माता पिता और हम

जवाहरलाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


मातृ ओर पितृ को देवता मानने का आदेश देने वाला शास्त्र केवल औपचारिकता का ही निर्वाह करने को नहीं कहता। वह इसे अपने धर्म और कर्म का अभिन्न अंग बनाने को कहता है। माता पिता की सेवा करने और उनकी आज्ञा का पालन करने के अनेक प्रसंग हमारे इतिहास में मिलते हैं। यह इसलिए है कि हमने परिवार को एक सामाजिक इकाई माना है। समाज परिवार की ही इकाइयों से ही बनता है। यदि हम परिवार में एक व्यवस्था बना पाएंगे, तभी समाज में भी व्यवस्था बनेगी। माता-पिता की आवश्यकता तो आदि मानव को भी रही होगी क्योंकि बच्चों के शैशव काल में माता पिता के सहारे के बिना रहना, जीवनयापन संभव ही नहीं हो सकता था। लेकिन जो तब एक भौतिक आवश्यकता थी, वही एक दायित्व बन गया। मनुष्य के कर्म का विस्तार हो रहा था और उसी के साथ उसकी बुद्धि का भी दायरा बड़ा होता जा रहा था ओर वह पशुवत् जीवन से आगे निकल कर सामाजिक प्राणी बन गया था। मानव अब केवल अपने ही छोटे से परिवार के ही बारे में नहीं सोचता था, उसकी चिंता के दायरे में अब पूरा गांव था, जो कालांतर में एक देश का रूप लेने लगा था। माता और पिता, जो आदिम काल में केवल एक भौतिक आवश्यकता भर थी अब कर्तव्य बन गया। माता शब्द में अनेक माताओं के गुण समाहित होने लगे। गाय भी माता थी क्योंकि वह दूध देती थी। धरती माता थी, जो अन्न, फल, मूल, औषधि आदि उपलब्ध कराती थी। इन दोनों की विशेषताएं मानव को परिवार की माता में भी दिखने लगीं। वह शिशु अवस्था में अपनी छाती का दूध पिलाती है। धरती की तरह वह सलिला है और सहनशील तथा धैर्यवती है। अपने इन गुणों के करण वह देवी समतुल्य है।

भारतीय संस्कृति में जब हम सर्वमातृपितृभ्यो कह कर के नमन करते हैं, तो हम केवल अपने मां-बाप को ही नमन नहीं करते, अपने परिवार में, अपने कुल में, अपने समाज या राष्टृ में सभी माता-पिता को नमन कर रहे होते हैं। भारतीय सभ्यता के विकास के साथ ही मातृ पितृ शब्द केवल साधारण शब्द नहीं रहे एक सांस्कृतिक धारणा बन गई। हमने पूरी प्रकृति के ही रूपों को माता का रूप माना, उन सबको हमने मां कहना आरम्भ किया जिसमें मां जैसे गुण दिखाई दिए। सौम्य, सरल, क्षमाशील, सहनशील, दात्री, वत्सल और रक्षक। जब प्राचीन द्रष्टा सरस्वती का गुणगान करते तो वे उसके भी मातृत्व को नहीं भूलते थे, मातातमा, नदीतमा सरस्वती यानी श्रेष्ठ माता और श्रेष्ठ नदी सरस्वती। वास्तव में पश्चिमी सभ्यता में पितृ को ही महत्वपूर्ण माना जाता है, वे राष्ट्रभक्ति को भी पिता से ही जोड़ते हैं। पैटरियाटिज्म शब्द का सम्बंध ही पैटर यानी पिता से है। हम माता और पिता के बीच एक संतुलन को ही महत्व देते हैं। पालक, रक्षक, ज्ञानदाता, कुल को पहचान देनेवाला यानी पिता और संस्कारित करने वाली, क्षमा और सहनशीलता सिखाने वाली, सौंदर्य और लालित्य का बौध कराने वाली यानी माता। इन दो आधार स्तम्भों पर हमारी संस्कृति टिकी है। इसिलिए पश्चिम और पश्चिम से उपजी सभी सभ्यताएं विजय, युद्ध और प्रतिशोध पर फलती फूलती रहीं हैं, वे किसी भी ऐसे दर्शन को विकसित नहीं कर पाई जो दमन और असहिष्णुता को बढ़ावा न देती हो।

माता पिता की सांस्कृतिक धारणाओं को सुरक्षित तो तभी रखा जा सकता है, जब हम अपने परिवार में उनका प्रतिनिधित्व करने वाले माता पिता को वह सम्मान दें जिसके वे अधिकारी हैं। यह सही है कि समय बदल गया है, वातावरण में बदलाव आया है। लेकिन परिवर्तन की लहरों पर तैर कर आगे जाना ही प्रगति है, लहरों की मनमर्जी पर लुढकना नहीं। हमें यह भी जान लेना होगा कि माता पिता ही परिवार का आधार हें, उनके न रहने या तिरस्कृत होने से परिवार का बिखरना सुनिश्चित है। अगर परिवार नहीं रहेंगे तो समाज भी देर-सवेर बिखर ही जाएगा। पश्चिमी समाज पर एक दृष्टि डालें तो साफ होगा कि ऐसे समाज की इकाई परिवार नहीं होता, केवल एक व्यक्ति होता है। जब व्यक्ति ही समाज की इकाई है तो नैतिक आचरण कैसे टिक सकेंगे? नैतिक मान्यताएं तो परिवार से ही जुड़ी होती हैं, परिवार के बिना उनका न तो औचित्य बचा रहेगा और न ही उन्हें लागू किया जा सकता है।

आज हमारे युवकों को पश्चिम बहुत आकर्षक लगता है। अमेरिका आज दुनिया को अपना बाजार मान कर भौतिक सम्पन्नता के शिकर पर जी रहा है, लेकिन वे दिन दूर नहीं हैं जब विश्व में और भी बड़े बाजार बनेगे। चीन बन ही चुका है, यूरोप भी वहां पहुंचने को है और भारत भी बहुत पीछे नहीं है। तब यह सम्पन्नता नहीं रह पाएगी। तब कथित लोकतंत्र का बिखरना भी तय है। आधुनिक सभ्यता कहलाने वाली सभ्यता वहीं पहुंच जाएगी जहां से ग्रीक और रोमन सभ्यताओं के पतन का दौर आरंभ हो गया था। इसिलए माता पिता का सम्मान उन पर किसी प्रकार की दया नहीं, यह सामाजिक ढांचे को सुरक्षित रखने, नैतिक मूल्यों को बचाने और विश्व को आयुधजीवी संघों में बदलने से रोकने की प्राथमिक शर्त है।