बायोपिक सिनेमा, समाज और आदर्श..

बायोपिक सिनेमा, समाज और आदर्श..

यशार्क पाण्डे
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

खबर है कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी सआदत हसन मन्टो की भूमिका निभाने वाले हैं। निस्संदेह नवाजुद्दीन मियां बेहतरीन अदाकार हैं परन्तु उरी हमले के बाद की गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर उनकी प्रतिक्रिया बडी विचित्रा प्रतीत हुई जब उन्होंने कह दिया कि ये तो सरकार का काम है सरकार ही जाने। कई बार देखा जाता है कि बॉलीबुड में बनने वाली फिल्में और उनमें काम करने वाले लोकप्रिय कलाकारों की टिप्पणियां और उनका व्यवहार समाज के बडे तबके को गहराई तक प्रभावित करता है। जब भी कोई बायोपिक यानी किसी व्यक्तित्व के जीवन पर आधारित फिल्म बनती है तब प्रश्न उठता है कि हम किस चरित्रा को समाज का चेहरा मानते हैं और यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो सिनेमा जो कि रूपहले परदे पर साहित्य की ही प्रस्तुति है, वह किस हद तक समाज के आदर्श गढ़ने में अपनी जिम्मेदारी को निबाहता है?
इतिहास उठा कर देख लीजिए, समाज को हमेशा आदर्शों की जरूरत पड़ी है और उन आदर्शों से ही प्रेरित हो जन-सामान्य ने कलम, तराजू और तलवार तीनों उठाई है। एक किताब, सिनेमा का एक दृश्य, एक विचार, एक डायलॉग किसी व्यक्ति को इस हद तक प्रभावित कर देता है कि उसका जीवन बदल जाता है। हमने अपने सिनेमा में ‘भारत माता’ को कम ‘मदर इंडिया’ को ज्यादा दिखाया है इसीलिए कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसे दिग्भ्रमित पैदा हुए हैं। गुप्त काल जो स्वर्णिम था, उसकी बजाय मुगल-ए-आजम को ज्यादा महत्व दिया है। इस दृष्टिकोण से प्रस्तुतिकरण भी मायने रखता है। पूरी दुनिया में जाकर माई नेम इज खान कहने वाले शाहरुख खान और करण जौहर के दौर से पचास साल पहले सन् 1946 में व्ही. शांताराम ने सम्भवतः पहली बार विदेशी परिप्रेक्ष्य को ले कर फिल्म बनाई थी जिसका नाम था ‘डॉ कोटनीस की अमर कहानी‘ और वह विदेश अमरीका नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क चीन था।
इतिहास में किसी भी क्रांतिकारी दौर में उपजे सार्थक रचनात्मक समाज के उत्थान में संगीत, साहित्य, कला इन सबकी आदर्श और उत्प्रेरक रूपी भूमिका रही है। फ्रांसीसी क्रांति के समय गाया जाने वाला गीत ‘ला मार्से‘ आज उनका राष्ट्रगान है। हमने भी तो बंकिम बाबू से वन्दे मातरम् सीखा। राष्ट्र की अवधारणा ऋग्वेद में है। इस दृष्टि से हाल ही में आई कुछ फिल्मों को देखिये। क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर पर अभी तक फिल्म नहीं बनी। भारतीय टीम के पहले कप्तान कर्नल सी के नायडू का नाम लोग भूल गए हैं लेकिन मैच फिक्सिंग करने के उपरांत खुद को मुसलमान विक्टिमहुड का शिकार बताने वाले मुहम्मद अजहरुद्दीन पर सिनेमा बन गया। पहले के जमाने में पौराणिक कथानक पर भी फिल्में बनती थीं। हॉलीवुड ने मूसा को डंडे से समन्दर के दो फाड़ करते कई बार दिखाया है लेकिन हमारे यहाँ बॉलीवुड को दिनकर के राम से कोई मतलब नहीं है। पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप फेसबुक पे टहलते हैं और जोधा अकबर मल्टीप्लेक्स में। अब तो सिनेमा का टाइटल ‘गजनी‘ रखा जाता है और फिल्म में उसके आगे ‘धर्मात्मा‘ जोड़ दिया जाता है।
बॉलीवुड ये भी नहीं कह सकता कि उसे समाज के प्रति जिम्मेदारी की याद दिला कर साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। हिन्दूबहुल देश भारत को 1971 की जंग में जीत दिलाने वाले सेनानायक हिन्दू नहीं, पारसी और यहूदी थे। मजे की बात देखिये कि पाकिस्तान की जेल में बन्द कैदियों पर खूब फिल्में बनी, ताजा उदाहरण ‘सरबजीत‘ का है परंतु लोगों को ये पता तक नहीं है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद किसी युद्ध में मिली सबसे बड़ी विजय के नायक फील्ड मार्शल मानेकशॉ और लेफ्टिनेंट जनरल जैकब पर कभी सिनेमा नहीं बना। कुछ दिन बाद ही चन्दन तस्कर वीरप्पन पर बनी फिल्म रिलीज होने वाली है।
शरदिंदु बंदोपाध्याय द्वारा रचित किरदार ब्योमकेश बक्शी पर दिबाकर बनर्जी ने बेहतरीन पिक्चर बनाई थी। इस चरित्रा की समाज में क्या सार्थकता है इस पर मैंने आलेख लिखा था। प्रश्न ये है कि हम देवदास जैसे रोंदू चरित्रा पर फिल्म बनाते थकते नहीं हैं तो नायब सूबेदार बाना सिंह या लांस नायक हनमंथप्पा पर सिनेमा क्यों नहीं बनाते? ध्यान दीजियेगा, एलओसी कारगिल जैसी फिल्में युद्ध आधारित थीं, चरित्रा आधारित नहीं। मानस पटल पर घटनाओं से ज्यादा प्रभाव चरित्रा का पड़ता है। मुम्बई बम धमाके पर बनी फिल्म मुम्बई मेरी जान के सभी किरदार और 26/11 पर बनी फिल्म में नाना पाटेकर कसाब को लतियाते और गरियाते नजर आते हैं। यह सीन दिखाता है कि हमारे समाज में समस्याओं का अम्बार है जिससे हम कभी उबर नहीं सकते और एक दिन हमें ‘ए वेडनेस डे’ का आम आदमी बनना होगा क्योंकि हमारे पास आदर्श या नायक नहीं हैं।
फिल्मों में साहित्य जगत या लेखक समुदाय को ही दिखाने का मन है तो क्या ये जरूरी है कि अश्लील लेखन के लिए मशहूर सआदत हसन मन्टो पर ही फिल्म बनाई जाए? जीवन के अंतिम समय में तिरुपति मन्दिर के सामने रश्मिरथी का पाठ करने वाले दिनकर या फिर निराला, प्रेमचंद जैसे साहित्यिक चरित्रों पर सिनेमा क्यों नहीं बनता? मारियो पुजो से ही प्रेरणा ली जाए और अपने देश की मिट्टी के लाल भुला दिए जाएँ, ये कहाँ की बुद्धिमानी है? बहुत जोर लगा कर महेंद्र सिंह धोनी पर बायोपिक बनाई गयी है। इसके पीछे भी एक कारण है। धोनी के सितारे अभी चमक रहे हैं इसलिए वे कमाई का अच्छा जरिया हैं। भगत सिंह को भी उठाया गया है, वह भी ऐसे समय जब किताब में उन्हें आतंकवादी लिखा जाता है और मंगल पांडे पर तो प्रामाणिक दस्तावेज ही नहीं हैं। यह अलग बात है कि नेशनल बुक ट्रस्ट ने बिपिन चन्द्रा की किताब छापने से मना कर दिया है जिसमें भगत सिंह को आतंकवादी लिखा गया था।
रिलायंस जैसी कम्पनी जो लाभ कमाने के लिए उपभोक्ता का खून चूसने पर उतर आये, तेल के कुंओं पर गैर कानूनी ढंग से कब्जा कर ले, को बनाने वाले धीरू भाई अम्बानी पर फिल्म बन सकती है लेकिन जमशेद जी टाटा जिन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान और टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी बनाई, के जीवन पर सिनेमा नहीं बनाया जाता। सच्चे उद्योगपति टाटा थे अम्बानी नहीं। ये लोग दिन रात नारी की देह पर चिल्लाते हैं तो अब तक तस्लीमा नसरीन पर पिक्चर क्यों नहीं बनाई? थोडा इंटरनेशनल लुक चाहिये तो बांग्लादेश लांघ के आंग सान सूकी से मिल आओ, म्यांमार बगल में ही तो है।
आमिर खान ने थ्री इडियट बनाई लेकिन इस देश में कभी किसी वैज्ञानिक पर पिक्चर नहीं बनी जो हाई स्कूल तथा इंटर के बच्चों को प्रेरित कर सके। गणित के नोबेल माने जाने वाले पुरस्कार ‘फील्ड्स मेडल‘ विजेता भारतीय मूल के प्रो मन्जुल भार्गव रामानुजन पर बनी फिल्म ‘मैन हू न्यू इनफिनिटि’ के एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं लेकिन वितरकों और मार्केटिंग वालों ने ये नहीं सोचा कि जब जंगल बुक और कुंगफू पांडा हिंदी में डब हो सकती है तो रामानुजन पर बनी इस फिल्म को भी हिंदी में छोटे शहरों में रिलीज किया जाए।
वीरप्पन, अजहर, और मन्टो देश के युवाओं का कितना भला करेंगे, इस पर विचार कीजिए। जो चलता है वही दिखता है ये बॉलीवुड का ‘जुमला‘ है। दरअसल हमें जो दिखाया जाता है, हम उसी को ढ़ोने के आदी हो चुके हैं। इस मानसिकता से उबरिये। कला साहित्य सिनेमा के लोग राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व से भाग नहीं सकते। उन्हें भी समाज के प्रति उत्तरदायी बन कर दिखाना ही होगा।