भारतीय विमानशास्त्र कल्पना या सच्चाई

{jathumbnail off} सुरेश चिपलूनकर
लेखक प्रसिद्ध ब्लागर हैं।

जैसे ही यह निश्चित हुआ, कि मुम्बई में सम्पन्न होने वाली 102वीं विज्ञान कांग्रेस में भूतपूर्व फ्लाइट इंजीनियर एवं पायलट प्रशिक्षक श्री आनंद बोडस द्वारा भारतीय प्राचीन विमानों पर एक शोधपत्र पढ़ा जाएगा, तभी यह तय हो गया था कि भारत में वर्षों से विभिन्न अकादमिक संस्थाओं पर काबिज, एक निहित स्वार्थी बौद्धिक समूह अपने पूरे दमखम एवं सम्पूर्ण गिरोहबाजी के साथ बोडस के इस विचार पर ही हमला करेगा और ठीक वैसा ही हुआ भी। एक तो वैसे ही पिछले बारह वर्ष से नरेंद्र मोदी इस गिरोह की आँखों में कांटे की तरह चुभते आए हैं, ऐसे में यदि विज्ञान काँग्रेस का उद्घाटन मोदी करने वाले हों, इस महत्त्वपूर्ण आयोजन में प्राचीन वैमानिकी शास्त्र पर आधारित कोई रिसर्च पेपर पढ़ा जाने वाला हो तो स्वाभाविक है कि इस बौद्धिक गिरोह में बेचैनी होनी ही थी। ऊपर से डॉक्टर हर्षवर्धन ने यह कहकर माहौल को और भी गर्मा दिया कि पायथागोरस प्रमेय के असली रचयिता भारत के प्राचीन ऋषि थे, लेकिन उसका क्रेडिट पश्चिमी देश ले उड़े हैं।

सेकुलरिज़्म, प्रगतिशीलता एवं वामपंथ के नाम पर चलाई जा रही यह बेईमानी कोई आज की बात नहीं है, बल्कि भारत के स्वतन्त्र होने के तुरंत बाद से ही नेहरूवादी समाजवाद एवं विदेशी सेकुलरिज़्म के विचार से बाधित वामपंथी इतिहासकारों, साहित्यकारों, लेखकों, अकादमिक विशेषज्ञों ने खुद को न सिर्फ सर्वश्रेष्ठ के रूप में पेश किया, बल्कि भारतीय इतिहास, अध्यात्म, संस्कृति एवं वेद-आधारित ग्रंथों को सदैव हीन दृष्टि से देखा। चूँकि अधिकाँश पुस्तक लेखक एवं पाठ्यक्रम रचयिता इसी गिरोह से थे, इसलिए उन्होंने बड़े ही मंजे हुए तरीके से षड्यंत्र बनाकर, व्यवस्थित रूप से पूरी की पूरी तीन पीढिय़ों का ब्रेनवॉश किया। आधुनिक वैज्ञानिक सोच (?) के नाम पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण आदि को पिछड़ा हुआ, अनगढ़, कोरी गप्प अथवा किस्से-कहानी साबित करने की पुरज़ोर कोशिश चलती रही, जिसमें वे सफल भी रहे, क्योंकि समूची शिक्षा व्यवस्था तो इसी गिरोह के हाथ में थी। बहरहाल, इस विकट एवं कठिन पृष्ठभूमि तथा हो-हल्ले एवं दबाव के बावजूद यदि वैज्ञानिक बोडस जी विज्ञान काँग्रेस में प्राचीन वैमानिक शास्त्र विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर पाए, तो निश्चित ही इसका श्रेय बदली हुई सरकार को देना चाहिए।

सभी विद्वानों में कम से कम इस बात को लेकर दो राय नहीं हैं कि महर्षि भारद्वाज द्वारा वैमानिकी शास्त्र लिखा गया था। इस शास्त्र की रचना के कालखंड को लेकर विवाद किया जा सकता है, लेकिन इतना तो निश्चित है कि जब भी यह लिखा गया होगा, उस समय तक हवाई जहाज़ का आविष्कार करने का दम भरने वाले राईट ब्रदर्स की पिछली दस-बीस पीढियाँ पैदा भी नहीं हुई होंगी। ज़ाहिर है कि प्राचीन काल में विमान भी था, दूरदर्शन भी था (महाभारत-संजय प्रकरण), अणु बम (अश्वत्थामा प्रकरण) भी था, प्लास्टिक सर्जरी (सुश्रुत संहिता) भी थी। यानी वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन सवाल तो यह है कि वह सब कहां चला गया? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों साल पहले जिन बातों की कल्पना(?) की गई थी, ठीक उसी प्रकार एक के बाद एक वैज्ञानिक आविष्कार हुए? अर्थात उस प्राचीन काल में उन्नत टेक्नोलॉजीतो मौजूद थी, वह किसी कारणवश लुप्त हो गई। जब तक इस बारे में पक्के प्रमाण सामने नहीं आते, उसे शेष विश्व द्वारा मान्यता नहीं दी जाएगी। प्रगतिशील एवं सेकुलर-वामपंथी गिरोह द्वारा इसे वैज्ञानिक सोच नहीं माना जाएगा, कोरी गप्प माना जाएगा। फिर सच्चाई जानने का तरीका क्या है? इन शास्त्रों का अध्ययन हो, उस संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार किया जाए, जिसमें ये शास्त्र या ग्रन्थ लिखे गए हैं। चरक, सुश्रुत वगैरह की बातें किसी दूसरे लेख में करेंगे, तो आईये संक्षेप में देखें कि महर्षि भारद्वाज लिखित वैमानिकी शास्त्र पर विचार किया जाना आवश्यक क्यों है? इसको सिरे से खारिज क्यों नहीं किया जा सकता?

जब भी कोई नया शोध या खोज होती है, तो उस आविष्कार का श्रेय सबसे पहले उस विचार को दिया जाना चाहिए, उसके बाद उस विचार से उत्पन्न हुए आविष्कार के सबसे पहले प्रोटोटाइप को महत्त्व दिया जाना चाहिए। लेकिन राईट बंधुओं के मामले में ऐसा नहीं किया गया। शिवकर बापूजी तलपदे ने इसी वैमानिकी शास्त्र का अध्ययन करके सबसे पहला विमान बनाया था, जिसे वे सफलतापूर्वक 1500 फुट की ऊँचाई तक भी ले गए थे, फिर जिस आधुनिक विज्ञान की बात की जाती है, उसमें महर्षि भारद्वाज न सही शिवकर तलपदे को सम्मानजनक स्थान हासिल क्यों नहीं है? क्या सबसे पहले विमान की अवधारणा सोचना और उस पर काम करना अदभुत उपलब्धि नहीं है? क्या इस पर गर्व नहीं होना चाहिए? क्या इसके श्रेय हेतु दावा नहीं करना चाहिए?

अंग्रेज शोधकर्ता डेविड हैचर चिल्द्रेस अपनी पुस्तक टेक्नोलॉजी ऑफ गॉड्स : दि इनक्रिडिवल साईंस ऑफ दि एन्शिएंट (पृष्ठ147-209) में लिखते हैं कि हिन्दू एवं बौद्ध सभ्यताओं में हजारों वर्ष से लोगों ने प्राचीन विमानों के बारे सुना और पढ़ा है। महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित यन्त्र-सर्वस्व में इसे बनाने की विधियों के बारे में विस्तार से लिखा गया है। इस ग्रन्थ को चालीस उप-भागों में बाँटा गया है। इसमें से एक है वैमानिक प्रकरण, जिसमें आठ अध्याय एवं पाँच सौ सूत्र वाक्य हैं।

महर्षि भारद्वाज लिखित वैमानिक शास्त्र की मूल प्रतियाँ मिलना तो अब लगभग असंभव है, परन्तु सन 1952 में महर्षि दयानंद के शिष्य स्वामी ब्रह्ममुनी परिव्राजक द्वारा इस मूल ग्रन्थ के लगभग पाँच सौ पृष्ठों को संकलित एवं अनुवादित किया गया था, जिसकी पहली आवृत्ति फरवरी 1959 में गुरुकुल कांगड़ी से प्रकाशित हुई थी। इस आधी-अधूरी पुस्तक में भी कई ऐसी जानकारियाँ दी गई हैं, जो आश्चर्यचकित करने वाली हैं।

इसी पुस्तक में डेविड हैचर लिखते हैं कि प्राचीन भारतीय विद्वानों ने विभिन्न विमानों के प्रकार, उन्हें उड़ाने संबंधी मैनुअल, विमान प्रवास की प्रत्येक संभावित बात एवं देखभाल आदि के बारे में विस्तार से समर सूत्रधार नामक ग्रन्थ में लिखी हैं। इस ग्रन्थ में लगभग 230 सूत्रों एवं पैराग्राफ की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ हैं। डेविड आगे कहते हैं कि यदि यह सारी बातें उस कालखंड में लिखित एवं विस्तृत स्वरूप में मौजूद थीं तो क्या ये कोरी गल्प थीं? क्या किसी ऐसी विशालकाय वस्तु की भौतिक मौजूदगी के बिना यह सिर्फ कपोल कल्पना हो सकती है? एक और अंग्रेज लेखक एंड्रयू टॉमस लिखते हैं कि यदि समर सूत्रधार जैसे वृहद एवं विस्तारित ग्रन्थ को सिर्फ कल्पना भी मान लिया जाए, तो यह निश्चित रूप से अब तक की सर्वोत्तम कल्पना या फिक्शन उपन्यास माना जा सकता है। टॉमस सवाल उठाते हैं कि रामायण एवं महाभारत में भी कई बार विमानों से आवागमन एवं विमानों के बीच पीछा करने अथवा उनके आपसी युद्ध का वर्णन आता है। इसके आगे मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा के अवशेषों में भी विमानों के भित्तिचित्र उपलब्ध हैं। इसे सिर्फ काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए था।

इन लुप्त हो चुके शास्त्रों, ग्रंथों एवं अभिलेखों की पुष्टि विभिन्न शोधों द्वारा की जानी चाहिए थी कि आखिर यह तमाम ग्रन्थ और संस्कृत की विशाल बौद्धिक सामग्री कहाँ गायब हो गई? ऐसा क्या हुआ था कि एक बड़े कालखण्ड के कई प्रमुख सबूत गायब हैं? तत्कालीन ऋषि-मुनियों एवं प्रकाण्ड विद्वानों ने यह कथित कल्पनाएँ क्यों की होंगी? कैसे की होंगी? उन कल्पनाओं में विभिन्न धातुओं के मिश्रण अथवा अंतरिक्ष यात्रियों के खान-पान सम्बन्धी जो नियम बनाए हैं, वह किस आधार पर बनाए होंगे, यह सब जानना जरूरी नहीं था?

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ही एक संस्कृत प्रोफेसर वीआर रामचंद्रन दीक्षितार अपनी पुस्तक ‘वार इन द एन्शियेंट इण्डिया इन 1944’ में लिखते हैं कि आधुनिक वैमानिकी विज्ञान में भारतीय ग्रंथों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने बताया कि सैकड़ों गूढ़ चित्रों द्वारा प्राचीन भारतीय ऋषियों ने पौराणिक विमानों के बारे में लिखा हुआ है। दीक्षितार आगे लिखते हैं कि राम-रावण के युद्ध में जिस सम्मोहनास्त्र के बारे में लिखा हुआ है, पहले उसे भी सिर्फ कल्पना ही माना गया, लेकिन आज की तारीख में जहरीली गैस छोडऩे वाले विशाल बम हकीकत बन चुके हैं। पश्चिम के कई वैज्ञानिकों ने प्राचीन संस्कृत एवं मोड़ी लिपि के ग्रंथों का अनुवाद एवं गहन अध्ययन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि निश्चित रूप से भारतीय मनीषियों/ऋषियों को वैमानिकी का वृहद ज्ञान था। यदि आज के भारतीय बुद्धिजीवी पश्चिम के वैज्ञानिकों की ही बात सुनते हैं तो उनके लिए चार्ल्स बर्लित्ज़ का नाम नया नहीं होगा। प्रसिद्ध पुस्तक द बरमूडा ट्राएंगल सहित अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें लिखने वाले चार्ल्स बर्लित्ज़ लिखते हैं कि यदि आधुनिक परमाणु युद्ध सिर्फ कपोल कल्पना नहीं वास्तविकता है, तो निश्चित ही भारत के प्राचीन ग्रंथों में ऐसा बहुत कुछ है जो हमारे समय से कहीं आगे है। 400 ईसा पूर्व लिखित ज्योतिष ग्रन्थ में ब्रह्माण्ड में धरती की स्थिति, गुरुत्वाकर्षण नियम, ऊर्जा के गतिकीय नियम, कॉस्मिक किरणों की थ्योरी आदि के बारे में बताया जा चुका है। वैशेषिका ग्रन्थ में भारतीय विचारकों ने परमाणु विकिरण, इससे फैलने वाली विराट ऊष्मा तथा विकिरण के बारे में अनुमान लगाया है। (स्रोत: डूम्स डे, 1999, चार्ल्स बर्लित्ज, पृष्ठ 123-124)।

इसी प्रकार कलकत्ता संस्कृत कॉलेज के संस्कृत प्रोफेसर दिलीप कुमार कांजीलाल ने 1979 में एन्शिएंट एस्ट्रोनॉमी सोसाइटी की म्यूनिख (जर्मनी) में सम्पन्न छठवीं काँग्रेस के दौरान उड़ सकने वाले प्राचीन भारतीय विमानों के बारे में एक उद्बोधन दिया एवं पर्चा प्रस्तुत किया था। प्रोफेसर कांजीलाल के अनुसार ईसा पूर्व 500 में कौशितिकी एवं शतपथ ब्रह्मण नामक कम से कम दो और ग्रन्थ थे, जिसमें अंतरिक्ष से धरती पर देवताओं के उतरने का उल्लेख है। यजुर्वेद में उडऩे वाले यंत्रों को विमान नाम दिया गया, जो अश्विन उपयोग किया करते थे। इसके अलावा भागवत पुराण में भी विमान शब्द का कई बार उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद में अश्विन देवताओं के विमान संबंधी विवरण बीस अध्यायों (1028 श्लोकों) में समाया हुआ है, जिसके अनुसार अश्विन जिस विमान से आते थे, वह तीन मंजिला, त्रिकोणीय एवं तीन पहियों वाला था एवं यह तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम था। कांजीलाल के अनुसार, आधे-अधूरे स्वरूप में हासिल हुए वैमानिकी संबंधी इन संस्कृत ग्रंथों में उल्लिखित धातुओं एवं मिश्रणों का सही एवं सटीक अनुमान तथा अनुवाद करना बेहद कठिन है, इसलिए इन पर कोई विशेष शोध भी नहीं हुआ। अमरांगण-सूत्रधार ग्रन्थ के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर एवं इंद्र के अलग-अलग पाँच विमान थे। आगे चलकर अन्य ग्रंथों में इन विमानों के चार प्रकार रुक्म, सुंदरा, त्रिपुर एवं शकुन के बारे में भी वर्णन किया गया है, जैसे कि रुक्म शंक्वाकार विमान था जो स्वर्ण जडि़त था, जबकि त्रिपुर विमान तीन मंजिला था। महर्षि भारद्वाज रचित वैमानिकी शास्त्र में यात्रियों के लिए अभ्रक युक्त (माएका) कपड़ों के बारे में बताया गया है, और जैसा कि हम जानते हैं आज भी अग्निरोधक सूट में माईका अथवा सीसे का उपयोग होता है, क्योंकि यह ऊष्मारोधी है।

भारत के मौजूदा मानस पर पश्चिम का रंग कुछ इस कदर चढ़ा है कि हममें से अधिकांश अपनी खोज या किसी रचनात्मक उपलब्धि पर विदेशी ठप्पा लगते देखना चाहते हैं। इसके बाद हम एक विशेष गर्व अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों के लिए मैं प्राचीन भारतीय विमान के सन्दर्भ में एरिक वॉन डेनिकेन की खोज के बारे में बता रहा हूँ। 79 वर्षीय डेनिकेन एक खोजी और बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं। उनकी लिखी किताब ‘चेरिएट्स ऑफ़ द गॉड्स’ बेस्ट सेलर रही है। डेनिकेन की खूबी हैं कि उन्होंने प्राचीन इमारतों और स्थापत्य कलाओं का गहन अध्ययन किया और अपनी थ्योरी से साबित किया है कि पूरे विश्व में प्राचीन काल में एलियंस (परग्रही) पृथ्वी पर आते-जाते रहे हैं। एरिक वॉन डेनिकेन 1971 में भारत में कोलकाता गए थे। वे अपनी ‘एंशिएंट एलियंस थ्योरीÓ के लिए वैदिक संस्कृत में कुछ तलाशना चाहते थे। डेनिकेन यहाँ के एक संस्कृत कालेज में गए। यहाँ उनकी मुलाकात इन्हीं प्रोफेसर दिलीप कांजीलाल से हुई थी। प्रोफेसर ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों का आधुनिकीकरण किया है। देवताओं के विमान यात्रा वृतांत ने वॉन को खासा आकर्षित किया। वॉन ने माना कि ये वैदिक विमान वाकई में नटबोल्ट से बने असली एयर क्राफ्ट थे। उन्हें हमारे मंदिरों के आकार में भी विमान दिखाई दिए। उन्होंने यह जानने के लिए लम्बे समय तक शोध किया कि भारत में मंदिरों के आकार विमान से क्यों मेल खाते हैं? उनके मुताबिक भारत के पूर्व में कई ऐसे मंदिर हैं जिनमें आकाश में घटी खगोलीय घटनाओ का प्रभाव साफ़ दिखाई देता है। वॉन के मुताबिक ये खोज का विषय है कि आखिऱकार मंदिर के आकार की कल्पना आई कहाँ से? इसके लिए विश्व के पहले मंदिर की खोज जरुरी हो जाती है और उसके बाद ही पता चल पायेगा कि विमान के आकार की तरह मंदिरों के स्तूप या शिखर क्यों बनाये गए थे? हम आज उसी उन्नत तकनीक की तलाश में जुटे हैं जो कभी भारत के पास हुआ करती थी।

अमरांगण-सूत्रधार में 113 उपखंडों में इन चारों विमान प्रकारों के बारे में पायलट ट्रेनिंग, विमान की उड़ान का मार्ग तथा इन विशाल यंत्रों के भिन्न-भिन्न भागों का विवरण आदि बारीक से बारीक जानकारी दी गई है। भीषण तापमान सहन कर सकने वाली सोलह प्रकार की धातुओं के बारे में भी इसमें बताया गया है, जिसे चाँदी के साथ सही अनुपात में रसमिलाकर बनाया जाता है (इस रस शब्द के बारे में किसी को पता नहीं है कि आखिर यह रस क्या है? कहाँ मिलता है या कैसे बनाया जाता है)। ग्रन्थ में इन धातुओं का नाम ऊष्णन्भरा, ऊश्नप्पा, राज्मालात्रित जैसे अबूझ नाम हैं, जिनका अंग्रेजी में अनुवाद संभव नहीं है अथवा इन शब्दों के अर्थ अभी तक किसी को समझ में नहीं आए हैं।

1979 में आई एक और पुस्तक एटोमिक  डिस्ट्रक्शन 2000 जिसके लेखक डेविड डेवनपोर्ट हैं, ने दावा किया कि उनके पास इस बात के पूरे सबूत हैं कि मोहन जोदड़ो सभ्यता का नाश परमाणु बम से हुआ था। मोहन जोदड़ो सभ्यता पाँच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता थी, जो इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं थी। लगभग डेढ़ किमी के दायरे में अपनी खोज को जारी रखते हुए डेवनपोर्ट ने यह बताया कि यहाँ पर कोई न कोई ऐसी घटना हुई थी जिसमें तापमान 2000 डिग्री तक पहुँच गया था। मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिलने वाले मानव अवशेष सीधे जमीन पर लेटे हुए मिलते हैं, जो किसी प्राकृतिक आपदा की तरफ नहीं, बल्किअचानक आई हुई मृत्यु की तरफ इशारा करता है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह परमाणु बम ही था। स्वाभाविक है कि जब पाँच हजार साल पहले यह एक परमाणु बम आपदा थी, अर्थात उडऩे वाले कोई यंत्र तो होंगे ही। डेवनपोर्ट आगे लिखते हैं कि चूँकि ऐसे प्रागैतिहासिक स्थानों पर उनकी गहन जाँच करने की अनुमति आसानी से नहीं मिलती, इसलिए मुझे काम बन्द करना पड़ा, लेकिन तत्कालीन रासायनिक विशेषज्ञों, भौतिकविदों तथा धातुविदों द्वारा मोहनजोदड़ो की और गहन जाँच करना आवश्यक था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया और उस पर पर्दा डाल दिया गया।

एरिक वॉन डेनिकन अपनी बेस्टसेलर पुस्तक चैरियट्स ऑफ गॉड्स (पृष्ठ 56-60) में लिखते हैं, उदाहरण के तौर पर लगभग पाँच हजार वर्ष पुरानी महाभारत के तत्कालीन कालखण्ड में कोई योद्धा किसी ऐसे अस्त्र के बारे में कैसे जानता था, जिसे चलाने से बारह साल तक उस धरती पर सूखा पड़ जाता, ऐसा कोई अस्त्र जो इतना शक्तिशाली हो कि वह माताओं के गर्भ में पलने वाले शिशु को भी मार सके? इसका अर्थ है कि ऐसा कुछ ना कुछ तो था, जिसका ज्ञान आगे नहीं बढ़ाया गया, अथवा लिपिबद्ध नहीं हुआ और गुम हो गया। यदि कुछ देर के लिए हम इसे काल्पनिक भी मान लें, तब भी महाभारत काल में कोई योद्धा किसी ऐसे रॉकेटनुमा यंत्र के बारे में ही कल्पना कैसे कर सकता है, जो किसी वाहन पर रखा जा सके और जिससे बड़ी जनसँख्या का संहार किया जा सके? महाभारत के ही एक प्रसंग में ऐसे अस्त्र का भी उल्लेख है, जिसे चलाने के बाद धातु की ढाल एवं वस्त्र भी पिघल जाते हैं, घोड़े-हाथी पागल होकर इधर-उधर दौडऩे लगते हैं, रथों में आग लग जाती है और शत्रुओं के बाल झडऩे लगते हैं, नाखून गिरने लगते हैं। यह किस तरफ इशारा करता है? क्या इसके बारे में शोध नहीं किया जाना चाहिए था? आखिर वेदव्यास को यह कल्पनाएँ कहाँ से सूझीं? आखिर संजय किस तकनीक के सहारे धृतराष्ट्र को युद्ध का सीधा प्रसारण सुना रहा था? अभिमन्यु ने सुभद्रा के गर्भ में चक्रव्यूह भेदने की तकनीक सुभद्रा के जागृत अवस्था में रहने तक ही क्यों सुनी?

एक और पश्चिमी लेखक जीआर जोसियर ने अपने एक लेख (दि पॉयलट इज वन हू नोज दि सिक्रेट) में वैमानिकी शास्त्र से संबद्ध एक अन्य ग्रन्थ रहस्य लहरी से उद्धृत किया है कि प्राचीन भारतीय वैमानिकी शास्त्र में पायलटों को बत्तीस प्रकार के रहस्य ज्ञात होना आवश्यक था। इन रहस्यों में से कुछ का नाम इस प्रकार है : गूढ़, दृश्य, विमुख, रूपाकर्षण, स्तब्धक, चपल, पराशब्द ग्राहक आदि। जैसा कि इन सरल संस्कृत शब्दों से ही स्पष्ट हो रहा है कि यह तमाम रहस्य या ज्ञान पायलटों को शत्रु विमानों से सावधान रहने तथा उन्हें मार गिराने के लिए दिए जाते थे। शौनक ग्रन्थ के अनुसार अंतरिक्ष को पाँच क्षेत्रों में बाँटा गया था : रेखापथ, मंडल, कक्षाय, शक्ति एवं केन्द्र। इसी प्रकार इन पाँच क्षेत्रों में विमानों की उड़ान हेतु 5,19,800 मार्ग निर्धारित किए गए थे।

आगे महर्षि अगस्त्य लिखते है, सौ कुंभों की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे, तो पानी अपने रूप को बदल कर प्राण वायु यानी कि आक्सीजन तथा उदान वायु हाइड्रोजन में परिवर्तित हो जाएगा।

वे आगे लिखते है: उदान वायु (एच2) को वायु प्रतिबन्धक वस्त्र (गुब्बारा) में रोका जाए तो यह विमान विद्या में काम आता है। राव साहब वझे, जिन्होंने भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथ और प्रयोगों को ढूंढऩे में अपना जीवन लगाया, उन्होंने अगस्त्य संहिता एवं अन्य ग्रंथों में पाया कि विद्युत भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्पन्न होती हैं, इस आधार पर उसके भिन्न-भिन्न नाम रखे गयें है:

 

(1) तडि़त‌ – रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न।

(2) सौदामिनी – रत्नों के घर्षण से उत्पन्न।

(3) विद्युत – बादलों के द्वारा उत्पन्न।

(4) शतकुंभी – सौ बैट्रियों या कुंभों से उत्पन्न।

(5) हृदनि – हृद या स्टोर की हुई बिजली।

(6) अशनि – चुम्बकीय दण्ड से उत्पन्न।

 

अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पालिश चढ़ाने की विधि निकाली। अत: महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव यानी कुंभ से उत्पन्न भी कहते हैं। उन्होंने आगे लिखा है, कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात तेजाब का घोल इसका सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।

उपरोक्त विधि का वर्णन डेविड हैचर ने भी अपनी पुस्तक टेक्नोलॉजी ऑफ गाड्स में किया है। अब मजे की बात यह है कि हमारे ग्रंथों को विदेशियों ने हम से भी अधिक पढ़ा है। इसीलिए दौड़ में आगे निकल गये और सारा श्रेय भी ले गये। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि वैमानिकी शास्त्र एवं प्राचीन ग्रंथों में भारतीय विमान विज्ञान की हँसी उड़ाने, खारिज करने एवं सत्य को षड्यंत्रपूर्वक दबाने की कोशिशें बन्द होनी चाहिए एवं इस दिशा में गंभीर शोध प्रयास किए जाने चाहिए। ज़ाहिर है कि यह कार्य पूर्वाग्रह से ग्रसित गुलाम मानसिकता वाले प्रगतिशील लेखक नहीं कर सकते। इस विराट कार्य के लिए केन्द्र सरकार को ही बड़ी पहल करनी होगी। जिन विद्वानों को भारतीय संस्कृति पर भरोसा है, संस्कृत में जिनकी आस्था है एवं जिनकी सोच अंग्रेजी अथवा मार्क्स की गर्भनाल से जुडी हुई ना हो, ऐसे लोगों के समूह बनाकर सभी प्रमुख ग्रंथों के बारे में शोध एवं तथ्यान्वेषण किया जाना चाहिए।