व्यवस्थापरिवर्तन के लिए सुराज चाहिए

“स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है”
इस नारे के साथ देश की आजादी के लिए लाखों युवा देशभक्तों ने स्वयं को बलिदान किया था। स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना, आन्दोलन, अहिंसा तथा ”सठे साठ्यम समाचरेत” का व्यवहार करके स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा था। भारत स्वतंत्र तो हो गया किन्तु स्वराज नहीं आया। भारत के लोगों के शरीर तो स्वतंत्र हो गए पर उनका मन गुलाम हो गया। भारत की शैक्षणिक व्यवस्था पर अपने राजा की नीतियों का प्रभाव होने लगा। भारत के पहले प्रधानमंत्री बने नेहरू जी को न तो भारत की परम्पराओं का पता था और न ही भारत के इतिहास का। अगर उन्हें इतिहास का ज्ञान होता तो वह ” लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया” का विचार नहीं रखते। समृद्ध भारत, कुशल वैज्ञानिकों का भारत, परम्पराओं में विज्ञान को जीने वाला भारत, दुनिया भर में सबसे अधिक जी.डी.पी. रखने वाला भारत, अनेकों विश्व विद्यालयों के कारण शिक्षा का केन्द्र माना जाने वाला भारत, उन्नत कृषि वाला भारत, कभी भी जंग न लगने वाला लोहा बनाने वाला भारत, अन्तरिक्ष की सटीक गणना करने वाला भारत, केवल आहार विहार तथा स्वस्थ जीवन शैली को जीकर स्वस्थ रहने वाला भारत, दुनिया को अंकों की गणना सिखाने वाला भारत न जाने कितनी ही उपलब्धियों वाला भारत केवल देश के प्रथम प्रधानमंत्री की विदेशी आचार-व्यवहार के कारण हजारों वर्ष पिछड़ गया। 1947 के पश्चात नई भाषा, नई जीवन शैली, नई शिक्षा व्यवस्था, सब कुछ बदल देने वाली व्यवस्थाओं का जन्म हो गया। परिणाम हमारे सामने है कि हम दुनिया के सामने बौने हो गये। हमारी गणना भ्रष्ट देशों में होने लगी। जो स्वतंत्रता से पहले तक जी.डी.पी. के अनुसार अमीर था वह गरीबी के निचले पायदानों में आ गया। हम ऐसे देश में रह रहें हैं जहां प्राकृतिक संसाधनों की बिल्कुल कमी नहीं है न ही काम करने वाले हाथों की। यह विश्वास से कहा जा सकता है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत इन नई व्यवस्थाओं के लिए तैयार नहीं था।
आज तर्क दिया जाता है कि भारत दुनिया के सामने छाती तान कर खड़ा है, कहां खड़ा है? अमेरिका जैसा 24 करोड़ की आबादी वाला उधार की भारतीय बौद्धिक सम्पदा का उपयोग करने वाला देश भारत के शासकों तक के कपड़े उतरवा देता है। समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन सी छाती है और किसकी छाती है जो तानकर भारत खड़ा है। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि हम भी उधार की व्यवस्थाओं के साथ जी रहे हैं। उधार की व्यवस्थाओं तथा उधार की भाषा पर जीने वाला कभी अगुवा नहीं बन सकता न ही उसे सम्मान मिल सकता है। सम्मान से खड़े होने का आधार होता है अपनी ही व्यवस्थाओं को आधुनिक बनाकर, अपनी संस्कृति को और संस्कारित करके, अपनी भाषा के कोश को मजबूत करके, अपनी परम्पराओं को और वैज्ञानिक करके। यह हो तभी सकता है जब हम स्वराज को समझें और स्वराज को जिएं। स्वराज की नीव मजबूत करने के लिए गुमनाम रहकर शिल्पकार बनना पड़ता है। जो लोग भारत की नीव को भारत के अपने ईट-गारे से मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं वास्तव में वह ही असली भारत भाग्य विधाता है। वही लोग स्वराज की कल्पना को साकार करने वाले हैं। स्वराज केवल अंग्रेजों को भारत से भगाने का नारा था। जिसे आज भारत की अनियन्त्रित व्यवस्था को बदलने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। भ्रष्टाचार भगाना तथा विकास को छोटी इकाईयों तक फै लाने भर से स्वराज आ जायेगा क्या  इसमें संदेह है। कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना से यह स्वराज नहीं आने वाला। भ्रष्टाचार हटाने के लिए सुराज का होना आवश्यक है। सुराज के लिए विचारों में ईमानदारी और दृढ़ता जरूरी है जो वर्तमान व्यवस्थापरिवर्तन की बात करके प्रसिद्ध होने वालों में नहीं दिखाई पड़ती। आज आवश्यकता है श्री धरन जैसे दृढ़ और ईमानदार सोच की जो समस्यायों से बार बार भागते नहीं अपितु काम करके व्यवस्थापरिवर्तन के अगुवा बन जाते हंै।