भारतवर्ष का सच्च इतिहास

पुस्तक का नाम – द्रष्टव्य जगत का यथार्थ, दो भाग
लेखक – डॉ. ओमप्रकाश पांडेय, मूल्य – 500 रूपये मात्र
प्रकाशन – प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड,
नई दिल्ली, 011-23289555. 23289666, 7827007777


आखिर प्रकृति में द्रष्टव्य क्या है। इसका अध्ययन कैसे किया जाए और आधुनिक विज्ञान, प्राचीन विज्ञान अर्थात् दर्शन और अध्यात्म में संबंध को कैसे विष्लेषित किया जाए। इसके बारे में हमारी सामान्य जानकारी ही हमारा विज्ञान और अध्यात्म है लेकिन इसका यथार्थ् कुछ और है। भारत में ऋग्वेद से ही सर्वमान्य और सर्वविदित है कि हमारी पृथ्वी सौरमंडल का एक ग्रह है और वह अपनी धुरी पर चार मिनट प्रति अंश की गति से घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा करती हैं। वहीं ज्योतिष गणना के आधार पर हमें यह भी पता था कि सौरमंडल का कौन सा ग्रह कितनी दूरी और एक दूसरे से किस कोण पर स्थित है। यही सब कुछ हमें अध्यात्म और विज्ञान के माध्यम से जानकारी देती है इसरो के पूर्व वैज्ञानिक और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और अटलबिहारी वाजपेयी के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. ओम प्रकाश पाण्डेय की पुस्तक ‘द्रष्टव्य जगत् का यथार्थ’। पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कालगणना और ब्रह्माण्ड के रहस्यों से अवगत कराती है, वहीं इसका दार्शनिक और अध्यात्मिक पक्ष भी स्पष्ट करती है।

डॉ. पाण्डेय बताते हैं कि दूरी मापने की सबसे बड़ी इकाई अब तक प्रकाशवर्ष (सूर्य किरण द्वारा एक वर्ष में तय की गई) और तीव्रतम गति प्रकाष की गति मानी गई है, लेकिन अब उससे तीन सौ गुना अधिक तेज चलनेवाली इकाई ‘लाइट पल्स’ यानी ‘प्रकाश-तरंग गति’ का पता लगाया गया है। इसका पता जुलाई 2000 में न्यूजर्सी के लिजन वांग नामक अनुसंधानकर्ता ने लगाया है। इस खोज से जो दूरी ‘प्रकाशवर्ष’ में पढ़ी और समझी जाती थी, अब वह ‘प्रकाश तरंग गति’ से कुछ घंटों में आकर सिमट गई है। इस प्रकार के रहस्य को पुस्तक में हमारी पारंपरिक और अत्याधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान-संपदा के आधार पर विष्लेषित किए गए हैं। इस तरह इस पुस्तक के माध्यम से हम ‘द्रष्टव्य जगत् का यथार्थ’ समझ सकने में सक्षम हो सकते हैं। हमारा वैज्ञानिक और अध्यात्मिक ज्ञान पाश्चात्य शिक्षण विधा ने इतना विदीर्ण कर दिया है कि उसको किसी एक जगह संचित करना महती आवश्यकता है। इसके बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना भ्रमित ज्ञान का अर्जन करना होगा। ऋग्वेद के सुक्त ‘एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ मात्र दार्शन और तत्व चिंतन के रहस्यों को नहीं, सृष्टि, ब्रह्मांड, जैविक-प्रस्फुटन, भाषा और लिपियों के संस्कार सभी को उद्भासित करता है।

इस पुस्तक का दूसरा अंक हिमालयी उपत्यका में जनमी मानव सभ्यता के बार में चर्चा करती है। मानवी इतिहास की वर्तमान शाृंखला के प्रथम ज्ञात पुरुष के रूप में चर्चित हुए ब्रह्मा के औरस वंशजों की 73वीं कड़ी रहे प्राचेतस-दक्ष को पुत्र-प्राप्ति के प्रयासों में तेरह कन्याएं हुईं। विवाह योग्य होने पर इन्होंने अपनी इन कन्याओं को सामूहिक रूप से मरीचि के यशस्वी कुल में उत्पन्न हुए कश्यपनामक प्रजापति को सुपुर्द कर दिया। दक्ष पुत्रियों को स्वीकार करने के कुछ काल बाद मरीचि-कश्यप लोहित्य सागर (लालसागर) से उत्तर-पूर्व स्थित देमावंद पर्वत (एलब्रुजपर्वत) के निकट ‘आर्य वीर्यवान’ नामक रमणीय स्थान पर अपनी राजधानी बनाकर रहने लगा। आर्य वीर्यवान को ही जेंद अवेस्ता में ‘अरियनेम बेजो’, ग्रीक साहित्य में ‘एरियाना’ और अन्य पाश्चात्य ग्रंथों में ‘एरान्न’ कहकर संबोधित किया गया है।

कैस्पियन सागर के पश्चिमी तट पर स्थित इस क्षेत्र को आजकल ‘अजरवेजान’ के नाम से पुकारा जाता है। दक्ष की उपर्युक्त वर्णित तेरह कन्याओं के स्थान पर कहीं-कहीं उसके साठ कन्याओं के होने का भी उल्लेख मिलता है। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि यम, दक्ष-पुत्री अदिति के पौत्र थे और भृगुपुत्र-शुक्र, दक्ष कन्या दिति की पौत्री दिव्या के पुत्र थे एवं चंद्र भृगुपुत्र-शुक्र के पौत्र अत्रि के पुत्र थे। इस प्रकार दक्ष-पुत्रियों का अपनी ही बहनों की पीढिय़ों में इतने अंतरों के साथ उत्पन्न हुए पौत्रों-प्रपौत्रों और दौहित्रों से तमाम दीर्घजीवी तर्कों के उपरांत भी युग्म संबंध स्थापित करना व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता है। भारतीय शास्त्रों में ब्रह्मा के मानस पुत्र ‘दक्ष’ (अग्निष्वाता) और शिव पत्नी सती के पिता ‘दक्ष’ या फिर ‘प्राचेतस दक्ष’ के अलावा भी कई अन्य दक्ष प्रजापतियों का संदर्भ मिलता है। किंचित् काल के विभिन्न खंडों में प्रचलित रहे ‘दक्ष’ नाम की इस एकरूपता के कारण उत्पन्न हुई भ्रांतियों ने ही तदंतर विकसित हुई गाथाओं में उपर्युक्त वर्णित इन साठ कन्याओं के अलग-अलग जनकों के स्थान पर इनके एक ही पिता होने का भ्रम उपस्थित कर दिया होगा। इन तेरह दिव्य कन्याओं की संतानों से प्रसूत हुई देव-दानव आदि मातृसत्तात्मक सभ्यताओं का वर्णन प्रस्तुत अध्याय में विस्तार से किया गया है दोनों पुस्तकों को यथार्थ बनाने में जो श्रम पाण्डेय जी ने किया वह विलक्षण प्रतिभा ही है, वह आज दुर्लभ है। डॉ. ओम प्रकाश पांडेय के ग्रंथ ‘द्रष्टव्य जगत् का यथार्थ’ में वह सब समाहित दिखता है, जो दृष्टव्य भी है और यथार्थ भी। यह पुस्तक किसी इनसाइक्लोपीडिया के समान है, जिसमें वेदों, उपनिषदों, संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों के साथ गणित भौतिकी परम्पपरिक और वैज्ञानिक सम्बंधों को अन्वेषित करने का प्रयास किया गया है। हमारे लोकमानस में व्याप्त तमाम अनुभूतियों को यथार्थ प्रामाणिक और वैज्ञानिक ढंग से डॉ. पांडेय ने इन दोनों ग्रंथों में प्रस्तुत किया है। डॉ. पांडेय का संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार इनको और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है, जिसके जरिए वे वेदों के दार्शनिक रहस्य को विज्ञान के आलोक में सभी के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। अंग्रेजी के माध्यम से उस दिशा में किए गए वैश्विक चिंतन और निष्कर्षों के आईने में भारतीय ऋषि-मुनियों के चिंतन-मनन को परखकर उसकी प्रामाणिकता भी प्रदर्शित कर रहे हैं। इन पुस्तकों को पढऩे से सभी पाठकों के विचारों में उपस्थित विज्ञान और अध्यात्म के जाले हट जायेंगे और यथार्थ के सही आलोक में पाठक सत्य को समझ सकेंगे।

विवेक भटनागर