राष्ट्र की सामूहिक चेतना – एक विमर्श

डॉक्टर नितिन अग्रवाल
लेखक विश्व आयुर्वेद परिषद् के राष्ट्रीय सचिव हैं।


जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से अनुरोध किया कि वे 22 मार्च को हमारे आपातकालीन सेवाओं में संलग्न कार्मिकों का समर्थन करने के लिए ताली, थाली और घंटी बजाकर उनका सम्मान करें तथा इसी क्रम में पूरे देश का मनोबल एक साथ बढ़ाने के लिए सभी लोग एक साथ 5 अप्रैल को रात में 9 बजे, 9 मिनटों के लिए घर कि बिजली बंद करके अंधेरे में दीया, मोमबत्तियां, टार्च और मोबाइल कि फ्लैश लाइट जलाएं तो पूरे देश में कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं हुईं। अधिकांश लोगों ने इस कदम का समर्थन किया तो कुछ ने इसे धर्म या अंकशास्त्र से जोड़ दिया, तो कुछ ने इसे तत्वमीमांसा से भी जोड़ा। मोदी जी की इस अपील को अनेकों तर्कवादियों तथा उनके विरोधियों ने या तो खारिज कर दिया अथवा राजनैतिक कारणों से इसका मजाक उड़ाया लेकिन वह मूल रूप से भारत के लोगों को एक संगठित शक्ति के रूप में देश की सामूहिक चेतना को जगाने की अपील कर रहे थे जिससे देशवासी अपने शरीर एवं मन को स्वस्थ रखते हुए कोरोना वायरस महामारी से लड़ सकें।

सामूहिक चेतना साझा विश्वासों और विचारों का एक समूह है जो समाज के भीतर एक एकीकृत बल के रूप में कार्य करता है। सच्चाई यह है कि इस विश्व की पूरी जनसंख्या प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर रही है और इसके परिणाम स्वरूप मानव जीवन समस्याओं से घिर गया है। इससे बाहर निकलने का एकमात्र तरीका चेतना के उच्च स्तर को प्राप्त करना है। मनुष्यों की किसी भी भौतिक और आध्यात्मिक आकांक्षाओं को प्रभावित करने में सामूहिक चेतना के प्रभाव के महत्व को योग वशिष्ठ (अध्याय 6 सेल्फ मेडिटेशन) के समय से वैदिक विज्ञान ने और आज के आधुनिक प्रायोगिक अनुसंधानों ने भी सिद्ध किया है। 1893 में फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम और भावातीत ध्यान (ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन) गुरु महर्षि महेश योगी ने भी सामूहिक चेतना की अवधारणा पर काम किया। महर्षि महेश योगी कहते थे कि जब किसी भी शहर, राष्ट्र या विश्व की जनसंख्या का एक प्रतिशत सुसंगतता में ध्यान करना शुरू कर देगा तो वहाँ की सामूहिक चेतना 99 प्रतिशत लोगों की मानसिकता को सकारात्मकता की ओर बदलने की शक्ति रखती है।

आधुनिक विज्ञान आज की दुनिया में सामूहिक चेतना के अस्तित्व पर भी प्रमाण प्रदान करता है। अमेरिका स्थित ग्लोबल कॉन्शियसनेस प्रोजेक्ट द्वारा 15 वर्षों से अधिक समय तक प्रिंसटन में किये गए प्रयोग इस विचार का समर्थन करते हैं कि सामूहिक चेतना हमारी दुनिया को बदल सकती है। इस परियोजना में मनुष्यों के मन (माइंड) और मैटर के बीच संबंधों पर शोध किया है और इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि सब कुछ गहरे स्तर पर आपस में जुड़ा हुआ है। अगर मनुष्य का मन सिंक्रनाइज़ किए गए सकारात्मक भावनाओं के एक क्रिटिकल मॉस तक पहुंच सकता है तो हमारे पास दुनिया को बदलने का अवसर है।

इन प्रयोगों ने प्रभावी रूप से दिखाया है कि जब किसी घर, शहर, राष्ट्र अथवा विश्व की सामूहिक चेतना सुसंगत हो उसमे समरूपता आ जाती है तो उनमे न कोई छोटा होता है न बड़ा तथा हम में से अधिकांश लोग जब एकसाथ वैचारिक रूपसे अपना ध्यान और इरादा एक लक्ष्य की तरफ आकृष्ट करते हैं तो विश्व में बड़े से बड़े भौतिक परिवर्तन कर सकते हैं। चेतना एक व्यक्तिगत शरीर तक ही सीमित नहीं है, मानव एक गहरे स्तर पर आपस में जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। परिवर्तन किसी वैश्विक या भौतिक घटना से नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना में परिवर्तन के माध्यम से आएगा। चाहे वह युद्ध या शांति के बारे में हो या हमारे पर्यावरण को बचाने या यहां तक कि कोरोना संक्रमण COVID 19 जैसी महामारी को हारने के लिए ही क्यों न हो। इसीलिए जब 100 करोड़ से अधिक भारतीयों ने 5 अप्रैल को एकता की ज्योति जलाई अथवा 22 मार्च को घंटियाँ और बर्तन बजाए, तो उससे जनित राष्ट्र की सामूहिक चेतना में हमारे शरीर और मन को स्वस्थ करने की शक्ति थी। ऐसा नहीं है कि दिया जलने से हमने वायरस को मार दिया अथवा उसे कमजोर कर दिया लेकिन सामूहिक चेतना के जागरण के कारण पूरे देश में लोग सभी नियमों का ईमानदारी से पालन करेंगे, अपने स्वास्थ्य और खान-पान की आदतों का ध्यान रखेंगे और वायरस से लडऩे के लिए अपनी मन:स्थिति को और मजबूत करेंगे। यही सामूहिक इच्छाशक्ति स्वत: इस महामारी को हराने के लिए पर्याप्त है। देश एकबार फिर समन्वित प्रयासों से इस आपातकाल से मुक्त होकर विजय प्राप्त करेगा और कोरोना रूपी महामारी हारेगी।