आत्मविश्वास से बढ़ेगा आयुर्वेद का गौरव

यहां प्रस्तुत है विश्व आयुर्वेद कांग्रेस के समापन समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिये गये भाषण का मूल पाठ

 

विश्व आयुर्वेद कांग्रेस की इस बार थीम है कि हेल्थ चैलेंजेज एंड आयुर्वेद। आपने बहुत सारी बातें की होगी लेकिन मुझे सबसे बड़ी चुनौती लगती है, कि शत-प्रतिशत आयुर्वेद को समर्पित, ऐसे आयुर्वेद के डॉक्टर मिलना मुश्किल हो गया है। उसको खुद को लगता है, भई अब इससे तो कोई चलने वाली गाड़ी नहीं है। अब तो एलोपैथी के रास्ते पर जाना ही पड़ेगा और वो मरीज को भी बता देता है कि ऐसा करते है शुरू के तीन दिन तो एलोपैथी ले लो बाद में आयुर्वेद का देखेंगें। मैं समझता हूँ कि आयुर्वेद के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह मानसिकता है। अगर आयुर्वेद को जानने वाले व्यक्ति की आयुर्वेद के प्रति प्रतिबद्धता नही होगी, उनका समर्पण नही होगा, आत्मविश्वास नही होगा, तो वे मरीज में विश्वास कैसे भर पाएंगे। हम जब छोटे थे तो एक चुटकला सुना करते थे कि कोई यात्री किसी शहर में गया और किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने गया और फिर उसने पूछा मालिक कहां है। तो उसने कहा मालिक सामने वाले होटल में खाना खाने गए हैं। तो उस रेस्टोरेंट में कौन खाएगा? जिसको अपने पर भरोसा नहीं है, अपने पर भरोसा नहीं है, अपनी परंपरा पर भरोसा नहीं है, वो औरों में भरोसा नहीं जगा सकते। संकट आयुर्वेद का नहीं है, संकट आयुर्वेद वालों का है।

आयुर्वेद ऐसा क्षेत्र नहीं है जो एक सर्टिफाइड डॉक्टर तक सीमित हो। हमारे पूर्वजों ने स्वास्थ्य को जीवन का एक हिस्सा बना दिया था। आज हमने जीवनचर्या और स्वास्थ्य के लिए कहीं आउटसोर्स किया हुआ है। पहले स्वास्थ्य को आउटसोर्स नहीं किया गया था। वह जीवनचर्या का हिस्सा था और उसके कारण हर व्यक्ति, हर परिवार अपने शरीर के संबंध में जागरूक था। समस्या आए तो उपाय क्या हो, उस पर भी जागरूक था।

इसलिए पहली आवश्यकता यह है कि मैं अगर आयुर्वेद क्षेत्र का विद्यार्थी हूं, आयुर्वेद क्षेत्र का डॉक्टर हूं, मैं आयुर्वेद क्षेत्र का टीचर हूं या मैं आयुर्वेद क्षेत्र में मेडिसन का मैन्यूफैक्चरिंग करता हूं या मैं होलिस्टिक हेल्थ केयर को प्रोमोट करने वाला हूं, मैं किसी क्षेत्र से हूं, उसमें मेरा कोई कम्प्रोमाइज नहीं होना चाहिए। मेरी शत-प्रतिशत प्रतिबद्धता होनी चाहिए और अगर हम शत-प्रतिशत प्रतिबद्धता लेकर चलते हैं, आप देखिए परिणाम आना शुरू हो जाएगा। कुछ न कुछ निगेटिव कारण ऐसे पैदा हुए हैं कि जिसके कारण परेशान लोग, थके-हारे लोग, जिस रास्ते पर चल पड़े थे, वहां से वापस लौटकर के बैक टू बेसिक की तरफ जा रहे हैं, होलिस्टिक हेल्थ केयर के नाम पर। उनको लग रहा है कि भई आज का जो मेडिकल साइंस है, शायद तुरंत हमें राहत तो दे देता होगा, लेकिन स्वास्थ्य की गारंटी नहीं देता है। अगर स्वास्थ्य की गारंटी है तो मुझे वापस होलिस्टिक हेल्थ केयर में जाना पड़ेगा। तो चाहे नेचुरोपैथी हो, आयुर्वेद हो या आहार-विहार के धर्म का पालन करना हो, या मुझे होम्योपैथी की ओर जाना हो। कुछ-न-कुछ उस दिशा में चल पड़ता है। क्या हम सब मिलकर एक आंदोलन नहीं चला सकते, एक कोशिश नहीं कर सकते, एक दबाव पैदा नहीं कर सकते कि एक आयुर्वेद सत्र में काम करने वाले लोगों को शोध निबंध के लिए लगातार आग्रह किया जाए। यह व्यवस्था का हिस्सा हो कि अगर कोई आयुर्वेद का प्रोफेसर या विद्यार्थी है तो उसको दो साल में एक बार किसी न किसी एक विषय पर गहराई से अध्ययन करके आधुनिक शब्दावली में शोध निबंध लिखना ही पड़ेगा। किसी अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में वो शोध निबंध छपना ही चाहिए। या फिर हमें यह कहना चाहिए कि इंटरनेशनल मेडिसीन की जितनी पत्रिकाएं हैं, उनमें कम से कम 10 प्रतिशत जगह तो आयुर्वेद के लिए दें। उनकी बराबरी में हमारे शोध निबंध अलग प्रकार के होंगे। लेकिन हमारे शोध निबंधों के लिए जगह होगी तो दुनिया का ध्यान जाएगा।

जब पंडित नेहरू प्रधानमंत्री थे, तब उस जमाने में तो इन सारी चीजों पर समाज जीवन का रूप भी अलग प्रकार का था। तो सरकार ने उस समय सोचा कि भई आयुर्वेद के प्रोत्साहन के लिए क्या किया जाए। तो एक हाथी कमीशन बना था। जय सुखलाल हाथी करके उस समय एक केंद्र सरकार में मंत्री थे और हाथी कमीशन को काम दिया गया था कि आयुर्वेद को पुनर्जीवित करने के लिए। शायद 1960 के आसपास की वो रिपोर्ट है। उस रिपोर्ट के पहले पेज पर जो सुझाव आया है, बड़ा रोचक है। उसमें कहा गया कि भई अगर आयुर्वेद को आपको प्रचारित करना है तो उसकी पैकेजिंग को बदलना पड़ेगा, क्योंकि वो पुडिय़ा, वो सारे जड़ी-बूटियां, थैला भरकर के ले जाना, फिर उबालना, फिर दो लीटर पानी से उबालो, फिर वो आधा होना चाहिए, फिर रातभर रखो, फिर उबालो, फिर आधा हो, यह सामान्य लोगों के गले नहीं उतरता था। उन्होंने लिखा है कि इसको ऐसी पैकेजिंग व्यवस्था में रखना चाहिए, ताकि सामान्य मानव को सहज रूप से उपलब्ध हो। धीरे-धीरे हमारे यहां बदलाव आया है। आज आयुर्वेद की दवाई खाने वालों को वो अब परेशानियां नहीं कि जड़ी-बूटियां उबाले और फिर कुछ निकाले। अब तो उसको रेडीमेड चीजें मिल रही हैं। गोली के रूप में मिल रही है। इसलिए आयुर्वेद क्षेत्र में अध्ययन करने वाले लोग और आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण करने वाले लोगों द्वारा साल में एक-दो बार संयुक्त प्रयास होने चाहिए। दवाईयों का निर्माण कैसे हो, उस पर सोचा जाए।

उसी प्रकार से आज हम जितनी मात्रा में शास्त्रों में पढ़ते थे क्या उतने औषधीय पौधे उपलब्ध हैं? यह बहुत बड़े शोध का विषय है। कई ऐसी दवाइयां होगी जिसका शास्त्र में मूल लिखा होगा कि फलाने वृक्ष या पौधे में से या मूल में से यह दवाई बनती है। आज उस वृक्ष को ढूंढने जाओंगे, उसका वर्णन देख कर खोजोगे तो प्राप्त क्या होगा? मुझे इस बात का अनुभव इसलिए है कि मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था तो मैंने एक तीर्थंकर वन बनाया था। जैन परंपरा में जो 24 तीर्थंकर हुए हैं, उनको किसी न किसी वृक्ष के नीचे आत्मज्ञान हुआ था। तो मैंने सोचा कि तीर्थंकर वन बनाऊंगा, इन 24 वृक्षों को लाकर के वहां लगाऊंगा। मैंने खोजना शुरू किया और मैं हैरान हो गया। मैं इंडोनेशिया तक गया खोजने के लिए, लेकिन 24 के 24 वृक्ष मुझे नहीं मिले। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे सामने एक बहुत बड़ी चुनौती यह है कि आयुर्वेद के मूलाधार औषधीय पौधों की रक्षा। उसमें हम किस प्रकार से आगे बढ़े, यह सोचें।

आप लोगों को कभी भावनगर जाने का अवसर मिले तो पालिताना जैन तीर्थ क्षेत्र जरूर जाएं। वहां जब मैं गुजरात में था, तो हमने पावक वन बनाया था। उस पूरे गार्डन का प्रारूप मनुष्य के शरीर जैसा बनाया है। करीब दो सौ मीटर लम्बा है। शरीर के जो अंग हैं, उस अंग के साथ जिस औषधि का संबंध आता है, वो पौधा वहां लगाया है। अगर हृदय है तो हृदय से जुड़े हुए सारे पौधे उस जगह पर लगाए हैं। अगर घुटने हैं वहां पर घुटनों के दर्द से संबंधित पौधे लगाए हैं। कोई भी व्यक्ति उस गार्डन में जाएगा तो उसको सहज रूप से पता चलता है कि हां भई यह औषधि है। इससे बनने वाली औषधि मेरे शरीर के इस हिस्से को काम आती है।

ये देश ऐसा है कि जिसमें करोड़ों भगवानों की कल्पना की गई है। और हमारे यहां तो जैसा भक्त वैसा भगवान है। अगर भक्त पहलवान है, तो भगवान हनुमान है। और भक्त अगर पैसों का पुजारी है, तो भगवान लक्ष्मी जी है। अगर भक्त ज्ञान में रूचि रखता है तो भगवान सरस्वती है। यानी हमारे यहां जितने भक्त, उतने भगवान इस प्रकार का माहौल है। और इसलिए एक विशेषता ध्यान में रखिए। हमारे यहां जितने भगवानों की कल्पना की गई है, हर भगवान के साथ कोई न कोई वृक्ष जुड़ा हुआ है। देखिए कैसा पर्यावरणानुकूल समाज था? उस की कल्पनाएं कैसी थी? ईश्वर का कोई भी ऐसा रूप नहीं है, जिसके साथ कोई न कोई पौधा नहीं जुड़ा होगा और कोई न कोई पशु-पक्षी जुड़ा न हुआ हो। यह सहज ज्ञान प्रसारित कर देने के मार्ग थे। उन्हीं मार्गों के आधार पर यह आयुर्वेद जन सामान्य का हिस्सा बना हुआ था। हमारी आस्थाएं अगर उस प्रकार की होती है तो हम चीजों को बदल सकते हैं।

मैं मानता हूं कि आज जो दुनिया, एक बहुत बड़ा चक्र बदला है। अगर गत 50 वर्ष एलोपैथी ने जगत पर कब्जा किया है तो उससे तंग आई हुई दुनिया आज होलिस्टिक हेल्थ केयर की तरफ मुड़ चुकी है। अन्नमय कोष और प्राणमय कोष की चर्चा आज विश्व के सभी स्थानों पर होने लगी है और मेडिकल साइंस अपने आपको एक नए रूप में देखने लगा है। हमारे पास यह विरासत है। लेकिन इस विरासत को आधुनिक संदर्भों में फिर से एक बार देखने की आवश्यकता है। उसमें बदलाव की आवश्यकता है। और यह हम कर पाते हैं तो हमारे सामने जो चुनौतियां हैं, उनको हम भली-भांति संभाल सकते हैं।

आज यहां बैठै हुए लोग भी कुछ बातों पर तालियां भी बजा रहे हैं। पीछे छात्र बहुत बड़ी मात्रा में है। लेकिन फिर अंदर तो दिमाग थोड़ा हिलता होगा। पता नहीं कैरियर कैसा बनेगा? ये पुडिय़ा से जिंदगी चलेगी क्या? यह उनके दिमाग में चलता होगा जी। यहां से मंथन के बाद भी जाएंगे तो भी वो दुविधा नहीं जाएगी। यार ठीक है, अब डॉक्टर तो नहीं बन पाए, वैद्यराज बन रहे हैं। लेकिन अब कुछ तो गाड़ी चलाने के लिए करना पड़ेगा। लेकिन उसके बावजूद भी, मैं खासकर के इन नई पीढ़ी के लोगों को कह रहा हूं, निराश होने का कोई कारण नहीं है। हमारे सामने एक उदाहरण है, उस उदाहरण से हम सीख सकते हैं।

जिस भारत की धरती पर योग की कल्पना की गई थी, जिस भारत ने अपने योग विश्व को दिया, उसी भारत में हम लोगों ने मान लिया था योग हमारा काम नहीं है। यह तो हिमालय में रहने वाले ऋषि मुनियों का गुफाओं में बैठकर के साधना करने वाला प्रकल्प है। यही हमने सोच लिया था और एक प्रकार से सामान्य जन उससे अलग रहता था। क्या कभी किसी ने कल्पना की थी कि आज से 30 साल पहले योग की जो अवस्था थी, आज योग विश्वभर में चर्चा के केंद्र में पहुंचेगा? क्या कारण है कि आज दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां जिस प्रकार से सीईओ रखते हैं, उसी प्रकार से एक स्ट्रेस प्रबंधन का विशेषज्ञ भी रखती हैं। क्यों? फ्र स्टेशन और अवसाद के कारण व्यक्ति के जीवन में जो संकटों की घडिय़ां आती हैं तब वो शाश्वत शांति का रास्ता खोजता है और उसके लिए विश्व में एक श्रद्धा का केंद्र बना कि योगा से शायद मुझे शान्ति मिल जाएगी। जिस योगा से हम भी जुडऩे को तैयार नहीं थे, उस योगा से अगर आज दुनिया जुड़ गई है तो जिस आयुर्वेद से हमारे यहां आज उदासीनता है, कल उस आयुर्वेद से भी दुनिया जुड़ सकती है। हमारे सामने जीता-जागता उदाहरण है। यह आत्मवविश्वास जब हमारे भीतर होगा तभी तो हम सामान्य लोगों के भीतर आयुर्वेद के प्रति आस्था पैदा कर सकते हैं। इसलिए हमारी यह कोशिश रही, तो मुझे विश्वास है कि उसका फायदा होगा।

एक संकट और मैं देख रहा हूं। आयुर्वेद अच्छा करे, करना भी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से हमने आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों जैसे कोई दुश्मन हों, इस प्रकार का माहौल बना दिया। हमारी पूरी शब्दावली ऐसी है। यह शब्दावली बदलनी होगी। हम भी तो विवाद करते रहते है भई आयुर्वेद जो है वो मूल से बीमारी को दूर करता है और एलोपैथी तो भई ऊपर-ऊपर आराम देता है और दुत्कारते हैं और फिर उसे ही अपनाते हैं। जब तक हम यह न कहे कि एलोपैथी एक रास्ता है लेकिन आयुर्वेद यह जीवन-पद्धति है। हमें फायदा इस बात में है। अगर नई बीमारियां आएगी तो एलोपैथी वाले संभाल लेंगे। लेकिन बीमारियां न आए, वो तो आयुर्वेद ही संभाल सकता है। आप देखिए, बड़े से बड़ा डॉक्टर क्यों न हो, सर्जन हो लेकिन उसके घर में पोता होता है और पोते को दांत आने वाले होते हैं तो वह भी होम्योपैथी के डॉक्टर के यहां जाता है। वो अपना रास्ता छोड़कर के अपने बच्चे की भलाई के लिए रास्ता बदलता है। विश्वास बहुत बड़ी चीज है।

मैं एक घटना से बड़ा परिचित हूं। मैं गुजरात में रहता था तो वहां एक डॉक्टर वणीकर थे, अब तो उनका स्वर्गवास हो गया। शायद वो गुजरात के पहले पैथोलॉजी के एम.एस. थे और विदेशों में पढ़कर के आए थे। उनका पैथोलॉजी लेबोरेट्री चलता था। उनके परिवार में एक बच्चा बीमार हो गया। बहुत छोटा बालक था। शायद दो तीन-महीने हुए होंगे और कुछ ठीक ही नहीं होता था। तो एक वैद्यराज के पास ले गए। सारा परिवार एलोपैथी के लोग थे। थक गए तो एक वैद्यराज के पास ले गए। उस वैद्यराज जी को मैं जानता था। उन्हों ने बच्चे को देखा और पत्नी को कहा कि हलवा बनाकर ले आओ। तो यह कहने लगे, नहीं-नहीं हम लोग तो नाश्ता करके आए हैं। हल्वा-वल्वा नहीं। उन्होंने कहा, मैं तुम्हारे लिए नहीं बना रहा हूं, मैं बच्चे के लिए बना रहा हूं। बच्चा‍ तो तीन महीने का है उसको हलवा खिलाओगे आप। जो भी औषधी वगैरह डालनी होगी उनकी पत्नी को मालूम होगा, तो चम्मचभर हलवा बनाकर के ले आई और खुद वैद्यराज जी ने उस बच्चे को उंगली पर लगा लगाकर के, उसके मुंह में चिपकाते रहे। उसको थोड़ा-थोड़ा आधे घंटे तक कोशिश कर करके थोड़ा बहुत डाला। तीन दिन के अंदर उसके जीवन में परिवर्तन आना शुरू हो गया। कहने का तात्पर्य है कि इस शास्त्र में कोई ताकत तो है। मुसीबत हमारे भरोसे की है। एक बार हमारा भरोसा हो जाए तो यह ताकत चौगुना हो जाएगी और दुनिया उसको जीवनशैली के रूप में स्वीकार करेगी।

दूसरी सबसे बड़ी बात है, यह सबसे सस्ती दवाई है। महंगी दवाई नहीं है। मैं भी अब इन दिनों चुनाव में भाषण करता हूं, गला खराब होता है तो पचासों फोन आते हैं, आप हल्दी ले लीजिए। कहने का तात्पर्य है कि इतनी सहज व्यवस्था हमारी विकसित हुई थी उसमें फिर एक बार प्राण भरने की आवश्यकता है।

मैं समझता हूं कि आपके इस दो-तीन दिन के समारोह में बहुत सी ऐसी चीजें आपके ध्यान में आई होगी। उसके आधार पर आप कोई न कोई योजना बनाएंगे। भारत सरकार के रूप में इस प्रकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में पूरा सहयोग रहेगा, उसको आगे बढ़ाने में पूरा समर्थन रहेगा। मेरी आप सबको स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं हैं, डॉक्टर का स्वास्थ्य पहले अच्छा‍ रहना चाहिए ना और दूसरा आपसे मेरी आग्रह भरी विनती है कि आप आयुर्वेद को समर्पित भाव से ही स्वीकार कीजिए। सिर्फ एक व्यवसाय के रूप में नहीं। यह समाज कल्याण के लिए बहुत बड़ा परिवर्तन लाने के लिए है। इस विश्वास से आगे बढि़ए।