पर्यावरण और भारतीय दृष्टि

जवाहरलाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

विज्ञान के विकास की तीन श्रेणियां होतीं हैं। पहली श्रेणी प्रेक्षण की होती है, जिसमें मनुष्य प्रकृति के क्रियाकलापों को देखता है और जो देखा उसे याद रखता है। अनुकूल समय आने पर वैसी ही परिस्थितियों में वैसा ही करता है, जैसा उसने देखा हो। दूसरा चरण होता है जब प्राकृतिक क्रियाओं को देख कर उनके कारण समझने का प्रयास करता है और उनके परिणामों को अन्य परिस्थितियों में लागू करने का प्रयास करता है। तीसरे चरण में वह इन परिणामों को नियम या सिद्धांत के रूप में परिवर्तित करता है। पहले चरण में तो मनुष्य जाति आदि काल से ही रही है। उसे पता था कि लकड़ी तैरती है और पत्थर डूबता है, उसे मालूम था कि मौसम निश्चित समय पर बदलता है और हर साल बरसात के बाद पतझड़ का मौसम आएगा और फिर जाड़ा। वह जानता था कि जाड़े में ठण्ड लगती है और तन को ढांपने के लिए जानवरों की तरह तन को ढांपना आवश्यक होता है, भले ही वह पेड़ की छाल हो या पशुओं की चाम। लकड़ी से नाव बनाना और चाम के बदले कपड़ा बुनना दूसरा चरण था, भले ही यह काम भी उसने प्रकृति में व्याप्त दृष्टांतों से ही सीखा हो। प्राचीन काल में सभ्यताओं का बीजारोपण इसी काल में हुआ होगा। आधुनिक काल में प्राकृतिक क्रियाकलापों के प्रेक्षण के बाद उनके परिणामों पर चिंतन करके उन्हें निश्चित नियमों या सिद्धांतों के माध्यम से परिभाषित करने को ही विज्ञान कहते हैं।
क्या प्राचीन भारत में भौतिक ज्ञान को इस कसौटी पर कसा जा सकता है? मानव आदिकाल से ही अपने आसपास के परिवेश को कौतूहल से देखता रहा है और उसकी गुत्थियों को समझने का प्रयास करता रहा है। दो महत्वपूर्ण क्षेत्र थे। एक था, अपने आसपास के पेड़-पौधे, पहाड़, नदियां, भूमि, सरोवर और विभिन्न प्रकार के प्राणी। दूसरा था खगोल, आकाश और आकाशीय पिंड, सूर्य, चांद, ग्रह, तारे आदि। क्या इस परिवेश के लगातार प्रेक्षण से उसने कुछ सीखा, कुछ सामान्य नियम खोजे या कोई सार्वभौमिक दृटिकोण बनाए?
सबसे पहले प्रकृति को ही लें। प्रकृति के बारे में हमारे साहित्य में सबसे पुराना प्रसंग पृथु का है। पृथु को हमारे यहां आदि राजा कहा गया है। राजा का पद शायद पहले भी रहा होगा लेकिन आरम्भिक दौर में वह संभवत: केवल मुखिया जैसा कोई नेता रहा होगा। राजा, जो नियमों कायदों से बंधा रहता था, जिसे कर्तव्यों और अधिकारों के बंधनों से जोड़ा गया हो, ऐसी संस्था संभवत: सबसे पहले पृथु से ही आरम्भ हुई होगी। लेकिन हमारे लिए पृथु की राजा बनने की कहानी नहीं, राजा बन कर उनके प्रकृति का सामना करने की कहानी अधिक प्रासंगिक है।
राजा पृथु किसी दूर देश के युद्ध में शामिल होने गया था। युद्ध में बहुत समय लगा होगा, इतना कि जब वह लौटा तो उसे देख कर आश्चर्य हुआ कि सारा देश अकाल से ग्रस्त है, सब कुछ सूख गया था। यहां तक कि पेड़ों के पत्ते भी सूख कर गिर गए थे। जहां गांव थे, वहां मनुष्यों और पशुओं की अस्थियों के ढेर पड़े थे। युद्ध में उसके सैनिक पहले ही थके थे, अब भोजन न मिलने के कारण उनकी हालत दयनीय हो रही थी। राजा स्वयं भी कई दिनों का भूखा था। उसने सोचा कि यदि वह अपने सैनिकों की जान नहीं बचा सकता तो उसके राजा होने का क्या अर्थ। लेकिन खाना लाए तो कहां से? बहुत विचार करके उसने मन बना लिया कि अन्न न सही, यदि कुछ भी खाने योग्य जीव मिल जाए, उसे ही मार कर सैनिकों की जान बचाना उसका कर्तव्य है। चारों ओर जंगल में अपने घोड़े पर घूमा तो अचानक एक सुंदर सी गाय उसे दिखाई दी। क्षण भर के लिए वह रुका, गाय मारना पाप होगा। लेकिन अगले ही क्षण उसने गाय के पीछे घोड़ा दौड़ाया। उसकी प्राथमिकता सैनिकों की जान बचाने की थी। चाहे व्यक्तिगत रूप से वह पापी क्यों न सिद्ध हो जाए, लेकिन वह अपने सैनिकों के लिए इस गाय को अवश्य मारेगा। गाय भागी लेकिन कुछ दूर निकल कर अचानक मुड़ गई। राजा ने अपने बाण को साधना आरम्भ किया तो गाय ने पूछा, ‘राजा तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो, मैंने तम्हारा क्या बिगाड़ा है?
राजा ठिठक गया और बोला, ‘मैं तुम्हें मारना नहीं चाहता, मैं जानता हूं कि यह केवल पाप ही नहीं है, बल्कि एक राजा द्वारा किया जाने वाला अन्याय भी है लेकिन मैं विवश हूं। मेरे सैनिक कई दिन से भूखे हैं और अगर उन्हें कुछ खाने को नहीं मिलेगा तो वे जीवित नहीं बचेंगे। राजा होने के नाते उनकी सुरक्षा मेरा दायित्व है। इसलिए अब तुम्हें मारने के अतिरिक्त मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं है।Ó
‘आज मेरा मांस दोगे तो कल क्या दोगे राजा, यह अकाल तो कल भी होगा और पता नहीं कितने दिन चलेगा। तुम अपने सैनिकों को कब तक जीवित रख पाओगे एक पशु के मांस पर?Ó
राजा कोई्र उत्तर खोज ही रहा था कि अचानक उसके मन बात आई कि यह गाय तो मनुष्यों की तरह बोल रही है और तर्कसंगत बातें कह रही है। यह गाय नहीं हो सकती है। वह घोड़े से नीचे उतरा और हाथ जोड़ कर गाय के सामने खड़ा हो गया, बोला, ‘हे देवी आप कौन हैं? आप एक साधारण पशु तो नही हो सकती हेैं।Ó
गाय ने कहा, ‘राजन मैं धरती हूं जिस पर तुम और तुम्हारा राज्य टिका है। मैंने तेरे लिए ही गाय का रूप धारण किया है। यह धरती भी गाय की ही तरह होती है।Ó
‘माता मुझे मार्ग बताएं, मैं विवेकशून्य हो गया हूं, क्या करुं समझ में नहीं आता।Ó
‘राजन, यदि आपके पास गाय हो तो आप उसका पालण पोषण करते हो, उसे प्यार करते हो, उसकी हिंस्र जानवरों से रक्षा करते हो और समय समय पर उसे भोजन और पानी देते रहते हो। तब उसका दोहन करते हो। धरती को भी गाय ही मान लो, उसे पालो-पोसो, प्यार करो और तब तुम्हें अन्न के रूप में दोहन का अधिकार मिलेगा। राजा पृथु, मुझे अपना लो, तुम मेरी रक्षा करो मैं तुम्हारी और तुम्हारी प्रजा की रक्षा करूंगी। जो हाल तुम आज देखते हो वह मेरी अवज्ञा का ही फल है।Ó
राजा उसके चरणों पर गिर पड़ा। गाय ने कहा, ‘राजन मुझे दासी की तरह नहीं अपनी बेटी की तरह पालोगे तो, आज से तेरे नाम से ही इस धरती को पृथु की बेटी, पृथ्वी के नाम से जाना जाएगा।Ó
पृथु की कहानी प्रकृति के बारे मे भारतीय दृष्टिकोण का सबसे बड़ा उदाहरण है। गाय का सिद्धांत हम धरती पर लागू करें तो धरती से हम उतना ही लें जितना धरती आसानी से दे सकती है, वह अन्न हो या फल हो, औषधि हो या पानी। इसीलिए हमारे देश में शोषण शब्द को विकास या प्रगति के संदर्भ में प्रयोग में लाया ही नही जाता था। केवल दोहन का ही उपयोग होता है। जब हम स्रोत की क्षमता के अनुपात में ही उससे साधन या उत्पादन प्राप्त करते हैं कि उससे स्रोत को हानि न पहुंचे तो वह दोहन होता है। गाय को पाल-पोस कर उसके दूध का उतना ही भाग हम दोह ले जितने से उसके बच्चे को कष्ट न हो। पृथु की ही कहानी में गाय को मार कर भरपूर भोजन प्राप्त करना शोषण होता, वैसे ही गन्ने को चूस कर कचरे के रूप में फैंक दिया जाता है। धरती अपने विविध रूपों में हमारे सामने होती है। केवल लम्बे-चौड़े मैदानों के रूप में ही नहीं। उसकी विशाल पर्वत श्रेणियां, उसकी झीलें और नदियां, उसके वन और वनस्पति सब धरती ही तो है। उन मैदानों के गर्भ में बह रहे पानी और छिपे हुए खनिज को भी धरती से अलग नहीं किया जा सकता है।
इसलिए सम्पूर्ण प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता केवल सहअस्तित्व का ही नहीं अपितु एक दूसरे पर आश्रित होने का भी है। प्रकृति हमारा पोषण करेगी अगर हम उसके अस्तित्व के लिए कोई खतरा पैदा ना करे, यानी उसका पोषण करें। यहीं भारतीय विचार और पश्चिमी धारणा के बीच मौलिक अंतर आ जाता है। पश्चिम की भौतिकवादी धारणा के अनुसार मनुष्य अपने सुख के लिए प्रकृति का किसी भी मात्रा में उपभोग कर सकता है, उसका शोषण कर सकता है। प्रकृति को पूरी तरह काबू किया जा सकता है क्योंकि वह प्रकृति का स्वामी है। भारतीय विचार है कि मानव स्वयं भी प्रकृति की उपज है, उसी का अंग है। एक अंग पूरे शरीर का स्वामी नहीं हो सकता है, यदि प्रयास करेगा तो दूसरे अंगों को हानि पहुंचा कर ही, उन्हें पंगु बना कर ही। प्रकृति से स्वामी और दासी का रिश्ता नहीं हो सकता है, मां और बेटे का हो सकता है।
प्रकृति का हम कितना उपयोग कर सकते हैं, इस पर भी विचार किया गया है। रामायण में संजीवनी बूटी का प्रसिद्ध प्रसंग है। जब हनुमान पर्वत पर पहुंच जाते हैं तो उन्हें इस बात का आभास होता है कि वे वन देवताओं द्वारा सुरक्षित हैं और उनकी अनुमति के बिना वह बूटी नहीं ले सकते। हनुमान वन देवताओं से कहते हैं कि मैं वन को हानि पहुंचाने नहीं आया हूं, मेरे स्वामी गम्भीर रोग से ग्रस्त हैं और उनकी जान बचाने के लिए मुझे केवल यह बूटी चाहिए।। यह अनुभूति प्राचीन भारतीयों को थी कि वनों का अनियमित दोहन शोषण ही होगा। इसलिए वनों को देवताओं द्वारा सुरक्षित माना गया है और उनका उपयोग भी अबाध रूप से नहीं किया जा सकता था।
वनों को प्राचीन भारत में कई वर्गों में बांटा गया है। ग्राम वन, जो बस्तियों के आसपास होते हैं जिनके पत्तो, लकड़ी और वनोपज पर ग्रामवासियों की जीविका निर्भर होती है। श्रीवन, जो ग्राम से कुछ दूर तो होते हैं लेकिन जिनका उत्पादन मानव की श्रीवृद्धि के लिए आवश्यक होता है और जिनका नियमित दोहन हो सकता है। और अंतिम देव वन। जो वन ऊंची पहाडिय़ों पर होते हेैं और जलवायु और प्राकृतिक संतुलन के लिए आवश्यक होते हैं, देव वन कहलाते है। इनका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। ये वन साधना और भमण के लिए तो खुले होते थे लेकिन दूसरे उपयोगों की सीमाएं बंधी थी। वनों को प्राचीन लोग अरण्य भी कहते थे। अरण्य जहां रण नहीं हो सकता है, जिनके विरुद्ध कोई जोर-जबरदस्ती या हिंसा नहीं हो सकती।
कुमाऊं में एक परंपरा प्रचलित हैं। सौ वर्ष पहले तक वहां के ग्रामवासियों को जब घर बनाने के लिए कभी वन से पेड़ लेने की आवश्यकता पड़ती थी तो पहले सारा परिवार वन जाता और वन देवता से प्रार्थना करता कि हे देव हमें घर बनाने के लिए एक पेड़ की नितांत आवश्यकता है, हमें एक पेड़ काटने दें। साथ ही वचन दिया जाता था कि एक पेड़ के बदले एक पेड़ रोप कर जाएंगे। जब तक परिवार के लोग एक पौघा वन में नही लगाते थे तब तक लकड़हारा भी कुल्हाड़ी चलाने के लिए तैयार नहीं होता था। वन संचित पूंजी की तरह होते हैं अच्छा हो कि हम उसके ब्याज का ही उपयोग करें वरना देखते ही देखते यह पूंजी भी नष्ट हो जाएगी। हो सकता है कि आज कल के पर्यावरणवादियों के लिए यह नई धारणा हो लेकिन इस तथ्य को भारतीय समाज हजारों सालों से जानता है और विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले तक व्यवहार में लाता रहा है। ह्व