आयुर्वेद को मुख्य चिकित्सा पद्धति घोषित करे सरकार

देश लॉकडाउन से बाहर आ रहा है। बाजार खुल रहा है, कुछ कुछ रेलगाडिय़ां चलने लगी हैं, घरेलू उड़ाने चालू हो गई हैं, जनजीवन को सामान्य बनाने की पहलें की जाने लगी हैं। परंतु अभी कोरोना का खतरा टला नहीं है। इसलिए सब कुछ करते हुए भी सावधानी रखनी ही है। इस सब का सबसे बुरा असर बच्चों की शिक्षा पर पडऩे वाला है। अभी तुरंत विद्यालय खुलते नहीं दिख रहे। ऑनलाइन कक्षाएं देने का प्रयास अवश्य हो रहा है, परंतु वह बच्चों की शिक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। विद्यालय के बाहर शिक्षा के जो अन्यान्य अवयव थे, उनको फिर से स्थापित करने का समय आ गया है। क्या समाज और सरकारें इस अवसर का उपयोग कर पाएंगी?

कोरोनाकाल के अनेक महत्त्वपूर्ण सबकों में से एक सबक देश की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर है। हालाँकि देश के डॉक्टरों ने काफी बहादुरी दिखाई और वे अस्पतालों में डटे रहे, परंतु वे भी कोरोना के शिकार होते गए। एम्स के ही सौ से ऊपर डॉक्टर कोरोनाग्रस्त निकले हैं। स्वाभाविक ही है कि उनमें भय व्याप्त हो रहा होगा। डॉक्टर भी जब भयभीत हों तो जनसामान्य तो भयभीत होगा ही। यह देखना भी दुखद है कि विज्ञान अभी तक कोरोना से कोई खास लड़ाई नहीं लड़ पाया है। अमेरिका और यूरोप दोनों पस्त पड़े हैं। एक-दूसरे पर दोषारोपण करके काम चला रहे हैं। भारत में कई कारणों से स्थिति उतनी नहीं बिगड़ी। एक तो सरकार ने लॉकडाउन और अन्यान्य उपायों द्वारा इसे रोकने की सफल कोशिशें कीं। दूसरे, आयुर्वेद ने स्थिति को काफी हद तक संभाला। आयुष मंत्रालय के निर्देशों के आते ही देश भर में काढ़ा पीने की एक लहर सी दौड़ गई। हर दूसरा-तीसरा व्यक्ति काढ़ा पीने लगा। जिसे जो सामग्री मिली, वह उसी का काढ़ा पीने लगा। गरमी का मौसम होने के बाद भी लोग गरम पानी पीते रहे। अनेक प्रकार के संयमों का पालन किया। राष्ट्रीय स्तर पर यह एक संयम का प्रदर्शन ही तो था, जिसमें हमारा राष्ट्र सफल होकर निकला। इन सभी के कारण भी कोरोना ने भारत से हार-सी मान ली। हालाँकि यह लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है, और विजय की घोषणा करना अभी शीघ्रता कहलाएगी, फिर भी उसे इस स्तर पर रोकना भी एक प्रकार की सफलता ही है।

इसलिए, अब चिंतन से आगे बढ़ कर कुछ करने का समय आ गया है। जैसे कि सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में ग्लोबल पर लोकल को वरीयता देने की बात की है, ठीक उसी प्रकार हमें स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी ग्लोबल पर लोकल को वरीयता देने की आवश्यकता है। एलोपैथ ग्लोबल है, आयुर्वेद लोकल है। विज्ञान दोनों ही हैं, परंतु लोकल होने के कारण आयुर्वेद अधिक उपयोगी, प्रभावकारी, लाभदायक और व्ययसाध्य यानी सस्ता है। काढ़े का सामान तो घर घर में उपलब्ध है ही। आयुर्वेदिक औषधियां भी तुलनात्मक रूप से सस्ती और अधिक परिणामकारी हैं। इसके अलावा परंपरागत वैद्यों की देश में एक बड़ी श्रृंखला है, जो कि देश में वर्तमान एलोपैथ और डिग्रीधारी आयुर्वेदिक वैद्यों से कहीं अधिक बड़ी है। अब समय आ गया है कि सरकार उनका संज्ञान ले और उनको भी कोरोना युद्ध में शामिल करे। बल्कि केवल कोरोना युद्ध में नहीं, उन्हें देश को स्वस्थ रखने के अभियान में साझीदार बनाए।

इसके लिए आवश्यक है कि सरकार आयुर्वेद को देश की प्रमुख चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दे। आयुर्वेद के लिए बजट को कम से कम 20 गुणा बढ़ाए। सरकार का यह बजट देश की स्वास्थ्य सेवाओं को लोकल और अधिक प्रभावी बनाएगा। जनता तो लोकल पर विश्वास करती ही है, आवश्यकता है कि हमारी अफसरशाही और सरकार इस पर भरोसा करे। आयुष्मान और इंद्रधनुष जैसी योजनाओं से अधिक परिणामकारी प्रकृति परीक्षण, ऋतुचर्या तथा सुवर्णप्राशन आदि का प्रचार और अनुपालन हो सकता है। इनके लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन अनिवार्य रूप से स्थानीय ही होगा। एलोपैथ की दवाओं और उपकरणों के लिए हम लोकल बन ही नहीं सकते, इसके लिए हमें ग्लोबल पर निर्भर रहना ही होगा, परंतु आयुर्वेद एक मात्र पद्धति है जो न केवल हमारे देश को स्वस्थ रखेगी, बल्कि यह हमारे देश को आर्थिक रूप से सबल भी बनाएगी। इतना ही नहीं, यदि हमारी सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए, तो यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है, कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हम शीघ्र ही विश्व को मार्गदर्शन देने की स्थिति में होंगे।