सामने लाएंगे भारत की धरोहर

सामने लाएंगे भारत की धरोहर

सच्चिदानंद जोशी, सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र

डॉ. सच्चिदानंद जोशी इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र के सदस्य सचिव हैं। उनकी एक शानदार अकादमिक पृष्ठभूमि रही है और वे कलाओं के संरक्षण और संवर्धन से भी जुड़े रहे हैं। कलाओं में भारतीय परंपराओं के प्रति केंद्र की प्रतिपद्धता और योजनाओं के संबंध में उनसे भारतीय धरोहर के लिए सूर्यप्रकाश सेमवाल जी ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश:

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र भारतीय कलाओं की प्रस्तुति व अभिव्यक्ति का एक समवेत मंच है। एक उत्तरदायी प्रशासक के नाते आप क्या सोचते हैं?

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र अपने आप में एक अनूठा संस्थान है। इसकी कल्पना और अवधारणा बहुत ही मौलिक और व्यापक है। भारतीय उपमहाद्वीप में कलाओं के संदर्भ और दस्तावेजीकरण का यह एक ऐसा अद्भुत कोष है जहां से आने वाली पीढियां अपने ज्ञान एवं शोध का आधार पा सकेंगी। प्राचीन, वर्तमान और भावी तीनों समय को एक स्थान पर साकार करने की अनूठी क्षमता है इस केन्द्र में।

जैसा कि केन्द्र के उद्देश्यों में निहित है कि यह भारतीय लोक सांस्कृतिक अंतःचेतना और कलाओं के विस्तार में भूमिका निभाएगा तो कला केन्द्र पूर्वाेत्तर, जम्मू-कश्मीर अथवा हिमालयी क्षेत्रा के राज्यों के लिए और कौन सी योजनाएं बना रहा है?

केन्द्र में लोक संस्कृति और जीवन शैली के अध्ययन के लिये जनपद सम्पदा विभाग है। इसके अंतर्गत प्रागैतिहासिक काल से लेकर वर्तमान तक सभी लोक कलाओं, शैलियों और अवधारणाओं का अध्ययन होता है। केन्द्र का एक स्वतंत्रा प्रकल्प पूर्वाेत्तर का है। इसमें विभिन्न शोध एवं अनुसंधान कार्य हो रहे हैं। साथ ही दस्तावेजीकरण, प्रलेखन भी हो रहा है। अभी तक इस प्रकल्प का संचालन दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय से होता था। हमने कार्य को प्रभावी बनाने की दृष्टि से अब इसे गौहाटी स्थानांतरित किया है। साथ ही हमारे गौहाटी स्थित क्षेत्राीय कार्यालय को पूरी तरह सुविधाओं तथा मानव संसाधन से लैस करने का निश्चय किया है, जिससे पूर्वाेत्तर के कार्यों में गति आ सके।
इसी प्रकार हम एक क्षेत्राीय केन्द्र जम्मू-कश्मीर में खोलने जा रहे हैं, जहां से हम हमारी पर्वतीय क्षेत्रा की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने के कार्य को प्रभावी ढंग से कर पायेंगे। हम लेह और कारगिल में भी हमारे कार्याे को विस्तार दे रहे हैं जिससे वहां की सांस्कृतिक सम्पदा से देश के अन्य भाग के लोग साक्षात्कार कर सकें। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से भी हम अनुबन्ध करने जा रहे हैं जिससे हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रा में भी कार्य को प्रभावी विस्तार दे सकें।

आप एक शीर्ष शिक्षाविद् और कलारंजक व्यक्तित्व रहे हैं। निश्चित रूप से आपके निर्देशन में कई योजनाएं प्रस्तावित होंगी? क्या इसके तहत शिक्षा, इतिहास व प्राच्य विधाओं के प्रसार के प्रयत्न भी शामिल हैं?

अभी तक इस केन्द्र की गतिविधियां इलाकों के क्षेत्रा में शोध, लेखन, दस्तावेजीकरण, प्रदर्शन तक ही सीमित थी। हमारा प्रयास इससे जुडे क्षेत्रों से नियमित शिक्षण प्रशिक्षण देने का एवं शोध की उपाधिपरक शिक्षा प्रारंभ करने का है। हम कुछ नये एकवर्षीय डिप्लोमा कोर्स प्रारंभ करने जा रहे हैं जिसमें कुछ ऐसे विषयों से शिक्षा दी जायेगी जिनमें अभी तक कोई औपचारिक शिक्षा उपलब्ध नहीं है। साथ ही कुछ प्रमाण पत्रा भी प्रारंभ करने का विचार है जिसके माध्यम से विशेषज्ञता मूलक प्रशिक्षण दिया जा सकेगा।
केन्द्र के पास प्रचुर संसाधन हैं जिसका उपयोग उच्च स्तरीय शोध में हो सकता है। हम विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ एमओयू करने जा रहे हैं जिससे शोध तथा अनुसंधान को बढावा मिल सके। साथ ही हम विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर साझा परियोजनायें भी संचालित करने जा रहे हैं। उच्च विधा पर केन्द्रित एक विशिष्ठ प्रकल्प ‘‘भारत विधा प्रयोजना’’ का भी प्रारंभ किया गया है, जिसके माध्यम से भारत विधा को भारतीय दृष्टिकोण से समझने और समझाने वाले अध्येताओं को तैयार करेंगे।

भारतवर्ष विविधताओं का देश है। यहां की बोली, भाषा, पहनावा और लोककलाओं के साथ खान-पान भी विविधतायुक्त है। केन्द्र किस प्रकार इन सबके बीच सामंजस्य स्थापित करता है?

केन्द्र के पास विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से देश की विविधता को संजोने और संरक्षित करने का जरिया उपलब्ध है। इसके साथ ही केन्द्र का बहुत ही अनौपचारिक ढांचा किसी भी विषय में स्वतंत्रा रूप से शोध और अनुसंधान का अवसर प्रदान करता है। इसलिये किसी बोली, भाषा, क्षेत्रा, पहनावे या कला रूप में इसे बांधा नहीं जा सकता। यही केन्द्र की सबसे बडी शक्ति है। यह कार्य बहुत व्यापक है तथा इसे परिभाषित करना कठिन है। यह उतना ही व्यापक है जितना भारत।

भारत देश में चाहे कला हो, इतिहास अथवा भाषा बिना संस्कृत और प्राचीन वाद्य यंत्रा एवं हमारी परंपरागत विधाओं के किसी की भी कल्पना नहीं की जा सकती। इसके लिए केन्द्र की योजना में कोई विशेष प्रावधान है क्या?

भारत के प्राचीन ग्रंथों, संदर्भों एवं पांडुलिपियों पर कार्य करने का महत्वपूर्ण कार्य केन्द्र के कला कोष विभाग के अंतर्गत होता है। इसके माध्यम से भारतीय पाठ्य संदर्भों पर आधारित कलात्मक कोष ग्रंथमाला की सूचना दी जा रही है। इसके अंतर्गत चालीस ग्रंथों का निर्माण हो चुका है और लगभग इतने पर कार्य जारी है। इसी प्रकार ‘कला मूल शास्त्रा’ पर भी कार्य हो रहा है और ‘‘कला समालोचना’’ के माध्यम से भी भारतीय पुरासम्पदा को प्रकाश में लाने का कार्य किया जा रहा है।
भारत की इस धरोहर को वर्तमान पीढी के सामने टीका एवं तुलना के साथ लाने का कार्य केन्द्र कर रहा है। एक ही ग्रंथ के विभिन्न संस्करणों को साथ लाकर उनके आधार पर प्रमाणित ग्रंथ रचना करना, साथ ही उसकी समीक्षा करना यह अत्यन्त कठिन एवं श्रमसाध्य कार्य है जो केन्द्र से जुडे विद्वान अध्येता कर रहे हैं। विभिन्न लिपियों में लिखी पांडुलिपियों को भी पढकर उनका अंग्रेजी, संस्कृत में अनुवाद का कार्य किया जा रहा है। सबसे बडी चुनौती इस कार्य को चुनौतीपूर्ण कार्य कर सकने वाले विद्वान अध्येताओं की पहचान करना है। ऐसे युवा अध्येताओं को खोज कर उन्हें इस कार्य के लिये प्रेरित करना हमारा लक्ष्य है। ग्रंथों की तरह ही मंत्रों और विधाओं पर भी कार्य जारी है। उदाहरणार्थ भारत की वैदिक परंपरा को समग्रता से दर्शाने वाले ‘‘वैदिक पोर्टल’’ का कार्य भी केन्द्र द्वारा किया गया है। संगीत के धरोहर को संजोने के लिये डिजिटल दृश्य श्राव्य संग्रहालय का कार्य तेजी से चल रहा है।

सरकारी संस्थानों में परंपरा यह है कि सत्ता व सरकार के इशारे पर चलने का आरोप लगता है, आप इस विषय में क्या विचार रखते हैं कि कला, संस्कृति, भाषा व साहित्य प्रसार के केन्द्रों में क्या राजनीति आग्रह की स्वीकृति होनी चाहिए?

ऐसे संस्थान सरकार की इच्छा शक्ति पर ही चलते हैं इसमें दो मत नहीं। लेकिन उसके आगे का सारा कार्य तो रचना और साधना का है। सरकार का काम सिर्फ संसाधन मुहैया कराना है जो कि संस्थान अपने उद्देश्यों को भलीभांति मूर्त रूप दे सके। इस दृष्टि से कला, संस्कृति, भाषा, साहित्य जैसी किसी भी विधा में राजनैतिक आग्रह अथवा दखल की कोई गुंजाइश ही नहीं है। रचनाकार अपनी रचना के लिये स्वतंत्रा है। वह स्वतंत्रा होगा तभी श्रेष्ठतम कृति की रचना होगी। और कोई भी सरकार ऐसी संस्थाओं को पोषित करती है तो इसलिये नहीं कि उसे राजनैतिक लाभ मिले बल्कि इसलिये कि इससे समाज का उत्कर्ष हो और समाज श्रेष्ठतम कृतियों के निर्माण के लिये प्रेरित हो सके।

कुशाभाऊ ठाकरे पत्राकारिता विश्वविद्यालय में दो कार्यकाल तक कुलपति रहने के साथ ही आप माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में कुल सचिव एवं डीन रहे, प्रशासन का अच्छा अनुभव है और शायद केन्द्र सरकार ने इसी योग्यता व प्रशासनिक क्षमता के चलते आपको यह बडी जिम्मेदारी दी। इस नए दायित्व की प्राप्ति पर क्या अनुभव किया है?

लगभग बाईस वर्ष शीर्ष शैक्षणिक प्रशासन पदों पर रहने के बाद यह अनुभव एकदम नया और चुनौती भरा लगा। कलाकार होना, कला के प्रति अनुराग होना अलग है और इतने महत्वूपूर्ण संस्थान की जिम्मेदारी निभाना अलग है। फिर जो संस्था पच्चीस साल से भी पुरानी हो और जिस पर डॉ. कपिला वात्स्यायन जैसी परम् विदूषी आसीन रही हों उस पद पर बैठना आपको बहुत अधिक जिम्मेदारी का अहसास दिला देता है। मैं इसे अपना भाग्य समझता हूं कि मुझे इस योग्य समझा गया। मैं अपनी पूरी क्षमता के साथ अपने चयन के साथ न्याय करने में लगा हूं।

आज प्रधानमंत्राी प्रत्येक मंच पर देश को युवा देश बताते हैं। सभी जगह युवाओं की चिन्ता है, इन्दिरा गांधी कला राष्ट्रीय केन्द्र युवाओं को ध्यान में रखकर क्या कोई विशेष कार्यक्रम चलाता है अथवा ऐसी कोई योजना है?

इसके पूर्व के प्रश्न के उत्तर में भी नई पीढी को तैयार करने की योजना के बारे में बताया। हम कला से जुडे हर ऐसे तकनीकी क्षेत्रा में युवाओं को तैयार करने की योजना बना रहे हैं जिसका उपयोग आने वाले समय में होना है।
हम अध्येताओं की एक नई पीढी तैयार करने की योजना बना रहे हैं। इसमें युवाओं के लिये नये-नये प्रोजेक्ट तैयार किये हैं। हमने इंटर्नशिप योजना तैयार की है-जिसमें हम 10,000/- महीना तक स्टायपेंड अध्ययनरत विद्यार्थी को दे रहे हैं। साथ ही युवा रचनाकारों को चाहे फिर वो किसी भी कला विधा से जुडे हों को अवसर प्रदान करना भी हमारा संकल्प है।