क्यों उपेक्षित हैं भारतीय चिकित्सा प्रणालियां

रवि शंकर कैंसर और एड्स जैसे असाध्य प्रतीत होने वाले रोगों से पीडि़त इस विश्व में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने अद्भुत प्रगति की है। आज यह ईश्वर से होड़ लेने की चेष्टा में मानव अंगों के प्रत्यारोपण से लेकर उनके विकास तक की बातें कर रहा है। परंतु इसका दु:खद पहलू यह है कि चिकित्सा विज्ञान की इन तमाम प्रगतियों के बाद भी पुरानी बीमारियां तो बनी ही हुई हैं, और ढेर सारी नई घातक बीमारियां पैदा भी हो रही हैं, चाहे वह कैंसर हो या एड्स या हैपेटाइटिस बी। पुरानी बीमारियों के भी नए विकसित रूप सामने आ रहे हैं। मोटापा जैसी सामान्य चीज गंभीर बीमारी बनती जा रही है। इसे हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रगति की सफलता मानें या असफलता?
आज यह लगभग साफ हो गया है कि पर्याप्त प्रचार और लोकप्रियता के बाद भी आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की अपनी सीमाएं हैं। न तो वह मनुष्य शरीर को संपूर्णता में देखती है और न ही उसका संपूर्णता से इलाज कर सकती है।
आज से 96 वर्ष पूर्व 1909 में महात्मा गांधी ने इसकी आलोचना करते हुए इसे देश के लिए अत्यंत हानिकारक बताया था। उन्होंने इस प्रणाली की व्यावसायिकता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा किया था। उन्होंने लिखा है, च्च्हम डॉक्टर क्यों बनते हैं, यह भी सोचने की बात है। उसका सच्चा कारण तो आबरूदार और पैसा कमाने का धंधा करने की इच्छा है। उसमें परोपकार की बात नहीं है। उस धन्धे में परोपकार नहीं है, यह तो मैं बता चुका। उससे लोगों को नुकसान होता है। डाक्टर सिर्फ आडम्बर दिखाकर ही लोगों से बड़ी फीस वसूल करते हैं और अपनी एक पैसे की दवा के कई रुपये लेते हैं। यों विश्वास में और चंगे हो जाने की आशा में लोग डॉक्टरों से ठगे जाते हैं। जब ऐसा ही है तब भलाई का दिखावा करनेवाले डॉक्टरों से खुले ठग वैद्य (नीम हकीम) ज्यादा अच्छे।ज्ज्
आज हम पाते हैं कि बाजारवाद इस पर इस कदर हावी हो चुका है कि यह उत्तरोत्तर महंगी और आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। आज कोई भी सिर्फ सेवा करने के लिए चिकित्सक नहीं बनता और चिकित्सक बनना भी अब बाजार की शक्तियों के नियंत्रण में है।
इसके लिए आपको चार से लेकर दस लाख रूपए तक खर्च करने पड़ते हैं। उस रूपये को जुटाने के लिए फिर इसी बाजार के अंग आपको कर्ज देते हैं। उस कर्ज को चुकाने के लिए यह तो निश्चित ही है कि आप सेवा नहीं कर सकते। बाजारवाद का चंगुल इस प्रणाली पर कुछ इस तरह कसा हुआ है कि भारत में कौन सी दवाएं या स्वास्थ्य साधन नि:शुल्क वितरित किए जाएं, यह भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही तय करती हैं। उन्हें मलेरिया और डायरिया की तुलना में एड्स अधिक गंभीर बीमारी दिखती है और इसलिए गांव-गांव में जितना ओ.आर.एस. के पैकेट और कुनैन का प्रचार नहीं होता, उससे अधिक कंडोम का प्रचार किया जाता है।
स्वास्थ्य और चिकित्सा के इस गंभीर प्रश्न पर विचार करते समय अक्सर एक तथ्य भुला दिया जाता है कि भारत एक प्राचीन राष्ट्र है और इसकी अपनी परंपराएं हैं। लाखों-करोड़ों वर्षों की लंबी परंपरा वाले इस राष्ट्र में एक स्वास्थ्य प्रणाली भी विकसित हुई थी जो यहां के परिवेश, पारिस्थितिकी और लोगों के अनुकूल थी। भारत पर विदेशियों के शासन के दौरान निरंतर हुई उपेक्षा और अंग्रेजों द्वारा उसे प्रतिस्थापित कर नई प्रणाली के चलन को बढ़ावा देने के बाद भी वह प्राचीन स्वास्थ्य प्रणाली मरी नहीं, जीवित रही, चलती रही। स्वाधीनता के बाद सरकार यदि चाहती तो उस प्राचीन भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली को पुन: विकसित और प्रतिष्ठित किया जा सकता था परंतु पश्चिम की चकाचौंध से चुंधियायी पंडित नेहरू की सरकार की एक सदस्य और भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को न तो भारतीय परंपराओं की जानकारी और समझ थी और न ही उस पर उन्हें कोई गर्व था। उन्होंने संसद में यह घोषणा की थी कि सरकार वैज्ञानिक पद्धति एलौपैथी का ही प्रचार-प्रसार करेगी, प्राचीन चिकित्सा पद्धति के अंधविश्वासों का नहीं। बिहार के एक सांसद के विरोध करने पर उन्होंने अपना वक्तव्य तो वापस ले लिया परंतु उनकी मंशा वही बनी रही। यही कारण है कि देश के कोने-कोने में सरकार ने जो भी स्वास्थ्य केंद्र खोले, वे ऐलोपैथी चिकित्सा ही उपलब्ध कराते थे। इसके कालेज और अस्पतालों की बाढ़ आ गई और भारतीय चिकित्सा प्रणाली के कालेज और अस्पताल उपेक्षा के शिकार बने रहे। परंतु अब धीरे-धीरे आधुनिक चिकित्सा प्रणाली का कड़वा सच सामने आ रहा है और उससे लोगों का मोहभंग भी हो रहा है। लोग अब आयुर्वेद, योग प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी जैसे विकल्पों की ओर आकर्षित होने लगे हैं।
आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के पैरोकार आयुर्वेद, योग प्राकृतिक चिकित्सा आदि पर ढेर सारे प्रश्न खड़े करते हैं। ये प्रणालियां कालबाह्य हो गई हैं, श्रमसाध्य हैं, समय लेती हैं, तुरंत लाभ नहीं देतीं, इनमें शल्य चिकित्सा नहीं है, आज की तेज गति की जिंदगी के साथ नहीं चल सकतीं आदि आदि। परंतु ध्यान देने की बात यह है कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की तरह केवल मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी हुई नहीं है। यह एक पूरी जीवन पद्धति है। इस बारे में गाँधी जी ने अपनी पुस्तक हिंद स्वराज में लिखा है, च्च्डाक्टरों का काम सिर्फ शरीर को संभालने का है या शरीर को संभालने का भी नहीं है। उनका काम शरीर में जो रोग पैदा होते हैं, उन्हें दूर करने का है। रोग क्यों होते हैं? हमारी ही गफलत से। मैं बहुत खाऊं और मुझे बदहजमी, अजीर्ण हो जाय, फिर मैं डाक्टर के पास जाऊं और वह मुझे गोली दे, गोली खाकर मैं चंगा हो जाऊं और दुबारा खूब खाऊं और फिर से गोली लूं। अगर मैं गोली न लेता तो अजीर्ण की सजा भुगतता और फिर से बेहद नहीं खाता। डाक्टर बीच में आया और उसने हद से ज्यादा खाने में मेरी मदद की। उससे मेरे शरीर को तो आराम हुआ लेकिन मेरा मन कमजोर बना। इस तरह आखिर मेरी यह हालत होगी कि मैं अपने मन पर जरा भी काबू न रख सकूंगा। अस्पतालें पाप की जड़ है। उनकी बदौलत लोग शरीर का जतन कम करते हैं और अनीति को बढ़ाते हैं। यूरोप के डाक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ शरीर के ही गलत जतन के लिए लाखों जीवों को हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों पर प्रयोग करते हैं। ऐसा करना किसी भी धर्म को मंजूर नहीं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, जरथोस्ती सब धर्म कहते हैं कि आदमी के शरीर के लिए इतने जीवों को मारने की जरूरत नहीं।ज्ज् यह उद्धरण सिद्ध करता है कि आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा शास्त्र ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का विज्ञान है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में केवल रोगों का इलाज होता है परंतु आयुर्वेद और योग प्राकृतिक चिकित्सा मनुष्य के संपूर्ण आहार विहार और जीवन को निर्देशित करती है। कहते हैं कि चरक ने पूछा था – कोह्यरुक, कोह्यरुक, कोह्यरुक। अर्थात् कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है, कौन स्वस्थ है? उनके एक शिष्य ने सही उत्तर दिया था – हितभुक, मितभुक, ऋतभुक। अर्थात् जो शरीर के लिए हितकारी भोजन करता है, कम भोजन करता है और उचित कमाई का भोजन करता है। इस प्रकार आयुर्वेद स्वास्थ्य का संबंध शरीर के साथ-साथ धन अर्जित करने के तरीके से भी मानता है।
इसी प्रकार योग व प्राकृतिक चिकित्सा सदाचार व मन की प्रसन्नता पर विशेष बल देते हैं। ये पद्धतियां इलाज से अधिक परहेज या संयम पर जोर देती हैं। यही कारण था कि स्वास्थ्य या चिकित्सा भारत में कभी भी व्यवसाय नहीं रही। स्वास्थ्य रक्षा के सामान्य सूत्र साधारणत: सभी लोगों को पढ़ाए जाते थे और वैद्यों की परंपरा कभी व्यावसायिक नहीं रही। इसके अलावा पूरे देश के लिए एक ही चिकित्सा प्रणाली, एक ही दवा जैसे एक केंद्रीय तंत्र विकसित करने पर कभी जोर नहीं रहा। कारण स्पष्ट था। प्रत्येक स्थान की जलवायु, जैव विविधता, वन्य पदार्थों की उपलब्धता, जीवन चर्या (रहन-सहन का तरीका) आदि भिन्न-भिन्न होने के कारण यह संभव भी नहीं था। इसलिए प्रत्येक स्थान पर चिकित्सा के भिन्न-भिन्न तरीके विकसित हुए परंतु इनमें एक बात साझा थी और वह थी हितभुक, मितभुक और ऋतभुक की।
वस्तुत: सारी भारतीय व्यवस्थाएं विकेंद्रित ही रही हैं। केंद्रीय व्यवस्था कभी भारतीय नहीं हो सकती। इसलिए आज भारतीय चिकित्सा प्रणालियों के सामने दोहरी चुनौती है। अपने अस्तित्व के साथ-साथ अपने विकेंद्रित व स्थानीय स्वरूप को बचाए रखने की चुनौती। यह एक चुनौती है कि विदेशी बल और सरकारी प्रश्रय पर पलती ऐलोपैथी के विशाल हो चुके स्वरूप के समक्ष अपने अस्तित्व को बचाने के चक्कर में भारतीय पद्धतियां कहीं अपनी अव्यावसायिकता व स्थानीय स्वरूप को न खो दें? आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा आदि भारतीय चिकित्सा प्रणालियों के समर्थकों को यह ध्यान रखना होगा कि ऐलोपैथी से होड़ लेने की धुन में वे भी कहीं व्यावसायिकता की दौड़ में शामिल न हो जाएं।
आज पुन: भारत ही नहीं, बल्कि विश्व में प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणालियों की महत्ता और उपयोगिता बढ़ रही है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या सरकार वास्तव में इनके विकास के प्रति गंभीर है? क्या वह जितनी सुविधाएं और सहायताएं ऐलोपैथी को देती है, उसका आधा भी भारतीय चिकित्सा प्रणालियों को देने के लिए तैयार है? क्या वह दोनों प्रणालियों को दी जाने वाली सरकारी व विदेशी सहायताएं बंद कर दोनों में स्वतंत्र स्पर्धा होने दे सकती है? सरकार के अभी तक के रुख से तो ऐसा नहीं लगता। लेकिन अब भारत की जनता भारतीय चिकित्सा प्रणालियों की ओर बढऩे लगी है। चाहे वह स्वामी रामदेव द्वारा योग-चिकित्सा का प्रचार हो या झारखंड के रांची शहर में डा. सुरेश अग्रवाल द्वारा अमृत स्वास्थ्य मंच के माध्यम से औषधीय पौधों का, लोग तो जागने लगे हैं। क्या सरकार भी जागेगी?