जोड़ों का दर्द और पथरचट्टा

जोड़ों के दर्द की तकलीफ को वही बता और समझ सकता है जो स्वयं इस पीड़ा से गुजरा हो या गुजर रहा हो। रियूमैटाइड अर्थराइटिस के नाम से प्रसिद्ध जोड़ों के दर्द को आयुर्वेद में आमवात और संधिवात के नाम से जाना जाता है। इसमें मरीज के जोड़ों में सूजन आ जाती है। इसके चलते असह्य पीड़ा होती है और मरीज परेशान हो जाता है। रोग पुराना होने पर जोड़ों के खराब होने का खतरा रहता है। उम्र बढऩे पर यह रोग लोगों को अपनी चपेट में ले लेता है। संधिवात की बीमारी से जोड़ों को अपूरणीय क्षति होती है और रोगी हमेशा के लिए चलने फिरने से लाचार हो जाता है। संधिवात की चिकित्सा आयुर्वेद में बताई गई है और उससे काफी लाभ भी होता है। पिछले दिनों संधिवात के ऐसे ही आयुर्वेदीय इलाजों पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी अपनी मुहर लगा दी।

संधिवात के आयुर्वेदीय चिकित्सा पर पहला शोध हुआ है सीएसआईआर की सहयोगी संस्था इंडियन इंस्टीटयूट आफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (आईआईआईएम) द्वारा। यहां रियूमैटाइड अर्थराइटिस के लिए एक ऐसे कारगर पौधे की खोज की गई है जिससे जोड़ों का दर्द छू-मंतर होने का दावा किया जा रहा है। इंस्टीटयूट के वैज्ञानिकों ने ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पाए जाने वाले पाषाणभेद (बर्गेनिया सिलिआटा) नामक पौधे में मौजूद तत्वों को इस रोग में फायदेमंद माना है। अब तक इस पौधे का उपयोग किडनी, मूत्र थैली से पथरी निकालने, पाइल्स और सांस संबधी तकलीफों के इलाज में किया जाता रहा है। इसे पत्थरचट्ट के नाम से भी जाना जाता है।

पाषाणभेद के औषधीय गुणों को ध्यान में रखते हुए यहां के वैज्ञानिकों ने शोध किया तो पाया कि यह रियुमैटाइड अर्थराइटिस में भी काफी कारगर है। वैज्ञानिकों ने इस पौधे के केमिकल का चूहे पर प्रयोग किया जिसके परीक्षण के नतीजे काफी उत्साहजनक रहे । इंस्टीटयूट के निदेशक डा. राम विश्वकर्मा का दावा है कि करीब तीन साल के प्रयोगशाला तथा चूहे पर किए गए अध्ययन में काफी सफलता मिली है। निदेशक का दावा है कि इस पौधे से मिलने वाले रसायन से दवा तैयार करके बिना किसी दुष्परिणाम के रियुमैटाइड अर्थराइटिस का कारगर इलाज किया जा सकता है। ये पौधे प्राय: सारे देश में पाए जाते हैं।

दूसरी ओर, आमवात और संधिवात के रोगियों पर किए गए एक अध्ययन में एम्स ने पाया है कि इसमें आयुर्वेद की दो औषधियां अश्वगंधा और सिद्ध मकरध्वज काफी लाभकारी हैं। एम्स ने संधिवात के 125 मरीजों पर इन औषधियों का प्रयोग किया था। इनके सेवन से मरीजों को न केवल दर्द से राहत मिली, बल्कि जोड़ों का सूजन भी कम हो गया और उनका संचालन भी संभव होने लगा। एम्स के डाक्टरों का मानना है कि अश्वगंधा में दर्द निवारण, तनाव समाप्त करने और स्नायु-तंत्र को मजबूत करने के गुण हैं जिससे शारीरिक गतिविधियों के संचालन में मदद मिलती है और संधिवात में आराम मिलता है। इस शोध के तहत तीन सप्ताह तक मरीज को प्रतिदिन तीन बार गुनगुने पानी से पांच ग्राम अश्वगंधा चूर्ण दिया गया। इसके बाद चार सप्ताह तक 10 ग्राम सिद्ध मकरध्वज चूर्ण शहद के साथ दिया गया। पाया गया कि संधिवात के कारणों में कमी आई और जोडों के सूजन ओर दर्द में काफी आराम हुआ। इस शोध के परिणामों को इंडियन जरनल ऑफ मेडिकल रिसर्च में भी प्रकाशित किया गया है। हालांकि प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य डा. रामनिवास पाराशर मानते हैं कि एम्स द्वारा किया गया यह प्रयोग अभी और अधिक शोध की मांग करता है। संभव है कि और शोध किए जाने पर अश्वगंधा के इस रोग के निवारण में और भी महत्वपूर्ण परिणाम मिले।

एम्स ने और भी अनेक परंपरागत औषधियों की चिकित्सा क्षमता को वैज्ञानिक रूप से प्रामाणिक पाया है। यह अध्ययन एम्स की एक बड़े शोध परियोजना का एक हिस्सा है जिसमें पांरपरिक चिकित्सा प्रणाली के इलाजों की वैज्ञानिकता की जांच और पुष्टि की जाती है। इस अध्ययन में संधिवात के अलावा इस परियोजना में मिर्गी रोग, अल्जाइमर्स और गंभीर हृदय रोगों की पारंपरिक चिकित्सा पर भी शोध किया जा रहा है। इसके अलावा एम्स में हल्दी, शंखपुष्पी और अर्जुन वृक्ष की छाल के चिकित्सकीय गुणों पर शोध किया जा रहा है और अभी तक के परिणाम काफी उत्साहवर्धक पाए गए हैं।