वैज्ञानिक से बनीं शास्त्रीय गायिका

वैज्ञानिक से बनीं शास्त्रीय गायिका

शशिप्रभा तिवारी

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

संगीत का ललित कलाओं में खास स्थान है। संगीत हमेशा से संस्कृति का साथी रहा है। संगीत का स्तर संस्कृति के स्तर पर निर्भर करता है। संस्कृति के उद्गम और विकास के साथ ही संगीत के उद्गम और विकास के क्रम में देखा जा सकता है। भारतीय शास्त्राीय संगीत हमेशा के समाज की बदलती परिस्थितियों के साथ परिवर्तित होता रहा है। इस सच को शास्त्राीय संगीत के कलाकार बखूबी स्वीकार करते हैं। कुछ ऐसा ही नजरिया जयपुर अतरौली घराने की गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे भी रखती हैं।

इस वर्ष संगीत नाटक अकादमी की ओर से कुछ कलाकारांे को अकादमी सम्मान के लिए चयनित किया गया है। उसमें  हिंदुस्तानी शास्त्राीय गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे का नाम भी शामिल था। विगत 23 अक्तूबर को राष्ट्रपति भवन में महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। अकादमी की परंपरा के अनुसार सम्मानित कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, जिसके तहत जयपुर अतरौली घराने की अश्विनी भिड़े देशपांडे ने मेघदूत थिएटर में अपना गायन पेश किया। इस समारोह में उन्होंने राग मारवा में बंदिश ‘पिया मोरे अनत देस गइल‘ और ‘गुरू बिन ज्ञान न पावे‘ गाया। उन्होंने दो अन्य बंदिशों ‘चांदनी रात मारूजी‘ और ‘धवल निशा मंद-मंद पवन‘ को भी सुरों में पिरोया।

मधुर आवाज, कोमल त्वचा, गौर वर्ण और आकर्षक व्यक्त्वि की मलिका अश्विनीजी की मुस्कुराहट और सहजता किसी के दिल को छू लेती है। करीब दो-तीन वर्ष पहले मथुरा में आयोजित स्वामी हरिदास नृत्य संगीत समारोह में अश्विनी भिड़े ने बहुत ही मोहक अंदाज में राग केदार में विलंबित बंदिश ‘पायो मोरे रामनाम धन‘ और द्रुत लय की बंदिश ‘कान्हा नंद नंदन‘ गाया। उन्होंने ख्याल गायन के बाद, अपने मधुर स्वर में झूला ‘झूले ंिहंडोला कुंजन में‘ व ‘धीरे झूलोजी राधा प्यारी‘ और बांके बिहारी को समर्पित मशहूर भजन ‘म्हारो प्रणाम बांके बिहारीजी‘ गाया। वाकई, वह गाते समय न सिर्फ श्रोताओं, स्थान और अवसर का भी खूब ध्यान रखती हैं। अश्विनी की खासियत है कि वह गाते समय खुद भी बंदिशों के प्रवाह के साथ डूबती-तिरती रहती हैं। इसलिए एक अलग तरह का मिजाज और समां बंध जाता है। इस हुनर को उन्होंने कैसे सीखा?

शास्त्राीय संगीत अश्विनी भिड़े को अपनी मां माणिक भिड़े से विरासत में मिली। वह कहती हैं कि मंा के अंाचल की छांव के साथ मुझे संगीत की छांव मिली। मां गुरू के रूप में तो जीवन की गुरू होती है, पर मेरा यह सौभाग्य रहा कि वह मेरी संगीत की भी गुरू रहीं। उन्होंने मुझे बचपन से ही हर पल संगीत के स्वर, लय और ताल की बारीकियों से अवगत कराया, जिसे सीखने-समझने के लिए आमतौर पर लोगों को गुरू की शरण में घंटे या दो घंटे का ही साथ मिलता है। पर मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे गुरू मां के रूप में मिलीं। लेकिन, उन्होंने कभी इस बात के लिए मुझपर जोर नहीं डाला कि मैं म्यूजिक को बतौर करियर अपनाऊं। हालांकि, मेरे मन में भी कभी यह नहीं था कि मैं संगीत सीखकर गायिका बनना है। हां! इतना मन में था कि संगीत अच्छी कला है। जब हम अपने रास्ते पर चलते हैं तो रास्ता खुद नजर आने लगता है।

अश्विनी ने गायन की शिक्षा मां के अलावा, नारायण दातार और पंडित रत्नाकर पाई से ग्रहण की है। वह बताती हैं कि शिक्षा के साथ अभ्यास जरूरी है। मैं आज भी अभ्यास करने जरूर बैठती हूँ। पंडित निखिल बनर्जी से किसी ने एक बाद पूछा कि आजकल तो आपके पास कोई प्रोग्राम नहीं है, फिर आप दो-तीन घंटे अभ्यास क्यों करते हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मैंने हमेशा आत्मसंतुष्टि के लिए अभ्यास किया, कभी प्रोग्राम है, इसके लिए अभ्यास नहीं किया। अभ्यास करना तो मेरा धर्म और जीवन है। मैं उनकी इस बात की कायल हूँ। मेरे लिए भी जीवन एक अनंत यात्रा है। इसकी कोई तयशुदा कोई मंजिल नहीं रखी है कि मुझे जिंदगी में यह या वह हासिल करना Ashwini Bhide 1है। मैं एक नदी की तरह बहते रहना चाहती हूँ। जबतक नदी में पानी है वह बहती है वैसे ही मुझे बहना यानी चलते रहना है।

संगीत के अलावा अश्विनी ने माइक्रोबायलाजी में एमएससी और बायोकेमिस्ट्री में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है। वह साइंस स्कालर रहीं। भाभा परमाणु रिसर्च सेंटर में बतौर वैज्ञानिक कार्यरत रहीं। लेकिन, कभी-कभी भाग्य कहें या नियति आपको ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहां आपको कुछ कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं और आपके जीवन की दिशा बदल जाती है। अश्विनी भिड़े के जीवन में भी एक बार ऐसा पल आया, जिसके बारे में वह बताती हैं, ‘कुछ सालों तक मैं नौकरी करने के साथ कार्यक्रमों में गाती रही। मैंने तय किया कि एक साल तक सिर्फ गाऊंगी, इसके अलावा कोई और काम नहीं करूंगीं। इस तरह सिलसिला शुरू हुआ और मैं गायन से जुड़ गई। मेरे पति ने भी मेरे इस फैसले में सहमति जताई। दरअसल, शास्त्राीय संगीत सीखने का मकसद पैसा, कॉन्सर्ट्स, नाम कमाना नहीं है। शास्त्राीय संगीत वास्तव में उनके लिए है जो कठिन रास्ते पर चलने के इच्छुक हैं। अनवरत और अमूल्य सतत् यात्रा का दूसरा नाम शास्त्राीय संगीत है। आप अपनी आत्मा को शुद्ध रखना चाहते हैं तो राग के आकार में ब्रह्म के दर्शन कर खुश रह सकते हैं। यह योग है।’

गायिका अश्विनी भिड़े के चेहरे पर गजब की चमक और सौम्यता झलकती है। उनकी इस सौम्यता और खूबसूरती के राज के बारे में वह बताती हैं, ‘आपके संस्कार ही आपके व्यक्तित्व को संवारते हैं। पहला संस्कार मुझे मेरे घर में और पढ़ाई से मिला। संगीत तो मेरी जीन में था ही। दूसरा आत्मसंतुष्टि का भाव जो एक बहुत महीन रेखा खींचती है। जो काम आप कर रहे हैं, उससे आपके मन को कितनी खुशी मिल रही है। इस खुशी के साथ एक सुख की अनुभूति जरूरी है। इससे आपको मेहनत के दम पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। मुझे लगता है कि अगर हम आत्मसंतुष्ट रहेगें तभी हम शांति के साथ आगे बढ़ते हैं। उसके लिए कोई अलग प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ती है। मुझे लगता है कि मुझपर ईश्वर की कृपा है कि मुझे संगीत में डूबना आता है, इसमें मजा आता है, इसमें रमना आता है। मैं बच्चों की तरह इस संसार को अचरज से देखती हूँ। लगता है कि पचास बसंत देखने के बाद भी अभी तो कुछ देखा नहीं बहुत कुछ देखना बाकी है। मैं संगीत की सुंदरता और उसके अद्भुत रूप को अब भी महसूस करने को आतुर हूँ।’

गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे अपनी किशोरावस्था से शास्त्राीय गायन पेश कर रही हैं। आज के व्यस्ततम कलाकारों में अश्विनी का नाम आता है, फिर भी इनका नाम पुरस्कारों की सूची में नहीं आता। परंतु उन्हें इसका कभी अफसोस नहीं रहा। इस सवाल का जवाब अश्विनी बहुत ही सरलता से मुस्कुराते हुए देती हैं, ‘जिंदगी सिर्फ एक अंधी दौड़ नहीं है। हमारी जिंदगी सुखमय और आनंद से भरा होना चाहिए। उस शिखर पर जाना सबके लिए जरूरी है। हरेक को अपने रास्ता तय करना होता है। आपके किस्मत में क्या लिखा है। वैसा ही आपको मिलेगा। मेरे सामने मेरी अभिलाषा सिर्फ गाते रहने की रही। मुझे यह अपेक्षा ही नहीं रही कि मुझे यह अवार्ड चाहिए या वह चाहिए। इसलिए, मुझे कभी इन बातों का अफसोस भी नहीं होता। मैं हमेशा पंडित कुमार गंधर्वजी की बात याद रखती हूँ। वह कहते थे कि जब हम स्टेज पर होते हैं तब हमारे सिर पर ताज होता है। लेकिन, वह ताज मैं लेकर नहीं उतरता हूँ। और एक बात मेरे दादा गुरू गजानन बुआ जोशी कहते थे कि जब स्टेज पर जाओ तो सब भूल जाओ यह सोचो कि सामने बैठे सब मूरख हैं। तब मन में आत्मविश्वास आएगा और डर नहीं लगेगा।’

उदयपुर में आयोजित राणाकुंभा संगीत उत्सव में वर्ष 2014 में वह शिरकत करने गईं थीं। शाम के में अश्विनी भिड़े ने राग बसंत और बहार की बंदिशें ‘खेलौ री, खेलौ री श्याम संग होली‘, ‘आई ऋतु बसंत मोरी‘, ‘सकल बृज धूम मची रे‘ को बहुत मोहक अंदाज में पेश किया। गायन में रसीलेपन के साथ जो अदायगी थी, वह अनुभूतियों को सीधे-सीधे दिलों में उतार रही थी। शायद, उस अनुभूति को शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल होगा।

शास्त्राीय संगीत के श्रोताओं का कानसेन होना जरूरी है। ऐसा अश्विनी भिड़े मानती हैं, वह कहती हैं, ‘पहले के श्रोता जागरूक थे। उन्हें स्वर-लय का अच्छा ज्ञान होता था। आज माहौल बहुत बदल गया है। पर यह हम कलाकारों की जिम्मेदारी है कि हम वह संगीत गाएं, जो हमें पसंद है। न कि हम सिर्फ वह गाएं जो लोग पसंद करते हैं। क्योंकि, शास्त्राीय संगीत आध्यात्मिक संगीत है। यह आत्मा का संगीत है। इसे आत्मानंद के साथ पेश किया जाएगा तो वह चिरंतन बनेगा। उसकी खुशबू दूर तक फैलेगी।’