तबलीगी जमात के बहाने

सोमदत्त शर्मा
लेखक आकाशवाणी, नई दिल्ली से संबद्ध रहे हैं।


आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में आ चुकी है। चीन, अमेरिका, फ्रांस, इटली और जापान जैसे विकसित देश इस अदृश्य वायरस के सामने लाचार दिख रहे हैं। भारत सरकार की प्रोएक्टिव नीति के कारण भारत में स्थिति कुछ नियंत्रण में दिख रही थी कि दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में तबलीगी जमात मरकज में लॉक डाउन और धारा 144 को धता बताते हुए हजारों लोगों का जमावड़ा होना चौंकाता है। मरकज के केंद्र प्रमुख मौलाना हादी का एक बयान भी उन दिनों मीडिया में वायरल हो रहा था जिसमें मौलाना जमात के लोगों के बीच में यह तकरीर करता दिख रहा था कि कोरोना का डर दिखाकर सोशल डिस्टेंसिंग की बात करके सरकार मुसलमानों को आपस में मिलने से रोकना चाहती है। यह सरकार की एक चाल है। मौलाना कह रहा था कि कोरोना मुसलामानों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता और अगर मरना ही है तो मस्जिद से अच्छी जगह और कौन सी हो सकती है। मस्जिद तो अल्लाह का घर है। मरकज के बारे में मीडिया में और जो जानकारी आ रही है कि इसका सम्बन्ध संपर्क तालिबानी संगठनों और अलकायदा से भी रहा है। कई मामलों में इन संगठनों ने मरकज की मदद भी ली है। ये सारे तथ्य चौंकाने वाले हैं और अमेरिकी राजनैतिक सिद्धान्तकार सैमुअल हंटिंगटन उस भविष्यवाणी की ओर इशारा करते हैं जो उन्होंने अपनी पुस्तक द क्लैश ऑफ सिविलाईजेशन में की थी कि शीत युद्ध के बाद दुनिया में धर्म और संस्कृति सम्बन्धी अस्मिताएं वैश्विक टकराव का मूल कारण बनेंगी।

वस्तुत: यह एक अंतर्राष्ट्रीय विमर्श है जिसके लिए दुनियाभर में शतरंजी चालें चली जा रही हैं। राजनीति और अर्थ के सिद्धांत इस शतरंज के दो प्रमुख मोहरे हैं। विज्ञान की भौतिक और सैद्धांतिक उपलब्धियां इनकी सहयोगी हैं। हमें यह मानना होगा कि वर्तमान में बौद्धिक विमर्श का केंद्र पश्चिमी जगत है। माक्र्सवाद की आर्थिक अवधारणाओं ने कुछ समय के लिए दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था लेकिन पिछली सदी के नब्बे के दशक में रूसी राष्ट्रपति गोर्वाचेव के ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोयका के विचार ने माक्र्सवादी अर्थ सिद्धांत के खोखलेपन को उजागर कर दिया और रूस में ही नहीं तो जहाँ जहाँ भी दुनिया में कम्युनिस्ट सरकारें थीं, उनमें से अधिकांश देशों में सत्ता परिवर्तन होते देखा गया। इसके बावजूद दुनिया के मजदूरों एक हो और जीवन के हर क्षेत्र में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का विचार राजनैतिक क्षेत्रों में रास आने लगा। इसके प्रयोग के लिए बड़ी चतुराई से उन देशों को प्रयोगशाला बनाया गया जिनमें या तो विकास की अपार संभावनाएं थीं या बिलकुल धीमी गति से चलने वाले देश थे और जो बहुत सी चीजों के लिए दुनिया के दूसरे देशों पर आश्रित थे। तीसरी दुनिया के देश इसी वर्ग में आते थे।

भारत भी उनमें से एक देश है जिसके पास भरपूर संसाधन हैं और भरपूर मानव शक्ति है। इतिहास में इसे सोने की चिडिय़ा कहा गया। वैचारिक और दार्शनिक दृष्टि से दुनिया के विचारक इसकी क्षमता का लोहा मानते रहे हैं। संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा जिसका गौरव है। वेद, उपनिषद, पुराण और गीता जैसे महान दार्शनिक ग्रंथों की थाती है। यास्क और पाणिनि जैसे वैयाकरण, पतंजलि जैसे योगाचार्य, आर्यभट्ट जैसे वैज्ञानिक और चरक जैसे औषधाचार्य यहाँ के भूषण हैं। अध्यात्म की आधारशिला पर यहाँ की जिंदगी की इमारत खड़ी की गयी है। दुनिया में प्रचलित आठ बड़े धर्मों और सैकड़ों मत-सम्प्रदायों के बीच समन्वय और सौहाद्र्र के साथ निरंतर रहने वाला हिन्दू समुदाय दुनिया को अचंभित करता है। यहाँ की परिवार व्यवस्था और विवाह जैसे संस्कार को विदेशी लोग आश्चर्य से देखते हैं। तमाम अच्छाइयों और संभावनाओं के बावजूद हमारी विभिन्न कमियों ने उन विदेशी तथा विधर्मी शक्तियों को यहाँ खुलकर खेलने की जमीन तैयार की। लोकतान्त्रिक व्यवस्था ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन तमाम विमर्शों को पैर फैलाने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया और इसी कारण भारत में धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिताओं को अलगाववाद के रूप में उभरने का अवसर मिला। भारत में अब धीरे धीरे इसकी परतें उघडऩे लगी हैं। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श भारत में उसी की देन हैं।

दुनिया के मजदूरों एक हो – का नारा भारत में जब भी आया हो, साहित्यिक क्षेत्र में यह वर्ष 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद प्रविष्ट हुआ। प्रेमचंद इसके पहले अध्यक्ष बने। प्रेमचंद ने स्वयं किसानों और मजदूरों के बारे में लिखा। कहना न होगा कि प्रेमचंद की अगुवाई में लेखकों की एक पूरी पीढ़ी किसानों और मजदूरों को केंद्र में रखकर लेखन में जुटी। इसमें कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक सब शामिल थे। पिछली शताब्दी के छठे दशक में इप्टा की स्थापना के बाद नाट्य क्षेत्र के बलराज साहनी जैसे स्वनामधन्य कलाकार भी जुड़े। हुसैन और रजा जैसे चित्रकार जुड़े। सत्यजित रे जैसे सिने जगत के लोग जुड़े। सब भाषाओं और क्षेत्रों के लोग जुड़े। कारवां चल पड़ा। तत्कालीन सरकारों का साथ मिला। बौद्धिक जगत में गाँधीवादी, समाजवादी और वामपंथी विचारधाराएँ प्रमुखता से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहीं थी। लेकिन वामपंथ ने इन सबमें बढ़त हासिल कर ली। कॉंग्रेस के सहयोग से वामपंथी लेखकों -विचारकों ने उन तमाम संस्थानों पर कब्जा कर लिया जहाँ से बौद्धिक विमर्श संचालित होते हैं। उन्होंने ऐसे तमाम संस्थानों में घुसपैठ कर ली जहाँ बौद्धिक विमर्श की सामग्री और पुस्तकों की खरीद-बिक्री होती रही है। चूंकि पुस्तकें प्रकाशन संस्थानों से प्रकाशित होती हैं, अत: तमाम प्रकाशन संस्थान उन लेखकों की पुस्तकों के प्रकाशन की ओर प्रवृत्त हुए जो वामपंथ से जुड़े थे, और पुस्तकों की संस्थानिक खरीद-बिक्री करने वाली समितियों के सदस्य थे। इस तरह एक खास विचारधारा वाले लेखन और लेखकों ने ऐसी स्थिति बना ली कि आने वाली पीढिय़ों को वही पढऩे को मिला जो इन लेखकों ने चाहा। यू.पी.एस.सी. जैसे सरकारी संस्थानों में घुसपैठ के कारण परीक्षा पत्रों और चयन समितियों में ऐसे लोगों के वर्चस्व के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में ऐसे ही प्रयास सफल हुए। ऐसे सरकारी संस्थानों में घुसपैठ जहाँ नीतियाँ बनती हैं और ऐसे स्वायत्त संस्थान जिन्हें सरकार से मदद मिलती है लेकिन उनका चरित्र स्वायत्त है, ऐसे तमाम संस्थानों पर कब्ज़ा करने के बाद विमर्श का माइक्रो से मैक्रो लेविल पर उतरना लाजिमी था और यही लेबल अब अस्मिताओं के उभार के रूप में सामने आ रहा है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और आदिवासी विमर्श वस्तुत: स्त्री अस्मिता, दलित अस्मिता और आदिवासी अस्मिता को अलग से रेखांकित करना है। देखने वाली बात यह है कि इन अस्मिताओं का स्वरुप उस तरह नहीं उभारा जा रहा है, जिस रूप में बताया जा रहा है। इन अस्मिताओं का अपनी मूल जमीन से कट जाना, अस्मिता विमर्श का अनिवार्य हिस्सा है। इनके नीचे जमीन का वही हिस्सा चर्चा में लाया जा रहा है, जहाँ दलदल है या कीचड़ जमा है। ये विमर्श लोकतंत्र की सैद्धांतिक और मूल्यगत अवधारानाओं के आवरण में लपेटकर प्रस्तुत किये जा रहे हैं। देश का एक बौद्धिक तबका इसकी अगुवाई कर रहा है। ऐसे संस्थान जिन्हें स्वायत्त संस्थान का दजऱ्ा मिला हुआ है ऐसे विमर्शों के लिए मंच प्रदान कर रहे हैं। सरकारें भी जाने अनजाने उन्हें आर्थिक सहयोग प्रदान कर रही हैं। लोकतंत्र को बचाना है और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार तो देश का संविधान भी प्रदान करता है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का स्वरुप कैसे परिभाषित हो, इस पर मुक्तिबोध के शब्दों में ‘देश की संसद मौन है।’

यह विमर्श बौद्धिकता और रचनात्मकता दोनों के साथ परोसा जा रहा है। दोनों इतने प्रखर और प्रभावी हैं कि बरबस ध्यान खींचते हैं। एक ओम प्रकाश बाल्मीकिऔर जय प्रकाश कर्दम जैसे दलित लेखकों और कवियों की जमात खड़ी की जा रही है तो दूसरी तरफ निर्मला पुतुल जैसे आदिवासी कवियों और लेखकों के समूह तैयार किये जा रहे हैं। अनामिका और इनके जैसी अनेक कवि-लेखिकाएं स्त्री विमर्श का परचम लहरा रही हैं। इसकी शुरुआत डॉ. राजेंद्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस के माध्यम से की थी और आज ऐसी अनेक पत्रिकाएँ हैं जो इन विमर्शों को प्रश्रय दे रही हैं। साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में डॉ. नामवर सिंह, डॉ. मैनेजर पांडे, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. गोपी चन्द्र नारंग, डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल जैसे विद्वान आधुनिकतावाद, उत्तर आधुनिकतावाद के बाद अब संरचनावाद, उत्तर संरचनावाद और विरचनावादी पश्चिमी विचार विमर्श को आज भारत मैं साहित्यिक विमर्श के केंद्र में लाने का सफल प्रयास कर चुके हैं।

रचनात्मक प्रस्तुतियों में किस्सागोई जैसी प्राचीन लोक शैली को अपनाया जा रहा है। अहमद फारुकी नए ज़माने के किस्सागो के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं। अहमद फारुकी पिछले पंद्रह सालों से महाभारत के प्रसंगों को किस्से की तरह प्रस्तुत करते आ रहे हैं। जैसे किसी जमाने में आल्हा सुनाई जाती थी और लोग सुनने आते थे। वे आल्हा-ऊदल के शौर्य के सामने नतमस्तक होते थे और वापस लौटते थे तो इस गर्व के साथ कि वह ऐसे देश और समाज का अंग है जहाँ आल्हा -ऊदल जैसे वीर सपूत पैदा हुए। वे लोग किसी बौद्धिक समाज का हिस्सा नहीं होते थे लेकिन जब कभी गाँव घर के बाहर घेर में या रात को अलाव तपते हुए ऐसे चरित्रों की चर्चा होती थी तो बड़े गर्व के साथ होती थी। यह चर्चा घर के बच्चों के सामने भी होती थी। बच्चों का मानस देशऔर देश के वीर सपूतों की गाथाएँ सुन सुन कर संस्कार ग्रहण करता था – भारतीयता का, राष्ट्रीयता का।

लेकिन आज की किस्सागोई तो विमर्श की कोई और ही तस्वीर प्रस्तुत करती है। अहमद फारुकी महाभारत से कर्ण का प्रसंग लेकर अपनी तरह से सुनाते हैं। उसमें दुनियाभर में उपलब्ध महाभारत के अनुवादों में से चुनकर अरबी-फारसी के अनुवादों में से भी सन्दर्भ पाठ लेकर शामिल करते हैं। बड़ी मेहनत की है उन्होंने। उनकी आवाज तो खास नहीं है लेकिन पुराने जमाने के किस्सागोओं से मेल खाती है। प्रस्तुति में आकर्षण है। भाषा बिलकुल बोलचाल की भाषा है लेकिन किस्सा एकदम सधा हुआ और उसके पञ्च मारक हैं और किसी खास मानसिकता और परिस्थिति को उभार कर उसे आधुनिक विमर्श का हिस्सा बना देते हैं। प्रस्तुति के समय उनका लिबास एकदम मध्यकालीन किस्सागो की तरह का। सफेद कुरता-पायजामा। कुरता पूरी बाजू का। पायजामा मुसलमानी। सर पर मुगलिया टोपी। कमर में फैंटा। दाढ़ी एकदम सफाचट ताकि कोई लेबल न लगे। लेकिन आँखों में काज़ल की रेख। मंच पर मुगलिया काल का वातावरण। सामान्य ऊंचाई का मंच। मंच पर गद्दा। गद्दे पर चादर। पीछे मसनद। मंच पर सामने की ओर अलमुनियम के बड़े बड़े कटोरे। कटोरों में किस्सागो के पीने के लिए पानी भरा है। उन दिनों शायद ऐसा ही होता होगा। पानी के कटोरे भरे थे या नहीं दूर से दिखाई नहीं दे रहे थे। लेकिन जिस तरह से अहमद फारुकी किस्सा कहते हुए बीच बीच में पानी पीते थे उससे लग रहा था कि कटोरे ढके हुए नहीं थे।आज के प्रदूषित वातावरण में भी बर्तनों के पानी को ऐसे ही रखा गया।बिना ढंके। यह शायद उस दौर के वातावरण को उभारने के लिए हो या शायद आज के कलाकार की रचनात्मकता का हिस्सा। लेकिन बैक ड्राप बिलकुल आज के जमाने का था। उसमें दायीं तरफ अहमद फारुकी का चित्र बना था उसमें अहमद फारुकी इस तरह हाथ उठाये दिख रहे थे जैसे डॉ. अंबेडकर सभाओं में भाषण करते हुए उठाते थे। ऊपर की ओर उठी हुई दायीं बाजू। मु_ी बंद और पहली उंगली सीधी और आसमान की ओर तानी हुई। बैक ड्राप पर दाहिनी ओर दास्ताने कर्ण -अज महाभारत 7 मंच के सामने दिल्ली का प्रबुद्ध लेखक वर्ग बैठा था उसमें प्रसिद्ध कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक, पाठक सब विराजमान थे। अवसर साहित्य अकादमी पुरस्कार का था, अत: देश के विभिन्न हिस्सों से आये वे साहित्यकार भी थे जिन्हें अकादमी ने पुरस्कृत किया था। पूरा किस्सा लगभग दो घंटे चला। बीच में एक ब्रेक बिलकुल सिनेमा के अंतराल की तरह का। किस्सा पुराना है, कहन भी पुरानी तरह की। लेकिन भाषा और उद्देश्य नया है। एकदम सधा और सटीक।

तो लीजिये साहब ! किस्सा एक दम पुराने ढंग से शुरू होता है। स्तुति के साथ। फिर महाभारत ग्रन्थ की रचना और रचनाकार के बारे में। फिर कुछ और बातों के बाद शुरू होता है किस्सा – दस्ताने -कर्ण -अज -महाभारत। प्रसंग आते जाते हैं। दुर्वासा ऋषि ने कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर उसे एक मंत्र दिया। मंत्र से आवाहन करने पर कुंती के सामने सूर्यदेव प्रकट हुए। उन्होंने कुंती को वरदान दिया। बिना कौमार्य भंग हुए कुंती के कान से उत्पन्न होने के कारण पुत्र का नाम पड़ा – कर्ण। किस्से का पहला पञ्च यही था और बिना एक भी अतिरिक्त शब्द का उपयोग किये श्रोताओं को समझ आ गया कि – कितनी अवैज्ञानिक बात है। भला कान से भी कहीं बच्चे पैदा होते हैं! वो भी कवच-कुंडल के साथ !

सूर्य देव के आशीर्वाद से कुमारी कुंती के कान से पुत्र तो पैदा हो गया लेकिन लोक लाज की मारी कुंती उसे अपने पास न रख सकी। उसने उस निरपराध नवजात शिशु को कवच-कुंडल सहित नदी में बहा दिया। शिशु को नदी से एक सूत ने निकाल लिया और उसी के हाथों उसका पालन पोषण हुआ। सो उच्च कुल-वर्ण तथा राजवंश में पैदा हुआ कर्ण सूत पुत्र कहलाया। और यहीं से कथा उस रूप में आ जाती है जहां आज का भारत दलित विमर्श करता दिखाई दे रहा है। और बता रहा है कि भारत में दलितों के शोषण का इतिहास कितना पुराना है।
इस किस्सागोई में चुनचुन कर ऐसे बिन्दुओं और घटनाओं को उभरा गया है जिससे आज का दलित विमर्श विभाजनकारी बने। दास्ताने-कर्ण दर्शकों तक यह झूठ परोसती है कि इस देश में दलितों के साथ भेदभाव बहुत पहले से आया है, उच्च वर्ण-और उच्च कुल और राजवंशों ने दलितों को उनके अधिकारों से वंचित रखा है। जबकि इतिहास साक्षी है कि इन सभी जातियों में वीर, धीर विज्ञ, संपन्न और समर्थ महापुरुष पैदा होते रहे हैं।

दास्ताने-कर्ण अज-महाभारत तो डेढ़-दो घंटे बाद खत्म हो गयी। दर्शक श्रोता भी अपने-अपने घर चले गये। लेकिन अहमद फारुख जो सन्देश उन तक पहुंचाना चाहते थे, वह उन तक पहुँच भी गया और वह भी एक गंभीर तार्किकता तथा बौद्धिक रचनात्मकता के साथ। इस प्रसंग के मद्देनजर उस समय अगर बहस होती तो कोई न कोई उन्हें यह जरूर बताता कि भाई, यह देश जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर व्यक्तियों का मूल्यांकन करता आया है। ऐसा न होता तो साहित्य के इतिहास में मध्यकालीन संतकाव्य और कवियों को वह स्थान न मिलता जो उन्हें दिया गया है जबकि वे सब ऐसी जातियों से आते हैं जो सामाज में उपेक्षित मानी जाती रहीं हैं। लेकिन उस दौर में भी समाज ने उन्हें पलकों पर बैठा कर रखा। उनकी पूजा की। तुलसीदास जैसे उच्च कुल ब्राहमण भक्त कवि के कहने पर राजरानी मीरा पेशे से चर्मकार संत रविदास के पास दीक्षा लेने गयी थी। यह उस समय के महान संत रैदास के अप्रतिम व्यक्तित्व और कृतित्व का ही परिणाम था कि मीरा बिना संकोच उनकी शरण में पहुँच गयी और दीक्षा भी ली। उस समय अकेले रैदास ही नहीं तो कबीर, दादू, मलूक दास जैसे न जाने कितने महान संत थे जिन्हें समाज ने पलकों पर बैठकर रखा था। लेकिन रावण, श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल, महान विद्वान, शिवभक्त रावण ! अपेक्षया हीन कुल में जन्म लेने वाले राम के दिव्य व्यक्तित्व के सामने हेय माना गया। कृष्ण यादव कुल में जन्म लेकर भी बड़े बड़े श्रेष्ठ ऋषियों -मुनियों द्वारा पूजे गये। लेकिन अहमद फारुकी का उद्देश्य सीमित था और उसमें उन्हें कामयाबी भी मिली।

लेकिन, यहाँ विचारणीय बात यह है कि क्या ये विमर्श सहसा उभरे हैं? नहीं। इनके पीछे एक पूरी पृष्ठभूमि है। यह पृष्ठभूमि बहुत पहले तैयार कर ली गयी थी जिसके अनेक आयाम हैं। समाज, साहित्य, संस्कृति, इतिहास सब इसके दायरे में हैं। राजनीति और व्यवस्था भी जाने अनजाने इस विविध आयामी विमर्श को संरक्षण देती रही हैं। आजादी के बाद से भिन्न भिन्न कारणों से सत्ता पक्ष ने भी इन विमर्शों का अपने पक्ष में इस्तेमाल भी किया है। वोटों का ध्रुवीकरण इनमें सबसे बड़ा कारण रहा है। पूर्व में सत्ता पक्ष यह जानता रहा है कि लोकतंत्र में जितनी अस्मिताएं उभरेंगी उतना ही वोट साधना आसान होगा।

स्त्री विमर्श और आदिवासी विमर्श ऐसे ही सत्ता समीकरण के विमर्श हैं लेकिन अब इन विमर्शों के साथ राष्ट्रविरोधी ताकतों का गठजोड़ सामने आ रहा है। स्त्री विमर्श देश-समाज की आधी आबादी का विमर्श भर नहीं है। यह भारत की परिवार व्यवस्था को ध्वस्त करने का विमर्श है। यह उन तथाकथित बुद्धिजीवी महिलाओं द्वारा संचालित हो रहा है जो परिवार को अपनी आजादी में बाधक मानती हैं। सुप्रसिद्ध कथाकार चित्रा के शब्दों में कहूं तो ये धड़ से नीचे की आजादी का विमर्श अधिक है महिला सशक्तिकरण का कम है । इसी तरह दलित और आदिवासी विमर्श उन देसी समुदायों को संबोधित करता है जिनकी आबादी देश की कुल आबादी का 55 प्रतिशत से ऊपर है। लेकिन यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि लोकतंत्र में सशक्तिकरण को यदि अस्मिता के रूप में लिया जाएगा तो यह एक बार फिर देश के विभाजन की नींव रखने का काम करेगा। देश एकबार वर्ष 1947 में मुस्लिम अस्मिता के उभार और देश के विभाजन का दंश झेल चुका है। एक और विभाजन के लिए माहौल तैयार करने की अनुमति किसी को भी और किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती।
कहने की जरूरत नहीं है कि राष्ट्र का विकास समग्र-चिंतन के द्वारा प्रतिष्ठापित होता है। भारत एक राष्ट्र के तौर पर अपने समग्र चिंतन और सर्व समावेशी जीवन शैली के रस्ते अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम है। समाज जीवन में अस्मिताओं को उभार कर उनके अलग-अलग विकास की बात करना राष्ट्रघाती कदम के अलावा कुछ नहीं है। इसके लिए किसी को भी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।