आयुर्वेद हराएगा कोरोना को

डॉ. आर. अचल
लेखक आयुर्वेद चिकित्सक तथा वल्र्ड आयुर्वेद काँग्रेस के सदस्य हैं।


कोरोना आज एक ऐसी विश्वव्याप्त महामारी है जिसने दुनिया को बदल दिया है। वास्तव में कोरोना न कोई नयी बीमारी है न वायरस है। यह सर्दी-जुकाम उत्पन्न करने वाले वायरस समूह का नाम है, जिसकी खोज 1964 में ब्रिटिश वायरोलाजिस्ट डॉ. अल्मेडा ने की थी। इस समूह में कई प्रकार के वायरस होते हैं, जिनका संक्रमण नाक की श्लेष्मकला यानी झिल्ली से शुरु होकर गला-कंठ होते हुए फेफड़ों तक पहुँच कर गंभीर रूप धारण कर लेता है। इस रोग के शुरूआती लक्षण नाक बहना, छींकें आना, हल्के ज्वर के साथ शरीर में पीड़ा आदि होते हैं। इसे सामान्यत: फ्लू, एन्फ्लूएन्जा या सर्दी-जुकाम कहा जाता है। यह विशेष रूप से ऋतु संधिकाल अर्थात मौसम मे बदलाव के समय होता है। एक सामान्य व्यक्ति को वर्ष में सामान्यत: 2-3 बार हो ही जाता है।

प्रसार
संक्रमित व्यक्ति के खाँसने, छींकने, थूकने से दूसरे व्यक्ति या समूह तक तेजी से फैल जाता है। किसी संक्रमित व्यक्ति द्वारा छुयी गयी वस्तुओं जैसे कि दरवाजे की कुंडी, टेलीविजन, रिमोट, कंप्यूटर कीबोर्ड, टेलीफोन को छूने के बाद जब आप अपनी आंख, नाक या मुंह को छूते या रगड़ते हैं तो आपकी त्वचा से फ्लू का वायरस नासा मार्ग में पहुँच जाता है। फ्लू या इन्फ्लूएन्जा के वायरस ए, बी और सी नामक तीन प्रकार के होते हैं। तीनो प्रकार के वायरस के संक्रमण से फ्लू या सर्दी-जुकाम के ही लक्षण होते हैं, जिसमे ए अधिक खतरनाक होता है। इसके विपरीत बी तथा सी केवल मनुष्यो में होते हैं।

फ्लू वायरस- ए: इसका संक्रमण पशु-पक्षियो में होता है। सामान्यत: यह इन्ही से मनुष्यो में भी पहुँचता है। ए वायरस बड़े पैमाने पर मौसम के संक्रमण काल में फैलता है जो कभी-कभी महामारी का रूप धारण कर लेता है। एक अन्य प्रकार का वायरस भी संक्रमित लोगो के माध्यम से फैलता है।

फ्लू वायरस- बी: बी प्रकार का फ्लू वायरस केवल मनुष्यों में पाया जाता है। ये ए प्रकार फ्लू वायरस की तुलना में कम हानिकारक होता है। सामान्यत: यह भी बदलते मौसम के समय में फैलता है। यह महामारी नहीं बनता है फिर भी आस-पास के लोगो में फैल जाता है।

फ्लू वायरस-सी: इन्फ्लूएन्जा सी वायरस भी केवल मनुष्यों में पाया जाता है। यह सामान्य सर्दी-जुकाम होता है, जिसका प्रसार नहीं के बराबर होता है। यह बिना किसी दवा के ही ठीक हो जाता है। यह महामारी बिल्कुल नहीं बनता है।

फ्लू सर्दी-जुकाम से कुछ अलग होता है। 100 से अधिक विभिन्न वायरस सर्दी-जुकाम पैदा कर सकते हैं, लेकिन केवल ए तथा बी इन्फ्लूएन्जा वायरस ही गंभीर बीमारी का कारण बनते हैं। ए और बी इन्फ्लुएन्जा वायरस का प्रकोप अनिश्चितता वाले मौसम में सक्रिय होते हैं, जबकि सी वायरस का प्रकोप आमतौर पर सांस सम्बंधित रोगियों में होता रहता है। फ्लू टीकाकरण ए और बी प्रकार से बचाने में मदद कर सकता है, लेकिन सी प्रकार वायरस के लिए कोई टीकाकरण नहीं है।

वर्तमान में वैश्विक महामारी के रूप में कोरोना कुल का एक नया वायरस सक्रिय हुआ है, जो फ्लू के ए वर्ग का वायरस है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नोवेल कोरोना कोविड-19 नाम दिया है। यह सर्वप्रथम दिसम्बर 2019 ई. में चीन के वुहान शहर में सक्रिय होकर कुछ ही दिनों में पूरे विश्व में आतंक का पर्याय बन चुका है। केवल दो से तीन महीनों में ही विश्व के लगभग 200 देशों में फैल चुका है। अप्रैल 2020 के अंतिम सप्ताह तक 30 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं। दो लाख से अधिक लोग मारे जा चुके है, जिसमे 75 प्रतिशत मरने वाले केवल पश्चिम के विकसित देशो के हैं। सबसे अधिक लोग संयुक्त राज्य अमेरिका में मारे गये हैं। कोविद-19 का तेज प्रसार को रोकने के लिए दुनिया के लगभग सभी देशों में कई महीने से सारी गतिविधियाँ ठप है, लोग अपने घरों कैद हैं। सड़कें तथा बाजार सुनसान हो चुके हैं। ऐसा दुनिया में पहली हुआ है। इसलिए महामारियों के इतिहास में यह सबसे भयावह महामारी सिद्ध हो रही है।

विषाणु व उसका संक्रमण
वायरस एक अकोशिकीय सूक्ष्म जीव होता है, जिसकी संरचना में नाभिकीय अम्ल व प्रोटीन होता है। यह वातावरण में आदि काल से सुषुप्तावस्था में उपस्थित है। यह किसी दुर्योग या प्राकृतिक परिवर्तन से किसी जीवित कोशिका के संपर्क में आने पर सक्रिय हो जाता है। वायरस एक जीवित कोशिका के आर.एन.ए.-डी.एन.ए को प्रभावित करता है। प्रभावित कोशिकायें तेजी से अपने जैसी विकृत कोशिकाओं का प्रजनन करने लगती है, जिससे वह जीव, पशु या मनुष्य बीमार हो जाता है। संक्रमण काल में मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक कोशिकायें सक्रिय होकर वायरस के विरुद्ध कार्य करने लगती है। उनके सबल होने की स्थिति में रोगी स्वत: बिना किसी दवा के ही स्वस्थ होने लगता है। रोगप्रतिरोधक शक्ति के कमजोर होने पर रोगी गंभीर स्थिति में पहुँच जाता है, जिससे कभी-कभी रोगी की मृत्यु भी हो जाती है। यहाँ एक विशेष उल्लेखनीय तथ्य है कि विषाणु एक निश्चित समय में स्वयं प्रोटीन के कवच में बन्द होकर सुषुप्तावस्था में चला जाता है। इस निश्चित अवधि में सबल रोगप्रतिरोधक शक्ति का रोगी स्वत: बिना किसी दवा के ही स्वस्थ हो जाता है। रोगी के संक्रमण काल में यह विषाणु अनुकूल वातावरण पाकर किसी अन्य व्यक्ति के शरीर में प्रवेश पाकर उसकी कोशिका को संक्रमित करता है और इसप्रकार इसका प्रसार होता रहता है। विषाणु को नष्ट नहीं किया जा सकता है। परन्तु पहली बार संक्रमित व्यक्ति में इसके विरुद्ध रोगप्रतिरोधक शक्ति यानी एण्टीबॉडीज उत्पन्न हो जाती है। सामान्यत:उसे दुबारा संक्रमण नहीं होता है, अथवा होने पर वह बीमार नहीं पड़ता। इसकी चिकित्सा लक्षणों के अनुसार की जाती है, जिसमे कोशिश की जाती है कि रोगी को वायरस के स्वसुषुप्ताकाल में पहुँचने तक जीवित रखा जाय।

कोविद-19 संक्रमण के लक्षण
कोविद-19 वायरस का संक्रमण नाक-मुँह से होता है जो क्रमश: गले से होते हुए फेफड़ो तक पहुँचकर गंभीर स्थिति उत्पन्न कर देता है। इसके संक्रमण में मुख्यत: दो लक्षण होते हैं – हल्का बुखार और सूखी खांसी। संक्रमण फेफड़ों तक पहुँचने पर सांस लेने में कष्ट होने लगता है। इस वायरस के आरम्भिक संक्रमण काल में शरीर का तापमान 100.04 फारेनहाइटके लगभग होता है जिसके कारण व्यक्ति का शरीर गर्म होता है तथा ठंडी महसूस होकर कंपकंपी भी महसूस हो सकती है। सर्दी-जुकाम के लक्षण जैसे, गले में खराश, सिरदर्द या डायरिया भी हो सकता है। एक ताजा शोध के अनुसार स्वादहीनता व गंधहीनता का लक्षण भी रोगी में प्रकट हो सकता है। माना जा रहा है कि कोरोना वायरस के लक्षण दिखने में लगभग पाँच दिन का समय भी लग सकता है। कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण प्रकट होते देखे जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायरस के शरीर में पहुंचने और लक्षण दिखने के बीच 14 दिनों तक का समय भी लग सकता है। इसका प्रसार भी फ्लू वायरस की ही तरह से हो रहा है।

कोविद 19 की एलोपैथिक चिकित्सा
कोविद-19 अभी पहली बार सक्रिय हुआ है, इसलिए दुनिया के चिकित्साविज्ञानियों द्वारा अभी नित्य अध्ययन किया जा रहा है। परन्तु अभी तक विभिन्न सूत्रों से जो तथ्य सामने आये हैं, उसके अनुसार कोविद-19 से संक्रमित लगभग 70 प्रतिशत व्यक्तियों में सर्दी-जुकाम, ज्वर, खाँसी जैसे मामूली लक्षण देखे जा रहे है, जो सामान्यत: आराम करने और पैरासिटामॉल जैसी सामान्य हल्की ज्वर तथा दर्दनाशक दवायें लेने से स्वस्थ हो रहे हैं। खाँसी अर्थात् गले में संक्रमण होने पर एजीथ्रोमायसिन जैसी स्थानिक एण्टीबायोटिक दवाओं से सफलता मिल रही है। कंपकपी होने पर मलेरिया व रियूमिटाइड अर्थराइटिस में प्रयोग की जाने वाली हाइड्राक्सिल क्लोरोक्वीन का प्रयोग प्रभावी पाया जा रहा है।

लगभग 20 प्रतिशत लोगों में न्यूमोनिया जैसे गंभीर लक्षण देखे गए है। इन्हे सांस लेने में कष्ट पाया गया है। श्वास कष्ट के दौरे सामान्यत: 24 घंटे में तीन-चार बार देखा जा रहा है। इस स्थिति में न्यूमोनिया की चिकित्सा से लाभ मिल रहा है। इसके साथ डायरिया होने, ब्लडप्रेशर लो या हाई होने पर प्रचलित चिकित्सा की जा रही है। इस तरह लाक्षणिक चिकित्सा से संक्रमित रोगी स्वस्थ हो रहे है। सांस लेने में अधिक परेशानी होने पर ऑक्सीजन या वेंटिलेटर दिया जा रहा है। कोरोना के कारण होने वाली खांसी आम खांसी नहीं होती है यह लगातार दौरे जैसी हो सकती है। कोविद-19 की खाँसी सूखी आती है। इसमें बलगम नहीं आता है।

मात्र 10 प्रतिशत लोग इस वायरस के कारण अति गंभीर रूप से बीमार पाये जा रहे हैं, जो पहले से ही किसी गंभीर रोग जैसे, दमा, सेप्टिक, गुर्दे, लीवर, हृदय रोग, असंतुलित डायबेटिज, एड्स, कैंसर आदि मारक रोगों से पीडि़त हैं। ऐसे ही रोगियों की अधिकतम मृत्यु हो रही है। इसमें भी 60 वर्ष से अधिक उम्र वालों की संख्या अधिक है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि बच्चे व महिलाओं की संख्या बहुत कम है। प्रचलित चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कोरोना कोविद-19 वायरस के गंभीर संक्रमण की चिकित्सा इस बात पर आधारित है कि रोगी को सांस लेने में तकनीकी सहयोग देकर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जाए। प्रत्येक वायरसजनित रोग की चिकित्सा के लिए यही कार्यकारी सिद्धांत है। ऐसे रोग से बचाव का एक और सटीक उपाय टीका यानी वैक्सिन होता है। कोरोना कोविद-19 का वैक्सिन अभी परीक्षण के चरण में है। इसलिए वर्तमान में रोगप्रतिरोधक शक्ति की वृद्धि का प्रयास ही एकमात्र उपाय है।

आयुर्वेद की दृष्टि में महामारी व बचाव
ऐसा नहीं है कि इस प्रवृत्ति की महामारी दुनिया में पहली बार आयी है। आयुर्वेद के साथ ही सभी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में महामारियों के नियंत्रण व चिकित्सा का उल्लेख है। आयुर्वेद में इसे जनपदोध्वंश कहा गया है, जिसके संक्रमण से जनपदों यानी एक निश्चित परिक्षेत्र का विनाश हो जाता है। वर्तमान में आवागमन के संसाधनो के विकास व सहज उपलब्धता के कारण पूरा विश्व एक जनपद बन चुका है। इसलिए कोरोना शीघ्रता से प्रसारित होकर विश्वध्वंश का कारण बन गया है। आयुर्वेद की दृष्टि में कोरोना भी जनपदोध्वंसक व्याधि है। जनपदोध्वंश के नियंत्रण के लिए आचार्यों ने गृह-ग्राम धूपन व उपासना चिकित्सा का उल्लेख है। इसके अनुसार गुग्गुल, जटामांशी, भोजपत्र, कदंब फल, कमल पुष्प, नीमपत्ते आदि सूखी औषधियों को गोघृत, मधु, गुड़ और कपूर मिलाकर नित्य धूपन यानी धुआं करना चाहिए। घर तथा शरीर में स्वच्छता रखने के साथ-साथ आवागमन और भीड़ से बचना चाहिए। महामारी के प्रसार काल में अपनी आस्था के अनुसार उपासना करनी चाहिए। इससे मनोबल बना रहता है।

आयुर्वेद की दृष्टि में कोरोना कोविद-19
आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन व सूचनाओं को आयुर्वेद की दृष्टि से देखने पर कोरोना कोविद-19 श्वसनतंत्र का विकार है। प्राथमिक लक्षणों के अनुसार यह प्रतिश्याय है, जो गंभीर होकर फुफ्फुस ज्वर यानी फेफड़ो में संक्रमण के कारण होने वाले ज्वर जिसे आज न्युमोनिया कहते हैं, के गंभीर रोग में बदल जाता है। किसी बाह्य पहार्थों के संसर्ग से नासिका मार्ग में होने वाले उपद्रव को प्रतिश्याय कहा गया है। इसका कारण नासागत वात, पित्त और कफ का विषम या कमजोर होना होता है। इनके साम्यावस्था या सबल होने पर बाह्य विषाणु का कोई प्रभाव नहीं होता है। परन्तु वात, पित्त और कफ के असंतुलित या दुर्बल होने की स्थिति में विषाणुओं का प्रकोप हो सकता है।

वात, पित्त और कफ के असंतुलन से आमदोष यानी अपच तथा एसिडिटी बढ़ जाता है, जिससे इम्यूनिटी यानी व्याधिक्षमत्व कमजोर हो जाता है। परिणामस्वरूप विषाणु का सहज संक्रमण हो जाता है। सबसे पहले कफ का प्रकोप होता है। इसके शान्त न होने पर वात भी प्रकुपित हो जाता है। यदि इस स्थिति मे भी रोग नियंत्रित नहीं हो सका तो पित्त भी प्रकुपित होकर पाक उत्पन्न कर देता है। रोग की यह क्रमश: गंभीर स्थिति होती है। दोषो के आधार पर मूलत: चार प्रकार के प्रतिश्याय होते हैं। कफज प्रतिश्याय, पित्तजप्रतिश्याय, वातज प्रतिश्याय और त्रिदोषजप्रतिश्याय। इसके अतिरिक्त किन्ही दो दोषों के एक साथ प्रकुपित होने पर इसके कई अन्य प्रकार भी बनते हैं। जैसे, कफज-वातज तथा कफज-पित्तज आदि।

ज्ञात लक्षणों के अनुसार कोविद-19 आयुर्वेद की शब्दावली में कफज-वातज प्रतिश्याय है, जो व्याधिक्षमत्व की कमजोर स्थिति या उचित चिकित्सा के अभाव में त्रिदोषज होकर गंभीर स्थिति उत्पन्न करता है। इसकी चिकित्सा प्रतिश्याय को ठीक करने वाली औषधियों से की जा सकती है। आयुर्वेद के अनुसार शीत-ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल में मौसम के कारण और दिनचर्या की गड़बड़ी से पाचन क्रिया असंतुलित हो जाती है, जिससे शरीर की व्याधिक्षमत्व शक्ति कमजोर हो जाती है। सामान्यत: कफज प्रकृति के व्यक्ति इससे अधिक प्रभावित होते हैं। वातज प्रकृति के व्यक्ति बहुत कम प्रभावित होते हैं। पित्तज प्रकृति में नगण्य प्रभाव होता है। कोरोना संक्रमण को भी इस सूत्र के अनुसार देखा जाना चाहिए।

व्याधिक्षमत्व
आयुर्वेद के अनुसार व्याधिक्षमत्व के दो महत्वपूर्ण घटक होते हैं, जिन्हे सत्वबल व ओज कहा गया है। सत्वबल का तात्पर्य मनोबल से है। ओज का तात्पर्य देह, मन और आत्मा के संयुक्त शक्ति है। व्याधिक्षमत्व को बल कहा गया है। यह तीन प्रकार का होता है।

1. सहज बल – यह जन्मजात होता है।
2. काल बल – यह मौसम व ऋतुओं पर आधारित होता है।
3. युक्तिबल – यह औषधि सेवन, उचित आहार, पोषण, व्यायाम, योगादि से अर्जित किया जाता है। संक्रामक रोगों या महामारी के प्रसार काल में युक्तिबल को बढ़ाना आवश्यक होता है।

व्याधिक्षमत्ववर्धक औषधियाँ
सामान्यत: महामारीकाल में भय-तनाव व विषाद का प्रभाव भी संक्रामक हो जाता है। इससे व्यधिक्षमत्व कमजोर होता है। इसलिए इस स्थिति में ऐसी औषधियों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो मानसिक व शारीरिक दोनों स्तरों पर सबलता प्रदान करें। इसके लिए आयुर्वेद में रसायन चिकित्सा का प्रावधान है। रसायन सेवन का उद्देश्य आयु, मेधा, स्मृतिवृद्धि व आरोग्यलाभ तथा असमय वृद्धावस्था व व्याधि से रक्षा करना है। इसके निम्नलिखित तीन प्रकार हैं।
1. काम्य रसायन – इसका प्रयोग किसी विशेष उद्देश्य जैसे मेधा, स्मृति, बल आदि के लिए किया जाता है।
2. आजस्रिक रसायन – यह नियमित पोषक द्रव्यों जैसे दूध, घी, आदि के सेवन को कहा गया है।
3. नैमित्तिक रसायन – यह रोग विशेष से बचाव के लिए सेवन किया जाता है। यह तत्काल प्रभावी होता है। महामारी काल में इसी वर्ग के रसायनों का सेवन किया जाता है। प्रयोग
विधि के अनुसार रसायन औषधियाँ निम्न दो वर्गो में विभाजित है।
1. कुटीप्रवेशिक विधि रसायन – यह विधि पूर्णत: चिकित्सक के देख-रेख में ही प्रयोग की जाती है। आधुनिक शैली में कहा जाय तो वातानुकूलित चिकित्सा कक्ष में वमन, विरेचन आदि कर्म से शरीर का संशोधन करके किया जाता है। इस वर्ग की औषधियो में ब्रह्म रसायन, च्यवनप्राश रसायन, अभयामवकावलेह, आमलक रसायन, पंचार्विन्दघृत आदि हैं।
2. वातातपिक रसायन विधि – इसका प्रयोग सामान्य दैनिक जीवन में किया जाता है। महामारी काल में इन्हीं रसायनों का प्रयोग उपयुक्त होता है। वर्तमान के कोरोना संक्रमण के बचाव के लिए इस वर्ग की कुछ सहज उपलब्ध रसायन औषधियों का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है।
1. अश्वगंधा चूर्ण – 3 से 5 ग्राम नित्य दूध या गुनगुने जल से दिन में एक बार।
2. शतावरी चूर्ण – 3 से 5 ग्राम नित्य दूध या गुनगुने जल से दिन में एक बार।
3. मधुयष्टि (मुलेठी) चूर्ण – 3 से 5 ग्राम नित्य दूध या गुनगुने जल से दिन में एक बार।
5. अश्वगंधा, मधुयष्टि, रससिंदूर (50, 50, 1.5 ग्राम के अनुपात में) मिलाकर 2-3 ग्राम शहद या जल से दिन में एक बार।
6. गिलोयस्वरस 50 मिली या काढ़ा 20 मिली लेना चाहिए। काढ़े में शहद, गुड़, काली मिर्च, दालचीनी, मुलेठी, मुनक्का आदि मात्रानुसार मिलाया जा सकता है।
7. शिलाजित – 500 मिग्रा कैप्सूल बाजार में उपलब्ध हैं, जिसे दिन में एक बार जल या दूध से लिया जा सकता है। इसके साथ गिलो या अश्वगंध या शतावरी या वासा का कैप्सूल भी लिया जा सकता है।
8. नारदीय लक्ष्मीविलास रस- यह बाजार में उपलब्ध है। इसे 250 मिग्रा की मात्रा में दिन में एक बार लिया जा सकता है। परन्तु रसौषधि होने के कारण वैद्य के परामर्श से ही इसका सेवन उचित है। ये रसायन औषधियाँ शीघ्रता से व्याधिक्षमत्व को बढ़ाकर कोरोना कोविद-19 से रक्षा कर सकती है।
9. नस्य योग – षडविन्दु तैल, अणुतैल, तुरवक तैल में से किसी एक का नस्य भी लेना चाहिए। इसके लिए प्रात:काल प्रत्येक नासा छिद्र में 4-5 बूँद तैल डाल कर 5 मिनट विश्राम अवस्था रहना चाहिए। इसके बाद नमक मिले गुनगुने पानी से गरारा करना चाहिए।

कोरोना की चिकित्सा
कोरोना कोविद-19 के संक्रमण की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद के श्लेष्मवातिक प्रतिश्याय की चिकित्सा प्रभावी सिद्ध होगी। रोग के प्रत्येक स्तर की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद में योग उपलब्ध हैं। त्रिभुवनकीर्तिरस, लक्ष्मीविलासरस नारदीय, मल्लसिन्दूर, यवाखार, सूतशेखर रस, गोदंतीभस्म, कफकेतु रस, कफकर्तरीरस, प्रवालपंचामृत, समीरपन्नग रस, वसंतमालती रस आनन्दभैरव रस, कस्तूरी भैरव रस, राजमृगांक रस आदि प्रतिश्याय, श्वास, कास, क्षय आदि श्वसनतंत्र पर प्रभावी औषधियोग हैं। रस तथा भस्म युक्त होने के कारण इनके प्रयोग से रोगी को तत्काल लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त दार्वीक्वाथ, दशमूलक्वाथ, वासावलेह, वासापत्रस्वरस, सितोपलादि, तालिसादि चूर्ण आदि प्रभावी वनौषधियाँ भी हैं जिनका स्थिति व आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है।

इस संबंध में यह उल्लेखनीय तथ्य है कि आयुर्वेद समुदाय की पुरानी माँग को सरकार ने स्वीकार कर पहली बाद कोरोना जैसी महामारी की चिकित्सा का अवसर प्रदान किया है। परन्तु खेद है कि उपरोक्त रसौधियों का प्रयोग संकोच के साथ किया जा रहा है। इसका कारण आधुनिक आयुर्विज्ञान की विधि से इन औषधियों के मानकीकरण का अभाव बताया जाता है। जबकि हजारों वर्षों से लेकर आज तक इन औषधियों के प्रयोग से मनुष्य लाभान्वित हो रहा है। इसके बावजूद इन औषधियों के चूहों व खरगोश पर प्रभावों का आंकड़ो जुटाने की जिद हास्यापद लगती है। अंतत: यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि रसौधियों के प्रयोग से कोरोना कोविद-19 की सफल एवं प्रभावी चिकित्सा प्रबंधन संभव है।