एक वैचारिक योद्धा का प्रयाण

एक वैचारिक  योद्धा का प्रयाण

रवि शंकर
लेखक कार्यकारी संपादक हैं।

राजेंद्र सिंह नहीं रहे। यह लिखना पीड़ादायक है। राजेंद्र सिंह के जाने से कहीं कोई खबर नहीं बनी, परंतु उनके रूप में एक परंपरा का अवसान हो गया। हम जैसे नए अध्यवसायियों के मार्गदर्शक थे वे। वे एक स्तंभ थे जिनसे मिल कर आचार्य उदयवीर शास्त्राी, पंडित भगवद्दत और वैद्य गुरुदत्त जैसे लोगों को अनुभव किया जा सकता था। वे एक ऐसी प्रेरणा थे जो हमें भारत की ऋषि परंपरा से सीधा जोड़ती थी।
राजेंद्र सिंह एक पत्राकार थे, लेखक थे, इतिहासकार थे, विद्वान थे। संक्षेप में कहें तो वे एक जीवन्त विश्वकोश थे। वे एक चलता-फिरता पुस्तकालय थे। विषय चाहे पुराणों का हो या फिर स्मृतियों का, विषय चाहे सिख ग्रंथों का हो या फिर आयुर्वेद के ग्रंथों का, रसायनशास्त्रा पर चर्चा करें या फिर सृष्टि के विज्ञान पर, उन्हें पुस्तकें कम ही देखनी पड़ती थीं। स्मरण मात्रा से वे बताने में सक्षम थे। बात को पुष्ट करने के लिए ही केवल उन्हें पुस्तकें देखना पड़ता था।
वे श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति-आन्दोलन के वह प्रमुख गवाह और अनुवादक थे। वे हिंदी, गुरुमुखी, उर्दु-फारसी और अंग्रेजी ठीक से पढ़ लेते थे। इन भाषाओं पर अधिकार होने के कारण मन्दिर के पक्ष में उर्दू और फ़ारसी के असंख्य पन्नों का उन्होंने अनुवाद करके विश्व हिंदू परिषद् के आन्दोलन को बल प्रदान किया था। उनकी साक्षी के आधार पर ही सर्वाेच्च न्यायालय ने अयोध्या में प्रभू श्रीराम के मंदिर होने के पक्ष में फैसला सुनाया। उन्होंने दस सिख ग्रंथों की साक्षी न्यायालय में दी थी।
वे एक सतत अध्येता थे। सतत अध्ययनरत रहना और लिखते रहना उनका स्वभाव था। उन्होंने एक बार स्वयं बताया था कि आयुर्वेद के लगभग ढाई सौ ग्रंथ उनके पास थे और उन्होंने वे सबी पढ़ रखे थे। उनके इस अध्ययन का परिणाम दिखता भी था। इसी प्रकार अन्यान्य विषयों की भी उनके पास दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह था। वे निरंतर पढ़ते थे और निरंतर लिखते रहते थे।
लेखन में सुविधा के लिए उन्होंने मोबाइल फोन का प्रयोग सीखा। वे मोबाइल फोन से अपने जीमेल के एकाउंट में हजार से अधिक लेख लिख रखे थे। उनका कोई भी लेख दो हजार शब्दों से कम का नहीं था। और यह सब उन्होंने केवल छह-आठ महीनों में कर डाला था। तकनीकी अनके लिए बाधा नहीं सहयोगी बन गई। पुस्तकों की प्रतिलिपि कराने में भी उनकी जबरदस्त सिद्धहस्तता थी। उन्हें यह तक पता होता था कि कितना प्रतिशत छोटा किया जाए, कैसे एक बड़ी पुस्तक को छोटी पुस्तक के आकार में प्रतिलिपि कराया जाए। फोटोस्टेट वाले को वे स्वयं ही निर्देश देकर करवाया करते थे।
उनकी इच्छा थी कुछ पुस्तकें लिखने की। प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक कालक्रम उनका प्रिय विषय था और वे सृष्टि रचना काल पर पुस्तक लिखने के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने महाभारत और पुराणों में दिए घटनाक्रम को कालबद्ध करने में उन्होंने उल्लेखनीय प्रयास किया था।
इसी प्रकार सिख-इतिहास पर भी उनकी जबरदस्त पकड़ थी। इस पर उनकी एक लेख श्रृंखला गुरु नानक की राष्ट्रीय दृष्टि, भारतीय धरोहर में प्रकाशित हुई थी। वे सभी सिख गुरुओं की राष्ट्रीय दृष्टि पर भी एक पुस्तक लिखने की योजना में थे। भारतीय धरोहर ने उसे प्रकाशित करने का निश्चय भी किया था। इसके अतिरिक्त वे इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी-इतिहास के भी वह बड़े भारी मर्मज्ञ थे। कुरआन, हदीस और बायबल पर उनकी व्याख्या अच्छे-अच्छे इस्लामी विचारकों पर भारी पड़ती थी।
राजेंद्र सिंह का जाना एक बड़ी क्षति इसलिए भी है कि वे अभी अत्यंत गतिशील थे। बड़ी योजनाएं बन रही थीं। उनके साथ कई परियोजनाओं पर काम करने के लिए भारतीय धरोहर तैयारी कर रहा था। उनके मार्गनिर्देशन में भारतीय रसायनशास्त्रा, भारतीय इतिहास के कालक्रम जैसे अनेक नवीन और कतिपय विवादित विषयों पर गंभीर खोजपरक कार्य की योजना थी। उनके अभाव में ये सब कार्य कैसे होंगे, सोच कर ही मन विचलित हो उठता है।
श्री राजेन्द्र सिंह जी के विषय में जितना कहा जाए, वह थोड़ा ही है। वे भारत की धरोहर थे। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजली होगी। उनके अधूरे छोड़े गए कार्यों को पूरा करने के लिए भारतीय धरोहर कृतसंकल्प है।