बदल गयी हैं। तिलक बाजार के सामने खारी बावली रोड के दक्षिण तरफ नया बाँस, गली बताशा वाली, गाडोदिया मार्केट आदि में केमिकल, तेल,घी की दुकानें नहीं हैं, तथा इन गालियों का ढाल उत्तर की तरफ है।

खारी बावली रोड पर ही फतेहपूरी मस्जिद में बनी दुकानों में एक भी केमिकल, तेल, घी की दुकान या ऑफिस नहीं है, जबकि ठीक सामने तेल एवं घी की होलसेल मार्केट दिखाई देती है। तेल घी के कई दुकानों के साथ मावे की दुकानें भी मौजूद हैं। फतेहपूरी मस्जिद की तरफ की भूमि का ढाल उत्तर दिशा की तरफ है जो चर वास्तु में नहीं होता और सामने की तरफ की भूमि दक्षिण ढाल वाली भूमि चर वास्तु है। इस प्रकार खारी बावली रोड के उत्तर की ओर चर वास्तु पर हमें रसायन, तेल, घी आदि का व्यापार देखने को मिलता है। चन्द इत्र की दुकानों से प्रारम्भ हुई इस मार्केट में लगभग 1600 दुकानें केमिकल की खुल गई हैं। अंग्रेजी हुकूमत के कृपा पात्र लोगों के रहने वाली जगह अब लगभग व्यापारिक गातिविधियों में तब्दील हो गयी है।

इस प्रकार के बाजार में लगभग सभी वस्तुओं का व्यापार पाया जाता है। बड़े-बड़े शो रूम, छोटी-छोटी दुकानें बैंक आफिस आदि इन बाजारों में देखने को मिलते हैं। केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र या कॉमर्शियल कोर का क्षेत्र इस प्रकार के बाजार से विकसित होता है। इन बाजारों की भूमि पूर्व, उत्तर, पूर्व-उत्तर पश्चिम एवं वायव्य कोण के मध्य की ओर ढालुआँ पायी जाती है।

गोवीथी वास्तु

वास्तुविद्या 2/2/3 में कहा है – वरूण का स्थान (पश्चिम) ऊँचा हो तथा इन्द्र का स्थान (पूर्व) नीचा हो तो ऐसी भूमि को गोवीथी वास्तु कहते हैं। अर्थात पश्चिम से पूर्व की ढाल वाली भूमि को गोवीथी वास्तु कहते हैं। यह भूमि वृद्धिकारक होती है। (पूर्वप्लवावृद्धिकरी)। ऐसी भूमि श्रेष्ठ बतायी गयी है। इस भूमि पर निवास करने से आयु, बल, यश की वृद्धि होती है, मनुष्य सभी सम्पत्तियों से युक्त होता है व राज्य से सम्मान पाता है तथा सदा आनन्दपूर्वक रहता है।

गजवीथी वास्तु

वास्तुविद्या 2/5 में कहा है – दक्षिण (यम) का स्थान ऊँचा हो तथा उत्तर (सोम) का स्थान नीचा हो तो ऐसी भूमि को गजवीथी वास्तु कहते हैं। अर्थात् भूमि का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर हो तो उसे गजवीथी वास्तु कहते हैं। ऐसी भूमि निवास करने योग्य होती है। यह भूमि धन में वृद्धि करने वाली होती है-‘धनदा तु उत्तरप्लवा’। उत्तर की ओर ढालुआँ भूमि पर व्यापार में बहुत वृद्धि पायी जाती है।

धनवीथी वास्तु

वास्तुविद्या 2/7 के अनुसार- दक्षिण-पश्चिम का स्थान (नैर्ऋत्य कोण) ऊँचा हो तथा ईश का स्थान (ईशान कोण) नीचा हो तो ऐसी भूमि को धनवीथी वास्तु कहते हैं। अर्थात् नैर्ऋत्य कोण से ईशान कोण की ढालुआँ भूमि को धनवीथी वास्तु कहते हैं। ऐसी भूमि यश और सुख देने वाली होती है।

पितामह वास्तु

वास्तुविद्या 2/8 के अनुसार – पूर्व (इन्द्र) एवं आग्नेय कोण (अग्नि) के बीच की भूमि ऊँची हो तथा पश्चिम (वरूण) एवं वायव्य कोण (वायु) के बीच की भूमि नीची हो तो ऐसी भूमि को पितामह वास्तु कहते हैं। यह वास्तु शुभ करने वाली होती है।

इनके उदाहरण भी देश भर के बाजारों में देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में सिविल लाइन मार्केट यहाँ का मुख्य बाजार है। बहुत ही खूबसूरत प्लानिंग से इस क्षेत्र को बसाया गया है। इस मार्केट में शहर की मुख्य व्यापारिक गातिविधियाँ, बैंक, आफिसेज़, बड़े-बड़े शो रूम, माल्स, होटल्स आदि मौजूद हैं। इस बाजार की भूमि का ढाल भी पश्चिम हिस्से में स्थित आल सेंट्स कैथेड्रल चर्च से पूर्व दिशा में बस स्टैण्ट की तरफ है।

राजस्थान प्रान्त के अजमेर शहर से लगभग 10 कि.मी. उत्तर राष्ट्रीय राजमार्ग 7 पर किशनगढ़ शहर से बाहर किशनगढ़ मार्बल मार्केट के नाम से संगमरमर पत्थर की मार्केट है। किशनगढ़ के आस-पास खदान मिलने के कारण यहाँ बाजार विकसित हो गया है। इस मार्केट में खदान से लाये गये पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों को मशीन से काटकर प्रयोग करने लायक पत्थरों में बनाने वाले फैक्ट्रियों के साथ-साथ सैकड़ों की संख्या में पत्थर का कारोबार करने वाले हैं। इस मार्केट में संगमरमर पत्थर के सैकडों ट्रकों का कारोबार प्रतिदिन देखने में आता है। इस मार्केट में भी पूर्व व उत्तर की ढालुआँ भूमि पर ही बाजार विकसित हुआ है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भूमि का ढाल विभिन्न दिशाओं में हैं। दक्षिण,पश्चिम की ढाल पर कहीं-कहीं गोदाम पाये जाते हैं। पत्थरों के कारोबार में वृद्धि तो उत्तर-पूर्व की ढालुआँ भूमि पर ही दिखाई देती है।

पटना शहर का एक्जीबिशन रोड व फ्रेजर रोड मार्केट पटना के अलावा पश्चिम बिहार का भी मुख्य बाजार है। चिरैयाटाड़ पुल के चौराहे से गाँधी मैदान तक एक्जीबिशन रोड पर लम्बाई में फैले इस बाजार में प्राय: सभी बड़ी कम्पनियों के शो-रूम, व्यापारिक प्रतिष्ठानों के कार्याकल, बैंक, सिनेमा हॉल आदि मौजूद हैं। इस बाजार में चिरैयाटाड़ पुल चौराहे से गाँधी मैदान तक की भूमि की लगभग एक से दो फुट नीची है। पूरी सड़क का ढाल स्पष्ट रूप से उत्तर की तरफ है। इसी प्रकार फ्रेजर रोड की भूमि भी उत्तर दिशा की ओर ढालुआँ है। पटना जंक्शन स्टेशन से आगे बढऩे पर डाक बंगला चौराहे से होते हुए आकाशवाणी के आगे गाँधी मैदान तक उत्तर की ढालुआँ सड़क दिखाई देती है। इस सड़क पर भी लगभग एक-दो फुट तक का ढाल दिखाई देता है। इस रोड पर बहुमंजिली इमारतों के साथ होटल, शोरूम, व्यापारिक कार्यालय, बैंक, फाइनेन्शियल इन्स्टीट्यूट्स आदि मौजूद हैं। इस रोड की भूमि भी उत्तर की ढालुआँ भूमि है। ‘उत्तरा तु धनदा स्मृता’, अर्थात् उत्तर की ढालुआँ भूमि धन देने वाली होती है-के अनुसार ये दोनों सड़क व्यापारिक केन्द्र बने हुए हैं। फ्रेजर रोड व एक्जीबिशन रोड को आपस में जोडऩे वाली डाक बंगला रोड की भूमि भ्ी पूर्व उत्तर की ढालुआँ दिखाई देती है और इस रोड पर भी व्यापारिक गतिविधियाँ विकसित है।

शोध के परिणाम बताते हैं कि

1.    पूर्व की ढालुआँ भूमि

2.     उत्तर की ढालुआँ भूमि

3.     पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) की ढालुआँ भूमि

4.     पश्चिम तथा वायव्य कोण के बीच की ढालुआँ भूमि पर व्यापारिक केन्द्र सफल, लाभदायल, वृद्धिकारक, उन्नतिशील केन्द्रों

         के रूप में विकसित होते हैं।

हम पाते हैं कि भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुणों में भूमि का प्रवाह या ढलान सर्वाधिक प्रभावी है। अन्य सभी कारकों के होते हुए भी यदि ढलान वृद्धिकारक नहीं है तो उस स्थान पर व्यापारिक गतिविधियाँ सफल नहीं होती हैं, जबकि ढलान वृद्धिकारक होने पर अन्य सुविधायें भी बढ़ती जाती है तथा वह स्थान सफल व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकसित हो जाता है। सम्भवत: किसी भी शहर का केन्द्रीय व्यापारिक प्रदेश वृद्धिकारक ढलान के विपरीत नही है। शोध के दौरान सभी व्यापारिक केन्द्र (बाजार) वृद्धिकारक ढलान पर ही पाये गये। जिन स्थानों पर वृद्धिकारक ढलान नहीं थे वहाँ सफल उन्नतिशील बाजार नहीं पाये गये।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि देश भर में फैले बाजार प्राचीन वास्तु शास्त्र के विधानों के अनुसार ही विकसित हो रहे हैं न कि आधुनिक नगर योजना के अनुसार। लेख में प्रस्तुत तथ्य कई वर्षो में एकत्रित किये गये हैं, जिसके कारण कई स्थानों पर नामों व भवनों में परिवर्तन हो गये हैं। भारतवर्ष के लगभग सभी प्रान्तों के अनेक शहरों के अध्ययन के उपरान्त कुछ शहरों एवं गाँवों के बाजारों का वर्णन प्रस्तुत किया गया है। देश व विदेश के बाजारों पर किये गये इस शोध का निष्कर्ष है कि आधुनिक नगर नियोजन के साथ वास्तुशास्त्रीय परम्पराएँ आवश्यक हैं। आधुनिक नगर नियोजन की अपनी सीमाएँ हैं, इसमें भूमि की उन विशेषताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता जिनका वर्णन वास्तुशास्त्र में किया गया है। इसलिए यदि हम स्मार्ट सिटी बनाने में शहरों के वास्तु का भी ध्यान रखें, तो सफलता मिलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी।

समझने की बात यह है कि वास्तुशास्त्र कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है, यह जादू-टोने का खेल भी नहीं है। यह अति विकसित प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक तकनीकी परम्परा है, जिस पर आधुनिक विज्ञान को अभी शोध करना बाकी है। अत: भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुण जो प्राकृतिक हैं और सभी स्थानों के लिए एक समान हैं (जैसे पूर्व की ढाल का गुण दिल्ली, चेन्नई, दुबई, हांगकाग, लंदन, वाशिंगटन, बर्लिन सभी स्थानों पर एक समान है) अवश्य प्रयोग में लाना चाहिये। भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुण धर्म, जाति, सम्प्रदायों के लिए अलग-अलग नहीं है। अत: एक वैज्ञानिक सोच के तहत आधुनिक टाउन-प्लानिंग में वास्तुशास्त्र में वर्णित भूमि के गुणों पर विचार कर व वास्तुशास्त्र के नियमों को शामिल कर शहरों व कस्बों के विकास-कार्यक्रम अपनाये जाने चाहियें।

कनॉट प्लेस : बाजार और वास्तु

वर्ष 1930 में ब्रिटिश कमाण्डर इन चीफ के लिए राजधानी दिल्ली में एक महलनुमा आवासीय भवन (वर्तमान में नेहरू मेमोरियल म्यूजियम व लाइब्रेरी) पूरा करने के बाद आर्किटेक्ट राबर्ट टार रसेल ने दो संकेन्द्रिक रोड वाले व्यापारिक केन्द्र को डिजाइन किया था जिसका निर्माण 1933 में पूरा हुआ और ड्यूक ऑफ कनॉट एवं स्ट्रादर्न के नाम पर कनॉट प्लेस नाम दिया गया। सीपी के नाम से प्रसिद्ध इस मार्केट में देश के बड़े-बड़े व्यापारिक प्रतिष्टानों के ऑफिस, शोरूम, रेस्टुरेण्ट, बैंक, जीवन बीमा, सिनेमा हॉल इत्यादि हैं। फोब्र्स पत्रिका के अनुसार वर्ष 2013 में यह बाजार संसार का पाँचवाँ महँगा बाजार रहा है।

कनॉट प्लेस में प्रथम हिस्से के बाजार में व्यापारिक प्रतिष्ठानों के कार्यालय, बैंक, शोरूम, जीवन बीमा, रेस्टुरेण्ट, होटल, सिनेमा हॉंल इत्यादि बड़े पैमाने पर दिखाई देते हैं। रेडियल रोड नं. 6 बाराखम्बा रोड (टालस्टाय रोड तक ), कस्तूरबा गाँधी मार्ग, जनपथ के बीच की भूमिका ढाल उत्तर, पूव व उत्तर-पूर्व दिशा की ओर है जैसा चित्र में दिखाया गया है। टालस्टाय मार्ग पर चलते हुए जनपथ व संसद मार्ग की भूमि का ढाल भी ईशान कोण की तरफ है। इस क्षेत्र में बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों के ऑफिसेज व शोरूम बने हैं। फाइव स्टार होटल व जीवन बीमा के ऑफिसेज भी हैं। जनपथ पर आगे जाकर ढाल दक्षिण दिशा की ओर हो जाता है तथा यहाँ जनपथ होटल है।

इस मार्केट के दूसरे हिस्से में व्यापारिक गतिविधियाँ प्रथम हिस्से की अपेक्षा बहुत कम दिखाई देती हैं। रेडियल रोड नं. 6 से 2 के मध्य बने ब्लॉक ए, बी, सी, डी, जी, एच, आई, जे में व्यापारिक गातिविधियाँ हैं। परन्तु इस हिस्से से जुड़े शहीद भगत सिंह रोड से मिण्टो रोड तक के क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियाँ अन्य भागों क ी अपेक्षा कम हैं। बाबा खड्ग सिंह मार्ग से उत्तर दिशा में आर्या स्कूल लेन में प्रवेश करते ही भूमि के कुछ हिस्से का ढाल दक्षिण की तरफ व वायव्य कोण की तरफ दिखाई देता हैं। शहीद भगत सिंह रोड की क्षेत्र की भूमि का ढाल आग्नेय कोण की तरफ झुकता हुआ दिखाई देता है तथा शहीद भगत सिंह मार्ग व पँचकुइयाँ मार्ग के बीच की भूमि का ढाल भी दक्षिण व आग्नेय कोण की तरफ दिखाई देता है। इस क्षेत्र में व्यवसायिक गतिविधियाँ कम, आवासीय भवन, लेडी हार्डिग अस्पताल व मेडिकल कॉलेज तथा इनके आवासीय परिसर, एन.डी.एम.सी पॉंली क्लीनिक, कलावती हॉस्पिटल, शिवाजी स्टेडियम आदि उने हैं। पँचकुइयाँ रोड व चेम्सफोर्ड रोड के बीच की भूमि का ढाल भी पश्चिम दिशा की ओर है तथा यहाँ भी व्यापारिक गतिविधियाँ कम है। पँचकुइयाँ रोड से पहाडग़ंज मार्केट की भूमि का ढाल पूर्व दिशा की ओर है तथा यहाँ घना बाजार बसा हुआ है।

जिस प्रकार संगीत के सुर-लय-ताल (रिदम) द्वारा उत्पन्न एक अदृश्य शक्ति के प्रभाव में हजारों मनुष्य एक साथ झूमते व आनन्दित होते हैं, उसी प्रकार कनॉट प्लेस मार्केट में बने भवनों की छन्द योजना से उत्पन्न अदृश्य ऊर्जा भी इस मार्केट में आने बाले हजारों, लाखों लोगों को प्रभावित करती है। लगभग 500 खम्भों का एक समान बना हुआ होना, सभी बिल्डिंग्स का आर्किटेक्चर, उनकी निर्माण सामग्री एवं एलीवेशन का एक जैसा ही होना इस मार्केट के स्थापत्य में छन्द योजना दिखाता है और इस छन्द योजना की सकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव में मनुष्य यहाँ खिंचा चला आता है तथा यहाँ आकर एक सकारात्मक वातावरण का अनुभव करता है।