भारतीय नववर्ष पृथ्वी का जन्मोत्सव

{jathumbnail off} भारतीय नववर्ष का पहला दिन सृष्टि रचना की शुरुआत का दिन है। इसलिए इसे पृथ्वी का जन्मदिन माना जा सकता है और इसी रूप में मनाया भी जाना चाहिए। पृथ्वी के जन्मोत्सव भारतीय नववर्ष को हम पर्यावरण दिवस के रूप में भी मना सकते हैं। भारतीय काल गणना किसी पंथ विशेष की न होकर वैज्ञानिक तो है ही, साथ ही साथ तार्किक और हितकारी भी है। यह  राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। अंग्रेजी यानी कि ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र २००० वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है, जबकि यूनान की काल गणना 3579 वर्ष, रोम की 2756 वर्ष, यहूदी 5767 वर्ष, मिश्र की 28670 वर्ष, पारसी लगभग एक लाख 98 हजार वर्ष तथा चीन की लगभग 9 करोड़ 60 लाख 2 हजार वर्ष पुरानी है। इन सभी से पुरानी भारतीय काल गणना में पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ २9 लाख 49 हजार 10४ वर्ष है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में तब से लेकर आज तक के एक-एक पल की गणना की गयी है। विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी मत-पंथ से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है।

हमारी काल गणना का आधार वैदिक विज्ञान है। वेद ज्ञान के स्रोत हैं। अधिकतर भारतीय वैज्ञानिक प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को महान तो अवश्य मानते हैं किन्तु उसके छोटे से अंश को ही विज्ञान मानते हैं। इसका कारण यह है कि सैकड़ों वर्षों तक विदेशी शासन रहने से यह विश्वास बन गया है कि यूरोप से विज्ञान भारत में आया है। वे जानते ही नहीं है कि भारत में प्रथम यूरोपीय के आने से हजारों वर्ष पूर्व ही भारत में विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त प्रगति हो चुकी थी। इस भावना का मुख्य कारण यह है कि हमने अपनी प्राचीन विज्ञान धारा को आधुनिक शिक्षा में सम्मिलित नहीं किया हैं।

प्राचीनकाल में भारतीयों ने अपने साहित्य में विज्ञान एवं दर्शन को वेदांग एवं उपांग के रूप में सम्मिलित किया था, जिससे साधारण व्यक्ति को भी काल बोध रहे। कालबोध मनुष्य को एक परिप्रेक्ष्य देता है। मनुष्य जहां भी है, वहां वह अकेला एकांगी नहीं खड़ा है। एक कमरे में बंद व्यक्ति को पहली बार पहाड़ की चोटी पर लाकर खड़ा करने पर जो अचानक व्यापक दृष्टि प्राप्त होती है, वही व्यापक दृष्टि मनुष्यों को कालबोध से प्राप्त होती है। समय की अनादि धारा में बनती, बहती और मिटती लहर अपने अस्तित्व का मनुष्य को साक्षात्कार कालबोध से ही कराती है।

कालबोध कुछ शीर्षस्थ वैज्ञानिकों या नक्षत्रशास्त्रियों तक ही सीमित न रहे, इसलिए हिन्दू-मनीषियों ने ऐसी व्यवस्था की, जिससे सामान्यजन में अपने विज्ञान के साथ काल-बोध का ज्ञान भी रहे। इस विशाल ब्रह्माण्ड में रहने वाला एक-एक सामान्य व्यक्ति भी महत्वपूर्ण है, इसलिए हर आनुष्ठानिक संकल्प में वह काल और आकाश (स्पेस) के परिप्रेक्ष्य में अपनी स्थिति परिभाषित करता है। कालबोध का विस्तार इतना था कि सन्त साहित्य में भी इसका समावेश हो गया था। एक रोचक उदाहरण गोस्वामी तुलसी दास कृत प्रसिद्ध हनुमान चालीसा से है जो इसप्रकार है: जुग सहस्त्र योजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। यह कूट भाषा में लिखा एक वैज्ञानिक मन्त्र है। इसका अर्थ है

1 युग = 12000 वर्ष, 1 सहस्त्र = 1000, 1 योजन = 8 मील

अब तात्पर्य हुआ, युग ङ्ग सहस्त्र ङ्ग योजन = 12000ङ्ग1000ङ्ग8 = 9 करोड़ 60 लाख मील। 1 मील = 1.6 कि.मी. होता है। इसके अनुसार पृथ्वी से सूर्य की दूरी = 9 करोड़ 60 लाख मील ङ्ग1.6 कि.मी. = 153.60 करोड़ कि.मी. हुई। नासा के अनुसार भी सूर्य की पृथ्वी से दूरी इतनी ही है।

मानव सभ्यता के विकास के प्रथम चरण में ही भारतीय दार्शनिकों ने ब्रह्माण्ड की मूलभूत सममिति एवं एकता की परिकल्पना कर ली थी एवं अनुभव किया था कि इस संरचना का गणितीय आधार है। उदाहरण के लिए महान गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ वराहमिहिर हुए हैं जिनके प्रसिद्ध ग्रंथ पंचसिद्धांतिका में वर्णित पांच सिंद्धात – सूर्य, वशिष्ठ, रोमक, पैलिश को व्यापक मान्यता प्राप्त हुई थी। इनमें पृथ्वी के गोल होने, इसके सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने एवं ग्रहों तथा नक्षत्रों की गति के अनुसार पंचाग निर्माण विधि का स्पष्ट उल्लेख है एवं यह भी वर्णित है कि सूर्य ग्रहण चन्द्रमा के पृथ्वी एवं सूर्य के मध्य आ जाने तथा चन्द्रग्रहण पृथ्वी की चन्द्रमा पर छाया पडऩे के कारण होते हैं इसके साथ ही इन सिद्धांतों में चन्द्रमा एवं पृथ्वी की त्रिज्याओं के शुद्ध मान भी निहित हैं। इस ग्रन्थ में काल गणना के भी अनेक अद्भुत उदाहरण हैं। वैदिक विज्ञान समय के सूक्ष्म विभाजन का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है, यथा

  1 प्रमाणु     =     1/60750  सेकेन्ड

  1 त्रुटि        =     29.6296   माइक्रोसेकेन्ड

  1 तत्पर     =     2.96296    मिलीसेकेन्ड

  1 निमेष     =     88.889      मिलीसेकेन्ड

45 निमेष     =     1 प्राष अर्थात् 4 सेकेन्ड

  6 प्राष        =     1 विनाडी अर्थात् 24 सेकेन्ड

60 विनाडी    =     1 नाडी अर्थात् 24 मिनट

60 नाडी       =     1 अहोरात्र    

माइक्रोसेकेन्ड और मिलीसेकेन्ड सेकेन्ड के 10 लाखवें और हजारवें हिस्से को कहते हैं।

वैदिक काल गणना का आधार

आधुनिक विश्व में काल सिद्धान्त का निर्धारण एक दुरूह पहेली है। आधुनिक विज्ञान के लिए स्टीफन हाकिंग की पुस्तक एक मार्गदर्शक का कार्य करती है। उसके अनुसार हो सकता है कि कभी समय और काल सीमित रहे हों, परंतु इनकी कोई शुरुआत या अंत नहीं है। यह वक्तव्य काल के भारतीय ज्ञान के सन्दर्भ में दर्शनीय है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने इस लयबद्ध ऐहिक लीला को संपूर्ण ब्रह्माण्ड के सृजन एवं विलय के रूप में समझा था एवं एक सृजन तथा विलय के मध्य के अंतराल को कल्प कहा था। इसके अनुसार कल्प का मान 432 करोड़ वर्ष होता है। इस कल्प के अब तक एक अरब 97 करोड़ २9 लाख 49 हजार 104 वर्ष बीत चुके हैं। आधुनिक विज्ञान के कार्बन को हीरा में परिणत होने के लिए लगभग 20 करोड़ वर्ष लगते हैं, फिर इसका विघटन होता है। इस चक्र में 432 करोड़ वर्ष लगते हैं। यह चक्र अनवरत चलता रहता है, इसमें कोई व्यतिक्रम नही होता है। यह साम्य किसी को भी चौंकाने के लिए पर्याप्त है। हिन्दू मान्यता के अनुसार वेदों का उदय मनुष्य के साथ हुआ।

विविधताओं एवं जटिलताओं से युक्त प्रकृति की मौलिक सममिति एवं एकता की खोज में वैदिक ऋषियों ने एकिक सिद्धांत (यूनिफाइड फिल्ड) की अवधारणा की थी। इसमें विश्व एवं इसकी वस्तुऐं विश्वज्येाति (कॉस्मिक ऊर्जा) नामक धनात्मक ऊर्जा का पुष्टिकरण है तथा इनके गतीय पक्ष एवं अन्य सिद्धांत यज्ञ से संबंधित है। अनेक मनीषियों ने विश्व के पदार्थ घटकों के रूप में विभिन्न तत्वों (भूतों) की संकल्पनाएं प्रस्तुत की थीं जिनके आधार पर लौकिक विकास के रूप में वैदिक दर्शन के सांख्य-तंत्र का प्रादुर्भाव हुआ था जिसमें क्लासिक एवं क्वांटम दोनों सिद्धांतो का समावेश है।

हिन्दू काल-अवधारणा के अन्तर्गत काल एक सीधी रेखा के समान नहीं है। सूरज के उदय से दूसरे दिन सूरज के उदय तक का समय-चक्र एक दिन माना जाता है। भारतीय समय चक्र, इसी प्रकार सूर्य चन्द्र के अनुसार मास, वर्ष से लगा कर आगे तक चलता है। इसी के आधार पर हिन्दू काल-अवधारणा चक्रीय है, सीधी बढ़ती रेखा नहीं हैं। चक्रीय अवधारणा के अन्तर्गत ही हिन्दुओं ने काल को कल्प, मन्वन्तर, युग (सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) आदि में विभाजित किया, जिनका अविर्भाव बार-बार होता है, जो जाकर पुन: लौटते हैं।

भारतीय समय काल गणना में कल्प, मन्वंतर और युग के पश्चात् संवत्सर का नाम आता है। भारत का सर्वमान्य विक्रमी संवत ही एकमात्र राष्ट्रीय संवत् है। सम्राट विक्रमादित्य ने शास्त्रीय विधि का पालन कर अपना संवत् चलाया। यहां कुछ भारतीय और कुछ विदेशी संवतों की तालिका दी जा रही हैं। पाठकों को तुलना करने पर ज्ञात होगा कि हमारे हिन्दू संवत् ही सभ्यता क्रम में सबसे प्राचीन और विज्ञान सम्मत तथा कालगणना की दृष्टि से शुद्ध है।

भारतवर्ष मे प्राचीन काल से विज्ञान के अध्ययन की परम्परा रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि बुद्ध के अनन्तर परिस्थितिजन्य कारणों से भारतवर्ष का जनमानस जीवनदर्शन की मीमांसा की ओर झुक गया। अत: विज्ञान सम्बन्धी शोध का कार्य स्थिर सा होता गया एवं तत्सम्बन्धी ग्रन्थों के अध्ययन-अध्यापन की परम्परा क्षीण हो गयी। फलत: बहुतेरे ग्रन्थ काल की बेदी पर चढ़ गये। दैनिक आवश्यकता के कारण आयुर्वेद एवं ज्योतिष शास्त्र पर कुछ विचार आठवीं शती तक चलता रहा परन्तु तत्पश्चात् इनका भी विकास क्रम कुंठित सा हो गया। संप्रति उपलब्ध ग्रन्थों के अध्ययन से प्राचीन विचार पंरपरा के गंभीर होने एवं आधुनिक विज्ञान के सम्मत होने के प्रचुर प्रमाण मिलते हैं। यत्र तत्र भारतीय दर्शनों में दिशा, काल, गति, अणु, आदि विषयों पर दिये गये विचार आधुनिक पाश्चात्य वैज्ञानिकों के आकर्षण बिन्दु रहे हैं।

प्राचीन भारत के संदर्भ में भारतीयों ने मूलभूत राशियों के मापन के लिये उचित इकाईयों का प्रयोग किया है, जिसे उन्होंने निश्चित रूप से प्रकृति के रहस्यों के उद्घाटन में प्रयोग किया है। गति के नियम, स्थितिस्थापकता यानी कि इलास्टिसिटी, गुरूत्वाकर्षण, विद्युत आवेश आदि से वे भलीभांति परिचित थे। वर्णमापी यानी कि स्पेक्टोमीटर जैसे यंत्र थे एवं सूर्य के प्रकाश में स्थित श्याम-रेखाओं के मापने के लिये प्रयुक्त करते थे। खगोलीय नक्षत्रों का वार्णिक विभाजन भी ज्ञात था इत्यादि। इन सारी बातों पर ध्यान दें तो स्पष्ट होगा कि यह प्राचीन ज्ञान-संपदा केवल योग-ध्यान पर आधारित न होकर वैज्ञानिक आधार पर ही थी।

 

युग की अवधारणा

भारतीय काल निर्धारण में अनेक युग परिभषित हैं। 5 वर्ष से लेकर 4,320,000 तक के युग प्रयोग में आते हैं। वेदांग ज्योतिष में इनका नामकरण है। निम्नलिखित महायुग परिभाषित हैं—

 

                युग                         मानवीय वर्ष             अनुपात

                कृत युग                 17 लाख 28 हजार          4

                त्रेता युग                12 लाख 96 हजार          3

                द्वापर युग                 8 लाख 64 हजार          2

                कलि युग                 4 लाख 32 हजार          1

                1 चतुर्युग (महायुग)   43 लाख 20 हजार       मानवीय वर्ष

                1कल्प                    1000                       महायुग

                1 दिन और 1 रात्रि,    ब्रह्मा                         2 कल्प

                1मन्वन्तर                71 चतुर्यग                चक्र

                1 महाकल्प               100 ब्रह्मा व्रर्ष

                                              (31104 अरब) मानवीय वर्ष

 

ब्रह्मा की आयु 100 वर्ष है और इसके पश्चात वह परमात्मा में विघटित हो जाता है। पुनरागमन और नई सृष्टि।यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। यही भारतीय काल गणना की सूक्ष्म से अनन्त तक की अवधातणा है, विज्ञान है।

भारतीय कालगणना

चक्रीय काल-अवधारणा के अन्तर्गत आज ब्रह्मा की आयु के दूसरे खण्ड में, श्वेतावाराह कल्प में, वैवस्वत मन्वन्तर में अ_ाईसवां कलियुग चल रहा है। इस कलियुग की समाप्ति के पश्चात् चक्रीय नियम में पुन: सतयुग आएगा।

अब आइए हिसाब लगाऐं कि सृष्टिकर्ता ब्रम्हाजी की आयु कितनी है। हमारे एक साल में 360 दिन होते हैं। यह हमारा एक साल देवताओं का एक दिव्य दिन होता है और ऐसे 360 दिन का एक दिव्य वर्ष होता है। जब चारों युग सत्य युग, त्रेतायुग, द्वापरयुग कलियुग एक बार व्यतीत होते हैं तब 12000 दिव्य वर्ष बीत जाते हैं। यानी हमारे 43,20,000 वर्ष की एक चतुर्युगी होती है। प्रत्येक युग की जितने हजार दिव्य वर्षों की अवधि होती है उससे दोगुने सौ दिव्य वर्षों का संधि काल भी होता है। चारों युग जब हजार बार बीत जाते है तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है। यह ब्रम्हाजी का एक दिन ही एक कल्प कहलाता है। दिन के प्रारंभ के साथ ब्रम्हाजी सृष्टि प्रारंभ करते हैं और संध्या में प्रलय होकर सृष्टिलय हो जाती है। दूसरे दिन वे फिर उठते है – और वही सृष्टि चक्र प्रारंभ होता है। तो जब ब्रम्हाजी का विष्णु भगवान के नाभिकमल से जन्म हुआ था तब से उनकी आधी आयु बीत गई है। यानी 43 लाख 20हजार मनुष्य के साल वाली एक चर्तुयुगी गुणे 1000 बराबर ब्रम्हाजी का एक दिन ऐसे 360 दिनों का एक साल। ऐसे 100 सालों की आयु होती है ब्रम्हाजी की, उसके बाद महाप्रलय होता है।

गणना इस प्रकार है

युग               युगावधि             संधिकाल              पूर्णयुगावधि

सत्ययुग          4000 वर्ष          800 वर्ष               4800 वर्ष

त्रेतायुग           3000 वर्ष          600 वर्ष               3600 वर्ष

द्वापरयुग          2000 वर्ष          400 वर्ष               2400 वर्ष

कलियुग          1000 वर्ष           200 वर्ष              1200 वर्ष

कुलयोग          10000 वर्ष         2000 वर्ष            12000 वर्ष