पुण्य जमा होता है राम नाम बैंक में

हर्षिता सिंह
शोधार्थी


प्रयागराज की पावन धरा अनादि काल से धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रही है। ऋषि—मुनियों, साधु—संतों, मनीषियों के अतिरिक्त अन्य धर्मभीरु लोग भी यज्ञ, जप-तप आदि अनुष्ठानों के माध्यम से प्रयाग का मान पूरे विश्व में बढ़ाते रहे हैं। प्रयागराज में सतत चल रही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच यहां के ‘राम नाम बैंक’ ने लाखों रामभक्तों को जोड़कर अपनी एक नई पहचान बनाई है। ‘राम नाम बैंक’ का बहुत कुछ काम बैंक की तर्ज पर होता है, बस एक बड़ा अंतर है कि यहां रुपए, पैसे या डॉलर जैसी मुद्रा की जमा या निकासी नहीं होती है, अपितु सारा लेन—देन ‘राम’ नाम का होता है। राम नाम का यह लेन—देन मौखिक नहीं, अपितु लिखित रूप में और सैकड़ों, हजारों नहीं लाखों और करोड़ों में होता है। इस बैंक से जुडऩे वालों में साधु, संन्यासी नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग हैं, जिनमें न्यायाधीश, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, जनप्रतिनिधि, व्यापारी, छात्र, शिक्षक और छोटे बच्चे भी शामिल हैं। प्रयागराज में प्रतिवर्ष लगने वाला माघ मेला हो या फिर कुंभ और महाकुंभ यह बैंक संगम की रेती पर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र होता है।

‘राम नाम सेवा संस्थान’ द्वारा संचालित इस अनूठे ‘राम नाम बैंक’ की स्थापना से लेकर विदेश तक उसके फैलाव की विकास यात्रा पर इसके मुख्य संयोजक आशुतोष वाष्र्णेय बताते हैं, ”यह पुनीत कार्य कब से चल रहा है, यह तो ठीक—ठीक नहीं पता, परन्तु हमारे दादा ईश्वर चन्द्र प्रयागराज में ही व्यवसायी थे और आजादी के बाद 1954 से पहले उन्होंने अपने व्यापार वाली बही खाते पर राम नाम लिखना प्रारंभ किया था। अपने साथ उन्होंने कुछ अन्य साथियों को इसके लिए प्रेरित किया और फिर राम नाम लिखने वालों का एक बड़ा समूह बन गया। उस समय सब लोग अपने लाभ का दस प्रतिशत भगवान के नाम पर सुरक्षित रख देते थे और उसका उपयोग धार्मिक कार्यों, जरूरतमंदों और गरीबों में बांट दिया करते थे। समय के साथ यह परम्परा सुदृढ़ होती गई। उस समय सब लोग बही में राम नाम लिखते और भर जाने पर उसे अपनी तिजोरी या पूजा के स्थान पर सुरक्षित रख देते थे। दादा के बाद पिता जी भी राम नाम लेखन से जुड़े, लेकिन वे वकालत पेशे में थे तो बहुत समय नहीं निकाल पाते थे। 1989 के आसपास मैं राम नाम लेखन से जुड़ा और एक ध्येय बनाया कि राम नाम लेखन की परम्परा को सुदृढ़ और समृद्ध बनाने के लिए प्रक्रिया का आधुनिकीकरण किया जाए। 2001 में इस कार्य का डिजिटलीकरण किया गया। बही—खाते के स्थान पर इसे पुस्तिका का रूप दिया। इस कारण यह आम लोगों में ज्यादा प्रचारित और प्रसारित हुआ। पुस्तिका में लेखन का ऐसा प्रारूप बनाया गया कि लोगों को लिखने में सुविधा होने लगी। जिस प्रकार से 108 बार जाप करने पर एक माला पूर्ण होती है, उसी प्रकार पुस्तिका में 108 बार राम राम लिखने पर एक पृष्ठ पूर्ण हो जाता है। राम नाम लेखन के लिए इच्छुक लोगों को पुस्तिका मुफ्त में दी जाती है। पुस्तिका भर जाने पर दूसरी, तीसरी, चौथी यानी आवश्यकतानुसार और पुस्तिकाएं दी जाती हैं।”

राम नाम बैंक में धन की कोई भूमिका नहीं है। धन का न लेना है और न देना है। राम नाम लेखन पुस्तिका के संग्रह और कर्ज के रूप में राम नाम देने की गतिविधियों के चलते यह कब और कैसे बैंक के रूप में विख्यात हो गया, यह किसी को ठीक से याद नहीं है। बैंक से व्यक्ति को अपने सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन का ऋण मिलता है, लेकिन राम नाम बैंक से आध्यात्मिक ऊर्जा, कष्ट निवारण, मोक्ष की कामना और मनोकामना पूर्ण करने के लिए राम नाम का कर्ज देते हैं। यह कर्ज श्रद्धालु की इच्छा, छोटी—बड़ी मनोकामना के दृष्टिगत लाखों या करोड़ों में होता है। मान्यता यही है कि सवा लाख राम नाम लिखने वाले की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। श्रद्धालु को यह कर्ज वापस भी करना होता है यद्यपि इस पर कोई ब्याज नहीं लिया जाता है। कर्ज वापसी का नियम यह है कि जितना कर्ज लिया है उतना राम नाम लिख कर श्रद्धालु को वापस करना होता है। कर्ज में लिए गए राम नाम का श्रद्धालु क्या करते हैं? इस पर श्री वाष्र्णेय बताते हैं, ”यह उस भक्त की इच्छा पर निर्भर करता है। लोग अपने भवन, माल, फैक्ट्री अथवा अन्य किसी बड़े निर्माण की नींव में रखवा देते हैं, तो कुछ लोग पूजा घर या संस्थान में संरक्षित करके रखते हैं।”

सामान्यत: अन्य स्थानों पर राम नाम लेखन से जुड़े लोग पुस्तिका के पृष्ठ पर राम राम लिखते हैं, लेकिन प्रयाग राम नाम बैंक की पुस्तिका में एक पृष्ठ में केवल 108 बार ही राम राम लेखन के खाने बने हैं। इसके पीछे वाष्र्णेय तर्क देते हैं कि सनातन धर्म में सब कुछ ग्रह नक्षत्रों पर ही आधारित है। 108 अंक की संख्या को हिन्दू धर्म में बहुत ही शुभ माना जाता है, यदि इसको आपस में जोड़ा जाए तो योग 9 आता है और हमारे धर्म में अंक 9 का बहुत महत्व है।नवरात्रि, नव दुर्गा, नौ अंग और नौ ग्रह के कारण हमारे धर्म में इस अंक का विशेष स्थान है। भारतीय ज्योतिष में भी अंक 9 को सम्पूर्णता, संतुलन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसका संबंध मंगल ग्रह से भी है, जो बहुत ही शक्तिशाली माना जाता है। इसलिए राम नाम लेखन को धर्म, ज्योतिष और वैज्ञानिक आधार से जोड़ा गया है, ताकि लोगों को अधिक से अधिक लाभ मिल सके। कहते हैं कि राम नाम को जब हम ग्रह नक्षत्र के आधार पर लिखते हैं तो राम की कृपा से हमारे कष्टकारी ग्रहों का निवारण होता है। बताया जाता है कि सिर्फ प्रयाग के राम नाम बैंक में ही राम नाम ग्रह नक्षत्रों के आधार पर लिखे जाते हैं।

कोई भी व्यक्ति जिसे प्रभु श्रीराम में श्रद्धा, आस्था और विश्वास हो वह बैंक का सदस्य बन सकता है। राम नाम लेखन के अपने नियम और विधि विधान हैं जिसे लिखने वाले को पालन करना होता है। पुस्तिका में सबसे पहले राम नाम लेखन का उद्देश्य लिखना होता है। इसके लिए दो विकल्प हैं प्रथम निष्काम भक्ति भाव एवं मोक्ष प्राप्ति हेतु दूसरा राम कृपा एवं मनोकामना पूर्ति हेतु। यदि कोई मनोकामना है तो उसे लिखना होता है। पुस्तिका में एक पृष्ठ पर 108 चौकोर खाने बने हैं। एक खाने में एक ‘राम’ लाल स्याही से तथा मुख से राम शब्द का उच्चारण करके लिखना होता है। लेखन लाल स्याही से करना होता है, जिसे पुस्तिका के साथ ही दिया जाता है। राम भक्तों से अपेक्षा यही की जाती है कि वे संकल्प लें कि प्रतिदिन कम से कम एक पृष्ठ अर्थात् 108 बार राम नाम लेखन के बाद ही लेखनी को विराम देंगे। यद्यपि ऐसा करने की कोई बाध्यता नहीं है, परन्तु रामभक्त ऐसा करता है तो 108 बार लेखन के साथ ही एक माला राम नाम का जाप भी पूरा हो जाता है जो ज्यादा शुभ और लाभकारी है। वाष्र्णेय बताते हैं कि तमाम श्रद्धालु ऐसे हैं, जो एक दिन में ही एक पुस्तिका, जिसमें 29 पृष्ठ हैं और 3132 बार राम लिखा जाता है, पूर्ण करके असीम पुण्य के भागीदार बनते हैं। राम नाम लेखन करने वाले के लिए कोई कठोर या अव्यावहारिक नियम तो नहीं है, लेकिन सबसे अनुरोध किया जाता है कि वह मांस—मदिरा आदि से परहेज करें। राम नाम लेखन पुस्तिका पूर्ण होने के बाद भक्त को दूसरी पुस्तिका प्रदान की जाती है।

प्रयाग के राम नाम बैंक की शाखा प्रतिवर्ष माघ मास में संगम तट पर होती है। माघ मेला हो या कुंभ अथवा महाकुंभ, माह भर चलने वाले इन सभी आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां राम नाम लेखन करके पुस्तिका जमा करते हैं। इतना ही नहीं, इस संस्था से जुड़े देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग राम नाम लेखन की संग्रहीत पुस्तिका लाकर यहां जमा करते हैं। बताया जाता है कि राम नाम का सर्वाधिक कर्ज माघ मास में ही वितरित किया जाता है। बड़ी संख्या में कर्ज बांटने के बाद भी राम नाम कोष में लगभग 8 करोड़ से अधिक राम नाम लिखी पुस्तिका और प्रपत्र जमा हैं। राम नाम हस्तलेखन हिन्दी के साथ ऊर्दू, बांग्ला, अंग्रेजी सहित अनेक भाषओं में हो रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस बैंक से जुडऩे वालों में प्रयागराज ही नहीं देश के अनेक बहुभाषी शहर, कस्बे के लोग भी हैं, जो नियमित रूप से अपनी भाषा में राम नाम लिख कर जमा करते हैं।

रामनाम बैंक का वार्षिक लेखा—जोखा समापन किसी अंग्रेजी तिथि में न होकर चैत्र राम नवमी के दिन होता है। रामभक्त अपनी पुस्तिका पूरे वर्ष नियमित रूप में जमा करते रहते हैं और बैंक उसे उनके खाते में दर्ज करता रहता है। यह खाता उसे बैंक से जुडऩे के तुरन्त बाद ही आंवटित हो जाता है। वर्ष भर की पूंजी को लाल अथवा पीले कपड़े में लपेट कर पूजन के बाद संरक्षित कर दिया जाता है। यद्यपि अब लोग राम नाम पुस्तिका का संग्रह अपने पास ही सुरक्षित रखते हैं।

इस बैंक से जुडऩे वालों में विदेशी भी हैं, जो कि न केवल स्वयं जुड़े हैं, बल्कि अपने साथ बड़ी संख्या में लोगों को जोड़ रखा है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय नाम न्यू जर्सी की सोनल सिंह और नीदरलैंड के हैंक केलेमन का है। केलेमन नीदरलैंड के बड़े व्यापारिक घराने से हैं, जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि उन्होंने गुरुमंत्र ले रखा है और अपना भारतीय नाम राम कृष्ण दास रखा है। उन्होंने अपनी कम्पनियों के नाम पृथ्वी, अग्नि आदि कर दिया है। बैंक की भाषा में कहा जाए तो विदेशों में भी राम नाम बैंक की शाखा और शाखा प्रबंधक हैं।
राम नाम बैंक के तकनीकी विभाग को संभालने वाली गुंजन वाष्र्णेय बताती हैं, ”आज की युवा पीढ़ी को भक्ति की राह पर लाने के उद्देश्य से राम नाम बैंक इंटरनेट और फेसबुक पर सक्रिय है। संस्था की ओर से राम नाम लेखन से जुड़ी समस्त जानकारियां मेल से लोगों को भेज दी जाती हैं। राम नाम लेखन पुस्तिका का फारमेट नेट से सीधे डाउनलोड किया जा सकता है। इन सुविधाओं के कारण कोई भी श्रद्धालु अब अपने कम्प्यूटर, लैपटाप, टेबलेट पर राम नाम टाइप कर अपने पेन ड्राइव आदि में लेकर उसे रामनवमी तक राम नाम बैंक के मुख्य कम्प्यूटर में सुरक्षित कर सकता है। इससे यह लाभ है कि युवा अपने कार्य के साथ ही फुरसत के क्षणों में सहजता से राम नाम लिख सकता है।”
प्रयागराज में चल रहा यह अनूठा राम नाम बैंक अब तक 6 महाकुंभ और 6 कुंभ का साक्षी बन चुका है। श्रद्धालुओं के उत्साह की बात करें तो बड़ी संख्या में ऐसे भक्त होते हैं, जो मात्र एक माह पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा के बीच सवा लाख राम नाम लिख कर पुण्य और पुरस्कार के भागीदार बनते हैं। दरअसल माघ मेला, कुंभ और महाकुंभ के समय संगम तट पर सर्वाधिक राम नाम लिखने वाले भक्तों को संस्था की ओर से ‘राम सेवा सम्मान’ अथवा ‘कुंभ सेवा सम्मान’ के अंतर्गत अंगवस्त्रम,स्मृति चिन्ह,राम नाम पुस्तिका, प्रसाद और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया जाता है।