पुराण परम्परा को समझाती पुस्तक

पुस्तक का नाम – पुराण विमर्श
लेखक – आचार्य बलदेव उपाध्याय, मूल्य – 450 रूपये मात्र,
पृष्ठ – 714, प्रकाशन – चौखंबा विद्या भवन, सीके 27/3-9, बैंक ऑफ बड़ौदा चौक के पीछे, वाराणसी, 0542-2420404, 9839243286


भारत के औपनिवेशिक शासनकाल में पुराणों की एक विशिष्ट-शैली के कारण उन्हें स्थूल-इतिहासग्रंथों की अपेक्षा कुछ कमतर मानकर देखा गया। उसी के चलते भारतीय विद्वानों ने आधुनिक विमर्श के अनुसार ही पुराणों को समझने-समझाने के प्रयास किये। उन सब विद्वत्प्रयासों से पुराणों का रूप और अधिक चमक उठा। पण्डित मदुसूदन ओझा जी का पुराणनिर्माणाधिकरणम और पण्डित गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी का पुराण परिशीलन हो या फिर प्रोफेसर वासुदेवशरण अग्रवाल जी द्वारा अलग-अलग पुराण आधारित सांस्कृतिक अध्ययन। इनके अतिरिक्त और भी बहुत से कार्य अनेकानेक विद्वानों ने किये। इसी क्रम में आचार्य बलदेव उपाध्याय जी ने पुराण विमर्श लिखा।

पुराण विमर्श में पुराणविषयक बहुत से पक्षों पर चर्चा की गयी है। इसमें पुराणों के अवतरण -उनके परिचय – अवतारतत्त्व – वेद तथापुराण के अन्त:संबंध तथा पौराणिक भूगोल पर विस्तारपूर्वक लिखा गया। पं बलदेव उपाध्याय जी के सामने पहले से किये गए संस्कृत कार्यों का एक विस्तृत संसार मौजूद था और अँग्रेजीभाषाई नवीन शोध भी। मेरे विचार से इन दोनों पक्षों पर एक साथ ध्यान देने के कारण यह कार्य रोचक बना। पं बलदेव उपाध्याय जी ने एक और ग्रंथ काशी की पांडित्य परम्परा लिखा है। काशी में हुए कितने ही संस्कृत-विद्वानों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर मानों वह एक पूरा कोश ही है। अत: संस्कृत धारा अपनी पूरी गहनता के साथ उपाध्याय जी के अवचेतन में रही ही होगी और उसके साथ आधुनिककाल की विमर्श भाषा भी जुड़ी। उदाहरणार्थ-पुराणों की कालनिर्णय संबंधी कठिन समस्या को उन्होंने अपने ही ढंग से विवेचित किया है।

संबंधित अध्याय के आरम्भ में ही वे इस बात का संकेत करते हैं कि परम्परागत मान्यतानुसार व्यासजी ने ही सब पुराणों का प्रणयन किया। सो वो भी एक ही समय में। लेकिन बात उतनी सरल है नहीं। पिछले सैंकड़ों वर्षों में पुराणों में जो परिवत्र्तन हुए या जो अंश दूसरे भारतीय ग्रंथों से प्रभावित रहे और अन्य कितने की कारकों की मदद से पुराणों का एक क्रम आधुनिक वैज्ञानिक रीति के साथ चलकर बनाया जा सकता है। यह सब इस ढंग से होता है कि परम्पराभाव को कोई आघात भी नहीं लगता।

उपाध्यायजी आधुनिक काल की समस्याओं को भी अनदेखा नहीं करते। एक जगह पौराणिक वंशवृत्त संबंधी अध्याय में वे महाभारत के उद्योगपर्व के एक श्लोक द्वारा व्यासजी को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि – जो नेता अपने हाथों से कृषि नहीं करता – खेत नहीं जोतता उसे नेता बनकर राष्ट्र की समिति में जाने का तनिक भी अधिकार नहीं है। न न: स समितिं गच्छेत यश्च नो निर्वपेत कृषिम [उद्योग 36.31 ]

बलदेव जी का यह संकेत भी ध्यातव्य है कि जो सूत्र बीज रूप से वेद में थे, वही पुराण में देशकाल की आवश्यकतानुसार पल्लवित हुए। मसलन यदि पुराणों में भक्ति का विवेचन है तो ऐसा नहीं है कि वह वेद में था ही नहीं ! कठ-केन उपनिषदों में उपासना संबंधी सूत्र मौजूद थे ही। तो एक ढंग से कहा जा सकता है कि वेद और पुराण एक वाइण्ड मूवमेंट जैसे हैं – एक संयुक्त गति ! और ये ऐसे ही नहीं कहा जाता रहा कि वेद को पुराण के सहारे समझा जाए। इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत यानी इतिहास-पुराण के सहारे ही वेदार्थ को समझने का कोई प्रयास हो। बल्कि एक दो जगह तो ये भी आया कि पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम ! अर्थात शास्त्रों में सबसे पहले ब्रह्मा ने पुराण का स्मरण किया।
इन सारे संकेत-सूत्रों को ज्यों-का त्यों स्थूल ढंग से ग्रहण करना उपाध्याय जी के कार्य की गहराई से हमें परिचित न होने देगा। उनका कार्य संश्लिष्ट है और पुराण की काव्यात्मकता हमें खुद ये संकेत देती है कि कूट-प्रतीकों को यदि कोई फेस वैल्यू पर ग्रहण करे तो अधिक गहरी परतों को वह चूक जाएगा। उपाध्याय जी का कार्य देखने के बाद भारतीय पुराण परम्परा को समझने की उत्सुकता-जिज्ञासा अधिक तीव्र होती है। भविष्य में आशा है कोई ऐसा कार्य भी आये कि हमारे अ_ारह पुराणों के साथ-साथ जैन पुराणशैली को भी हम साथ देखकर रख पाएं। चौबीस अवतार और चौबीस तीर्थंकर मिलकर एक बृहत्तर आख्यान की रचना करें।

अमन दीप वशिष्ठ