भ्रष्ट शासकों को भुगतने होंगे बुरे परिणाम

शासन संबंधित है लोगों से लोगों का संबंध है ज्योतिष से। इस प्रकार शासन और ज्योतिष का अप्रत्यक्ष लेकिन गहरा जुड़ाव है। शासन को अपने आप में अच्छा होना चाहिए। लेकिन अब माहौल ऐसा खराब हो गया है कि देसी घी के पहले शुद्ध लगाना पड़ता है, वैसे ही शासन के पहले सु लगाना पड़ता है। शासन का मतलब ही है कि अच्छा हो, शुभ हो। लोगों का शुभ करने के लिए एक तंत्र बनाया जाता है। इसका आधार होता है संविधान और संविधान का आधार होता है लोगों की अपेक्षाएं।
अब इसे दो रूपों में समझने का प्रयास करते हैं। एक तो ऐसे समय की बात करें जब आज की भांति लोकतंत्र नहीं था। उस समय भी शासन था और काफी उच्च कोटि का शासन था। शासन पर बाकायदा चिंतन और शोध होते थे। उस समय औपचारिक संगठन न होते हुए भी शासन अधिक सफल था। इसका कारण था कि उस समय का शासन चरित्र आधारित था और आज का तंत्र आधारित शासन है। आज तमाम प्रकार की आचार संहिताएं यानि की कोड ऑफ कंडक्ट्स हैं, मानवाधिकार हैं, संविधान है, काफी मजबूत न्यायपालिका है, इन सबके बावजूद सुशासन नहीं दिख रहा है। नब्बे के दशक के अतिम वर्षों में न्यायपालिका ने सुओ मोटो केसेज यानि कि मामलों का स्वत: संज्ञान भी लेना शुरू कर दिया। उसमें बड़े-बड़े नेता भी फंसे, फिर भी कोई लाभ नहीं दिख रहा। इसका एक ही कारण है कि हम आज की व्यवस्था को चरित्र आधारित बनाने के लिए तैयार ही नहीं है।
ज्योतिष भी बताता है कि भ्रष्ट शासकों को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। ज्योतिष के अनुसार हम सभी अपने अतीत से किसी न किसी रूप में जुड़े होते हैं। हम जो अच्छे काम करते हैं, उसके अच्छे और जो बुरे काम करते हैं, उसके बुरे प्रभाव हमारे साथ जुड़ते रहते हैं। ताकत का गलत प्रयोग, किसी के हक को मारना, किसी का निरादर करना आदि को घोर अपराध माना गया है। इसका परिणाम काफी बुरा होता है। ऐसा नहीं है कि ये परिणाम उसे अगले जन्म में मिलेंगे, परिणाम मिलने इसी जन्म में शुरू हो जाते हैं। आज जो सत्ता का दुरूपयोग करता है, वह भविष्य में सत्ताविहीन हो जाता है और सत्ताधारी का सहयोग भी खो देता है। जो भी भ्रष्टाचारी होगा, वह दूसरे का हक मारता ही है, और ऐसे भ्रष्टाचारी व्यक्ति को उसका अपना हक प्राप्त नहीं होता। यहां तक कि उसे अपने परिवार तक कि संवेदनाएं नहीं मिलतीं और वह पागल तक हो जा सकता है।
इसी प्रकार किसी भी प्रकार के शोषण करने वाले व्यक्ति को दास बनना पड़ता है और वह भी ऐसा दास जिसका कोई सम्मान नहीं होता। वह साधारण जीवन जीने का अधिकार भी खो बैठता है। राष्ट्रद्रोह करने वाले को शुक्रदोष होता है और उसे जीवनसाथी का सुख प्राप्त नहीं होता। उसका पति या पत्नी उसे छोड़ जाती है।
कोई भी राष्ट्र स्वयं में एक इकाई नहीं होता। पूरी शासन व्यवस्था स्वयं में कोई तंत्र नहीं है। इन सब का आधार हैं, व्यक्ति। यदि मूलत: देखें तो राज्य से व्यक्ति नहीं है, व्यक्तियों के समूह से राष्ट्र बनता है। तो व्यक्तियों के चरित्र से राष्ट्र का चरित्र बनता है। यदि व्यक्ति का मन शांत होगा तो राष्ट्र शांत होगा। यदि व्यक्ति का मन अशांत होगा, तो शांत राष्ट्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। शासन चलाने वाले समस्त लोग भी व्यक्ति ही हैं, और वे भी उस माहौल से प्रभावित होते हैं, जिससे कथित रूप से आम आदमी (आम आदमी की व्याख्या आज तक नहीं हो पाई है) प्रभावित होता है। काम, क्रोध, लोभ मोह, अहंकार से यदि आम आदमी प्रभावित है तो इसी से शासन भी प्रभावित है। इसलिए, इस समय दस्तावेजों, कानूनों की वहुत आवश्यकता नहीं है, चरित्र की बहुत आवश्यकता है। उदाहरण के लिए लोकपाल का मामला है। लोकपाल बनकर भी क्या हो जाएगा? इससे पहले भी तो कई संस्थाएं बनीं। उससे क्या हो गया? न्यायाधीश लोग ही आज कहने लगे हैं कि न्यायपालिका को ध्यान से चलने की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि वे इसमें कुछ गलत होता देख रहे हैं। इसलिए सारी चीजें अंतत: चरित्र पर आकर टिकती हैं। चरित्र का अर्थ होता है मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन चार चीजों से चरित्र बनता है।
अब इसमें बुद्धि केवल मन को चला रही है, मन चित्त से प्रभावित है और चित्त चरित्र का निर्माण कर रहा है। इसलिए चित्त और मन को साधने की आवश्यकता है। इस पर कोई प्रयत्न देश में नहीं हो रहा है। अब इसमें ज्योतिष की भूमिका आती है। ज्योतिष का कार्यक्षेत्र व्यक्ति है, समूह नहीं। इसलिए ज्योतिष पूरे देश के लोगों को ठीक नहीं कर सकता लेकिन व्यक्ति के मन की समझ ज्योतिष को जबरदस्त होती है। क्या चीजें ऐसी की जाएं कि संतान उत्तम हो, ऐसा क्या किया जाए कि बच्चा नकारात्मक से सकारात्मकता की ओर बढ़े, ऐसा क्या किया जाए कि साधारण से विलक्षण लोग उत्पन्न हों, क्या ऐसा किया जाए कि मन में शांति हो? ज्योतिष समस्या का पता लगाता है और अध्यात्म निदान कर देता है। वातयुक्त देश में विद्रोह होगा और वह दिशाहीन होगा। जैसा कि अभी हमने देखा कि लोग कई बार एकत्र हुए। क्यों एकत्र हुए, क्या चाहते हैं, पता नहीं। कुछ लोग मनोरंजन के लिए आए, कुछ देश के लिए कुछ करना चाहते थे, कुछ तो तमाशा देखना था, कुछ को फोटो खिंचवाना था, कुछ को व्यवस्था बदलनी थी। हर तरह के लोग आए।
ज्योतिष में सबसे महत्वपूर्ण चीज है कि आप एक पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं। जो बिगड़ गए हैं, उन्हें सुधारना बेहद कठिन है। उनके पास ढेरों तर्क हैं। जो जितना बड़ा बुद्धिजीवी होता है, वह उतना ही बड़ा अच्छा या बुरा आदमी बनता है। उसको संभालना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन हम नई पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं और यह काम ज्योतिष से किया जा सकता है। छोटी-छोटी बातें हैं। यदि उंगलियां छोटी हैं तो बच्चे में चंचलता अधिक होगी, धैर्य कम होगा। तो उसको तदनुरूप भोजन कराओ, पढ़ाई कराओ, थोड़ा ध्यान आदि का अभ्यास कराओ और शरीर से स्थिर बैठना सिखा दो तो जब वह बड़ा होगा, तो उसमें धैर्यहीनता कम हो जाएगी।
अगर हमने किसी के हाथ में देखा कि मस्तिष्क रेखा एकदम सीधी है, तो उससे पता चलता है कि वह या तो काफी लालची है या भ्रम में रहने वाला है। तो शुरू से ही उसकी परवरिश और शिक्षा उसके अनुसार हो जाए तो, वह व्यक्ति लालची न रहे। लालच ही तो सभी प्रकार के भ्रष्टाचार की जड़ है। लालची व्यक्तियों के समूह से ही तो भ्रष्टाचार पनपता है। यदि एक एक करके लोगों में लालच कम करते चले जाएं तो इससे भ्रष्टाचार कम हो जाएगा। इसलिए शुरू से यदि पीढ़ी को साधने का प्रयास करें तो निश्चित रूप से सुशासन स्थापित हो सकता है।
अच्छा नेता कौन है? अगर हम जीव विज्ञान की भाषा में इसे समझें तो जो रेटिना की इमेज को अमेलडेला पर बनाता है फिर अपनी प्रतिक्रिया देता है, जिससे उसकी प्रतिक्रिया में धैर्य होगा, बुद्धि होगी। वह उचित प्रतिक्रिया होगी। यदि किसी व्यक्ति का रेटिना के बाद ही सीधा प्रतिक्रिया हो जाए तो वह सक्षम प्रतिक्रिया नहीं होगी। उसमें पूर्वाग्रह भी हो सकता है और आक्रामकता भी। इसमें ज्योतिष देखता है कि चंद्रमा और मंगल का क्या संयोग बनता है। यह संयोग अच्छा होने से आँख से बनने वाली इमेज पहले अमेलडेला पर जाएगी, फिर वहां से कार्य में परिणत होगी। इससे व्यक्ति में शांति होगी, निडरता होगी और उसका विजन काफी दूर तक का होगा।
यह चीज उत्पन्न की जा सकती है। तलाशी जा सकती है। समाज में अल्फा व्यक्ति काफी कम होते हैं। जो अल्फा है वह कहीं से भी निखर कर चला आएगा। कुछ लोग न तो अल्फा होते हैं, न बीटा, बीच के होते हैं। उनमें नेतृत्व क्षमता विकसित की जा सकती है। यदि कोई छोटे दांत वाला मोटा बच्चा है, उसको खूब पढ़ाइये और हर बात पर चर्चा करिए। इससे उसमें धैर्य और ज्ञान की उत्पत्ति होगी। आगे चल कर वह अच्छा नेता बनेगा।
इसके अलावा समान इमोशनल कोशंट, इंटेलिजेंट कोशंट और स्पिरिचुअल कोशंट के बच्चों को एक समूह में रखा जाए और उनके बीच गतिविधियां संचालित की जाएं। अभी स्कूल में नेतृत्व के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। इसलिए हमारे यहां जन्मजात नेता ही होते हैं, विकसित किए गए नेता नहीं। इससे जन्मजात नेताओं का एकाधिकार हो गया है और वे मनमानी कर रहे हैं।