दूरद्रष्टा थे आचार्य चाणक्य

प्रो. बजरंगलाल गुप्त

राजतंत्रा के काल में देश की एकात्मता के सामने महान संकट खड़ा हो गया था, ऐसे समय में किसी ने साहस करके संक्रमण की दिशा में देश को ले जाने का असामान्य काम करने वाला व्यक्ति था आचार्य चाणक्य। ऐसा क्रांतदर्शी व्यक्ति बिना किसी वैचारिक अधिष्ठान का नहीं हो सकता। उसके पास विचारों की गहरी समझ वाला अधिष्ठान होना चाहिए। मेरा ऐसा मानना है कि भारत में समय-समय पर उसी अधिष्ठान को केंद्र में रख कर समाज को दिशा देने वाले महापुरूषों की माला पैदा होती रहीं। यही भारत का सनातनत्व है। सनातन होने का अर्थ रूढ़िवादी होना नहीं या सनातन होने का अर्थ बंद दिमाग नहीं है। हमारे यहाँ सनातन होने का अर्थ बताया गया है सनातन पर नित्य नूतन। हमारे यहाँ की सम्पूर्ण विचार, ज्ञान और कर्म परंपरा में हमेशा नवीनता है, सड़ांध नहीं है, बंद दिमाग नहीं है। और यदि कभी ऐसा हुआ तो देश और समाज का पराभव हुआ। उस जड़त्व को समाप्त कर उस बंद दिमाग को चलाने वाले समय-समय पर इस देश में महापुरूष पैदा होते रहे। उसी श्रृंखला में आचार्य चाणक्य भी थे।

ऐसा व्यक्ति जब भी आता है, वह सामयिक घटनाओं पर प्रहार करता है। घटना सामयिक लगती है, परंतु उसकी दृदृष्टि दूरगामी होती है। उसकी दृष्टि में एक लंबा वैचारिक अधिष्ठान होता है, शाश्वत धारा होती है। परंतु उस तात्कालिक घटना में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं। आचार्य चाणक्य ने तात्कालिक घटना में परिवर्तन लाने के लिए जिन शाश्वत दृष्टि के आधार पर काम किया, उन्हीं का संग्रहण कौटिल्य अर्थशास्त्रा में हुआ होगा।

कौटिल्य ने अर्थशास्त्रा की परिभाषा करते हुए कहा है कि मनुष्यों की वृत्ति का नाम अर्थ है और मनुष्यों से परिपूर्ण भूमि के रक्षण, पालन और पोषण के शास्त्रा का नाम अर्थशास्त्रा है। अर्थशास्त्रा चाणक्य का इकोनोमिक्स नहीं है। इकोनोमिक्स इसका बहुत छोटा हिस्सा है। जब इस इकोनोमिक्स का एडम स्मिथ ने प्रारंभ किया था, तब उसने भी इसका नाम पोलिटिकल इकोनोमिक्स ही रखा था।

कौटिल्य समेत तमाम भारतीय मनीषियों ने न तो कभी किसी समस्या को पृथक-पृथक विखंडित करके देखा और न ही उसका विखंडित समाधान ढूंढने की कोशिश की। मनुष्य, देश, समाज, राज्य आदि की समस्या खंडित या अलग-अलग या एकांगी नहीं है? वे तो परस्पर जुड़ी हुई हैं। इसलिए कौटिल्य का अर्थशास्त्रा एक समग्र शास्त्रा है, वह एकात्म और समग्र शास्त्रा है। उसने इतने सारे आयामों पर विचार किया है, वह आवश्यक था। अन्यथा समाज के जिस प्रकार के उत्थान और वैभव की कल्पना कौटिल्य के मन में रही होगी, वह एक आयाम पर विचार करने से पूरी नहीं हो सकती। उसमें राजनीति भी आएगी, उसमें समाजनीति, अर्थनीति, कूटनीति, वैदेशिक नीति आदि सभी नीतियां आएगी। इसलिए इन सभी आयामों पर विचार करने वाला यह शास्त्रा है।

कौटिल्य ने चार प्रकार की विद्याओं की बात की है। आन्वीक्षिकी, त्रायी, वार्ता, दण्डनीति। इन चारों को भी अलग-अलग परिभाषित किया गया है। कौटिल्य के अनुसार आन्वीक्षिकी में सांख्य, योग और लोकायत का ज्ञान है। आमतौर पर लोग लोकायत यानि चार्वाक से डरते हैं, परंतु कौटिल्य आन्वीक्षिकी में इन तीनों का समग्रता में अध्ययन करने की बात करते हैं। त्रायी में धर्म और अधर्म का विवेक है। आज के छोटे अर्थशास्त्रा को हम वार्ता कह सकते हैं। वार्ता यानि अर्थ और अनर्थ का विचार। आज के अर्थशास्त्रा में तो केवल अनर्थ का ही विचार है। दोनों का समग्रता IMG_0252 (2)से विचार करना ही वार्ता का अर्थ है। दण्डनीति में सुशासन और कुशासन, दोनों का विचार किया गया है।

कौटिल्य ने तात्कालिक जमीनी सच्चाइयों को ईमानदारी से स्वीकारा है। आमतौर पर हम वर्तमान समस्याओं की उपेक्षा करने का प्रयत्न करते हैं। परंतु कौटिल्य अपने समाज के सभी बुराइयों का अध्ययन किया और माना कि ये हैं। इसलिए उन्हें नियंत्रित करने के लिए राजनियम बनाए। वे एक शानदार प्रशासक हैं। प्रशासन की इतनी बढ़िया समझ रखने वाला ऐसे कोई और व्यक्तित्व दुर्लभ ही है। इसलिए वे ढेर सारे विभाग और उनके अध्यक्षों की रचना करते हैं। वे अध्यक्ष क्या करेंगे, इसका भी विस्तार से वर्णन करते हैं। जिस क्षेत्रा के वे अध्यक्ष बनाए गए हैं, उनमें क्या बुराइयां हैं, यह भी वे बताते हैं। उससे निपटने के उपाय भी बताते हैं।

मैं केवल दो-तीन बातों की चर्चा करूँगा। आज बाजारआधारित अर्थव्यवस्था है। बाजार में अनेक प्रकार की हेराफेरी भी होती है। राज्य तो ऐसे किसी भी हेराफेरी को मानने से इनकार करता है। परंतु कौटिल्य उन्हें स्वीकारते हैं। उन्होंने एक पौतवाध्यक्ष बनाया। पौतवाध्यक्ष यानि तौलने-मापने का अध्यक्ष। उन्होंने कहा कि लोग तौलने-मापने में गड़बड़ी करते हैं। तराजू में कितने प्रकार से डंडी मार कर ठगा जा सकता है, इसका विस्तार से वर्णन है। सुनार कैसे ठगता है, विभिन्न व्यापारों के व्यापारी कैसे ठगते हैं, इनका भी वर्णन है। फिर उपाय भी बताया। सोने और चाँदी को तौलने के लिए अलग-अलग दस प्रकार की तुलाओं का वर्णन है। एक प्रकार की तुला से ही दोनों को नहीं तौला जा सकता। सोने-चाँदी के अलावा अन्य सामानों को तौलने के लिए छह प्रकार की तुला बताई गई है। इस प्रकार कुल सोलह प्रकार की तुलाओं का वर्णन है। कौन-सा सामान किस तुला में तौलना चाहिए, तुला किस धातु की बनी होनी चाहिए, बाट किस धातु के हों, इन सबका वर्णन है। पौतवाध्यक्ष का काम है कि बीच-बीच में इनकी जाँच करे।

एक और अद्भुत अध्याय में वर्णन है कि यदि किसी क्रेता को सामान खरीद कर घर पहँचने के बाद लगे कि वह ठगा गया है तो वह क्या करे। आज तो इसका कोई उपाय नहीं है। ली हुई वस्तु वापस नहीं ली जाएगी। परंतु कौटिल्य कहता है कि इसका इलाज है। यदि क्रेता को लगे कि वह ठगा गया है तो वह वापस जा सकता है। परंतु यह कोई चलन न बन जाए, इसलिए कौन-सा सामान का क्रेता वापस करने के लिए जा सकता है और उसके लिए कितना दंड देना पड़ेगा, इन सबका वर्णन है। इसी प्रकार विक्रेता के लिए भी व्यवस्था दी गई है। बेचने के बाद लगे कि कम में बेच दिया तो वह दोबारा से मोलभाव कर सकता है।

इसके अलावा कौटिल्य ने मजदूरी के संबंध में काफी विचार किया है। कौटिल्य कहते हैं कि समय पर वेतन मिले, यह नियोक्ता और शासन की जिम्मेदारी है। समय पर वेतन न देने पर दंड का विधान है। कौटिल्य कहते हैं कि वेतन पहले से तय हो, परंतु यदि पहले से तय न हुआ हो, तो वेतन कैसे तय हो। कौटिल्य कहते हैं कि कर्म और काल अर्थात् कितनी देर और कितना उपयोगी काम किया गया है, इसके आधार पर वेतन सुनिश्चित करना चाहिए।

उस समय हमारे यहां वस्त्रा उद्योग कापी विकसित था। घर-घर में सूत काता जाता था। इसके लिए कौटिल्य ने एक सूताध्यक्ष ही बना दिया। महिलाएं सूत कातती हैं तो कौटिल्य ने महिलाओं के लिए दोनों प्रकार की व्यवस्था दी है। या तो वे एक स्थान पर आकर सूत कातें या फिर घर पर ही सूत कातने के लिए उन्हें कच्चा माल दे दिया जाए। इसका पारिश्रमिक तय करने के लिए भी मानक तय किए हैं।

इस प्रकार कौटिल्य ने विविध विषयो का विस्तार से वर्णन किया है। अंत में कौटिल्य का एक कथन उद्धृत करता हूँ। वे कहते हैं, सुख का मूल धर्म है, धर्म का मूल अर्थ है। पैसे के बिना धर्म कैसे होगा? फिर कहते हैं कि अर्थ का मूल राज्य है। जब तक राज्य अच्छा नहीं होगा, उत्पादन और व्यापार कैसे अच्छे होंगे? फिर कहा, राज्य का मूल इंद्रियजय है। यह अंतिम बात केवल भारत का विद्वान ही बोल सकता है। पश्चिम का राजनीतिविज्ञानी नहीं बोल सकता। फिर कहते हैं कि इंद्रियजय का मूल विनय है और विनय का मूल है वृद्धों की सेवा। यहाँ वृद्ध का अर्थ अधिक आयु नहीं बल्कि विद्वान, ज्ञानयुक्त और अनुभवी व्यक्ति है। अंत में कहा है वृद्धों की सेवा का मूल है विज्ञान। विज्ञान अर्थ यहां साइंस से भिन्न है। यह उक्ति ही कौटिल्य के गांभीर्य को दर्शाती है।