भूख और कुपोषण का खेल

कथित हरित क्रान्ति ने प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत माने जाने वाली हमारी दालों तथा तिलहनों में पाये जाने पोषक तत्वों की मात्रा में चौंकाने वाली हद तक कमी कर दी है
वन्दना शिवा
भूख तथा कुपोषण मानव निर्मित समस्याएं हैं। रासायनिक खेती की नयी पद्यति के परिणामस्वरूप ये सभी उद्योगों में तैयार की गयी हैं। किन्तु जिस प्रकार भूख का एक खाका तैयार करके उसे उद्योगों में पैदा किया जा रहा है उसी प्रकार सभी के लिए पौष्टिक तथा स्वास्थ्यवर्धक भोजन का भी एक खाका तैयार किया गया है।
हमें टेलीविजन तथा समाचार पत्रों में बार-बार विज्ञापनों के जरिये दिखाया और समझाया जाता है कि उद्योगों में निर्मित भोजन ही सही पोषण प्रदान करता है। लेकिन जब भी हम इस पर सवाल खड़ा करते हैं तो हमें बताया जाता है कि यदि हमने रासायनिक खेती को त्याग दिया तो हम सभी भूखे मरेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि रासासनिक खाद निश्चित रूप से ऐसे जहर हैं जो विभिन्न तरीकों से हमारी खाद्य सुरक्षा को समाप्त कर रहे हैं। ये न केवल जमीन के हितैशी कीडों को मारकर उसकी उर्वरा शक्ति को नष्ट करते हैं, बल्कि वातावरण में पाये जाने वाले किसानों तथा फसलों के हितैषी कीटों को भी नष्ट कर देते हैं। आखिर में इस सबका असर हमारे खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ता है।
इस औद्योगिक उत्पादन के कारण गंभीर पर्यावरणीय तथा सामाजिक संकट पैदा भी हुआ है। यदि हमें सही मायने में पौष्टिक भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित करनी है तो हमें हर हालत में खाद्यान्न उत्पादन के प्रकृति रक्षक सुरक्षित तरीकों को अपनाना पडेगा। हमारी संस्था नवदान्य सहित अनेक पर्यावरण रक्षक आन्दोलन वास्तव में यही काम और मांग कर रहे हैं। हमने हकीकत में काम खडा करके दिखाया है कि यही व्यावहारिक तरीका है और हम रासायनिक खेती से पूरी तरह मुक्ति पाते हुए पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन कर सकते हैं।
खेती का औद्योगीकरण भूख और कुपोषण पैदा करता है। लेकिन यह सब जानते हुए भी आज हमारे देश में खेती के और अधिक औद्योगीकरण की बात की जा रही है। इससे संकट बढ़ेगा अथवा घटेगा? भारत में खेती, भोजन तथा पोषण को एक दूसरे से अलग करके देखा जाता है। लेकिन इसके बावजूद किस खाद्यान्न का कैसे उत्पादन किया जाता है उससे उसकी पौष्टिकता निर्धारित होती है। इसी से उसका वितरण तथा वह किसे मिलना चाहिए यह तय होता है।
यदि हम ज्वार-बाजरा, मंडवा और दालों का अधिक उत्पादन करते हैं तो निश्चित रूप से इससे प्रति व्यक्ति पोषकता में वृद्धि होगी। यदि हम रासायनिक खादों व कीटनाशकों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करते हुए खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं तो इसका मतलब यह है कि हम प्रति एकड़ कम पोषणयुक्त अन्न का उत्पादन कर रहे हैं। यदि हम पर्यावरण के अनुकूल खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं तो इससे किसानों के घरों में अधिक अन्न रहेगा और उससे ग्रामीण बच्चों में कुपोषण की समस्या पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।
आज हमारी कृषि नीति में फसलों के अधिक से अधिक मात्रा में उत्पादन पर जोर दिया जाता है न कि खाद्यान्न की पौष्टिकता पर। आज सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर आधारित हमारी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था भी भोजन की गुणवत्ता तथा पौष्टिकता पर जोर नहीं देती। यही कारण है कि पौष्टिकता के कार्यक्रम खेती तथा खाद्य सुरक्षा से अलग रखे जाते हैं।
भू-संकट, खाद्य संकट तथा पौष्टिकता व स्वास्थ्य संकट आपस में जुड़े हुए हैं। इसलिए इन्हें एक साथ ही देखना चाहिए और उनका समाधान भी एक साथ ही तलाशना चाहिए। इसलिए कृषि नीति का उद्देश्य औद्योगिक तरीके से खाद्य प्रसंस्कृत भोजन को बढ़ावा देना नहीं हो सकता है। आज जिस तेज गति से खेती का रासायनिकरण हो रहा है उतनी ही तेज गति से हम भोजन की पौष्टिकता को समाप्त कर रहे हैं। इससे कभी भी हमारी भूख और कुपोषण की समस्या का समाधन नहीं हो सकता है। कुपोषण की समस्या की शुरूआत हमें जमीन से शुरू करनी होगी।
जिस औद्योगिक कृषि को आज तीसरी दुनिया के देशों में हरित क्रान्ति अथवा दूसरी हरित क्रंाति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह बहुत ज्यादा रसायन खाने वाली, अधिक पूंजी मांगने वाली और अधिक डीजल खाने वाली कृषि पद्धति है। इसकी संरचना ही ऐसी है कि यह किसान को कर्ज के ऐसे जाल में फंसा देती है, जिससे निकलना उसके लिए असंभव हो जाता है। और आखिर में उसे या तो अपनी जमीन से ही हाथ धोना पडता है, या फिर आत्महत्या का रास्ता चुनना पड़ता है।
गरीब देशों में किसानों को महंगे रासायनिक खाद तथा दोबारा प्रयोग न होने वाले बीजों को खरीदने के लिए अधिक से अधिक पैसा उधार लेना पडता है। इसलिए जो भी फसल वे उगाते हैं वह कर्ज उतारने के लिए उन्हें बेच देनी पड़ती है। यही कारण है कि आज भूख गांव-गांव की समस्या बन गयी है। जहां-जहां भी आज रासायनिक तथा कमर्शियल खेती ने पैर पसारे हैं वहीं-वहीं किसान कर्ज में डूबे हैं। अपने स्वयं के उत्पादन पर उनका हक नहीं रहता और धीरे-धीरे वे गरीबी और भूख के कभी न खत्म होने वाले जाल में फंसते जाते हैं।
औद्योगिक रासायनिक कृषि विभिन्न प्रकार के कीट पतंगों को नष्ट करके अथवा उन्हें वह स्थान छोड़कर कहीं दूर चले जाने के लिए बाध्य करके भी एक प्रकार से भूख को बढ़ावा दे रही है। हरित क्रान्ति ने प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत दालों तथा तिलहनों को की पौष्टिकता को भी चौंकाने वाली हद तक कम किया है।
मोनोकल्चर से कभी अधिक खाद्यान्न का उत्पादन तथा पोषण प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इनमें अधिक रासायनिक खाद तथा डीजल की जरूरत होती है। इसलिए ये सिर्फ खेती के लिए रासायनिक खाद तथा कीटनाशकों का उत्पादन करने वाली कंपनियों और तेल कंपनियों के लिए ही फायदेमंद हो हैं, आम आदमी अथवा किसानों के लिए नहीं। इनसे अधिक अन्न भले ही उत्पन्न हो जाए, लेकिन उसमें पोषण की मात्रा बहुत कम होती है।
औद्योगिक रासायनिक कृषि में उत्पादन लागत के रूप मेंं सबसे अधिक जोर मजदूरों पर दिया जाता है। इसलिए बार-बार कहा जाता है कि अमुक मशीनें खरीदने से किसान की मजदूरों पर निर्भरता कम हो जाएगी। मशीनों को खरीदकर किसान का जमीन से रिश्ता समाप्त हो जाता है। मशीनों के अत्यध्कि उपयोग से ग्रीनहाउस गैसों तथा पर्यावरण असंतुलन का जो खतरा पैदा होता है वह अलग है।
दूसरे, औद्योगिक रासायनिक कृषि में सिर्फ उसी फसल के उत्पादन पर जोर दिया जाता है, जिसका दुनिया के दूसरे देशों में निर्यात किया जा सके। इसके लिए मैं ‘दिमाग का मोनाकल्चरÓ शब्द प्रयोग करती हूं। इन अधिक उत्पादन वाली कथित फसलों ने हमारी जैव विविध्ता के समक्ष भी संकट पैदा कर दिया है। खेती की जैव विविधता वाली पद्धतियों से वास्तव में इस मोनोकल्चर पद्धति से भी अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। यही कारण है कि औद्योगिक रासायनिक कृषि की अपेक्षा जैविक कृषि किसानों तथा जमीन के लिए अधिक फायदेमंद है।
औद्योगिक रासायनिक कृषि एक प्रकार से फसलों की पौष्टिक शक्ति को छीनकर भी भूख और कुपोषण का कारण बनती है। खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से जो भी खाद्य पदार्थ उत्पन्न किया जाता है वह पौष्टिकता की दृष्टि से तो शून्य होता ही है साथ ही खतरनाक जहरीले रसायनों से भरपूर होता है। खाद्य पदार्थो में जो पौष्टिकता होती है वह वास्तव में जमीन से आती है न कि रसायनों से।
एनपीके यानि नाइट्रोजन, फासफोरस तथा पोटेशियम आधरित रासायनिक खादों वाली औद्योगिक रासायनिक कृषि जमीन में पाये जाने जिंक, कैलिश्यम तथा आयरन जैसे उन जरूरी तत्वों को समाप्त कर देती है जो अन्न में पौष्टिकता पैदा करते हैं। इसलिए अधिक फसल उत्पादन का मतलब यह कदापि नहीं है कि उसमें पौष्टिकता भी अधिक है। वास्तव में यह कुपोषण को बढ़ावा देना ही है। इसलिए आवश्यक पौष्टिकता को प्राप्त करने के लिए हमें अधिक भोजन करना पडता है।
इसलिए भूख और कुपोषण को समाप्त करने के लिए सस्ती तथा प्रभावी रणनीति जैविक खेती के अलावा दूसरी कोई हो ही नहीं सकती। यह जमीन की पौष्टिकता को बढ़ाती है और पौष्टिकता से परिपूर्ण जमीन बदले में हमें पौष्टिकतापूर्ण खाद्यान्न प्रदान करती है।
खेती में जमीन के कीडों के सही निक्षेपण से रासायनिक खाद की अपेक्षा जमीन को पांच गुणा अधिक नाइट्रोजन, सात गुणा अधिक फोसफोरस, तीन गुणा अधिक मैग्नेशियम, 11 गुणा अधिक पोटाश, एक से दो गुणा अधिक कैलिश्यम प्राप्त होता है। जमीन के यही कीड़े खेती की उर्वरा तथा पौष्टिक शक्ति को बढ़ाते हैं। यदि जमीन में सूक्ष्म कीडों की मात्रा अधिक है तो उसमें पौष्टिकता भी अधिक ही पायी जाएगी। इस प्रकार उस जमीन में जो भी अन्न उत्पन्न होगा, उसमें भी अधिक पौष्टिकता होगी।
औसतन जैविक भोजन में रासायनिक खादों से उत्पन्न भोजन की अपेक्षा 21 प्रतिशत अधिक आयरन, 14 प्रतिशत अधिक फासफोरश, 78 प्रतिशत अधिक क्रोमियम, 390 प्रतिशत अधिक सेलेनियम, 63 प्रतिशत अधिक कैलिशयम, 70 प्रतिशत अधिक बॉरोन, 138 प्रतिशत अधिक मैग्नेशियम, 27 प्रतिशत अधिक विटामिन सी तथा 10 से 15 प्रतिशत अधिक विटामिन ई व बीटा कैरोटिन पाया जाता है।
इसलिए हमारे खेतों में जितनी अधिक जैविक विविधता होगी हमारे खेतों में प्रति एकड़ उतनी ही अधिक पौष्टिक फसलें पैदा होंगी। इसमें कृषि लागत भी कम होगी। पौधे, व्यक्ति तथा जमीन एक ही खाद्य चक्र के हिस्से हैं और यही वास्तव में जीवन चक्र है। अच्छी खेती वही है जो अधिक से अधिक स्वास्थ्य प्रदान कर इस जीवन चक्र को मजबूती प्रदान करे।
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(लेखिका नवदान्य ट्रस्ट की कार्यकारी निदेशिका हैं।)