आयुर्वेद की वैज्ञानिकता

डॉ. सम्पूर्णानंद

हमारे देश में आयुर्वेद के अध्ययन अध्यापन का स्वरूप क्या हो, इस प्रश्न पर भारत सरकार और उत्तर प्रदेश तथा अन्य प्रदेशीय सरकारों की अनेक समितियां विचार करके अपनी रिपोर्ट दे चुकी हैं। इन समितियों ने बहुत परिश्रम के बाद अपने महत्वपूर्ण सुझाव दिये जिनमें से बहुतों को अब भी व्यावहारिक रूप देना सम्भव नहीं हुआ है। किन्तु मेरे विचार से इन समितियों में दो बड़े दोष थे। या तो उनमें मुझे जैसे अल्पज्ञों का बाहुल्य था या एलोपैथी के डाक्टरों का उनमें प्राधान्य था। इन डाक्टरों की इच्छा चाहे कितनी ही निरपेक्ष तथा निष्पक्ष रहने की रही हो, परन्तु उनसे यह आशा नहीं की जा सकती थी कि अपनी प्रणाली से भिन्न किसी अन्य प्रणाली के संबंध में ऐसा मान सकते कि यह किसी सार्थक अध्ययन का विषय बन सकती है। किन्तु हम सबके पीछे यह धारणा भी रहती है कि आयुर्वेद, हिकमत और होमियोपैथी को, विशेषकर आयुर्वेद और हिकमत को अन्य कारणों से नही ंतो राजनैतिक कारणों से ही सही एक दम छोडऩा सम्भव नहीं है, यद्यपि ये इतनी सम्माननीय नहीं है कि विज्ञानविद् उनका अनुशीलन और अध्ययन करें। परिणामस्वरूप निश्चय ही आयुर्वेद को कुछ समय से सहारा मिला है और कुछ वैद्य सरकारी नौकरी में छोट मोटे स्थान पा गये हैं। किन्तु इसके अतिरिक्त एक बात और हुई जिसका भविष्य में भयंकर परिणाम हो सकता है। चाहे वह अभीष्ट न रहा हो परन्तु जो शिक्षा आयुर्वेदिक कालेजों और स्कूल में दी जाने लगी है उसका यह परिणाम अवश्यम्भावी है। सुशिक्षित वैद्य चिकित्सा कर सकें इस विषय में सरकार की सतर्कता भारतीय परम्परा के अनुकूल ही है। सुश्रुत के कथनानुसार वैैद्य को ‘अधिगत तंत्र उपासित तन्त्रार्थ और दुष्टकर्माÓ होना चाहिए। किन्तु ऐसा व्यक्ति भी राजाज्ञा के बिना चिकित्सा का कार्य नहीं कर सकता। चरक ने तो यहां तक कहा है कि यदि किसी राज्य में नीम हकीमों को अपना व्यवसाय करने की छूट हो तो राज्य की कर्तव्यविमुखता को ही इसका कारण कह सकते हैं। ऐसे लोग समाज के कण्टक हैं और इन्हें कांटे के समान ही निकाल कर फेंक देना चाहिए। किन्तु जैसा कि मैंने अभी कहा है, वह ठीक ही हुआ कि उचित प्रशिक्षण की अनिवार्यता पर इतना जोर दिया गया किन्तु उस प्रशिक्षण का रूप क्या हो इस ओर उतना ध्यान नहीं गया जितना आवश्यक था।

इन सब बातों का परिणाम बड़ा भयंकर हुआ है। नीम हकीमों की एक नयी जाति पैदा हो गयी है। पिछले कुछ वर्षों में आयुर्वेदिक कालेजों से जो वैद्य पढ़कर निकले हैं उनको नीम हकीम कहना शायद कटु और अतिशयोक्ति हो किन्तु उन्हें और क्या उपयुक्त नाम दिया जाय, यह मेरी समझ में नहीं आता। ये लोग वैद्य नहीं माने जा सकते। उन्हें आयुर्वेद में किसी प्रकार की आस्था नहीं है और वे स्पष्ट रूप से उसकी अवैज्ञानिकता की निन्दा करते हैं। विज्ञान की उनको जानकारी बहुत ही थोड़ी है इसलिए अहम्मन्यता और वैज्ञानिक होने का गर्व जताने में उन्हें संकोच भी नहीं होता। अल्पज्ञान खतरनाक होता है क्योंकि अन्य बुराईयों के अतिरिक्त उससे झूठा अभिमान उत्पन्न होता है। आयुर्वेदाचार्य कहलाने में वे अपना अपमान समझते हैं और उनकी अभिलाषा यह रहती है कि उन्हें ऐसी उपाधियां दी जाएं जो बोलने में एलोपैथिक कालेजों के स्नातकों की उपाधियों से मिलती जुलती हों। किन्तु वे एलोपैथ भी नहीं हैं और उनके प्रशिक्षण का स्तर एम.बी.बी.एस उपाधि प्राप्त स्नातकों के प्रशिक्षण से कहीं नीचा है। वे अपने आपको नैराश्य के गर्त में पाते हैं क्योंकि ये उन लोगों की विचारहीनता के शिकार हुए हैं जिनका यह कर्तव्य था कि उनके प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त पाठ्यक्रम बनाते। इन अभागों के साथ हमारी सहानुभूति तो होनी चाहिए किंतु यह गलत बात होगी कि हम यह आशा करें कि वे समाज के स्वास्थ्य और चिकित्सासम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकेंगे। मेरी राय में जिस नयी प्रणाली ने इनका सर्वनाश किया है उसे चालू रखना बड़ा भारी अपराध होगा।

जिस परिस्थिति में आज हम अपने को पाते हैं उसका उत्तरदायित्व उन लोगों पर है जिन्होंने यह निर्णय किया कि आयुर्वेद के विद्यार्थियों को ईटेव्रेटेड प्रणाली की शिक्षा दी जाय। चिकित्सा के विषय में मैं स्वयं एकीकरण में विश्वास करता हूं क्योंकि मानव शरीर और मस्तिष्क इतनी महान वस्तुएं हैं कि उनको विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों का अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता। मेरी दृष्टि में एक ही चिकित्सा प्रणाली वैज्ञानिक हो सकती है। इस प्रणाली की औषधि सूची में सैकड़ों प्रणालियों से औषधियां ली जा सकती हैं। किसी औषधि विशेष का प्रयोग किसी रोग विशेष को चिकित्सा के लिए कुछ हद तक प्रयोगात्मक हो सकता है, किन्तु वैज्ञानिक बनने के लिए किसी भी प्रणाली को निश्चित नियमों से बद्ध होना चाहिए। विज्ञान और प्रयोग संभूत ज्ञान में यही अन्तर है। केवल अनुभव पर आधारित ज्ञान से विज्ञान इसीलिए विशिष्ट है कि उसमें प्राकृतिक नियमों का निर्देश रहता है। जब अनेक घटनाओं में अनुस्थूल प्राकृतिक नियम पहचान लिया जाता है तो हमको ऐसे विषयों की भी जानकारी हो सकती है जो अभी प्रत्यक्ष अनुभव में नहीं आए हैं। आप चाहें तो इसे भविष्य कथन कह सकते हैं। इस दृृष्टि से आयुर्वेद और एलोपथी का एकीकरण वास्तविक एकीकरण होता। किन्तु इस प्रकार का कोई प्रयत्न न तो राज्य की ओर से किसी केन्द्रीय या प्रदेशीय सरकारी कमेटी ने किया और न किसी एलोपैथी या आयुर्वेद के कालेज में किया गया। वास्तव में एकीकरण का अर्थ आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की इन झीनी चादर को आयुर्वेद की एक पतली पर्त पर उढ़ाना मात्र ही था। पतली या मोटी का प्रश्न तो बाद का है। मूल बात तो यह है कि यह मान लिया गया कि आयुर्वेद स्वयं अवैाज्ञनिक और अपूर्ण है और उसमें जान डालने के लिए एलोपैथी का एक तीव्र पुट देना होगा। एलोपैथी ने इस एकीकरण में आयुर्वेद की ओर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया। आयुर्वेद का ही रूपांतर किया जा रहा है। इसको एकीकरण नहीं कहा जा सकता। यदि यही क्रम रहा तो थोड़े ही समय में आयुर्वेद का नामनिशान मिट जायेगा। केवल कुछ औषधियों का प्रयोग ही बच रहेगा। हां, यह स्मरण रखना चाहिए कि पश्चिम में सर्पगंधा आदि कुछ आयुर्वेदिक औषधियों के प्रयोग का यह अर्थ नहीं है कि एलोपैथी का आयुर्वेद के साथ एकीकरण हो रहा है। यह दु:ख की बात है कि कुछ ऊंचे वैद्यों ने भी समय रहते इस भयंकर संभावना को नहीं पहचाना और अनजाने इस एकीकरण के समर्थक बन बैठे।

मेरी अपनी राय इस विषय में यह है कि आयुर्वेद पूर्णतया वैज्ञानिक है, किंतु यह गतिहीन विज्ञान नहीं है। एक समय था जब वैद्य काष्ठ औषधियों पर ही बहुत कुछ निर्भर रहते थे। बाद में नागार्जुन जैसे लोगों ने रस औषधियों का प्रयोग चलाया। इनके प्रयोग का यदि रसायन शास्त्र का आयुर्वेद से एकीकरण कहें तो ठीक न होगा। केवल यही कह सकते हैं कि वैद्य ने रासायनिक क्रिया का उपयोग किया। इसलिए मेरी धारणा यह है आयुर्वेद में सैकड़ों ऐसी औषधियों का प्रयोग होने पर भी पूर्वकाल में जिनसे वैद्य अनभिज्ञ थे, आयुर्वेद अपना स्वत्व नहीं खो सकता। चरक और सुश्रुत जैसे आयुर्वेद के प्रतिपादकों ने भी तो यही कहा है कि वैद्य को निरन्तर नयी औषधियों का अन्वेषण करना चाहिए और इस अन्वेषण के लिए जंगली और असभ्य लोगों के व्यवहार का अध्ययन करना भी वांछनीय हो सकता है, केवल शर्त यह है कि वैद्य प्रत्येक औषधि को आयुर्वेद की कसौटी पर कसे। पेनसिलीन या क्लोरोमाइस्टीन का प्रयोग इसीलिए ही न किया जाय कि कुछ रोगों में ये बड़ी उपयुक्त सिद्ध हुई हैं। आयुर्वेदिक औषधि इन्हें तभी कह सकते हैं और वैद्य उन्हें बिना संकोच के तभी प्रयोग कर सकता है जब वे त्रिदोष सिद्धांत की कसौटी पर खरी सिद्ध हो जायें।

आयुर्वेद में अविश्वास पैदा करने में सबसे अधिक उसके भक्तों अर्थात् वैद्यों का ही हाथ है जो उसकी गलत व्याख्या किया करते हैं। वे जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं उनके वास्तविक अर्थ को समझने का कष्ट उठाना नहीं चाहते। वात, पित्त तथा कफ को यदि वैद्य हवा, पीले रंग का रस जो उदरविकार में कभी कभी बाहर आ जाता है और बलगम समझे तो यह अपने को ही नहीं किंतु आयुर्वेद को नीचे गिराता है, उसी प्रकार यदि कोई यह समझता है कि क्षिति, अप, तेज, वायु और आकाश, मिट्टी, पानी, आग, हवा और आसमान के नाम हैं और फिर लोग उस पर हंसे और आयुर्वेद से घृणा करने लगें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है। तीन धातुएं क्या हैं यह समझने के लिये भारतीय दर्शन का थोड़ा सा ज्ञान आवश्यक है। इसीलिए वैद्यों के पाठ्यक्रम में दर्शन का अध्ययन भी रखा जाता है। जैसा कि हम सब जानते हैं, परमात्मा की पराशक्ति प्रधान या मूल प्रकृति के रूप में प्रकट होती है कि जिसके तीन भेद सत, रज और तम व्यक्त होते हैं। ये तीन गुण सृष्टि के प्रत्येक चेतन-अचेतन पदार्थ में वर्तमान रहते हैं। मनोविज्ञान के क्षेत्र में ये काग्निशन, अफैक्शन और कोर्नेशन (संवेदन, भावना और क्रिया प्रवृति) के रूप में प्रकट होते हैं। जड़ात्मक सृष्टि के प्रत्येक छोटे-बड़े पदार्थ में ये तीनों गुण पाये जाते हैं। शरीर में ये तीन शक्तियों के रूप में रहते हैं, जिन्हें वात, पित्त और कफ कहते हैं। ये तीन शक्तियां शरीर की प्रत्येक क्रिया का प्रवर्तन और नियन्त्रण करती हैं, चाहे उसका सम्बन्ध मांस पेशियों से हो, चाहे पाचनादि रासायनिक परिवर्तनों से, चाहे नाडि़ जाल से। जिन्हें हम साधारण बोलचाल में वात, पित्त और कफ  कहते हैं वे शरीर में सम्बद्ध वह तीन स्थूल पदार्थ हैं जिनमें यह धातु अभिव्यक्त हो रहे हैं। कोई घातु एक पदार्थ में अधिक उद्भूत है, कोई दूसरे में।

पंचमहाभूत का सिद्धांत पूर्णरूपेण वैज्ञानिक है। इसके समर्थन में कई लोगों ने अध्ययन किया है। उदाहरण के लिए बड़ी नम्रता से मैं पाठाकों का ध्यान इस विषय के उस विवेचन की ओर दिलाता हूं जिसे मैंने अपनी पुस्तक चिद्विलास में किया है। जो वैद्य महाभूतों की उस व्यवस्था से चिपटा रहना चाहता है। जिसे मध्यकाल के लेखकों ने किया था जब कि राजनीतिक पर तंत्रता थी और अन्वेषण तथा नए प्रयोगों की सुविधाएं न थीं, वह अपनी विद्या की कुसेवा करता है। दोष प्राचीन ़ऋषियों के लेखों का नहीं परन्तु आधुनिक टीकाकारों का है। मैं विज्ञान का विनम्र विद्यार्थी हूं और अपनी पूरी शक्ति से कह सकता हूं कि त्रिदोषसिद्धांत की नींव उतनी ही दृढ़ है जितनी किसी चिकित्सा सम्बन्धी सिद्धांत की हो सकती है। यह उन परिस्थितियों को बतलाता है, जिनमें स्वास्थ्य को हानि पहुंच सकती है। इसकी सहायता से वैद्य लक्षणों को जानकर यह समझ सकता है कि शरीर के भीतर की अव्यवस्था क्या है जिससे यह लक्षण प्रकट हुए हैं और शरीर को किस उपचार की आवश्यकता है यह भी पूरी तरह समझ में आ जाता है। निदान के आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों को यदि वैद्य अपनाये ंतो यह बिलकुल उचित ही है। परन्तु कीटाणु और रासायनिक कमियां, उनके दृष्टिकोण से, बाहरी लक्षणों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे केवल इस बात की ओर संकेत करते हैं कि शरीर के भीतर धातुओं में विषमावस्था और अव्यवस्था उत्पन्न हो गयी है। आयुर्वेद के आधुनिक अध्यापन में यह प्रयत्न होना चाहिए कि वैद्य का आयुर्वेद में खोया हुआ विश्वास लौट आये और दृढ़ धारणा हो जाय कि आयुर्वेद पूर्णरूपेण वैज्ञानिक हैं। आधुनिक विज्ञान ने जो तथ्य ढूंढ निकाले हैं, उनको न मानने से वैद्य अपने या अपनी विद्या के गौरव को नहीं बढ़ाता। जो सत्य है वह सत्य रहेगा और जो व्यक्ति उससे मुंह मोडता है उसे अपने शुतुर्मुर्गी व्यवहार की भारी कीमत चुकानी होगी।

रसायन, शरीर-रचना, जीवशास्त्र, मनोविज्ञान, कीटाणु विज्ञान जैसे शास्त्रों का किसी चिकित्सा-प्रणाली विशेष से सम्बन्ध नहीं होता। वैद्य उन्हें साधिकार उसी प्रकार प्रयोग कर सकता है जैसे एलोपैथ। किन्तु उसे अपने मूलाश्रय को न भूलना चाहिए और इन शास्त्रों का उसी दृष्टिकोण से प्रयोग करना चाहिए। शल्य चिकित्सा के बारे में भी यही बात सही है। एक समय था जब वैद्य की चिकित्सा में शल्य को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। सुश्रुत के दिए हुए आदेश आज भी आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं। कुछ कारणों से, जिनका मैं यहां उल्लेख नहीं करूंगा, शल्य चिकित्सा का प्रयोग बन्द हो गया, यद्यपि वैद्य अब भी शल्य चिकित्सा का अध्ययन करते हैं। यह विभाजन अब न रहना चाहिए और शल्य चिकित्सा आयुर्वेदिक प्रशिक्षण का अनिवार्य अंग होना चाहिए। इस विषय में भी मैं फिर एक बात की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं और वह यह है कि शताब्दियों पूर्व लिखी पुस्तकों में वर्णित शल्य के उपकरणों को आज यदि कोई प्रयोग करने को कहे तो उससे बढ़कर मूर्खता की कोई बात न होगी। यदि आज का एलोपैथ 50 वर्ष पहले प्रयोग किए जाने वाले उपकरणों और विधियों को छोडऩे में स्वतन्त्र है और ऐसा करने से उसकी विद्या की एकता तथा क्रमिकता में कोई ह्रास नहीं होता तो कोई कारण नहीं कि वैद्य को सहस्रों वर्ष पूर्व निर्मित साधनों और उपकरणों का उपयोग करने के लिए विवश किया जाए। शल्य क्रिया के क्षेत्र में जो आधुनिकमत अन्वेषण हुए हैं, उनका उपयोग वैद्य को करना चाहिए। वे आयुर्वेद के अंग ही माने जायेंगे।

आयुर्वेद और आधुनिक शल्य चिकित्सा में कोई विरोध नहीं हो सकता क्योंकि अवयम और अवयवी में कोई विरोध नहीं होता। किन्तु मेरी यह निश्चित धारणा है, जिसे मैं फिर दुहराता हूं और वह यह है कि आधुनिक औषधियों के प्रयोग की शिक्षा आयुर्वेदिक प्रशिक्षण का अंग नहीं होना चाहिए जब तक कि इन औषधियों की उपयोगिता आयुर्वेदिक सिद्धांतों से परीक्षित न हो और आयुर्वेद में उनका समावेश न हो गया हो, ठीक उसी प्रकार जैसे सुपरिचित भोजन अपना स्वतन्त्र अस्तित्व खोकर शरीर के साथ एकरस हो जाता है। जो अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखना चाहे और विदेशीयता को विज्ञापित करता रहे, वह पराया तत्व है और आयुर्वेदिक प्रणाली से बहिष्कार करने योग्य है। ये विचार एक अल्पज्ञ के हैं उनका उतना ही सम्मान होना चाहिये जो विशेषज्ञों के क्षेत्र में व्यक्त हुए अलपज्ञ के विचारों का होता है। किन्तु मैं आशा करता हूं कि लोग उन पर पूरी तरह चिन्तन करेंगे। मेरी यह धारणा है कि हमारे इन प्रश्नों को महत्व न देने के कारण ही वर्तमान परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है। उनकी महत्ता इसलिए नहीं है कि मैंने उन्हें व्यक्त किया है किन्तु मेरी जानकारी में ये विचार बहुत से वैद्यों और आयुर्वेद प्रेमियों के मन में उठकर उन्हें चिन्तित कर रहे हैं। थोड़े ही समय में वैद्यों की वर्तमान पीढ़ी, वे वैद्य जिन्होंने आयुर्वेद का ज्ञान ऐसे गुरूओं के चरणों में बैठकर प्राप्त किया है जो शताब्दियों से परम्परा प्राप्त ज्ञान के भण्डार थे, समाप्त हो जायगी और हमारे बीच में वे लोग रह जायेंगे जो नाम के ही वैद्य होंगे क्योंकि कुछ आयुर्वेदिक नुसखों की छोटी मोटी जानकारी मात्र उन्हें होगी। यदि आयुर्वेद की आधार शिला ही टूट जायगी तो आयुर्वेद का विनाश हो जाएगा। मानवीय ज्ञान में योग देने के लिए उसके पास कुछ न बचेगा और वह चिकित्सा शास्त्र के इतिहास के विद्यार्थियों के सिवाय और किसी प्रयोजन की वस्तु न रह जायगी। हमसे से बहुतों का यह विश्वास है कि आयुर्वेद मानव ज्ञान और सुख में इससे अधिक योग दे सकता है। यही कारण है कि मैं उसे पाठ्यक्रम को सुधारने का अनुरोध कर रहा हूं। जिन शास्त्रों का हमने ऊपर वर्णन किया है उनमें जो साहयता प्रदान करने वाले उत्तम तत्व हैं उन्हें हम ग्रहण कर लें किन्तु आयुर्वेद अपने सत्व को न छोड़े और अपने मौलिक सिद्धान्तों पर अडिग रहे। तभी वह सच्चे अर्थ में आयुर्वेद कहलायेगा।

किस पाठ्यक्रम को हमें अपनाना चाहिये और उसमें क्या क्या हो यह सुझाव देना मेरे अधिकार की बात नहीं है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञ मुझसे कहीं अधिक अच्छी तरह से यह काम कर सकते हैं। जिसे हम आधुनिक चिकित्सा कहते हैं, उसके बोझ से हल्के होने के पश्चात् भी आयुर्वेद के विद्यार्थी के लिए अध्ययन की पर्याप्त सामग्री रहेगी और कालेज में पांच या अधिक वर्ष जो उसे व्यतीत करने होंगे वे पूरी तरह से व्यस्त रहेंगे। निश्चय केवल यही नहीं करना होगा कि कौन विषय पाठ्यक्रम में रखे जायें प्रत्युत यह भी सोचना कि आधुनिक चिकित्सा के अतिरिक्त कौन से विषय निकाल दिये जायं। उदाहरण के लिए पुरानी पुस्तकों में बतायी हुई शरीर रचना प्रणाली का अध्ययन अनावश्यक है। यदि आधुनिक विज्ञान के असंदिग्ध साधनों ने यह निश्चित कर दिया है। कि शरीर के अंग विशेष में 100 नाडिय़ां हैं तो इसमें कौन सी बुद्धिमत्ता है कि विद्यार्थी का समय ऐसी पुस्तक या उसके किसी ऐसे भाग के अध्ययन में नष्ट कराया जाय जिसमें यह लिखा है कि नाडिय़ों की संख्या 70 है। यह उदाहरण मात्र है। यदि प्राचीन ज्ञान के इस प्रकार के स्मारकों का कोई स्थान है तो वह आयुर्वेद के इतिहास में ही हो सकता है, यदि इस विषय का पाठन करना वांछनीय ही हो। यह भी निश्चय करना है कि जो कुछ पढ़ाना है वह किस ढंग से पढ़ाया जाय कि उसे ऐसा विद्यार्थी जो सतर्क बुद्धि है और जिसे आधुनिक विज्ञान की प्रगति में आस्था है, हृदयंगम कर सके। हमें आधुनिक विज्ञान की दृष्टि में रखते हुये अपने शास्त्र के सिद्धान्तों की पुन: मीमांसा करनी होगी। मैं यह नहीं कहता कि हम अपनी बातों को छोड़ दें, केवल इसलिए कि जो समय की दृष्टि से नवीन है, उनसे हमारी बातों का समर्थन नहीं होता। मेरा तो केवल इतना ही कहना है कि हम अपनी शास्त्रीय स्थिति की पुन: समीक्षा करें और देखें कि क्या यह सम्भव नहीं है कि हम अपने सिद्धान्तों को आधुनिक विज्ञान की भाषा में समझा सकें। ज्ञान गत्यात्मक होता है। वह निरन्तर आगे बढ़ता रहता है। न आयुर्वेद में न अन्य किसी विज्ञान में दुराग्रही होने की आवश्यकता है।

एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न और भी विचाराधीन है। वह यह कि आयुर्वेदिक कालेजों में किस प्रकार का विद्यार्थी प्रवेश पावे। इस विषय में बहुत कुछ मतभेद है। विज्ञान और संस्कृत दोनों का ज्ञान साथ साथ हो तब तो सबसे अच्छा हो। किन्तु अभी इस तरह के पाठ्यक्रम की सुविधा शिक्षा संस्थाओं में उपलब्ध नहीं है। मैं आशा करता हूं कि शिक्षा संस्थाएं निकट भविष्य में ऐसा करेंगी। जब तक ऐसा न हो तब तक के लिए यह कहा जाता है कि जिन विद्यार्थियों ने इण्टरमीडिएट परीक्षा विज्ञान के साथ पास की है साधारणत: उनकी आयुर्वेद के वैज्ञानिक होने में शंका रहती है इसलिए अच्छा यह हो कि जिन्होंने संस्कृत में माध्यमा परीक्षा पास की हो उन्हें ही लिया जाय। भैषज्य विज्ञान का किसी भाषा विशेष से कोई सरोकार नहीं होता। संसार की किसी भी भाषा के माध्यम से यह विद्या पढ़ाई जा सकती है। किन्तु कई कारणों से आयुर्वेद के विद्यार्थी के लिए संस्कृत के ज्ञान की अभी कुछ दिनों तक अनिवार्यता माननी होगी। आवश्यक नहीं है कि वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान हों। हां थोड़ा ज्ञान कार्य सुगमता के लिए अवश्य होना चाहिए। यदि हम 6 वर्ष का पाठ्यक्रम रखें जिसमें पहले वर्ष में प्रारम्भिक अध्ययन हो तो ऐसी व्यवस्था शायद सब तरह से आदर्श व्यवस्था होगी। लेकिन मैं इस बात से सहमत हूं कि पांच वर्ष के अधिक के पाठ्यक्रम के लिए विद्यार्थी कठिनाई से मिलेंगे।

विशेषकर जबकि एम.बी.बी.एस. के लिए पांच वर्ष का पाठ्यक्रम है। इसलिए मेरा सुझाव यह है कि उन विद्यार्थियों को ही लिया जाय जिनकी वैज्ञानिक योग्यता वही हो जो एलोपैथिक कालेजों में प्रवेश पाने के लिए स्थिर की गई है, अर्थात् विज्ञान विषयों के साथ इण्टरमीडिएट परीक्षा पास विद्यार्थी ही लिए जाएं। इसके साथ संस्कृत का एक पाठ्यक्रम निश्चित कर दें जिसे प्रत्येक विद्यार्थी को अध्ययन करना होगा। इस पाठ्यक्रम में साधारण संस्कृत में लिखना होना चाहिए। इसमें तर्कशास्त्र का प्राथमिक ज्ञान भी रखा जाय। कुछ-कुछ तर्कसंग्रह के समान, किन्तु नवीन आधुनिक ढंग पर। इसमें संशय नहीं कि प्रतिदिन दो घंटे के अध्ययन से बुद्धिमान विद्यार्थी संस्कृत के इतने ज्ञान को तीन या चार महीने में अर्जन कर सकता है। विज्ञान के स्नातक भी एलोपैथिक मेडिकल कालेजों की प्रवेश परीक्षा प्रशिक्षण के हेतु तीन चार मास का समय व्यय करते हैं। आयुर्वेदिक कालेज में प्रवेश पाने के इच्छुक भी इसी प्रकार के प्रशिक्षण पाने के पश्चात् ही प्रवेश पाने के योग्य समझें जाने चाहिए। आप देखेंगे कि मैंने मध्यमा परीक्षा को इसमें कोई स्थान नहीं दिया है। मैं इसका समर्थक नहीं हो सकता, जब तक इण्टरमीडिएट परीक्षा वाली विज्ञान की योग्यता उसके साथ-साथ न हो।

मेरे विचार से आयुर्वेद को पुन: प्रतिष्ठित करना हमारा कर्तव्य है। इस दिशा में यदि अविलम्ब प्रयास न किया गया तो यह शास्त्र समाप्त हो जायगा। मैं आयुर्वेद का समर्थक इसलिए नहीं हूं कि इसमें सस्ती दवाएं प्राप्त हैं। कुछ आयुर्वेद औषधियां बड़ी मंहगी होती हैं। सस्तापन इसकी सिफारिश नहीं हो सकती। मैं आयुर्वेद के पक्ष में इसलिए हंू कि मैं यह मानता हंू कि यह मानवसमाज के लिए उपयोगी है। आयुर्वेद के विद्वानों और विशेषज्ञों से अधिक और कोई इस स्थिति में नहीं है जो इस तथ्य की जांच कर सके। उन्हें चाहिए कि वे भविष्य में होने वाले वैद्यों के लिए एक उपयुक्त प्रशिक्षण प्रणाली प्रस्तुत कर उत्तर प्रदेश सरकार की सहायता करें। उसके पश्चात अगला कदम सरकार को उठाना होगा। उसे उनकी सिफारिशों केवल कार्यन्वित ही न करनी होंगी वरन् यह भी स्मरण करना होगा कि किसी भी विद्या के तब तक अध्येता न मिलेंगे जब तक वह अर्थकरी न हो। यदि हमें अच्छे वैद्य चाहिए तो यह भी देखना होगा कि उन्हें समाज में सम्मान प्राप्त हो और आर्थिक निश्चिन्तता रहे, क्योंकि उन्होंने रोग और मृत्यु से लड़कर मानवता की सेवा करने का व्रत लिया है। एक सच्चा वैद्य जिसने अपने शास्त्र के आचार्यों की शिक्षा हृदयंगम की है, धन के लिए अपना कार्य नहीं करता। किन्तु समाज को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों के प्रति अपना कर्तव्य पालन करे। ह्व