चाणक्य की दण्डनीति

प्रो.लल्लन प्रसाद

प्रख्यात आर्थिक विचारक एवं अध्यक्ष, कौटिल्य फाउंडेशन

न्यायाधीश को कौटिल्य अर्थशास्त्र में धर्मस्थ की संज्ञा दी गयी है। दण्डनीति धर्म पर आधारित होनी चाहिए। कानून सबके लिए समान हो। चाहे वह राजा का बेटा हो या आम आदमी, किसी अपराध के लिए जो दण्ड निर्धारित हो, वह सबके ऊपर समान रूप से लागू हो। अभियुक्त को अपने बचाव का पूरा अवसर दिया जाए। गवाहों के बयान उसकी उपस्थिति में हो, अभियोग सिद्ध होने पर सजा अवश्य दी जाए। गवाह झूठा बयान दे तो उसे भी सजा दी जाए, निर्दोष को न फांसा जाए। गलत इल्जाम लगाने वाले से जुर्माना वसूल किया जाए और निर्दोष को जो नुकसान हुआ हो उसकी भरपाई की जाए। न्यायाधीश उन्हीं लोगों को बनाया जाए जो कानून के जानकार हों, ईमानदार और स्वच्छ छवि के हों साथ ही साथ निर्भीक हो, सही निर्णय दे, किसी के दबाव में न आए। उनको अच्छा वेतन दिया जाए। लालच या दबाव में आकर निर्णय करने वाले न्यायाधीश दण्ड के पात्र समझे जाए। न्याय की सम्पूर्ण प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, अपराध मुक्त समाज की रचना तभी सम्भव है।

अपराधी समाज के लिए कांटा (कण्टक) होता है, उसे सजा दिलाने को चाणक्य ने ‘कण्टक शोधनÓ कहा है। अपराध छोटा हो या बड़ा अपराध है और अपराधी को सजा मिलनी चाहिये सजा अपराध के अनुरूप होनी चाहिए। कम भी नहीं और अधिक भी नहीं हत्या, डकैती, चोरी, बलात्कार जैसे बड़े अपराधों की सजा भी वैसी ही कठोर होनी चाहिए, दुस्साहस करने वालों को भी सजा मिलनी चाहिए। गाली गलौच, निन्दा, दूसरों को धमकाना आदि को चाणक्य ने ‘वाकपारूष्यÓ अपराध की संज्ञा दी। काने, गंजे, लंगडे, लूले आदि को काना, गंजा लंगड़ा कहकर सम्बोधित करना शिष्टाचार के विरूद्ध है, इसलिए दण्डनीय है। ऐसे सम्बोधन करने वालों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए। एक दूसरे के व्यवसाय की निंदा करने वाले, अपने देश समाज और पूजा स्थलों की निन्दा करने वाले भी दण्ड के पात्र बनते हैं।

सरकारी अधिकारी, व्यवसायी, शिल्पी, कार्मिक जनता का शोषण न करें इसकी जिम्मेदारी राज्य पर है। जनहित के विरूद्ध काम करने वालों को दण्ड मिलना चाहिए दण्ड कितना हो, किस प्रकार का हो, इसका निर्णय अपराध के अनुसार होना चाहिए। राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों का आचरण शुद्ध हो, तभी वे दण्ड व्यवस्था के द्वारा जनता को सही रास्ता दिखा सकते हैं। अपराधी कर्मचारियों को दण्ड से शुद्ध करना आवश्यक है।

उच्च पदों पर बैठे लोग अपने अधिकार का दुरूपयोग कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में चाणक्य नीति स्पष्ट और व्यावहारिक है। उनको ऐसा करने से रोकने के लिए शासन को सतर्क रहना चाहिए। ऐसे लोगों की तुलना वे पानी में तैरती मछली से करते हैं। मछली जल की कुछ बूंदें कब पी जायगी, पता लगाना आसान नहीं है। वैसे ही राजकोष से सम्बन्धित अधीकारी कब घपला कर बैठें कहा नहीं जा सकता। इसके लिए उन्होंने खुफिया जानकारी की व्यवस्था सुझाई और अपराधियों के लिए दण्ड की व्यवस्था भी निर्धारित की। राज्य के अधिकारी जनता को कष्ट न पहुचाएं इसको भी उन्होंने प्राथमिकता दी। आयकर अधिकारी उतना ही टैक्स वसूल करे जितना निर्धारित हो, सही समय और सही रूप में टैक्स का निर्धारण करें। बगीचे के माली का उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा है कि माली फल फूल तभी तोड़ता है जब पक जाते हैं, प्रफुल्लित हो जाते हैं और उनके तोडऩे से पौधे को नुकसान नहीं होता। समय के पहले कच्चे फल फूल तोड़कर न तो बाग की न पौधे की भलाई करता है। उसका उद्देश्य पौधे को स्वस्थ और सुरक्षित रखना होता है न कि उसे कोयले में परिवर्तित करना। कर विभाग के अधिकारी राज्य और करदाता दोनों का अहित करते हैं यदि करदाता कर शोषण करते है। उसे कष्ट देते हैं, अनुचित ढंग से वसूली करते हैं, ऐसी स्थिति में वे दण्ड के भागी होते हैं।

न्याय प्रक्रिया में जनता का विश्वास हो इसके लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों का आचरण और व्यवहार उदाहरणीय हो। क्षीर नीर का विवेक वे तभी रख पायेंगे जब निष्पक्ष हों, निर्भीक हों और स्वयं कानून का पालन करने वाले हों, लालच और स्वार्थवश फैसले न करें। अभियुक्त या अभियोक्त को डराएं या धमकाएं नहीं, उनकी बोली बन्द करने का प्रयास न करें। रिश्वत न लें, गवाहों से पूछने योग्य बातें ही पूछें, अप्रासंगिक बातें न पूछे, गवाह की बात में अपनी बात डालने की कोशिश न करें, निर्णीत मामलों को बारबार स्वयं न उठाएं, बातों में साक्षी को उलझाएं न रखें आदि। न्यायधीश यदि किसी निरपराधी को जानबूझकर दण्ड दे तो उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए। यह सजा निर्धारित दण्ड से दो गुनी से आठ गुनी तक हो सकती है। न्यायाधीश का मुहर्रिर यदि कहा हुआ बयान दर्ज न करके गलत बयान दर्ज करता है, कथन का अर्थ बदल देता है तो सजा का भागी होता है। जेलर यदि किसी अपराधी को रिश्वत लेकर छोड़ देता है या उसको जेल में ऐसी सुविधाएं देता है जो कैदियों के लिए वर्जित है तो वह भी सजा का पात्र बनता है। न्यायाधीश लोकप्रिय तभी होता है, जब छल कपट से रहित, सबको समान अवसर देते हुए न्याय करता है।

व्यापारी खरीददारों का शोषण न करें। उन्हें लूटने का प्रयास न करें, इसके लिए कौटिल्य अर्थशास्त्र में समुचित प्रावधान है। घटिया वस्तु को अच्छा बताना, माप तौल में गड़बड़ी करना, जानबूझकर कम तौलना, अप्रमाणित बाट इस्तेमाल करना, बनावटी नकली माल को असली बताना, कोई माल दिखाना और उसकी जगह काई और माल देना और मुनाफाखोरी आदि दण्डनीय माना गया है। लकड़ी, लोहा, हीरे-जवाहारात, चमड़ा, सूत, ऊन आदि पदार्थों को जो घटियां किस्म के हैं, उन्हें बढिय़ा बता कर बेचने पर वस्तु के कीमत का आठ गुना तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

बाजार प्रबन्ध के लिए सरकारी अधिकारी नियुक्त किया जाता है जिसे संस्थाध्यक्ष की संज्ञा दी गई है। उसे अधिकार है कि वह तराजू, बाट और नाप के बर्तनों का निरीक्षण करे। व्यापारियों को सही ढंग से करने के लिए प्रेरित करें और उचित निर्देश दे। व्यापारी आपस में मिलकर बाजार भाव बढ़ा दें, अनाधिकृत वस्तुएं बेचें, अधिक मुनाफा खाएं और ऐसी हरकतें करें जिससे खरीददारों को नुकसान हो, उन पर अनावश्यक बोझ पड़े, ये सब कार्य दण्डनीय माने गए है। जुर्माना की रकम अपराध के अनुसार निर्धारित करने के प्रावधान है।

शिल्पी, जुलाहे, दर्जी, धोबी, सुनार, वैद्य, मनोरंजन करने वाले और भी सेवाएं देने लोग सही कीमत पर अच्छी सेवाएं दें। इसके लिए भी अर्थशास्त्र में समुचित व्यवस्था की गई है अधिक कीमत लेकर कम या घटिया सेवा देना दण्डनीय माना गया है। जुलाहा जितना सूत बुनता है उतनी ही मजदूरी का हकदार होता है न कम न ज्यादा। मजदूरी सूत के प्रकार पर निर्भर करेगा, रेशमी वस्त्र की बुनाई सूती से अधिक होगी। धोबी यदि कपड़ा बदल देता है तो कपड़े के मूल्य का दुगुना जुर्माना लगाया जा सकता है। कपड़े समय सीमा के अन्दर न देने पर भी जुर्माना हो सकता है। यह बात दर्जियों के लिए भी लागू होती है। सुनार धोखाधड़ी न करें। इसके लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था है। शुद्ध सोना-चांदी में नकली धातु मिलाना, चुराना, बनाई की मजदूरी निर्धारित से अधिक लेना आदि दण्डनीय है। अपराध के अनुसार जुर्माना लगाना जाना चाहिए। वस्तुओं के पारखी यदि खरे को खोटा और खोटे को खरा कहें तो दण्ड का पात्र बनते हैं। गलत इलाज या आपरेशन के लिए वैद्य जिम्मेदार होगा और यथोचित दण्ड का भागी होगा। अपनी कला के प्रदर्शक और मनोरंजन करने वालों पर भी अपनी सेवाओं के एवज में नाजायज कीमत बसूलें तो दण्डनीय है।

श्रमिक जहां एक ओर उचित मजदूरी समय सीमा में प्राप्त करने के अधिकारी है वहीं उनका उत्तरदायित्व भी है कि वे जितना पारिश्रमिक लेते है उतना काम करें, काम बीच में छोड़कर न भागें जब तक कि कोई ऐसी विवशता न हो जो टाली न जा सके। मालिक की सम्पत्ति को नुकसान न पहुंचाएं, जिम्मेदारियां ईमानदारी से न निभाने पर वे भी दण्ड के पात्र होते हैं। दान लेने एवं देने के सम्बंध में भी नियम बनाए गए हैं। जिससे देने वाले और लेेने वाले दोनों को किसी प्रकार की हानि न हो यदि भय, निन्दा और रोग आदि के कारण दान दें या लें। उसे चोरी समझा जाए और दण्डित किया जाए। किसी वस्तु का स्वामी न होते हुए भी उसे बेच देना, किसी का खोया हुआ या चोरी किया माल सम्बन्धित सरकारी विभाग में जमा न करना दण्डनीय है मिथ्या आचार विचार फैलाने वाले साधू भी दण्ड के पात्र है।

डाका डालने, वस्तुओं के अपहरण करने, स्त्री पुरूष को जबरदस्ती बन्धक बनाने, धमकी देकर अवांछित कर्म करने की सजा कठोर होनी चाहिए। शारीरिक प्रताडना देने वाले, मारने-पीटने, घसीटने, लहु लुहान करने अंगभंग करने, समूहिक रूप से किसी को पीटने, किसी के घर में घातक वस्तु फेंकने, गाय भैंस और छोटे छोटे जानवरों को चोट पहुंचाने आदि के लिए अर्थशास्त्र में समुचित दण्ड की व्यवस्था है द्यूत क्रीड़ा में बेइमानी और छलकपट के लिए भी सजा का प्रावधान है। गिरवी रखी वस्तुएं ठीक समय और स्थान पर दिया घन वापस मिल जाने पर भी न लौटाना दण्डनीय माना गया है। छोटे पशुओं को बधिया बनाना, विधवा के साथ बलात्कार दण्डनीय अपराध है।

फौजदारी के मुकदमों के बारे में अर्थशास्त्र में दिये गए कुछ निर्देश उल्लेखनीय है। अदालत में कोई पक्ष पहले जाए या बाद में मुकदमे का फैसला सबूतों के आधार पर ही होना चाहिए। यदि पीडि़त पक्ष के पहले हानि पहुंचने वाला पहले अदालत में जाता है तो उसे इसका लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। प्रतिवादी से जब प्रश्न पूछा जाए उसी समय उसे जबाव देना अनिवार्य है। दो व्यक्तियोंं को झगड़े में फंसा देखकर तीसरा व्यक्ति उनका माल उड़ा लेने का प्रयास करे तो उसे दण्डित किया जाए। मुकदमे में गवाह न मिले तो परिस्थितियों की जांच करके निर्णय करें जैसे शरीर पर चोट के निशान या भीतरी चोट प्रतिवादी यदि जवाब देने में असफल हो तो उसकी हार मानी जाए। अपराध पुराना हो या नया, धर्मस्थ के सामने जब भी आये कानून के अनुसार निर्णय किया जाए। चाणक्य का मानना है कि अपराधी को हर हालत में सजा अवश्य मिलनी चाहिए दण्ड अपराध के अनुपात में होनी चाहिए। अति कठोर दण्ड से लोग शासन से उद्धिग्न हो जाते है किन्तु दण्ड में ढिलाई करने से लोग शासन की अवहेलना करते हैं इसलिए समुचित दण्ड की व्यवस्था आवश्यक है।