समलैंगिकता की चिकित्सा संभावना

डॉ.आर.अचल पुलस्तेय
लेखक आयुर्वेद चिकित्सक तथा वल्र्ड आयुर्वेद काँग्रेस के सदस्य हैं।


समलैंगिकता एक ऐसी स्थिति है जिसे न रोग कह सकते है न प्राकृतिक स्वाभाविक व्यवहार,इसलिए निश्चित ही एक विकृत अस्वाभाविक व्यवहार है। जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जन्मजात प्रवृत्ति मानता है, फिर भी कुछ विशेषज्ञ इसे मनोविकार मानकर चिकित्सा करने का प्रयास करते हैं। आयुर्वेद भी लगभग इस बात से सहमत दिखता है।
सामान्यत: विपरीत लिंगी यौन आकर्षण व संसर्ग प्राकृतिक व स्वाभाविक होता है। इसी प्रक्रिया में मनुष्य ही नहीं प्रत्येक जीव में प्रजनन होताहै। परन्तु कुछ लोगो में इसके विपरीत स्वलिंगी यौन आकर्षण और संसर्ग की प्रवृत्ति होती है, हालाँकि इनकी संख्या बहुत कम होती है, फिर भी अस्वाभाविकता के कारण सामाजिक, प्राकृतिक समस्या खड़ी हो जाती है, जो आगे चलकर धार्मिक और न्यायिक रुप में भी विवाद का विषय बन जाती है।

इसे अधिक स्पष्टता से इस तरह समझ सकते हैं कि जब पुरुष, पुरुष से या महिला, महिला के प्रति यौन भाव से आकर्षित होकर यौन संसर्ग की इच्छा करे या करे तो उन्हें समलैंगिक, होमोसेक्सुअल या लेस्बियन कहते हैं।
इस संबंध में आधुनिक विज्ञान का मानना है कि समलैंगिकता की प्रवृत्ति जन्मजात होती है। इसमें न उस व्यक्ति का कोई दोष होता है न ही उसके माता-पिता का। ऐसे लोगों का उल्लेख भारत ही नहीं दुनियाँ के सभी सभ्यताओं के प्राचीन साहित्य में मिलता है। इस संबंध में वैज्ञानिकों का मानना है कि जन्मजात विकार होने के कारण इसमें सुधार की संभावना नहीं के बराबर है, लेकिन कुछ लोग ऐसा भी मानते है कि यदि वह व्यक्ति स्वयं चाहे तो इस प्रवृत्ति में सुधार संभव है। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है जहाँ किसी-किसी व्यक्ति यह विकार अस्थायी रूप से उभर आता है। जिसकी मनोवैज्ञानिक चिकित्सा या कभी-कभी स्वयं ठीक हो जाता है। ऐसा अक्सर यौन व्यवहार के प्रति संकुचित या कुंठित समाज में होने की संभावना होती है। लड़के-लड़कियों में दूरी रखने की परम्परा वाले समाज के किशोर वय के बच्चों अक्सर यह प्रवृत्ति पनप जाती है, जो समय के साथ परिस्थिति बदलने या विवाह होने का बाद स्वत: बदलाव हो जाता है।

समलैंगिक प्रवृत्ति के कारणों पर विवाद है, बहुत से धर्मों में समलैंगिकता को पाप माना गया है। कुछ धर्मों में समलैंगिकता को विकल्पों के रूप में देखा गया है जो किसी व्यक्ति की अपनी पसंद पर निर्भर करता है।
परंतु बहुत से आधुनिक वैज्ञानिकों का कहना है कि दर्शाया समलैंगिकता यौन क्रिया का स्वाभाविक विकल्प नहीं है। समलैंगिकता के कारक अभी स्पष्ट नहीं हैं, लकिन आनुवंशिकी और शिशु के गर्भ काल में माँ की शरीर में बनने वाले हार्मोन के प्रभाव से शिशु में यह विकृति होती है। कुछ वैज्ञानिक पारिवारिक-सामाजिक, धार्मिक कारणों का भी उत्तरदायी मानते हैं। में भी पाई जाती है।

कुछ चिकित्सकों द्वारा समलैंगिकता का उपचार मनोविकार मानकर किया जाता है, जिसमें सामाजिक कारणों से उत्पन्न समलैंगिता में लाभ होते देखा गया है। हालाँकि कुछ चिकित्सा विज्ञानी इससे सहमत नहीं है। कुछ धार्मिक समलैंगिकता के उपचार करने प्रयास भी करते है। इसे ‘रपैरेटिव चिकित्साÓ कहा जाता है। इस प्रकार की चिकित्सा में बहुत से समलैंगिकों ने अपने आप को विषम लैंगिक बनाने का प्रयास किया है और वो ये दावा भी करते हैं कि उनमें बदलाव आया भी है,परन्तु इस प्रयास को मान्यता नहीं मिली ही है। बहुत से चिकित्सा और मनोरोग विज्ञानी इस थेरापीफ्राड मानते हैं। अमेरिकी साइकोलाजिस्ट कि सोसाइटी, रायल साइकोलाजिस्ट काले, नेशनल सोससएक्टिविस्ट सोसाइटी, नर्सिग कालेज एवं पैड्रियाटिक अकेडमी के वैज्ञानिक इस विषय पर एक मत है कि समलैंगिकता में चिकित्सकीय परिवर्तन या सुधार संभव नहीं है।

आयुर्वेद में मूल ग्रंथों में इस विषय पर अधिक चर्चा नहीं मिलती है, परन्तु भाव प्रकाश पूर्वखण्ड में नपुंसक संतान उत्पन्न होने के कारणों का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि यदि मोह वश कामोन्मत्तऋतुमती स्त्री पुरुष की तरह विपरीत आसन में पुरुष संसर्ग करती है तो उससे उत्पन्न पुत्र संतान पुरुष के प्रति तथा स्त्री संतान स्त्री के प्रति आकर्षित होकर यौन संसर्ग करने वाली होती है। इसे कुम्भीक नपुंसक कहा गया है। इस स्थिति के को परमेश्वर की कृपा से जोड़ा कर देखा गया है। इसलिए इसकी चिकित्सा की संभावना बहुत कम बचती है। परन्तु ऐसी संतानों की संख्या बहुत की कम होती है। समलैंगिक के अधिक मामले सामाजिक कारणों के होते है जिन्हें समय रहते पहचान कर मनोचिकित्सकी परामर्श और वाजीकरण औषधियों के प्रयोग से प्राकृतिक यौन संबंध की प्रवृत्ति में वापस लाया जा सकता है।