सरस्वती के प्रवाह के लिए संकल्पित है सरकार

सरस्वती के प्रवाह के लिए संकल्पित है सरकार

मनोहर लाल खट्टर, मुख्यमंत्री, हरियाणा

भारत को यदि हम नदियों का देश कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत में न केवल ढेर सारी नदियां हैं, बल्कि अनेक नदियां पूरे देश के लिए पूज्य और पवित्र मानी जाती हैं। भारत की पहचान मानी जाने वाली गंगा एक नदी ही तो है। इसी प्रकार भारतीय सभ्यता की पहचान सिंधु और सरस्वती नदियों से होती है। सरस्वती नदी का नाम तो मिलता है परंतु धरातल पर इसका प्रवाह काफी पहले लुप्त हो गया। स्वाभाविक सी बात थी कि हरेक भारतीय के मन में सरस्वती को फिर से प्रवाहित देखने की उत्सुकता तो होनी ही है। स्व. विष्णु श्रीधर वाकणकर जैसे कुछेक पुरातत्ववेत्ताओं ने जब सरस्वती नदी के मार्ग का निर्देश किया तो इसके जिज्ञासुओं के मन में खुशी की लहर दौड़ गई। फिर तो ढेर सारे प्रयास हुए और अंतत: आधुनिक विज्ञान और ऐतिहासिक परंपरा के सहयोग से सरस्वती के एक बार फिर से प्रवाहित होने की संभावना बलवती हो गई है। सरस्वती का वर्तमान खोजा गया मार्ग और उद्गम हरियाणा के आदिबद्री में माना जा रहा है। इस विषय को लेकर भारतीय धरोहर ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर से संक्षिप्त बातचीत की। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश:

भारत की प्राचीनतम वैदिक नदी सरस्वती का उद्गम स्थान हरियाणा प्रांत के आदि बद्री नामक स्थान पर प्राप्त हुआ है। हरियाणा के लिए यह गौरव का विषय है। हरियाणा सरकार इस को किस रुप में देखती है?
निसंदेह हरियाणा के लिए यह गौरव का विषय है कि विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता किसी भूमि में सरस्वती नदी के तट पर पनपी थी। यहां पर विश्व के प्राचीन सरस्वती-सिंधु सभ्यता के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं। हम इसे एक विश्व धरोहर के रूप में देख रहे हैं, जिसे विश्व के एक बड़े वर्ग के सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है।

सरस्वती के मार्ग तथा ऐसे ही भारत के अन्य गौरवशाली इतिहास के प्रतीक चिन्हों के विकास के लिए हरियाणा सरकार की क्या योजना है?
हमारी सरकार नए 21 अप्रैल 2015 को यमुनानगर जिले के रोलाहेड़ी गांव से नदी की खुदाई का कार्य शुरू किया और मात्रा 15 दिन के अंदर ही हमें बहुत बड़ी सफलता मिली जिसमें मुग़ल वाली गांव में नदी का पाट देखने को मिला। अक्टूबर 2015 को हरियाणा सरस्वती धरोहर विकास बोर्ड की स्थापना करके सरस्वती नदी परियोजना को सुचारु रुप से चलाने के लिए गठित किया। ताकि नदी क्षेत्रा में जलाश्य वनाकर एवं नदियों को जोड़कर पुराने मार्ग में जल का पुनः प्रवाह किय़ा जा सके। हरियाणा के सभी पुरास्थलों पर अन्वेषण केंद्रों की स्थापना, सभी सरस्वती तीर्थों का विकास एवं सरस्वती धरोहरों को पर्यटन से जोड़ना इस महान उद्देश्य के साथ इस परियोजना को कार्यान्वित करने के लिए कृतसंकल्प है।

एक समय था जब सरस्वती भारतीय वैदिक सभ्यता का स्रोत और मौलिक प्रेरणा रही है। उस सरस्वती का उद्गम क्षेत्रा बनने वाला हरियाणा क्या आज के भारत का प्रेरक बन सकता है? इसके लिए हरियाणा सरकार की क्या प्राथमिकताएं है?
यह वास्तविकता है सरस्वती नदी हमारी वैदिक सभ्यता की द्योतक है। ऐसा माना जाता है कि ऋषियों ने वैदिक साहित्य की रचना इसी नदी के तट पर आकर ही की थी। उसी के फलस्वरूप भारत को विश्व गुरू का दर्जा मिला था। आज भले ही आधुनिकता के दौर में कुछ देश अपने को विकसित देश कहलाने लगे हैं लेकिन विश्व गुरु का दर्जा आज भी भारत के पास ही जस का तस बना हुआ है।हम सरस्वती के सभी वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं और उसे अपनी आने वाली युवी पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि उन्हें प्रेरणा मिल सके।

सरस्वती नदी को आधुनिक इतिहासकार मिथक मानते थे। आज भी बहुत बड़ा वर्ग उसे मिथक ही मानता है। इस धारणा को कैसे बदला गया?
सबसे पहले मुझे तो इस बात की खुशी है कि सरस्वती नदी आज मिथक नहीं रही है, वह एक वास्तविकता बन चुकी है। वर्ष 1985 में जब प्रसिद्ध पुरातत्वविद् वाकणकर जी ने जब आदिबद्री से सरस्वती यात्रा शुरू की थी, उसमें तीन दिन मुझे भी सहभागी होने का अवसर प्राप्त हुआ था। उसके बाद कई वर्षों तक यह जिज्ञासा बनी ही रही कि क्या वास्तव में हम सरस्वती को ढूंढ कर फिर से देख पाएंगे। वर्ष 2003 में जब इसरो के वैज्ञानिकों ने सरस्वती के मार्ग के अस्तित्व पर अपनी मुहर लगा दी, तो पूरे विश्व को इसकी सच्चाई पर विश्वास करना पड़ा। आज हमारे पास सरस्वती के होने के सभी प्रकार के प्रमाण उपलब्ध हैं। चाहे वह जलविज्ञान सम्मत हो या फिर पुरातात्विक हो या साहित्यिक। सर्वे ऑफ इंडिया के प्राचीन मानचित्रों से लेकर गजेटियरों तक के प्रमाण अब सरस्वती के होने की साक्षी दे रहे हैं। मैं इस गौरव का हिस्सा हूँ, इस बात की मुझे खुशी है।
जहां एक और सरस्वती धरोहर हरियाणा का विश्व में एक अनूठा स्थान बना रही है, वहीं दूसरी ओर हरियाणा की बेटियां भी दुनिया में अपना नाम रोशन कर रही है, वह चाहे अंतरिक्ष

वैज्ञानिक के रूप में या खेल के क्षेत्रा में। लेकिन वहीं कुछ समय पहले हरियाणा को कन्या भ्रुण हत्या के लिए जाना जाता था यह व्यापक परिवर्तन कैसे संभव हुआ?
सकारात्मक सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति। माननीय प्रधानमंत्राी जी ने जिस दृढ़ संकल्प से पानीपत से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की मुहिम शुरू की थी, उसको क्रियांवित करने में निस्सन्देह हम सफल हुए हैं। ‘यत्रा नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्रा देवता’ ऐसी हमारी संस्कृति रही है। जहाँ गाय और गीता हमारे दिल में है वहाँ हमारे राज्य की पहचान भी विशिष्ट होनी चाहिए।

आज आधुनिक विज्ञान की विनाशकारी परिणामों को दुनिया पहचानने लगी है। ऐसे में प्राचीन भारतीय ज्ञान विज्ञान परंपरा की सार्थकता उभरकर सामने आने लगी है। भारतीय ज्ञान विज्ञान परंपरा के संरक्षण संवर्धन और विकास के लिए क्या हरियाणा सरकार की कुछ प्रयास कर रही है?
भारत की ज्ञान परंपरा के प्रति हम पूरी तरह सजग हैं। सरस्वती और भगवद्गीता दोनों ही इसका प्रतिनिधित्व करती हैं। ये दोनों ही विज्ञानसम्मत भी हैं। दोनों के विकास के लिए हम दृढ़ संकल्प हैं। पिछले महीने दिसम्बर, 2016 में हमने अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन किया था। इससे पूरी दुनिया में गीता के महत्व का विस्तार हुआ है। इसी प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा के अन्य क्षेत्रों के विकास के लिए भी हम संकल्पित हैं। जहां जैसी आवश्यकता होगी, सरकार पूरा प्रयास और सहयोग करेगी।