राजपाल सिंह राठौर
सदस्य, राष्ट्रीय युवा सलाहकार समिति, भारत सरकार
वर्ष 2024 में दीपावली 2 दिन मनाई गई। रक्षाबंधन में भी संशय रहा कि राखी कब बांधनी चाहिए। मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाएं या 15 को, संशय बना ही रहता है। और लगभग हर त्योहार पर तिथि के आगे-पीछे होने के कारण आम जन में असमंजस रहता है और समाज में मतभिन्नता दिखाई देती है। इस कारण पिछले दो-तीन वर्ष से सोशल मीडिया पर भी कुछ बहस देखने में आती है कि पंचाँग बनाने वाले सारे त्योहारों का मजा खराब कर रहे हैं या फिर युवा वर्ग का विश्वास पंचाँग से उठता जा रहा है।
परंतु, हम यदि तथ्यात्मक रूप से इसके पीछे का कारण समझने का प्रयास करेंगे तो ध्यान में आता है कि अनंत काल से हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनि जिज्ञासु वृत्ति के रहे हैं। भारत में ज्ञान और विज्ञान एक—दूसरे के पूरक है। हमारे सारे तीज-त्योहार, हर धार्मिक अनुष्ठान का अपना एक वैज्ञानिक महत्व है।
कौन-सा त्योहार किस तिथि को मनाया जाएगा, उस समय कौन-सी ऋतु होगी, उस तिथि में कौन-सा चौघडिय़ा शुभ है, कौन-सा व्यंजन बनेगा सब कुछ वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही तय किया गया है।
हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों ने तिथियों का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की परस्पर गति को आधार बनाकर किया है। वे जानते थे कि सूर्य की गति क्या है, चंद्रमा की गति, स्थिति और नक्षत्रों का समूह कैसा है, यह सब उन्हें पता था। इसीलिए वे यह बता पाते थे कि कब पूर्णिमा होगी और कब अमावस्या।
जब दुनिया यह भी नहीं जानती थी कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, तब हमारे पूर्वजों को यह पता था कि चंद्रमा को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में लगभग 27 से 28 दिन का समय लगता है। हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों ने चंद्र पथ के 27 दिन के होने के कारण चंद्रपथ में आने वाले तारा समूहों को 27 नक्षत्रों (तारा समूहों) में बाँटा है, जिनके नाम अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मॄगशिरा, आद्र्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेशा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती है। चंद्रमा के इस 27 दिन के समय को नक्षत्र मास भी कहते हैं। हर चंद्र मास में 30 निश्चित तिथियाँ होती हैं, जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में बंटी होती है। जब सूर्य और चंद्रमा एक स्थान या कहे एक ही अंश पर एक सीधी रेखा में होते हैं तब अमावस्या होती है।
लगभग 27 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा पूरी कर लेने के कारण चंद्रमा का महीना अंग्रेजी केलैंडर के महीने से लगभग 2 से 3 दिन छोटा होता है। अत: एक वर्ष में 11 दिन 3 घटी और 48 पल चंद्रमा का महीना सूर्य के महीने से छोटा होता है। इसी कारण हमारे पंचाँग में हर 3 वर्ष में एक अतिरिक्त महीना आता है जिसे हम अधिकमास कहते हैं।
हम सारे त्योहार पंचाँग के अनुसार मनाते हैं। पंचाँग पाँच चीजों के मिश्रण से बना है—दिन, तिथि, नक्षत्र, करण और योग। इन्हीं पाँच तत्वों का मिलान करके गणितीय गणना होती है और फिर पंचाँग बनता है।
पंचाँग में समय गणना हेतु प्राण (4 सेकंड), विनाड़ी या पल (24 सेकंड), नाड़ी या घटी (24 मिनट) का उपयोग किया जाता है। इसमें 4,32,000 वर्ष का कलियुग, 8,64,000 वर्ष का द्वापर युग, 12,96,000 का त्रेता युग और 17,28,000 वर्ष का एक सतयुग होता है।
इन चारों युगों को मिलाकर एक चतुरयुग होता है और ऐसे 71 चतुरयुगों का एक मन्वन्तर होता है और 14 मन्वंतरों का एक कल्प होता है और 1 कल्प जब पूरा होता है तो धरती पर प्रलय आता है।
हमारी कालगणना श्रेष्ठ है, क्योंकि हमने कई वर्षों में इसे विकसित किया है। चंद्रमा पृथ्वी के जो चक्कर लगाता है उसे बराबर 30 भागों में हमने विभाजित किया है, जिसके प्रत्येक भाग को हम तिथि कहते हैं। तिथि का समय कम या ज्यादा हो सकता है। अपने चंद्रपथ में चंद्रमा के हर 12 डिग्री दूरी तय करने पर एक तिथि हो जाती है। सूर्य और चंद्रमा द्वारा तय की गई दूरी के बीच का अंतर ही तिथि है। चूँकि सूर्य भी अपनी गति से चलता है। इसलिए कभी चंद्रमा यह 12 डिग्री का अंतर 24 घंटे में पाट देते हैं और कभी इससे अधिक या कम समय में भी पूरा कर लेते हैं और इसी कारण तिथि की वृद्धि या क्षय होता है।
जब किसी तिथि में दो बार सूर्योदय हो जाता है तो उस तिथि की वृद्धि हो जाती है। जैसे किसी सोमवार को सूर्योदय प्रात: 5:48 मिनट पर हुआ और इस दिन सप्तमी तिथि सूर्योदय के पूर्व प्रात: 5:32 बजे प्रारंभ हुई और अगले दिन मंगलवार को सूर्योदय (प्रात: 5:47 बजे) के बाद प्रात: 7:08 बजे तक रही तथा उसके बाद अष्टमी तिथि प्रारंभ हो गई। इस तरह सोमवार और मंगलवार दोनों दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि होने से तिथि की वृद्धि मानी जाती है और दोनों दिन सप्तमी मनाई जाती है।
जब किसी तिथि में एक बार भी सूर्योदय नहीं हो तो उस तिथि का क्षय हो जाता है। जैसे किसी बुधवार को सूर्योदय प्रात: 5:44 बजे हुआ और इस दिन द्वादशी तिथि सूर्योदय के बाद प्रात: 6:08 बजे समाप्त हो गई एवं त्रयोदशी तिथि प्रारंभ हो गई और त्रयोदशी तिथि अर्धरात्रि 3:52 बजे तक रही तत्पश्चात् चतुर्दशी तिथि प्रारंभ हो गई। त्रयोदशी तिथि में एक भी बार सूर्योदय नहीं हुआ। बुधवार को सूर्योदय के समय द्वादशी और गुरुवार को सूर्योदय (प्रात: 5:43) के समय चतुर्दशी तिथि रही, जिस कारण त्रयोदशी तिथि का क्षय हो गया।
और इसी कारण अधिकांश अवसरों पर मूलत: सूर्य उदय के समय जो तिथि होती है उसी तिथि को दिन भर मनाया जाता है।
इसलिए तीज-त्योहारों पर जब तिथि एक साथ आती है, तो अपने पंचाँग और ज्योतिषियों पर शंका न करते हुए तिथि अनुसार त्योहार मनाना चाहिए और लोगों को भी इस विषय में जागृत करना चाहिए। क्योंकि पश्चिम का कैलेंडर केवल तारीखों तक सीमित है, जबकि हमारा कैलेंडर त्योहार, पूजा, काल, योग और खगोलीय गणना के साथ शुरू होता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में नया दिन रात को 12 बजे से शुरू हो जाता है, जबकि हिन्दू धर्म में सूर्य उदय के अनुसार दिन की शुरुआत होती है। और सूर्य उदय का समय हर दिन भिन्न होता है।
खंडित स्वतंत्रता के पश्चात नवंबर, 1952 में पंचाँग सुधार समिति बनाई गई थी। इस समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी और उन्होंने विक्रम संवत् को सरकारी काम-काज के लिए अपनाने की अनुशंसा की थी, परंतु पंडित नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया और ग्रेगोरियन कैलेंडर को ही आधिकारिक रूप से अपनाया।





