धरा पर उतरी सरस्वती की धारा

धरा पर उतरी सरस्वती की धारा

प्रशान्त भारद्वाज
लेखक हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास
बोर्ड के डिप्टी चेयरमेन हैं।

सन् 1885 में पुरातत्त्ववेत्ता ओल्डमैन तथा भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के श्प्रथम महानिदेशक लॉर्ड कनिंघम (1864) आदि ने सरस्वती सभ्यता एवं सरस्वती नदी से जुड़ी पहेलियों का अन्वेषण कार्य आरम्भ किया था। इसके अलावा जब सन् 1917 में हड़प्पा में खुदाई हुई और भावलपुर में नदी का पार पाया गया तो पुरातत्त्व वेत्ताओं ने अनुमान लगाया कि कभी कोई विशाल नदी यहाँ से गुजरती होगी। वर्ष 1942-43 में ओरल्सटाइन ने (तत्कालीन) अम्बाला एवं करनाल जिले में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण किया। (वर्तमान में यमुनानगर, कुरूक्षेत्रा, फतेहाबाद, जींद आदि जिले।) तो उन्होनें भी पाया कि इस क्षेत्रा में कभी कोई विशाल नदी बहा करती थी।
वर्ष 1950-53 के मध्य श्री ए. घोष जो तत्कालीन भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक थे ने ओरल्सटाइन के कार्य को आगे बढाते हुए पेहोवा, और फतेहाबाद जिले में सरस्वती कालीन सभ्यता के पुरातात्त्विक प्रमाण एकत्रित किए और कहा कि सरस्वती नदी कभी इस क्षेत्रा में बहा करती थी। वर्ष 1968 में पद्म विभूषण प्रो. के. एस. वल्दिया का धर्मयुग में “गंगा (यमुना) ने चुराया सरस्वती का पानी“ शीर्षक नाम से लेख प्रकाशित हुआ। इसमें पहली बार सरस्वती नदी के लुप्त होने व उसका रूख यमुना के तरफ मुड़ने से सम्बन्धित भूवैज्ञानिक प्रमाण सामने आए। इन्हीं दिनों भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग ने कई पुरास्थलों को हरियाणा से लेकर गुजरात तक का सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ किया और 1960 से वर्ष 2000 के मध्य हरियाणा में भिन्न-भिन्न स्थानों पर खुदाई की गई जिनमें कुनाल, बिरडाना, बनावली, राखीगढी, आदिबद्री सिरसा मुख्य पुरास्थल थे। इनमें प्राप्त पुरातात्त्विक प्रमाणों में यह सिद्ध हुआ कि यहाँ पर इस ब्वनतेम में एक विशाल नदी बहती थी और इसके तट पर विशाल नगर स्थित थे जिनके नगर नियोजन प्रणाली आज ही की भान्ति उच्चस्तरीय थी। इन पुरातात्त्विक प्रमाणों या अवशेषों की आयु का निर्धारण आज से 3000 वर्ष पूर्व से 18000 वर्ष पूर्व तक का काल रहा। वर्ष 1982-83 में प्रो. यशपाल आदि वैज्ञानिकों ने सरस्वती के पालियो चैनल से सम्बन्धित सेटेलाइट चित्रों के माध्यम से कुछ प्रमाण खोजे और उसका गहनता से अध्ययन शुरू हुआ। प्रो. के. एस. वल्दिया वर्ष 1996 में रेजोनेंस पत्रिका के मई, 1996 के अंक में रिवर प्युरॅसी – सरस्वती दैट डिसअपियर्ड लेख छपा। इस लेख में उन्होनें सरस्वती का पैलियो चैनल सिन्धु और यमुना के मध्य की सभी नदियाँ जो सरस्वती की सहायक नदियाँ थी उनके ग्लेशियर बन्दरपूँछ, चन्द्रनाहन, मानसरोवर आदि का उल्लेख किया। इसमें आज से 4600-4100 वर्ष पूर्व हड़प्पाकालीन संस्कृति के समेत जो ग्लेश्यिर की स्थिति थी जिस में पटियाला से 25 कि.मी. दक्षिण में शुतराना नामक स्थान पर सरस्वती और शतद्रु का संगम होता था और उसके आगे नदी का पाट 6-8 कि.मी. चौड़ा हो जाता था। आज की घग्घर तब की सरस्वती की ही सहायक नदी थी और शुतराना में आकर यह भी इसमें समाहित हो जाती थी।
वर्ष 1999 में श्री. वी. एम. के. पूरी और अन्य ने सरस्वती के ग्लेश्यिर का विस्तृत अध्ययन किया। वह इस नतीजे पर पहुँचे कि तमसा नदी जो आज की यमुना की सहायक नदी है वह कभी दृष्द्वती और गिरिबाटा आदि सहायक नदियों से मिलकर आदिबद्री से होकर गुजरती हुई सरस्वती नदी बनाती थी। आदिबद्री में स्थित शैलों के अध्ययन से पता चलता है कि इसके पैतृक शैल रूपिन-सुपिन और पब्बर के ग्लेश्यिर बन्दरपूँछ, चाँशल और चन्द्रनाहन आदि क्षेत्रों से बहकर आए थे। हर की दून में जोंधार और मिनिडा से बर्फ के ग्लेशियर पिघलकर हर की दून नामक नाला बनाती है और दिवसु में आकर रूणसाडाताल जिसमें बईयाँ से आती हुई ज्ञानसु खड़/नाला भी मिलता है। पांच कि.मी. आगे दो और धाराएँ भेड़गाड़ और कंडारा खड्ड भी सीमा ओर ओसला गाँव के पास हर की दून गाड में मिलती है। और इससे आगे हर की दून गाड का नाम ओसलागाड से जाना जाता है।
ओसला गाँव से लगभग दो कि.मी. आगे चलकर चिलूडगाड धारा भी ओसलागाड में आकर गिरती है। उसके एक कि.मी. आगे से गंगाड नाम की एक और धारा बटगैर ग्लेश्यिर से आकर ओसलागाड में गिरती है। उससे सात कि.मी. आगे चलकर भिडेका नामक स्थान पर स्यॉंगाड नाम की एक धारा भी ओसलागाड में आकर मिलती है। भिडेका से तालुका होती हुई, तालुका से तीन कि.मी. आगे चलकर दो अन्य धाराएँ हलारागाड और ज्ञयाँगाड कदारकाण्ठा नामक ग्लेश्यिर जो यमुनोत्राी के निकट है भी ओसलागाड में गिरती है।
आगे चलकर साँकरी के पास बड़ासुपास ग्लेश्यिर से लिबाडी खड्ड और फिताडी में ओबरागाड से मिलकर बैंचा गाँव से होती हुई गुईयाँ घाटी में सांकरी के पास ओसलागाड में मिलती है जहाँ से आगे सुपिन नामक नदी बन जाती है। गँुईयां घाटी से 12 कि.मी. आगे नैन्टवाड नामक स्थान पर सुपिन नदी डोडराक्वार चाँशल एवं चन्द्रनाहन ग्लेश्यिर से आती हुई रूपिन नदी सेवा गाँव से आगे चलकर सुपिन के साथ मिलकर तमसा(टौंस) नामक नदी बनाती है। नैन्टवाड से आगे मोरी से होकर तियूणी नामक स्थान पर चन्द्रनाहन ग्लेश्यिर से आती हुई पब्बर नदी टौंस में मिलकर टौंस के जल का विस्तार दोगुणा करती है। टौंस जो कभी आदिबद्री से होकर दृषद्वती एवं सरस्वती बनाती थी। जो कुरुक्षेत्रा से बहती हुई शतराना के पास घग्गर, सरस्वती में शतद्रु के सगंम के साथ सिरसा होते हुए राजस्थान में प्रवेश करती थी।
वर्ष 1999 को इसरो के वैज्ञानिकों ने इस नदी का सैटेलाइट चित्रों के माध्यम से पैलियों चैनल मैिपंग का कार्य प्रारम्भ किया और वर्ष 2002 में केन्द्रीय भू-जल बोर्ड एवं राजस्थान भू-जल बोर्ड ने क्रमशः 24 एवं 14 कुएं पैलियो चैनल पर किया जिसमें शुद्ध पीने योग्य पानी मिला। और इसका आइसोटोपिक विश्लेषण भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र मुम्बई ने किया। उन्होनें पाया कि यह शुद्ध जल ग्लेशियर का है और इसकी फोंसिल आयु 3000 से 18000 वर्ष पूर्व के बीच की निर्धारित की गई। वर्ष 2007 में ओ. एन. जी. सी. ने सी. एस. आर. परियोजना के तहत जैसलमैर में सरस्वती पेलियों चैनल पर एक कुआं खुदवाया जिसमें 76000 लीटर प्रतिघण्टा की दर से पानी बाहर निकला। लगातार पानी की निकासी के बावजूद पानी का स्तर नहीं घटा।
हरियाणा में सरस्वती परियोजना का कार्य 1985 में पद्मश्री डॉ. वी. एस. वाकणकर की 17 नवम्बर-19 दिसम्बर 1985 को आदि बद्री से कच्छ तक 30 शोधकर्ताओं के दल ने यात्रा करके प्रारम्भ किया था। वर्ष 1988 में श्री वाकणकर जी के आकस्मिक निधन के पश्चात श्री दर्शनलाल जैन ने सरस्वती नदी शोध संस्थान स्थापित कर इस कार्य को आगे बढ़ाया और वर्ष 1997 में डॉ. कल्याणरमन ने अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना का प्रकल्प सरस्वती नदी शोध केन्द्र चैन्नई स्थापित किया। वर्ष 1997 में जिला कुरुक्षेत्रा के तत्कालीन उपायुक्त श्री तल्लाप्रगड वैंक्टेश्वर सुब्रमण्यम नरसिम्हन (टी.वी.एस.एन) प्रसाद ने कुरुक्षेत्रा में सरस्वती सेतु के पास सरस्वती नदी पर सरस्वती विरासत वाटिका बनाकर इसे पर्यटन के साथ जोड़ने का प्रयास किया और बाद में सरस्वती नदी शोध संस्थान के प्रयासों से वर्ष 2008 में हरियाणा सरकार ने ओ.एन.जी.सी. के साथ एक करार किया कि हरियाणा के भिन्न-भिन्न स्थानों पर ओ. एन. जी. सी., सी. एस. आर. के तहत सरस्वती पेलियों चैनल कुएं खोदेगी। वर्ष 2008 में ही हरियाणा सरकार से सरस्वती नदी को चौड़ा करने की परियोजना ऊंचा चन्दाना (यमुनानगर) से पिपली तक शुरू किया।
वर्ष 2015 अप्रैल को रोला हेडी गांव यमुनानगर से नदी की खुदाई का कार्य शुरु किया गया और 6 मई को मुगलवाली गांव में नदी का स्पष्ट ताल देखने को मिला और मात्रा 7-6 फुट की गहराई पर जलधारा सहित नदी के उच्च पर्वतीय शैल भी मिले और आम्बवाली गांव में सीप आदि भी मिले जिससे नदी की प्राचीनता स्पष्ट रुप में झलकती है। आदि बद्री से ऊंचा चन्दाना- 55 कि.मी., ऊंचा चन्दाना से पिपली – 65 कि.मी., पिपली से पिहोवा – 32 कि.मी., पिहोवा से घग्घर तक – 65 कि.मी. का जिला अनुसार नदी को चौड़ा करने का कार्य जारी है जिनमें से यमुनानगर में 40 कि.मी. और कुरुक्षेत्रा में 70 कि.मी. का कार्य पूरा हो चुका है। कुरुक्षेत्रा एवं कैंथल जिले में भी कार्य की परियोजना बना दी गई है।
वर्ष 2015 में हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड का गठन कर हरियाणा सरकार ने सरस्वती परियोजना के सुचारु रूप से चलाने के लिए एवं सरस्वती नदी का जीर्णोधार और पुर्नाधार हो इस उद्देश्य से बोर्ड का गठन किया। आदिबद्री से लेकर सिरसा तक सरस्वती पर्यटन वृत का निर्माण, आदिबद्री के पास दो सरस्वती सरोवरो एवं बराज सहित डैम बनाने का कार्य, सरस्वती की वर्तमान धारा को चौड़ा करके उसका नहरीकरण करने का प्रयास एवं एक सरस्वती सरोवर स्योंसर वन पिहोवा के पास बनाने की परियोजना बनाई गई है।