चांद की रोशनी में अभ्यास और गजब का जुनून

संजय श्रीवास्तव

लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं।

 

आजादी से पहले देश की दो ही शख्सियतें विदेशों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थीं। भारत का नाम लेते ही लोग हमारे देश को इन दो महान शख्सियतों से जोड़कर देखते थे। ये थे महात्मा गांधी और दूसरे थे ध्यानचंद। महात्मा गांधी देश के आजादी के आंदोलन में हमारे सबसे बड़े नेता थे और उनकी अंहिसा की अवधारणा दुनियाभर में प्रेरणा बन रही थी तो ध्यानचंद की हॉकी के चर्चे हर ओर फैले हुए थे। चाहे जर्मनी हो या जापान, आस्ट्रेलिया हो या हालैंड, हर कहीं लोग ध्यानचंद को जरूर जानते थे। हिटलर से लेकर महारानी एलिजाबेथ तक उनकी हॉकी की जादूगरी की कायल थीं। सही बात ये भी है कि अपने श्रेष्ठ होने के गर्व में चूर इंग्लैंड और हिटलर के जर्मनी का दर्प किसी ने तोड़ा था तो वह अपने ध्यानचंद ही थे।

 

पहले इंग्लैंड के वाकये का जिक्र करते हैं। भारतीय टीम को वर्ष 1928 में पहला ओलंपिक खेलने एम्सटर्डम रवाना होना था। टीम पानी के जहाज पर सवार हुई। लेकिन एम्सटर्डम जाने से पहले टीम इंग्लैंड में रुकी, जहां उसने ब्रिटेन की टीम को इतनी बुरी तरह हराया कि अंग्रेज पानी-पानी हो गए। उनका चेहरा देखने लायक था, ज्यादा रुसवाई नहीं हो, इसके चलते उन्होंने अपनी टीम को ओलंपिक में ही नहीं भेजा। तो इस तरह भारत पर तब शासन कर रहे अंग्रेजों के सामने ध्यानचंद ने भारतीय गर्व की छाप छोड़ी औऱ सारे देशवासियों को अभिमान के अहसास से भर दिया।

इसी तरह का वाकया वर्ष 1936 के बर्लिन ओलंपिक का है। तब ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे। जर्मनी पर एडोल्फ हिटलर का शासन था। उसे लगता था कि पूरी दुनिया में जर्मनी से बेहतर न तो कोई देश है और जर्मनों सरीखी कोई नस्ल। 15 अगस्त 1936 को फाइनल में भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया। हिटलर इस मैच में जर्मनी को जीतते हुए देखने आया था। लेकिन जब उसने अपनी टीम को हारते हुए देखा तो बीच में उठकर चला गया।  मैच से पहले वाली रात को बर्लिन में जमकर बारिश हुई थी, इसी वजह से मैदान गीला था। भारतीय टीम के पास स्पाइक वाले जूतों की सुविधा नहीं थी और सपाट तलवे वाले रबड़ के जूते लगातार फिसल रहे थे। इसके चलते ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद जूते उतारकर नंगे पांव खेलना शुरू किया। उनका खेल इस तरह का था कि जर्मनी की टीम असहाय सी हो गई थी। भारतीय टीम ने आसानी से स्वर्ण पदक पर कब्जा जमा लिया।

अगले दिन हिटलर ने भारतीय कप्तान ध्यानचंद को मिलने के लिए बुलाया। ध्यानचंद ने हिटलर की क्रूरता के कई किस्से-कहानी सुन रखे थे। इसलिए वो हिटलर का आमंत्रण पत्र देख चिंतित हो गए कि आखिर तानाशाह ने उन्हें क्यों बुलाया है। डरते-डरते हिटलर से मिलने पहुंचे। लंच करते हुए हिटलर ने उनसे पूछा कि वह भारत में क्या करते हैं? ध्यानचंद ने बताया कि वह भारतीय सेना में मेजर हैं। हिटलर ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वह जर्मनी आ जाएं और कहीं ज्यादा बड़े पद पर जर्मनी की सेना से जुड़ जाएं और पैसा वह जितना चाहें ले लें। ध्यानचंद ने विनम्रता से प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि उनके रग-रग में देशभक्ति समाई हुई थी। बाद में भी उनके सामने कई बार बहुत अच्छे प्रस्ताव विदेशों से आए लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया।

सही बात ये है कि हॉकी के जादूगर ध्यानचंद केवल महान खिलाड़ी ही नहीं थे बल्कि गुलामी के दौर में भारतीय स्वाभिमान के भी प्रतीक थे। तब वह असल मायनों में विदेशों में भारतीय उत्कृष्टता के राजदूत बने।

ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 में इलाहाबाद के एक बहुत साधारण से क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इसके बाद उनका परिवार झांसी आकर बस गया। उनके पिता सोमेश्वर सिंह सेना में काम करते थे। पारिवारिक माहौल पारंपरिक और सुसंस्कृत था। ध्यानचंद सात भाई बहन थे। पिता का तबादला लगातार हुआ करता था। परिवार में खेल की कोई पृष्ठभूमि नहीं थी। परिवार में अभाव भी बना रहता था। ध्यानचंद शांत, सौम्य और शर्मीले स्वाभाव के थे। घमंड उनके अंदर लेशमात्र भी नहीं था और साथ ही वह थे सादगीपूर्ण और सच्चाई वाले इंसान। अपनी सरलता के कारण वह जीवन में कई बार छले भी गए, लेकिन हर बार ही ऐसा करने वालों में हृदय से माफ भी कर दिया।

वह हॉकी के ऐसे योगी थे, जो फल की चिंता किए बगैर लगातार एक खिलाड़ी के रूप में अपना कर्म करते रहे। ये कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने शरीर की लहू की एक एक बूंद और बदन की एक एक हड्डी हॉकी को समर्पित कर दी। उनकी तपस्या किसी ऋषि मुनि की तपस्या से कम नहीं थी।  वह ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाए थे। उनकी शिक्षा इतनी थी कि वह अपनी बात लिख सकते थे और लिखा हुआ पढ़ सकते थे। वह कम उम्र में सेना में भर्ती हो गए। सेना में उनका जाना इसलिए भी तय था क्योंकि उनके पिता के अलावा बड़े भाई भी सेना में ही थे। जब वह सेना में भर्ती हुए तो उनकी उम्र 16 साल की थी। हालांकि उन्होंने हॉकी खेलना और पहले ही शुरू कर दिया था। सेना के मैदानों में हॉकी के मैच देखने के बाद वह शौकिया तौर पर पेड़ों की टहनियों की हॉकी बनाकर खेलते थे। स्टेमिना बनाने के लिए घर के बगल में स्थित रेलवे लाइन की पटरियों पर दौड़ा करते थे।

उन्होंने अपनी आत्मकथा गोल में लिखा, मुझे याद नहीं पड़ता कि सेना में जाने से पहले मैने कभी ढंग की हॉकी खेली भी थी। बस मुझे इतना जरूर याद पड़ता है कि झांसी में कभी कभार दोस्तों के साथ हम लोग यूं ही हॉकी खेल लिया करते थे लेकिन केवल मजे के लिए। लेकिन लगता है कि हॉकी की प्रतिभा का उपहार उन्हें भगवान से मिला ही था। तभी उन्हें हॉकी के मैचों को देखते समय कुछ होने लगता था।

जब वह 14 साल के थे तो पिता के साथ हॉकी का एक मैच देखने गए। वहां एक टीम दो गोल से हार रही थी। उन्होंने पिता से कहा कि अगर मुझे मौका मिला, तो मैं हारने वाली टीम को जीता दूंगा। बार बार पिता से कहने पर पास बैठे एक अंग्रेज सेना अफसर ने उन्हें खेलने की इजाजत दे दी, ध्यानचंद ने हारने वाली टीम की ओर से चार गोल करके उसे जिता दिया।

उन दिनों सेना में खूब हॉकी खेली जाती थी। सेना की तमाम टुकडिय़ों के बीच हॉकी के मैच हुआ करते थे। इसमें यूनिटों की टीमें, जिसमें अंग्रेज और भारतीय दोनों होते थे, जी-जान लगाकर खेल की तैयारी करते थे। मैचों को जीतना प्रतिष्ठा का प्रश्न होता था। ध्यानचंद को जब सेना में एक खेल चुनने को कहा गया तो उन्होंने हॉकी को चुना। शुरुआत ब्राह्मण रेजीमेंट से हुई। ये रेजीमेंट सेना में हॉकी में काफी अच्छी थी। रेजीमेंट के सूबेदार-मेजर बाले तिवारी ने मुझे हॉकी स्टिक दी और ज्यादा से ज्यादा अभ्यास करने को कहा। चूंकि उस समय कैंट में खेल का कोई तय समय नहीं होता था, इसलिए हम लोग हमेशा इस खेल में लगे रहते थे। जल्दी ही उन्हें खेल में मजा आने लगा। जिस तरह से वह अभ्यास में जुटे रहते, उससे उनके सीनियर्स को ये तो लगता था कि वह एक दिन अच्छे खिलाड़ी जरूर बनेंगे। वह और खिलाडिय़ों में ज्यादा घुलते मिलते नहीं थे। अपने ही लगे रहते थे।

उनके पहले खेलगुरु बने सूबेदार मेजर बाले तिवारी ही बने, जो खुद शानदार हॉकी खेलते थे। जल्दी ही ध्यानचंद स्टिक से ऐसी ड्रिबलिंग करने लगे कि उनसे गेंद छुड़ा पाना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल होता था। लेकिन दिक्कत ये थी कि वो कुछ ज्यादा ही ड्रिबलिंग करते थे। इससे टीम का काफी समय बर्बाद हो जाता था। इस बात से बाले तिवारी भी बहुत परेशान हो गए। आखिर एक दिन उन्होंने ध्यानचंद को एक मूलमंत्र दिया-तुम ड्रिबलिंग अच्छा करते हो, अच्छा खेलते हो लेकिन गेंद को बहुत देर तक हमेशा अपने पास मत रखो, पास देकर अन्य खिलाडिय़ों के साथ खेलों। अगर सही समय पर सही प्लेसिंग करोगे तो गोल हो जाएगा। ध्यानचंद ने ये बात गांठ बांध ली। उन दिनों अंग्रेजी राज में सेना में खेलों पर बहुत जोर देती थी। ये ध्यानचंद के लिए एक अवसर था। हॉकी में खुद को निखारने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। देर रात में जब मैदान में लैंपपोस्ट टिमटिमा रहा होता, तब भी पसीने से लथपथ ध्यानचंद अकेले अभ्यास कर रहे होते। भोर में पौ फटने से पहले रियाज फिर शुरू हो जाता था। प्रतिभा,  लगन और मेहनत ने उन्हें इस कदर तराशा कि कभी रुके नहीं। खेल उनके लिए तप था, एक साधना की तरह। वैसे भी अभावों और खेल का एक खास रिश्ता होता है। लातीनी देशों की फुटबाल स्लम्स में फलती फूलती है और सुविधा संपन्न यूरोप को चुनौती देती है। गरीब अफ्रीकी देशों के एथलीट और छोटे छोटे अभावग्रस्त देशों के तैराक अपनी श्रेष्ठता की छाप छोड़ते हैं। अपने देश में ही हॉकी और दूसरे खेलों की ज्यादातर असाधारण प्रतिभाएं साधारण और ग्रामीण परिवेश से ही निकलती रही हैं। अब तो क्रिकेट जैसे खेल में नए खिलाड़ी छोटे शहरों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों से आकर नाम रोशन कर रहे हैं। ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था। उनके दूसरे हॉकी कोच पंकज गुप्ता उनकी खेल तकनीक से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने उनका नाम ध्यान सिंह से ध्यानचंद कर दिया। उनका कहना था कि जिस तरह तुम चांद की रोशनी में अभ्यास करते हो, उसी तरह हॉकी का चांद बनकर चमकोगे, इसलिए तुम्हारा नाम ध्यानचंद रहेगा। उस तरह वह ध्यान सिंह से ध्यानचंद होकर विख्यात हुए।

ध्यानचंद ने सोचा भी नहीं था कि हॉकी उनके जीवन की दिशा बदल देगी। दिल्ली में होने वाले वार्षिक टूर्नामेंट में खेलने के लिए उन्हें चुना गया। ये पहला बड़ा मैच था, जिसे आसानी से जीत लिया गया। उनके सैनिक अधिकारियों ने इस जीत पर गर्व व्यक्त किया। इस टूर्नामेंट के बाद सेंटर फारवर्ड की पोजिशन पर उनकी जगह मानो सुरक्षित हो गई। वर्ष 1922 से 1926 के बीच उन्होंने सेना के सीमित हॉकी टूर्नामेंटों में हिस्सा लिया। उनकी इच्छा भारतीय सैनिक हॉकी टीम में शामिल होने की थी। लेकिन वो दो बातों को लेकर शंकित थे, एक तो वह नए नए भरती हुए थे दूसरे छोटी रैंक में। किंतु उन्हें ये भी विश्वास था कि यदि उनका खेल अच्छा है तो भविष्य में उनके साथ न्याय होगा और वह टीम में मजबूती से अपनी जगह बना पाएंगे।

उन दिनों सेना बेशक अंग्रेजों के अधीन थी लेकिन पक्षपात और भ्रष्टाचार देखने को नहीं मिलता था। अंग्रेज सेना अधिकारियों ने हॉकी को निष्पक्ष बनाए रखा। ध्यानचंद की प्रतिभा के साथ उन्होंने पूरा न्याय किया। अगर भारतीय मूल के खिलाडिय़ों और गोरे मूल के खिलाडिय़ों के बीच पक्षपात होता तो शायद भारत पहले ही ओलंपिक में हिस्सा लेने के बाद स्वर्ण पदक लेकर नहीं लौटता।

ये वर्ष 1925 की बात है। ध्यानचंद उन दिनों पंजाब इंडियन इंफ्रेंटी की ओर से हॉकी खेलते थे। एक प्रमुख टूर्नामेंट में यूपी (तत्कालीन नाम संयुक्त अवध प्रांत) के खिलाफ मैच था। यूपी की टीम 2-1 से जीत रही थी। खेल खत्म होने में केवल दो मिनट बचे थे। तब कमांडिंग अफसर ने ध्यानचंद को आवाज दी-आगे बढो जवान, आगे बढ़ो जवान, कुछ तो करो ध्यान। ध्यान चंद ने वाकई कर दिखाया। अगले चार मिनट में तीन गोल करके उन्होंने अपनी टीम को विजयी बना दिया। इसी मैच के बाद ब्रिटिश प्रेस ने पहली बार उन्हें हॉकी का जादूगर कहा। इसके बाद तो उनके खेल का ग्राफ कुछ यूं ऊपर चढता गया कि वह भारतीय हॉकी में करिश्मा के प्रतीक बन गए।

ये वर्ष 1926 का समय था जब उनके कमांडिंग अफसर ने उन्हें बुलाकर कहा-तुम्हे आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाना है। ये सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ये सूचना उन्होंने बैरक में जाकर अपने गुरु बाले तिवारी को दी। बैरक में सभी ने खुशी में उन्हें कंधों पर उठा लिया। जब ध्यानचंद ने अपनी पहली विदेश यात्रा की खबर घर में दी तो हडकंप मच गया। घरवालों को देश में घूम-घूमकर खेलने की बात को समझ में आ रही थी लेकिन विदेश दौरा किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण थी। सबसे बड़ी समस्या यही थी कि विदेश जाने के लिए गर्म कपडो़ं और अन्य सामानों का इंतजाम कैसे हो पाएगा। इसका समाधान भी ध्यानचंद ने खुद ही निकाला। सेना से मिले पुराने गर्म ओवरकोट, गर्म शर्ट और पैंट इक_ा किए। सेना के ही जूते लिए और फलालेन की सस्ती कमीजें बनाईं। कंबल बांधकर विदेशी दौरे की तैयारी कर ली। न कोई झिझक और न ही कोई दिखावा। मां ने शंका जाहिर की, इतने कम गर्म कपड़ों से कैसे काम चलेगा। उनका जवाब था, मां, गर्मी खिलाडी़ के शरीर में होनी चाहिए, गर्म कपड़ों में नहीं।

बहुत सीमित साधनों में ही वह देश का नाम रोशन करने के लिए निकले पड़े। टीम के सभी सदस्यों ने भ्रमण का हर क्षण आनंद लिया। कभी विलासिता और आरामतलबी की परवाह नहीं की। ध्यानचंद ने आत्मकथा में लिखा, ये शायद पहला मौका था जब भारतीय खिलाड़ी विदेश में खेलने गए थे।

न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में ध्यानचंद अपनी बेहतरीन हॉकी की छाप छोड़ी। वहां भारतीय टीम ने 21 मैच खेले, 18 जीते, दो बराबर रहे और एक हारे। 192 गोल किए और महज 24 गोल खाए। इस दौरे से लौटने के बाद लोगों में उनके नाम की चर्चा होने लगी। दौरे में शानदार प्रदर्शन के लिए अंग्रेज अफसर इतने खुश थे कि उनका प्रोमोशन करके लांसनायक बना दिया गया। सही मायनों में भारतीय हॉकी ने अपने इस चमत्कारिक खिलाड़ी के साथ अब करवट लेनी शुरू की। उनके अधिकारियों, प्रशंसकों को उनमें खासी संभावनाएं दिखने लगीं। इस दौरे से लौटने के बाद वह नित्यप्रति अपने सैनिक की ड्यूटी निभाते और सुबह-शाम जमकर हॉकी का अभ्यास करते। (क्रमश: अगली कड़ी में किस तरह पहली बार ध्यानचंद ने दिलाया भारत को स्वर्ण पदक)   ह्व