गणित में सबसे आगे था भारत

गणित में सबसे आगे था भारत

जवाहरलाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

पश्चिमी सभ्यता को मानने वालों का विश्वास है कि विज्ञान ग्रीस में जन्मा और वहीं से दुनिया भर में फैला। ज्ञान विज्ञान के प्रति मनुष्य जाति में सदैव ही तीव्र जिज्ञासा रही है। प्राचीन विश्व में ऐसे दो या तीन ही केंद्र थे जहां नए विचारों और धारणाओं का विकास हुआ। ग्रीस यानी यूनान उनमें से एक था। लेकिन मध्यकाल आते-आते पश्चिमी राजनैतिक शक्ति के उदय के साथ पश्चिमी साम्राज्य को विश्व पर थोपने की धुन में यह धारणा भी पूरी मानव जाति पर थोपी जाने लगी कि केवल विज्ञान का जन्म ही यूनान में नहीं हुआ, अपितु विश्व में जहंा भी कोई नया वैज्ञानिक सिद्धांत पेश किया गया वह भी यूनानी सभ्यता से ही वहां पहुंचा है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।
उदाहरण के लिए पाइथागोरस एक ग्रीक दार्शनिक और वैज्ञानिक थे। दर्शन और सौंदर्यशास्त्रों पर कई नई धारणाएं पेश करने के अतिरिक्त उसने गणित का एक नया सूत्र भी प्रस्तुत किया जिसे पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जाना जाता है। इस सू़त्र को पाइथागोरस के नाम से जोड़ तो दिया गया है लेकिन इस बात को नजरअंदाज किया गया कि इस सूत्र की जानकारी उनसे पहले भी दुनिया को थी और इसके आधार पर बने वास्तुशिल्प के प्रमाण भी विश्व में विभिन्न भागों में पाए जाते थे।
पाइथागोरस मूलत: आयोनियन थे जो कि ग्रीस का एक प्राचीन प्रांत था और जहां से अयोन नाम की जाति के नाम पर ही ग्रीक जाति और साम्राज्य दुनिया भर में फैला। इस क्षेत्र में पूर्व और पश्चिम की कई जातियों के लोग बसे जिनमें प्राचीन यवन भी शामिल थे। इसलिए यहां अलग-अलग देशों से नई धारणाएं और नए सिद्धांत आए और फिर विश्व में फैले। अगर पाइथागोरस सूत्र का फलित देखा जाए तो बगल में ही मिश्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मिश्र के पिरामिड ज्यामितीय सिद्धांत पर आधारित है जिनका समावेश पाइथागोरस सूत्र में किया गया है। यानी मिश्र के पिरामिड पाइथागोरस सूत्र के व्यावहारिक प्रमाण हैं। लेकिन इससे पाइथागोरस को या तो और प्राचीनतर युग में ले जाना होगा या फिर यह मानना होगा कि मिश्र को लोग पहले से ही इस सिद्धांत को जानते थे।
भले ही मिश्र के पिरामिडों के निर्माण में पाइथागोरस के सूत्र का उपयोग किया गया हो लेकिन मूल सिद्धांत तो वहां नहीं मिलता। पिरामिडों से जुड़े हजारों टुकड़ों में कहीं भी इस सूत्र का कोई संकेत उपलब्ध नहीं है। यानी इसे हमें कहीं और ही खोजना होगा। अब से करीब दो हजार वर्ष पहले मैसोपोटामिया में भी इस सूत्र का उपयोग वहां की वास्तुकला में करने का प्रमाण मिलता है। यानी यह सूत्र मिश्र के पश्चात् अरब क्षेत्र में पहुंच गया था। लेकिन वहां भी ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला है जिससे पता चलता कि यह सूत्र लिपिबद्ध रूप में वहां उपलब्ध था। यह खोज हमें सीधे भारत ले आती है, जहां के शुल्ब सूत्र में पाइथागोरस का सूत्र लिपिबद्ध तरीके से मिलता है। बौधायन के शुल्ब सूत्र का रचनाकाल 800 ईसापूर्व था। लेकिन प्रसिद्ध गणितशास्त्री और पुराविद् डा. सुभाष काक का मानना है कि आवश्यक नहीं कि इस सूत्र का उल्लेख पहली बार बौधायन के शुल्ब सूत्र में ही हुआ हो। बौधायन में इस का उल्लेख वैदिक यज्ञकुण्डों के निर्माण के बारे मेंं किया गया है। लेकिन इस बात को समझ लेना चाहिए कि वैदिक यज्ञकुंड वैदिक युग के आरम्भिक काल से ही बनाए जाते रहे हैं। अगर वे कुण्ड इस सूत्र के आधार पर ही बनाए जाते थे तो सूत्र भी रहा होगा। यानी भारत ही एक देश है जहां सूत्र का लिपिबद्ध रूप भी उपलब्ध है और उसके आधार पर निर्माण के प्रमाण भी।
ग्रीक सभ्यता के आरम्भिक दौर में कुछ दार्शनिकों को यह शंका होने लगी कि संभवत: हमारी पृथ्वी अपने स्थान पर अचल है और सूर्य उसकी परिक्रमा करता है। इससे कुछ समय पहले ही यह प्रश्न भारतीय वैज्ञानिकों की चिंता का विषय बन चुका था। वैदिक ऋषियों को ज्ञात था कि सूर्य अचल है और पृथवी उसकी परिक्रमा करती है। सूर्य सिद्धांत में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर भले ही घूमती हो, इसके अलावा उसकी अपनी भी एक सीधी गति है। यानी वह अपनी धुरी के कारण एक ही स्थान पर रुकी नहीं होती। वह गति सूर्य द्वारा निर्धारित होती है, इस बात को अपने खूंटे से बंधे गाय के उदाहरण से समझाया गया है। इस प्रकार भारतीय ज्योतिषी खगोलशा की सटीक जानकारी रखते थे।
सूर्य सिद्धांत केवल ग्रहों की चाल का अध्ययन नहीं है, यह कुछ मौलिक गणितीय सिद्धांतों का भी स्रोत है। विश्व में त्रिगुणमित्तीय गणित का स्रोत सूर्यसिद्धांत ही है। सूर्यसिद्धांत प्राचीनतम गणितीय शास्त्र है जिसके कई संस्करण उपलब्ध हैं। भारत में उस समय तक केवल सूर्य और चंद्रमा का ही अध्ययन नहंी होता था, सौर मण्डल के अन्य ग्रहों की गति का भी अध्ययन आरम्भ हो चुका था। भारतीय खगोल वैज्ञानिकों के अध्ययन के दायरे में सौर मण्डल से परे के ग्रह भी आ चुके थे। उदाहरण के लिए भारत का अतिप्राचीन पंचांग सप्तर्षि संवत रहा है। महाभारत काल से कालगणना के लिए इसी का उपयोग होता रहा है। इसके अनुसार एक नक्षत्र को राशिचक्र में एक राशि से दूसरी तक यात्रा करने में सौ वर्ष लगते हैं। 27 राशियों का पूरा चक्कर लगाने में 2700 वर्ष लगने चाहिए। लेकिन एक राशि की यात्रा सौ वर्ष से कुछ अधिक समय लेती है, इसलिए पूरे राशि चक्र की यात्रा 2718 वर्ष में पूरी होती है। प्राचीन भारतीय गणितज्ञ और ज्योतिषी एक सप्तर्षि की यात्रा पूरी करने के बाद फिर से नया चक्र आरम्भ करते थे।
नक्षत्रों के इस अध्ययन के मूल में केवल ग्रहों का अध्ययन ही नहीं अपितु गणित की गहन जानकारी भी थी। सभी प्राचीन सभ्यताओं में गणित विद्या की पहली अभिव्यक्ति गणना प्रणाली के रूप में प्रगट होती है। अति प्रारंभिक समाजों में संख्यायें रेखाओं के समूह द्वारा प्रदर्शित की जातीं थीं। रोम जैसे स्थानों में उन्हें वर्णमाला के अक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया गया। यद्यपि आज हम अपनी दशमलव प्रणाली के अभ्यस्त हो चुके हैं, किंतु सभी प्राचीन सभ्यताओं में संख्याएं दशमाधार प्रणाली पर आधारित नहीं थीं। प्राचीन बेबीलोन में 60 पर आधारित संख्या-प्रणाली का प्रचलन था। पश्चिम में ईसा से कुछ शताब्दी पूर्व तक नौ से आगे की गिनती का प्रचलन नहीं था। कारण यह था कि तब तक पश्चिम में शून्य अंक था ही नहीं, जिससे नौ के बाद दहाई की गिनती हो सके। अरब देशों, जहां से पश्चिमी यूरोप ने गिनती सीखी, में आरम्भ से माना जाता था कि गिनती करने का तरीका भारत से ही आया। इसलिए अंक को वहां आरम्भ से ही हिंदसा कहते हैं यानी जो हिंद से आया। गणित की इस जानकारी के ही कारण ग्रहों की सूक्ष्मतर गतिविधि का भी अनुमान लगाना भारतीय वैज्ञानिकों के लिए आसान हो गया था। उदाहरण के लिए सूर्य सिद्धांत में ग्रहों की केवल दो तीन गतियों का विवरण नहीं है, आठ प्रकार की गतियों का वर्णन है। वक्र, अनुवक्र, कुटिल, मंद, मंदतर, सम, शीघ्र और शीघ्रतर।
महत्वपूर्ण बात है कि जहां ग्रीक वैज्ञानिकों को प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध कोई बात कहने के कारण दण्डित होना पडता था, वहीं भारतीय वैज्ञानिकों को इस प्रकार की किसी प्रताडऩा का भय नहीं था, भले ही उनकी मान्यता प्रचलित धारा के विश्वासों के विपरीत ही क्यों न हो। इसलिए भारत में विज्ञान का समुचित विकास हो पाया और विज्ञान तथा गणित के मौलिक सिद्धांतों की खोज हो पाई।