शिशिर ऋतु चर्या

डॉ. राहुल पाराशर 


शिशिर में कड़ाके की ठंड पड़ती है। वातावरण में सूर्य के अमृत तत्व की प्रधानता रहती है और शाक, फल, वनस्पतियां उस अमृत तत्व से पुष्ट होती हैं। यह ऋतु स्वास्थ्य साधना की ऋतु हैं। इस ऋतु में पौष मास आता है, जो पुष्टि का मास है।

इस ऋतु में दिन छोटे और रातें बड़ी होती हैं, इसलिए शरीर को अधिक समय तक नींद और विश्राम मिलने के अलावा आहार को पचाने का समय भी ज्यादा मिलता है। जिससे पाचन शक्ति और भूख बढ़ जाती है, यही कारण है कि आयुर्वेद के ग्रंन्थों में केवल इसी ऋतु में सुबह का नाश्ता करने के लिए कहा गया है। शीतकाल का खान-पान वर्षभर के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। शीतकाल के तीन-चार मासों में बनाए जाने वाले प्रमुख व्यंजनों में अनेक प्रकार के स्वास्थ्यवर्धक पाक, मेवे, उड़द के बने पदार्थ, दूध, गुड़-मूंगफली, गोंद, मैथी, मगज के लड्डू और सौंठ की मिठाइयां प्रमुख हैं, जो स्वादिष्ट और सुपाच्य होती हैं तो स्वास्थ्य की दृष्टि से दवा का काम करती हैं।

शीत के प्रतिकार हेतु तिल और तेल का उपयोग अति आवश्यक है। तिल-गुड़ से बने पदार्थ स्वास्थ्यकर होते हैं। बादाम की अपेक्षा तिल में छ: गुना से भी अधिक कैल्शियम है, तिल विशेषत: अस्थि, त्वचा, केश व दांतों को मजबूत बनाता है। इसीलिए इस ऋतु में आने वाले व्रत-त्योहार में तिल के सेवन करने के लिए कहा गया है। शिशिर ऋतु में भूख सहना और बासा , ठंडा या रूखा-सूखा आहार लेना हानिकारक होता है। साथ ही साथ देर रात में भोजन करना, देर रात तक जागना, सुबह देर तक सोये रहना या दिन में सोना और व्यायाम न करना इस ऋतु के लाभों से वंचित करने वाले काम है। सर्दीयों में मीठा, नमकीन और खट्टा यथासम्भव कम खायें। अल्कोहल और कैफीन के सेवन से बचें।

  • सामान्य गरम पानी से स्नान करें किंतु उसे सर पर डालने से बचें।
  • देसी चने रात में भिगोकर सुबह खूब चबा-चबा कर खाएं। आंवला और हरड़ का सेवन पाचन शक्ति को बढ़ाने के लिए उपयोगी है।
  • इस ऋतु में धूप का सेवन पीठ की ओर से और आग का सेवन सामने की ओर से करना चाहिए।
  • अस्थमा के रोगी अपने भोजन में काली मिर्च और लौंग जैसे मसालों का प्रयोग करें।

डायबिटीज़ के रोगी को भोजन निश्चित समय पर, दो-तीन घंटे के अन्तराल पर कर लेना चाहिए। अपने को सक्रिय रखें विशेष रूप से सुबह की सैर पर क्योंकि ठंड के कारण आलस्यवश कई बार शारीरिक गतिविधियां बहुत कम हो जाती हैं।  इस मौसम में सर्दी और खांसी होना बड़ी आम बात है। किन्तु खांसी के इलाज के लिए मीठे कफ सिरप योग्य चिकित्सक के परामर्श के बाद ही लें। क्योंकि इस के सेवन से भी ब्लड शुगर बढ़ सकती है। अधिक तली हुई चीजें और कार्बोहाईड्रेट्स जैसे चावल, चीनी और आलू को सेवन कम करें। उनके स्थान पर कम कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ जैसे भुना चना, अकुरित अनाज, सूप व सलाद और हरी पत्तेदार सब्जी का सेवन अधिक करें।

उच्च रक्तचाप के रोगी इस मौसम में खासतौर पर इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उनका पेट साफ रहे। इस ऋतु में भूख खुलकर लगती है, स्वादवश कई बार अधिक खाने के कारण, विशेष रूप से वातज एवं कफज प्रकृति के लोगों का पेट खराब हो जाता है इसलिए अपनी पाचन शक्ति को ध्यान में रखकर ही भोजन करें। कई लोगों का बी.पी. पेट खराब होने के कारण भी बढ़ जाता है। इस ऋतु में वात कुपित रहता है अत: पुराने कब्ज के रोगी अपने भोजन में कम से कम एक चम्मच घी का प्रयोग अवश्य करें ताकि आंतों में चिकनाई बनी रहे। दूध में मुनक्का उबाल कर पीना भी लाभदायक रहता है। उच्च रक्तचाप के रोगी मालिश अवश्य कराए। व्यायाम अवश्य करें, आयुर्वेद में बलार्ध व्यायाम का निर्देश है। मतलब यह है कि थकने के पहले ही व्यायाम रोक देना चाहिए। आटे में अलसी का सेवन 20:1 के अनुपात में करना चाहिए इस से कोलेस्ट्रोल नियन्त्रित रहता है। रात्रि में दूध में हल्दी डालकर पीना और भोजन में अदरक का सेवन भी उपयोगी है। फल, सब्जियां और घर का बना सादा खाना खाए। जंक फूड और बाहर के खाने से बचें। सर को अच्छी तरह से ढ़क कर रखें।