लोकभाषाओं का रिश्ता

लोकभाषाओं का रिश्ता

निराला
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

कुछ दिन पहले बिहार के गाँव पंजवार में गांववालों के नेह निमंत्राण पर भोजपुरी और मैथिली लोकगीतों की विख्यात गायिका शारदा सिन्हा गयी थीं। दुरूह यात्रा कर, सुदूर गांव में पहुंची थी। शारदाजी वहां पहुंची तो सीधे मंच पर गयीं। जब शारदाजी बोलने आईं तो उन्होंने बस एक टुकडा बिदेसिया गीत का सुनाया। हजारों की भीड से भरा हुआ पंडाल नाचने लगा। शारदाजी ने अगला गीत शुरू कर दिया। फिर एक के बाद एक गीत। छठ के गीत, महेंदर मिसिर के गीत, भिखारी ठाकुर के गीत। पूरा पंडाल उनके गीतों संग या तो ताली बजा रहा था या नाच रहा था।
इस बीच बिहार ही नहीं देश के दुर्लभ कर्मयोगियों में से एक पंजवार गांव के रहनेवाले, जिनकी वजह से पंजवार गांव को आखर के इस आयोजन के लिए चुना गया है, घनश्याम शुक्ल मंच तक आए। वे कभी मंच तक नहीं आते, एकदम भीड में आम आदमी के बीच आम आदमी का हिस्सा होते हैं। बच्चों जैसी उर्जा बटोरे, उत्साह और उमंग के साथ बोले, ‘पूरा पंडाल रो रहा है शारदाजी। अब मैथिली में गीत सुनाएं। आपसे मैथिली गीत भी सुनना चाहती है जनता।’ घनश्याम शुक्ल को ऐसा आग्रह करते देखना ही अपने आप में एक अलग दृश्य था। बस फिर क्या था शारदाजी ने माईक पकडा। भावुक हो गयीं। गौरा शिव विवाह का प्रसंग सुनाने लगीं मैथिली में। पंडाल में आगे के लोग नाच रहे थे, पीछे हजारों की जनता रो रही थी।
मैं सिर्फ यह कहना चाह रहा हूं कि बिहार में लोकभाषाओं के बीच ऐसा ही रिश्ता है। शुद्ध भोजपुरी का मंच है आखर का। भोजपुरी में ही लिखना, पढना, बोलना, उसे बढाना। यही करता है आखर। लेकिन जब शारदाजी मंच पर्र आइं तो आखर के संरक्षक घनश्याम शुक्ल ने मैथिली की मांग की, जनता ने मैथिली गीतों की मांग की। बिहार के लोकभाषाओं के बीच आपसी प्यार-दुलार और एक दूसरे में समाहित होने की ऐसी ही तडप है, ललक है और संभावना भी।
शारदा सिन्हा पिछले चार दशक से अपनी गायकी से बिहार की दो प्रमुख भाषाओं मैथिली और भोजपुरी का मिलान करवा रही हैं। भोजपुरी इलाके के जनमानस के बीच मैथिली गीतों को लोकप्रिय बनाया है, मैथिली इलाके में भोजपुरी गीतों को। शारदा सिन्हा के मैथिली गीत भोजपुरी इलाके में उतने ही चाव से सुने जाते हैं, जितने चाव से मैथिली इलाके में भोजपुरी के पारंपरिक गीत। शारदाजी का भोजपुरी गीत – जगदंबा घर में दियरा बार अईनी हे, जितना लोकप्रिय है उतनी ही लोकप्रियता जय-जय भैरवी… गीत की भी है। दोनों गीतों ने भाषा की दूरियां खत्म की हैं।
ऐसे ही कई गीतों के जरिये शारदाजी ने पिछले चार दशक में भाषायी अपनापन के रिश्ते को बढाया है। इसलिए ही वह महज गायिका भर नहीं है और उनके प्रति जो अगाध श्रद्धा का भाव रहता है लोकमानस में, वह सिर्फ गायिका होने की वजह से नहीं बल्कि उन्होंने गायकी को एक व्यापक सरोकार से जोडा है। उस सरोकार के रंग भरे हैं गायकी से, जिसकी दरकार बिहार जैसे राज्य को सबसे ज्यादा है।
मैंने ऐसा ही एक छोटा रूप पिछले साल दरभंगा में देखा था। ई समाद, जो कि मैथिली भाषा को लेकर काम करनेवाली सक्रिय और सरोकारी ग्रुप है, ने दरभंगा विश्वविद्यालय में सुर समाद नाम से आयोजन कराया था। उस आयोजन में मैथिली गीतों की गायिका रजनी पल्लवी आयी थी और भोजपुरी गीतों के लिए चंदन तिवारी को बुलाया गया था। आयोजन शुरू हुआ। अजीब था वह दृश्य भी। एकदम से ठेठ मैथिली इलाके में, ठेठ मैथिली भाषियों के बीच भोजपुरी गीत सुनने की दीवानगी अजीब थी। हर भाषा भाषी समूह एक दूसरे की दूरियों को खत्म कर एक दूसरे से मिलान को बेताब है। एक दूसरे से सामंजस्य बिठाकर, एक दूसरे की दुनिया को समझने के लिए बेताब है। माहौल बना है तो यह सिलसिला शुरू हो और आगे जारी रहे। कई कलाकार इस दूरी को पाटेंगे।