कक्षा-शिक्षण बनाम ऑनलाइन शिक्षण

प्रो. रसाल सिंह
लेखक जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष हैं।


वर्तमान समय में कोरोना संक्रमण ने पूरी दुनिया में कहर बरपाया हुआ है। करोड़ों लोग इससे संक्रमित हुए हैं और लाखों की जान जा चुकी है। कोरोना विषाणु ने विश्व के साथ-साथ भारत देश की भी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है। इसी के साथ बच्चों के दैनंदिन जीवन और शिक्षण को प्रभावित करते हुए उनके भविष्य को चुनौतीपूर्ण बना डाला है। सरकार देश के भविष्य के विषय में कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है। अत: कोरोना महामारी के फैलाव को रोकने के लिए लॉकडाउन से पहले ही देश के सभी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को अगले आदेश तक के लिए बन्द कर दिया गया था। ज्ञान-प्रवाह और शिक्षण-प्रशिक्षण को अबाध जारी रखने के लिए ऑनलाइन शिक्षण के विकल्प को लागू किया गया। इस विकट परिस्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने जूम ऐप, गूगल क्लासरूम, माइक्रोसॉफ्ट, वेबेक्स, आदि के अलावा विभिन्न प्रकार के माध्यमों यथा, टेलीविजन, रेडियो, यूट्यूब, व्हाट्सऐप, ईमेल आदि को भी ऑनलाइन शिक्षण के लिए प्रयोग किया जा रहा है।

शास्त्रों में कहा है, ‘जन्मना जायते शूद्र:’ अर्थात् मनुष्य जन्म से अज्ञानी पैदा होता है। उसको प्रत्येक चीज सीखनी पड़ती है। यह सीखना ही शिक्षण, प्रशिक्षण अथवा ज्ञानार्जन है। शिक्षण अथवा ज्ञानार्जन वह किसी न किसी गुरू के सान्निध्य में माध्यम विशेष से ही करता है। ज्ञान नैमित्तिक होता है अर्थात् मनुष्य को कुछ सीखने के लिए किसी न किसी निमित्त की आवश्यकता होती है। वैदिक काल से लेकर आज तक शिक्षण के इन निमित्तों में अनेक प्रकार के परिवर्तन आए हैं।

वैदिक कालीन श्रुति परंपरा से लेकर उत्तर आधुनिककालीन स्क्रीन परंपरा तक शिक्षण की अनेक अधुनातन और वैविध्यपूर्ण प्रविधियां समय-समय पर अस्तित्व में आती रही हैं। उत्तरोत्तर परिवर्तित और विकसित शिक्षण प्रविधि मनुष्य मस्तिष्क की एकाग्रता की न्यूनता की बोधक है, क्योंकि जिस ज्ञान को मनुष्य मात्र श्रवण से अर्जित कर लेता था, उसको सीखने के लिए आज उसे अनेक तकनीकी माध्यमों की आवश्यकता हो गई है। इक्कीसवीं सदी में जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों की तरह शिक्षा क्षेत्र में भी सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का अत्यधिक प्रवेश और प्रभाव हुआ है। प्राचीन गुरुकुलों तथा विद्याश्रमों की वाचिक परंपरा के बाद श्यामपट, कलम-दवात और टाट-पट्टी के दौर से गुजरते हुए शिक्षा आज नवयुगीन तकनीकी साधनों तथा युक्तियों से सुसज्जित होती जा रही है। आधुनिक शिक्षण प्रविधियों की तकनीक-निर्भरता अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक है। आज साधारण श्यामपट की जगह स्मार्टबोर्ड, स्लाइड प्रोजेक्टर तथा एलसीडी प्रोजेक्टर ने ले ली है। विविध प्रकार के मार्कर पेन ने खडिय़ा (चॉक) का तथा इंगित करने के लिये प्रयोग में आने वाली स्टिक का स्थान लेजर पॉइंटर ने ले लिया है। ये सब संसाधन अब हर कक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बनते जा रहे हैं।

ई-कॉमर्स, ई-बैंकिंग, ई-शॉपिंग, ई-कनेक्ट आदि के उपरांत अब कोविड-19 महामारी के कारण हम ज्ञानार्जन के लिए भी ई-लर्निंग अथवा ई-शिक्षा को भविष्य के मार्ग के रूप में देख रहे हैं। सभी प्रकार की ई-शिक्षा (चाहे वह शिक्षण-संस्थान द्वारा हो, व्यावसायिक प्रशिक्षण का हिस्सा हो या दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रम के रूप में हो) में इलेक्ट्रॉनिक, इंटरनेट व अन्य संचार समर्थित उपकरणों का बहुविध और बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। वेब आधारित शिक्षा, कंप्यूटर-आधारित शिक्षा, आभासी कक्षाएं और अन्य डिजिटल माध्यम इसके विविध रूप हैं जो स्वाभाविक तौर पर क्रियात्मक होते हैं। इनका उद्देश्य शिक्षक तथा शिक्षार्थी के व्यक्तिगत अनुभव, अभ्यास एवं ज्ञान का संवर्धन करना, पाठ की गुणवत्ता बढ़ाना, सीखने के प्रति रुचि पैदा करना, मूल्यांकन तथा प्रतिक्रिया के प्रति निष्पक्षता को बनाए रखना है। पाठ्य-सामग्री को इन्टरनेट, इंट्रानेट, एक्सट्रानेट, कृत्रिम उपग्रह प्रसारण, ऑडियो/विडियो, इंटरैक्टिव टेलीविजन, सी-डी इत्यादि के माध्यम से लिखित, मौखिक, श्रव्य, दृश्य, एनीमेशन आदि के रूप में अध्येता तक पहुँचाया जाता है।

ई-शिक्षा व्यवस्था में हम घर बैठे कम समय में एक साथ कई विषयों का ज्ञान ले सकते हैं। इस व्यवस्था में दुनिया के किसी भी हिस्से में संचालित पाठ्यक्रम को किसी भी विख्यात शैक्षणिक संस्थान से किया जा सकता है। ऑनलाइन पाठ्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जो शिक्षार्थी किसी कारणवश अथवा असमर्थतावश नियत समय तथा स्थान पर जा कर शिक्षण/अधिगम में भाग नहीं ले सकते हैं, उनके लिए कक्षा और प्रशिक्षक (सैद्धांतिक रूप से) सप्ताह में सातों दिन और 24 घंटे उपलब्ध हैं। ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से हम देश ही नहीं बल्कि विदेश में दी जाने वाली उपयोगी शिक्षा को भी ग्रहण कर सकते हैं, कभी भी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं, नोट्स का उपयोग कर सकते हैं, असाइनमेंट की समीक्षा कर सकते हैं, अभ्यास प्रश्न-शाृंखला ले सकते हैं, प्रश्नों पर चर्चा कर सकते हैं, साथी छात्रों के साथ वार्ता कर सकते हैं, अपनी गति से काम कर सकते हैं, उपयोगी अध्ययन सामग्री संकलित कर सकते हैं, और किसी भी समय अध्ययन कर सकते हैं। यह शिक्षण पद्धति न केवल एक तात्कालिक सीखने की सुविधा प्रदान करती है, बल्कि गतिविधियों और परीक्षाओं के परिणामों को देखने की संभावना/सुविधा भी प्रदान करती है। इसके माध्यम से किया गया मूल्यांकन पूर्णतया निष्पक्ष और पारदर्शी होता है ।

ऑनलाइन शिक्षा कंप्यूटर-आधारित अनुकूली परीक्षण प्रदान करती है तथा वैकल्पिक शिक्षा और विचारों को बढ़ावा देती है। यह शिक्षण-माध्यम छात्रों, शिक्षकों, माता-पिता, पूर्व छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, संस्थानों और सांख्यिकीय प्रतिक्रिया द्वारा निरंतर सुधार करते हुए बौद्धिक विकास में सहयोग करता है। प्रभावी ऑनलाइन शिक्षण वातावरण छात्रों को समीक्षा के उच्च स्तर की ओर अग्रसर करता है। छात्र की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देता है और व्यक्तिगत मतभेदों को समायोजित करता है। ऑनलाइन शिक्षा छात्रों, शिक्षकों, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को मापने, श्रेणीकरण करने तथा छात्रों के सर्वांगीण विकास को पुरस्कृत करने के लिए एक सतत ग्रेडिंग प्रणाली प्रदान करती है। इससे कक्षा के अतिरिक्त शिक्षण की अन्य गतिविधियों- संगोष्ठी, कार्यशाला, राष्ट्रीय तथा अंतर-राष्ट्रीय सम्मलेन आदि के आयोजन को अत्यंत उपयोगी, उत्पादक और मितव्ययी बनाया जा सकता है। जो जहां है, वहीं से इन गतिविधियों में भाग ले सकता है, जिससे आने-जाने में व्यय होने वाले समय और धन को बचाया जा सकता है। ईंधन और परिवहन के प्रयोग को सीमित किया जा सकता है और प्रदूषण को कम करके पर्यावरण को भी संरक्षित किया जा सकता है। ऑनलाइन शिक्षण से बिना किसी भेद-भाव के दूर-दराज के क्षेत्रों तक ज्ञान पहुँच सकता है। मनुष्य के इतिहास में किसी भी तकनीकी आविष्कार ने दुनिया के लोगों को इंटरनेट की तरह नहीं जोड़ा है। इंटरनेट ने एक विशेष अर्थ में विश्वग्राम अथवा वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को संभव किया है। इसके माध्यम से पूरा विश्व एक मंच पर आकर परस्पर जुड़ गया है। सभी देशों की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, भाषा, वेश-भूषा, खान-पान,पर्यटन तथा तीर्थस्थल आदि सभी सूचनाओं का अबाध आदान-प्रदान किया जा सकता है। किसी दूर-दराज की प्रतिभा से पूरा विश्व परिचित हो सकता है।

परन्तु शिक्षा केवल एक ऐसी तकनीकी-मशीनी संक्रिया मात्र नहीं, जिसका कि उद्देश्य विद्यार्थियों को शिक्षण-सामग्री अथवा सूचनाएं उपलब्ध करवा देने तक सीमित हो; बल्कि यह एक सतत् और अन्तरसंवादी प्रक्रिया है। प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने मात्र से शिक्षण और अधिगम प्रक्रिया संभव नहीं हो सकती। शिक्षण एवं ज्ञानार्जन, एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बहुत से कारक शामिल होते हैं और सीखने वाला उन सभी कारकों के गुण, धर्म, अनुभव सारग्रहण करके नए ज्ञान, संस्कार और कौशल का आत्मसातीकरण करता है। उन्हें अपने व्यक्तित्व में समाहित करके जीवन-लक्ष्य की ओर बढ़ता है। कहा भी गया है कि आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्य: स्वमेधया । पादं सब्रह्मचारिभ्य: पादं कालक्रमेण च।। अर्थात् विद्यार्थी अपना एक-चौथाई ज्ञान अपने गुरु से प्राप्त करता है, एक चौथाई अपनी बुद्धि से प्राप्त करता है, एक-चौथाई अपने सहपाठियों से और एक-चौथाई समय के साथ (कालक्रम से, अनुभव से) प्राप्त करता है। अत: शिक्षण-प्रक्रिया में अवैयक्तिक कारकों से सीखने का दुष्परिणाम अवैयक्तिक अनुभव के रूप में, अथवा जड़ता के रूप में ही सामने आता है। यह माध्यम जितना प्रकृति से स्वयं दूर है, उतना ही सीखने वाले को भी प्रकृति से दूर लेकर जाता है।

कक्षा में शिक्षक का एक नैतिक अनुशासन तथा नियंत्रण होता है। कक्षा के भौतिक, सामाजिक एवं भावनात्मक परिवेश का विद्यार्थियों की पढ़ाई तथा जीवन पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है। आज सामाजिक जीवन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या ऑनलाइन शिक्षा कक्षा शिक्षा का विकल्प बन सकती है? यही नहीं, क्या यह भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक परिवेश के अनुकूल है? क्या इसमें समाज के निर्धन और वंचित वर्गों की समान भागीदारी संभव है? क्या इसके माध्यम से हम अपनी भाषा, संस्कृति, प्राचीन इतिहास तथा राष्ट्रीय अस्मिता का संरक्षण कर सकते हैं? क्या शिक्षार्थियों में एकता-अखंडता, सामूहिकता और भारतीयता की भावना को विकसित कर सकेंगे? क्या इस माध्यम से मनुष्य का सर्वांगीण विकास संभव है? एक छोटी-सी स्क्रीन पर इंटरनेट से वीडियो देख-देख कर पढऩा उपरोक्त प्रयोजनों की सिद्धि में कितना सहायक है? ये सब सवाल आज ‘यक्ष प्रश्न’ बनकर पूरे समाज के सामने खड़े हैं।

भारत जैसे विकासशील देश में जहां आधारभूत संसाधनों की भारी कमी है। एक बहुत बड़े वर्ग की इंटरनेट तथा कंप्यूटर तक पहुंच नहीं है; वहां ई-शिक्षा एक नाटक बन कर रह जाती है, क्योंकि सभी के पास न ही कंप्यूटर है और न ही अच्छी गति वाले इंटरनेट की व्यवस्था और न ही इन उपकरणों का प्रयोग करने के लिए आवश्यक बिजली और एकांत स्थान की व्यवस्था है। इनके अभाव में यह शिक्षा दुर्लभ और दुर्लक्ष्य हो जाती है। साथ ही घर से कार्य करने, ई-शिक्षा तथा अन्य काम ऑनलाइन होने से मौजूदा कनेक्टिविटी तथा इंटरनेट की वर्तमान संरचना पर बहुत दबाव बढ़ा है । परिणामस्वरूप इंटरनेट की स्पीड में कमी देखी गई है। ऐसे में समय की बर्बादी, शिक्षण की गुणवत्ता तथा दक्षता में गिरावट स्वाभाविक है।

कक्षा में बच्चों को संस्कार तथा जीवन मूल्य भी सिखाये जाते हैं , जोकि ऑनलाइन संभव नहीं है। यह एक पक्षीय व्यवस्था है जिसमें वार्तालाप और संवाद की बहुत ही सीमित गुंजाइश और संभावना है। इससे शिक्षार्थी की समझ तथा बौद्धिक विकास प्रभावित होता है। ऑनलाइन शिक्षण कुछ हद तक पेचीदा और अवैयक्तिक अनुभव के रूप में सामने आता है। इसके अलावा, ई-लर्निंग के लिए घर पर अनुकूल वातावरण न होना, छात्र का घर पर गेम तथा सोशल मीडिया से विचलित होना, एकाग्रचित्त न हो पाना,समझ न आना, कक्षा का वातावरण न होना, एकपक्षीय संवाद, अधूरा ज्ञान, मूल्य रहित शिक्षा आदि अनेक चुनौतियाँ हैं। सबसे गहन और विचारणीय चुनौती यह है कि अध्यापक विद्यार्थी के बौद्धिक स्तर के अनुसार ज्ञान नहीं दे सकता, क्योंकि अध्यापक अपने पाठ या तो रिकॉर्ड करके भेजेगा अथवा चुने गये प्लेटफॉर्म के द्वारा सीधी कक्षाएं लेगा जो सभी के लिए एक समान होंगी जबकि सब विद्यार्थियों का बौद्धिक स्तर एक समान नहीं होता। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच मात्र यांत्रिक सम्बन्ध होने से विद्यार्थी कितना ग्रहण कर रहा है और जो वह सुन पा रहा है क्या वह सही है, यह जानने के लिए भी अध्यापक के पास सीमित स्रोत हैं। अध्यापक तथा ज्ञान की अनन्तता तथा स्वतंत्रता यंत्र के अधीन हो जाती है।

तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा, शिक्षक और शिष्य के आदर्श सम्बन्धों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि – आचार्य: पूर्वरूपम्। अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या संधि:। अर्थात् आचार्य पूर्व रूप, शिष्य उनका उत्तर रूप और शिक्षा उनका सेतु है। किसी भी देश का असली प्राण-दाता शिक्षक ही होता है, क्योंकि राष्ट्र के भावी कर्णधार उसके ही सानिध्य में पुष्पित और पल्लवित होते हैं। गुरु-शिष्य की यह परम्परा भारतीय संस्कृति की पवित्रतम परंपरा है जिसका अधिकतम व्यवसायीकरण अब तक हो चुका है। दुर्भाग्य से ई-लर्निंग में इस पवित्र परंपरा का पूर्ण अभाव है तथा व्यवसायीकरण की असीम संभावनाएं हैं। कुछ कंपनियां जो इस बनती हुई शिक्षण-व्यवस्था से आर्थिक लाभ ले रही हैं, इसका अवास्तविक प्रदर्शन और प्रचार करते हुए इसे व्यापक प्रोत्साहन दे रही हैं। लेकिन शिक्षा के वास्तविक उद्देश्यों की दृष्टि से इस व्यवस्था की सक्षमता संदिग्ध है।

आज के आपातकालीन समय में डिजिटल शिक्षा जरूरी तो है, लेकिन इसका उपयोग एक निश्चित सीमा तक और किसी की देख-रेख में ही होना चाहिए। जिससे इस तकनीक का छात्रों को पूरा लाभ मिले, वहीं उनका मानसिक, शारीरिक और चारित्रिक विकास भी बाधित न हो। हमें इस बात को भलीभांति समझ लेना चाहिए कि यह एक वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली नहीं बल्कि केवल अनुपूरक प्रणाली ही हो सकती है। यह मूल व्यवस्था नहीं, सहायक व्यवस्था ही है। भविष्य में इसका पूर्ण प्रयोग नहीं आनुषंगिक प्रयोग ही श्रेयस्कर होगा। स्थितियां सामान्य होने पर 25-30 प्रतिशत पाठ्यक्रम तथा 70-75 प्रतिशत सेमिनार, सम्मेलन या बैठक आदि अकादमिक गतिविधियों को ऑनलाइन करके समय, पर्यावरण तथा संसाधनों को बचाया जा सकता है। इसके लिए नवीन शिक्षण-प्रविधियों का विकास, शिक्षकों के उसके अनुकूल प्रशिक्षण की व्यवस्था तथा छात्रों को भी समान स्तर पर आवश्यक संसाधनों और ढांचागत सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करानी होगी। ऑनलाइन शिक्षण असीम और अबाध न हो, उसकी एक निर्धारित सीमा होनी चाहिए अन्यथा शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षा तीनों ही का भविष्य संकटग्रस्त हो जायेगा । इन तीनों के संकटग्रस्त होने के बाद भला किसी भी राष्ट्र अथवा समाज का क्या भविष्य होगा!