टीम में नहीं चुने जाने की आशंका थी ध्यानचंद को

संजय श्रीवास्तव
लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं।

वर्ष 1928 में एम्सटर्डम ओलंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतना अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत की पहचान की ओर पहला कदम माना जाना चाहिए। टीम जब मुंबई लौटी तो हॉकी टीम के सारे खिलाड़ी देशभर में नायक बन चुके थे। खासकर ध्यानचंद का नाम सभी की जुबान पर था। वह देश के पहले स्पोट्र्स आयकन बन गए। इस सफलता और जनता के नायक बनने के बावजूद ध्यानचंद के कदम जमीन पर थे। वह पहले की तरह सेना में अपनी बटालियन में उसी तरह कामों और दायित्व को अंजाम देते, जिस तरह ओलंपिक के पहले करते थे। हां, ये जरूर था कि सेना के अफसर उन्हें अच्छी तरह जान गए थे, यहां तक सेना के सबसे बड़े अफसर को भी ध्यानचंद के बारे में पता था। सेना से उन्हें ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के पीछे बेहतरीन प्रदर्शन के लिए शाबासी भी मिली। लेकिन और कोई फायदा नहीं। इस बीच उनकी बटालियन देशभर में कई जगह स्थानांतरित होती रही और उसके साथ ध्यानचंद भी। वर्ष 1932 के आसपास अफगानिस्तान के पास नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में विद्रोह की खबरें आने लगी थीं। वहां उथल-पुथल ज्यादा थी। ध्यानचंद की बटालियन को वजीरिस्तान में उसी फ्रंट पर तैनात कर दिया गया। यह वही वजीरिस्तान है, जहां आज भी तालिबान और अन्य आतंकी गतिविधियां चल रही हैं। यहां जीवन ज्यादा कठिन था और खेल के लिए समय कम। बल्कि ये एक ऐसी जगह थी, जहां से ध्यानचंद और उनकी बटालियन लगभग कटी हुई थी। बाहरी खबरें भी उन्हें चि_ी के जरिए ही मिलती थीं। हालांकि उन्होंने कोलकाता और हॉकी फेडरेशन और टीमों से जुड़े अपने मित्रों से ऐसी व्यवस्था की हुई थी कि वो उन्हें देश में हॉकी की गतिविधि की जानकारी भेजते रहें। इस वर्ष एक बात और हुई थी। पहले तो इंडियन हॉकी फेडरेशन का नियंत्रण आर्मी स्पोट्र्स कंट्रोल बोर्ड से संबद्ध सेना के अधिकारियों के हाथों में था लेकिन अब वो उनके पास से सिविलियन के पास चला गया था। लिहाजा इंडियन हॉकी फेडरेशन और सेना के बीच वैसा र्मैत्रीभाव और तालमेल भी कम हो गया था, जैसा पहले था।

वर्ष 1932 में लास एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए टीम चुनी जानी थी। इसके लिए आईएचएफ ने कलकत्ता में नेशनल हॉकी चैंपियनशिप की तर्ज पर इंटर प्रोविंशियल प्रतियोगिता आयोजित की। आईएचएफ ने आर्मी सर्विस कंट्रोल बोर्ड को इसकी सूचना देते हुए ध्यानचंद को महज एक पखवाड़े के लिए रिलीज करने का अनुरोध किया। सेना ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया। उनकी प्लाटून ने उन्हें इस प्रतियोगिता में जाने के लिए छुट्टी नहीं दी।

इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेने का मतलब था टीम में नहीं चुना जाना। क्योंकि इस टीम में एक एक जगह के लिए खिलाडिय़ों के बीच कड़ा मुकाबला था। और ध्यानचंद इस चयन प्रतियोगिता में हिस्सा ही नहीं ले पा रहे थे। इस हालत से वह बहुत दुखी थे। उन्हें लगने लगा कि इस ओलंपिक में उनका नाम अब टीम में शायद ही शामिल किया जाए। अंग्रेज सेना के कठोर अनुशासन को देखते हुए वह अपनी बात कह भी नहीं सकते थे। यूं भी अभी वह सेना की सबसे निचली पायदान पर ही थे। वहीं सेना को उम्मीद थी कि चूंकि ध्यानचंद ने पिछले ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन किया था और इसके बाद भी वह प्रतियोगिताओं में बढिया खेलते रहे थे, लिहाजा आईएचएफ को उनका सेलेक्शन खुद ब खुद कर लेना चाहिए। ध्यानचंद से भी सेना के कुछ अफसरों ने ऐसा ही कहा। वैसे ध्यानचंद को भी लगता था कि उनका चयन स्वाभाविक तौर पर हो जाना चाहिए। लेकिन मन शंकाओं से भी भरा हुआ था। खैर जब टीम की घोषणा हुई तो उसमें उनका नाम शामिल था। अखबारों के जरिए उन्हें टीम में शामिल किए जाने की जानकारी मिली। उन्हें हैरानी भी हुई और खुशी भी। चार साल पहले ओलंपिक में गई टीम चार खिलाडिय़ों को ही अबकी बार दोबारा चुना गया था, ये थे ध्यानचंद, एरिक मिनेगर, लेस्ली हेमंड और रिचर्ड एलेन। ध्यानचंद के लिए खुशी की बात ये भी थी कि उनके छोटे भाई रूप सिंह को भी ओलंपिक टीम में चुन लिया गया था। लिहाजा दोनों भाइयों को एक साथ देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलने वाला था।

वर्ष 1928 की तरह ही इस बार भी टीम के सामने आर्थिक समस्या आ खड़ी हुई। आईएचएफ के पास इतना पैसा ही नहीं था कि टीम को ओलंपिक में भेज सके। लास एंजल्सि बहुत दूर था और इसका खर्च भी इसीलिए पिछली बार की तुलना में दोगुना लगना था। आईएचएफ को लगा कि उन्हें गांधी जी से मदद मांगनी चाहिए। क्योंकि गांधी देश में अकेले ऐसे लोकप्रिय नेता थे, जिनकी एक आवाज पर जनता कुछ भी करने को तैयार रहती थी। उन्हें लगा कि अगर गांधी एक बार जनता से इसके लिए अपील कर देंगे तो बात बन सकती है। गांधी जी उस समय शिमला में थे और लार्ड इरविन के साथ उनकी बातचीत के दौर चल रहे थे। ऐसे में आईएचएफ ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर चाल्र्स न्यूमन को उनके पास भेजने का फैसला किया। न्यूमन वरिष्ठ पत्रकार थे। वह गांधी-इरविन की वार्ता को कवर भी कर रहे थे। इसी बीच में उन्होंने गांधी के व्यस्त समय में से उनसे मिलने के लिए कुछ समय मांगा। समय मिल गया। उन्होंने गांधी को मिलने का कारण बताया तो गांधी जी ने उल्टे उनसे पूछ लिया – ये हॉकी क्या है? इसके बाद न्यूमन के लिए कहने को कुछ बचा ही नहीं। दूसरे गांधी जी का फोकस भी पूरी तरह से जनता को आंदोलनों के लिए जोडऩा था, लिहाजा वह अलग ट्रैक पर जाना भी चाहते थे। हालांकि बाद के बरसों में ध्यानचंद और हॉकी टीम का नाम पूरे देश की जुबान पर बार बार आता रहा। यहां तक कि कांग्रेस के कई बड़े नेता भी भारतीय हॉकी टीम और ध्यानचंद के मुरीद थे लेकिन लगता नहीं कि कभी ध्यानचंद की मुलाकात गांधी जी से हुई हो।

गांधी जी से निराशा मिलने के बाद भारतीय हॉकी संघ ने अपने तरीके से पैसा जुटाने की कोशिश की। इसके बाद पर्याप्त धन में काफी कसर थी। जिसके चलते आईएचएफ के अध्यक्ष एम हेमन और सचिव पंकज गुप्ता ने कलकत्ता में पंजाब नेशनल बैंक से मोटी रकम उधार ली। बाद में आईएचएफ से संबद्ध तमाम इकाइयों ने इस ऋण को उतारने की समेकित जिम्मेदारी ली। लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई। एक तरफ का टिकट तो हो गया लेकिन लौटने का टिकट नहीं हो पाया था। लौटने का टिकट यूरोप से हो, इसके लिए खिलाडिय़ों को भी कुछ बलिदान देने को कहा गया। ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा गोल में लिखा कि हमें हर सप्ताह मिलने वाली पॉकेटमनी को छोडऩे की शर्त रखी गई इसके अलावा एक और शर्त थी कि टीम मैनेजमेंट इस दौरे में ओलंपिक के मैचों के अलावा जो भी मैच रखेगा, उसे हमें खेलना होगा। टीम के सदस्य यूरोप होकर आने के लिए इतने लालायित थे कि उन्होंने तुरंत इन शर्तों पर सहमति दे दी। जो टीम 1932 के लास एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए जा रही थी, वो इस तरह थी। गोलकीपर – रिचर्ड जे एलन (बंगाल), एसी हिंड (पंजाब) बैक- सी टापसेल (बंगाल), एल सी हेमंड (यूपी), एस असलम (पंजाब), हाफबैक- एफ ब्रेविन (मुंबई), एस लाल शाह बोखारी (पंजाब-कप्तान), मसूद मिन्हास (पंजाब), ईसी पिनिगर (पंजाब), फारवर्ड – आर जे कार (रेलवे), गुरमीत सिंह (पंजाब), ध्यानचंद (आर्मी), रूप सिंह (यूपी), सैयद मोहम्मद जाफर (पंजाब), डब्ल्यूपी सुलिवन (मुंबई)।

इस टीम में बंगाल के केवल दो और पंजाब से सात खिलाडिय़ों के चयन पर बंगाल में नाराजगी भी थी। क्योंकि बंगाल न केवल लगातार इंटर प्रोविंशियल टूर्नामेंट करा रहा था बल्कि भारतीय हॉकी टीम को भेजे जाने में जरूरी आर्थिक मदद भी कर रहा था। ध्यानचंद ने भी महसूस किया कि टीम में बंगाल के कुछ अच्छे खिलाडिय़ों को और होना चाहिए था, वो इसके हकदार भी थे। भारतीय ओलंपिक टीम 14 मई 1932 को भोपाल में एकत्र हुई, जहां भोपाल के लोगों ने उसे शानदार रिसेप्शन दिया। भोपाल से टीम मुंबई रवाना हुई। इस बीच भारतीय टीम ने भोपाल में दो मैच खेले और फिर मुंबई में भी तीन मैच। सभी जगह उसने जीत हासिल की। सभी में ध्यानचंद और रूप सिंह ने शानदार खेल दिखाया। इसी तरह टीम ने बेगलूर और चेन्नई में भी वहां की टीमों के साथ मैच खेले, हालांकि ये सभी मैच इतने आसान भी नहीं थे। कई ऐसे मैच थे जो बराबरी पर भी छूटे।

चेन्नई से टीम श्रीलंका की राजधानी कोलंबो गई। टीम के पास इतना पैसा नहीं था कि वह लग्जरी होटलों में ठहरे, लिहाजा हमें श्रीलंका के रेलवे अधिकारियों ने टीम को सुविधाजनक स्थानों में ठहराया। यहां से टीम एन वाई के हारून मारू जहाज में सिंगापुर के लिए रवाना हुई। जहाज पर टीम का शानदार स्वागत हुआ। टीम ने तीसरे क्लास में यात्रा की। तीन दिन में टीम सिंगापुर पहुंच गई। वहां रह रहे भारतीयों ने टीम को हाथों हाथ लिया। इसके बाद टीम रास्ते में हांगकांग, शंघाई, जापान और हवाई में रूकी। सिंगापुर से हांगकांग की यात्रा के दौरान टीम के कई सदस्यों की तबीयत खराब हो गई। रास्ते में आ रहे लगातार तूफानों ने जहाज के यात्रियों की हालत पतली कर दी। जब टीम हांगकांग पहुंची तो वहां उन्हें इस ब्रिटिश कॉलोनी को घूमने का अवसर भी मिला।

ध्यानचंद लिखते हैं कि यद्यपि हांगकांग ब्रिटिश शासन के तहत था लेकिन वहां से लोगों में चीन के प्रति राष्ट्रभक्ति में कोई कमी नहीं थी। जब वह एक डिपार्टमेंटल स्टोर में पहुंचे तो स्टोर में चीनी लड़कियों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने इतने असरदार तरीके से उन्हें बताया कि उनके होजियरी के कपड़े जापान की तरह ही क्वालिटी मेें बेहतर और सस्ते हैं। उस समय मंचूरियन विवाद के कारण दोनों देशों में ठनी हुई थी। ध्यानचंद को एक बनियान खरीदनी थी लेकिन वो चीनी लड़कियों की बातों से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने कई बनियानें खरीद लीं। भारतीय हॉकी टीम लास एंजिल्स के रास्ते में जहां जहां से होते हुए गई, हर जगह उन्हें पर्याप्त संख्या में भारतीय मूल के लोग मिले। यहां तक की जब टीम जापान के कोबे पहुंची तो वहां भारतीय टीम का स्वागत करने वालों में क्रांतिकारी रास बिहारी बोस और शंकर सहाय भी मौजूद थे। हॉकी टीम जहां रुकती थी, वहां मैच भी खेलती थी। हर मैच में वह बड़े अंतर से जीत हासिल करती थी।

लास एंजिल्स पहुंची टीम

इस तरह यात्रा करते हुए टीम जब लास एंजिल्स पहुंची तो वह अमेरिकी जीवनशैली के प्रतीक इस शहर को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। ध्यानचंद ने अपनी आत्मकथा में लिखा, हमने हॉलीवुड में कुछ प्रसिद्ध स्टूडियो की यात्रा की जबकि कुछ लोकप्रिय हॉलीवुड स्टार्स से हमने खेलगांव में मुलाकात की। टीम ने वहां ला क्रेसेंट में रामकृष्ण मिशन के मंदिर की भी यात्रा की। एक और भारतीय योगी स्वामी योगानंद ने टीम को अपने आश्रम में दावत दी।

हार के डर से नहीं आई ब्रिटिश टीम

वर्ष 1932 ओलंपिक में हिस्सा लेने वाली हॉकी टीमों का स्तर इतना खराब था कि ध्यानचंद को अफसोस भी हुआ कि वो लोग क्यों यहां शिरकत कर रहे हैं। बाद में उन्हें पता चला कि हॉकी को 1928 में दोबारा ओलंपिक खेलों में शामिल किया गया है अगर भारतीय टीम 1932 के ओलंपिक में नहीं आती तो शायद हॉकी को ओलंपिक से निकाला भी जा सकता था। इस लिहाज से भारत का यहां आने का फैसला गलत नहीं था। इस बार भी ब्रिटेन की टीम ने यहां शिरकत इसलिए नहीं की, क्योंकि उसे साफ मालूम था कि ध्यानचंद के रहते हुए उसकी टीम की जीत मुश्किल है। हार का मतलब था ब्रिटिश राज के आत्मसम्मान को ठेस। लिहाजा ओलंपिक में ब्रिटेन के दूसरे खेलों की टीमों ने तो शिरकत की लेकिन हॉकी की टीम नहीं आई। ओलंपिक में चार अगस्त को भारत का जापान के खिलाफ मैच हुआ, जिसमें उसे 11-1 से जीत मिली। फाइनल में भारत का मुकाबला अमेरिका से था, जिसे भारतीय टीम ने 24-1 से हराया। इस मैच में ध्यानचंद ने आठ और रूप सिहं ने 10 गोल किए।

ध्यानचंद जिस तरह हॉकी खेलते थे और उनकी स्टिक के साथ गेंद नियंत्रण में रहती थी, लोगों को बड़ी हैरानी होती थी कि कोई अपने स्टिक से गेंद को बखूबी कैसे नियंत्रण में रख सकता है। उन्हें उनकी स्टिक जादू की छड़ी लगती थी। बाद के बरसों में कई बार उनकी स्टिक की जांच की गई, उसे तोड़ा गया और चुराया भी गया। लेकिन नतीजा यही रहता था कि ध्यानचंद के हाथों में कोई भी स्टिक दीजिए गेंद उसी तरह अगल-बगल घूमती थी।

लास एंजिल्स ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने के बाद भारतीय टीम यूरोप में जगह जगह मैच खेलती हुई वापस लौटी। टीम जब म्यूनिख में एक मैच खेल रही थी तो वहां एक भारतीय क्रांतिकारी चरकनाथ भी ठहरे थे। वह उसी होटल में थे, जिसमें भारतीय टीम थी। जब उन्होंने भारतीय टीम को यूनियन जैक लिए देखा तो इसका बहुत विरोध किया। (जारी है)