भारतीय विचार में सुशासन

बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के द्वारा वर्ष 2011 और 2012 में देश में दो प्रमुख आंदोलन चलाए गए। पहली दृष्टि में देखा जाए तो दोनों आंदोलन देश की शासन तंत्र की विफलता के विरूद्ध शुरू हुए थे। हालांकि इस शासन तंत्र की विफलता को देश काफी लंबे समय से अनुभव करता रहा है और इसके विरूद्ध कई बड़े आंदोलन भी खड़े हुए परन्तु दुर्भाग्यवश वे न केवल स्वयं दिशाभ्रम के शिकार हुए, बल्कि उनक ा वास्तविक कारण और उद्देश्य भी ठीक से नहीं समझा जा सका। उदाहरण के लिए जयप्रकाश नारायण द्वारा संचालित 1977 में चलाए गए आंदोलन को देखें तो बात साफ हो जाएगी। यह आंदोलन भी शुरूआत में शासन में बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के विरूद्ध ही था परन्तु यह तात्कालिक मुद्दा गंभीर तब बन गया जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। लेकिन समस्या यह थी कि जेपी जिन लोगों के दम पर यह आंदोलन कर रहे थे, उनमें से किसी को भी न तो समस्या की और न ही इस आंदोलन की गंभीरता की समझ थी। वे इस समस्या को केवल और केवल कांग्रेस व इंदिरा गाँधी से जोड़ कर देखते थे और समझते थे कि इन दोनों के हट जाने से या फिर बलपूर्वक इन दोनों को सत्ताच्यूत कर देने से समस्या ठीक हो जाएगी। जेपी तो समस्या के मूल को समझते थे परन्तु दुर्भाग्यवश वे भीष्म मानसिकता से ग्रस्त थे यानी कि शासन में सुधार तो चाहते थे लेकिन स्वयं उसमें शामिल नहीं होने की प्रतिज्ञा किए बैठे थे। इसलिए उनके सामने एक ही उपाय था कि वे दूसरे लोगों को इसके लिए तैयार करें। दूसरे लोग तैयार तो हुए परन्तु उनकी मंशा कुछ और ही थी। इसी प्रकार हम और भी कई आंदोलनों को देख सकते हैं जो पैदा तो हुए परन्तु शासन की विफलता के कारण वे शासन तंत्र पर न तो कोई प्रश्न चिह्न ही खड़ा कर पाए और न ही कोई विकल्प ही प्रस्तुत कर सकें।
सवाल है कि फिर समाधान क्या है? क्या लोकपाल और कालेधन की समस्या सुलझ जाने से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या यह समस्या वाकई इतनी ही छोटी है? ध्यान से देखा जाए तो यह समस्या का एक छोटा अंश भर ही है। समस्या शासन में बैठे लोगों की विफलता का नहीं, बल्कि शासन की ही असफलता का है। यह तो अब साफ हो चुका है कि शासन अपने सभी उद्देश्यों में असफल हो चुका है। जो उद्देश्य उसने घोषित किए थे, उनमें भी और जो उद्देश्य एक शासन तंत्र के होते हैं उनमें भी। वैसे शासन तंत्र के जो उद्देश्य होने चाहिए, इस व्यवस्था ने उसे पहले से ही गौण बना रखा था और रही सही कसर इसके संचालकों के भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। सवाल है कि एक शासन तंत्र के उद्देश्य क्या होते हैं या फिर क्या होने चाहिए जिन पर खरा न उतरने के कारण इस शासन तंत्र को ही असफल माना जा रहा है? क्या भारत में इससे पहले कोई शासन व्यवस्था रही है जो इससे बेहतर शासन दे सकती हो या फिर देती रही हो? क्या भारत में इससे अधिक सफल और बेहतर शासन प्रणाली को कोई उदाहरण मिलता है? क्या आज के लोकतंत्र का कोई सार्थक विकल्प हमारे पास उपस्थित है?
पहले तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि देश में चल रही संसदीय प्रजातंत्र की व्यवस्था भारत को गुलाम बनाने वाले इंग्लैंड की व्यवस्था की नकल है। दूसरी बात यह जानने की है कि इस संसदीय प्रजातंत्र के बारे में देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के विचार क्या थे? यह जानकर हमें हैरानी हो सकती है कि महात्मा गाँधी ने इस व्यवस्था को सिरे से ही खारिज कर दिया था। उनका साफ-साफ मानना था कि यह व्यवस्था एकदम ही बेकार की है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज में वे लिखते हैं, ÓÓजिसे आप संसद की माता कहते हैं, वह संसद तो बांझ और बेसवा (वेश्या) है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक उस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर- दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है। और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पास वह रहती है। जो सिर्फ डर के कारण ही संसद कुछ काम करती है। जो काम आज किया, वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को संसद में ठिकाने लगाया गया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है, तब उसके सदस्य पैर फैला कर लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियां लेते हैं। उस संसद में इसके सदस्य इतने जोर से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं।ÓÓ (हिन्द स्वराज, पृष्ठ 13-14)
भारत में अंग्रेजों की सरकार 1760 में स्थापित हुई थी। हालांकि वो कंपनी की सरकार थी, अंग्रेजों की सरकार नहीं थी, लेकिन छोटे-मोटे कानून उन्होंने उसी समय से बनाना शुरू कर दिया था और उस समय से लेकर 1947 तक अंग्रेजों द्वारा लगभग 34735 कानून बनाये थे। उन्होंने हमें गुलाम बनाने के लिए ये जो व्यवस्थाएं और कानून बनाये थे, दुर्भाग्य से आज भी हमारे देश में सब के सब कानून, सब की सब व्यवस्थाएं वैसे के वैसे ही चल रहीं हैं जैसे अंग्रेजों के समय चला करती थीं।
जब हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था तो सभी क्रान्तिकारियों का मानना था कि भारत की गरीबी, भुखमरी और बेकारी तभी खत्म होगी जब अंग्रेज यहाँ से जायेंगे और हम अपनी व्यवस्था लायेंगे। उनका संकल्प था कि उन सब तंत्रों को उखाड़ फेकेंगे जिससे गरीबी, बेकारी, भुखमरी पैदा हो रही है। लेकिन हुआ क्या? हमारे देश में आज भी वही व्यवस्था चल रही है जो अंग्रेजों ने गरीबी, बेकारी और भुखमरी पैदा करने के लिए चलाया था।
देश की वर्तमान शासन व्यवस्था की विफलता का एक बड़ा उदाहरण है 1952 से शुरू हुई पंचवर्षीय योजनाएं जो औसतन 10 लाख करोड़ की होती हैं। अभी तक हमारे देश में ग्यारह पंचवार्षिक योजनायें लागू हो चुकी हैं, मतलब अभी तक हमारी सरकार 110 लाख करोड़ रूपये खर्च कर चुकी हैं और गरीबी, बेकारी, भुखमरी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। अंग्रेज जब थे तो ऐसी कोई योजना नहीं थी क्योंकि वो विकास पर कुछ भी खर्च नहीं करते थे और तब हमारी गरीबी नियंत्रण में थी लेकिन जब से हमने पंचवार्षिक योजना शुरू की, हमारी गरीबी भयंकर रूप से बढऩे लगी और बढ़ती ही जा रही है, कहीं रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।
वास्तव में आज की शासन व्यवस्था स्वयं को कल्याणकारी राज्य के रूप में घोषित करती है और इस लिए वह शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर व्यापार करना, उत्पादन करना, होटल चलाना और यहां तक कि नालियां बनवाना, सड़कों पर झाड़ू लगवाना जैसे काम भी स्वयं करना चाहती है। इसके लिए उसे सरकारी कर्मचारियों की बड़ी फौज खड़ी करनी पड़ती है। जिसके लिए जनता पर करों का भारी भरकम बोझ लाद दिया जाता है। इन सारे उपक्रमों के बाद भी सारी चीजें बदहाल ही बनी रहती हैं। करों के बोझ के कारण मंहगाई व गरीबी और बढ़ती जाती है। करों से काम न चलने के कारण सरकार विदेशों से कर्ज लेती रहती है और अंतत: हम आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ते जाते हैं। यह सारी गड़बड़ केवल एक कारण से हो रही है और वह है राज्य यानी कि शासन व्यवस्था के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कर्तव्यों को नहीं समझना। राज्य के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कर्तव्यों को समझना हो तो हमें पहले यह समझना पड़ेगा कि दुनिया में शासन व्यवस्था की शुरूआत क्यों और कैसे हुई थी?
राज्य की शुरूआत और उसके कर्तव्य
वैसे तो पाश्चात्य चिंतन में भी राज्य व्यवस्था के शुरूआत की अनेक कल्पनाएं की जाती हैं, परंतु अपने देश में महाभारत में इसका बड़ा ही स्पष्ट वर्णन आता है। महाभारत के शांतिपर्व का एक अत्यंत ही प्रसिद्ध श्लोक है ‘न राज्यं, न वै राजा∙∙सीत्, न दंडो न च दांडिक:। धर्मेणैव प्रजा: सर्वं रक्षन्ति स्म परस्परम।।’ इसका अर्थ है प्रारंभ में न तो कोई राजा था, न राज्य, न कोई दंड व्यवस्था थी और न कोई दंड देने वाला। सभी लोग परस्पर धर्मपूर्वक व्यवहार करते हुए एक दूसरे के हितों की रक्षा किया करते थे।
सामान्यत: समझा जाता है कि यह महाभारतकार ने समाज की आदर्श व्यवस्था का चित्र खींचा है, परंतु वास्तव में यह समाज की प्रारंभिक अवस्था का वर्णन है। प्रारंभ में मानव समाज ऐसा ही था। उसमें लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईष्र्या, चोरी, लूट जैसे अवगुण नहीं थे। अपने परिश्रम से अर्जित संपत्ति से वे संतुष्ट थे क्योंकि वे यजुर्वेद के निर्देश ‘मा गृध: कस्यस्विद्धनम’् का पालन करते थे। परंतु महाभारतकार के अनुसार धीरे-धीरे लोगों में लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईष्र्या आदि बढऩे लगे और परिणामस्वरूप समाज में अव्यवस्था फैलने लगी। गम्यागम्य, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य-अभक्ष्य और दोष-अदोष कोई भी बात उनकी दृष्टि में त्याज्य न रही। इस प्रकार मानव समाज में धर्मविपव हो जाने से वेद भी लुप्त होने लगा और वेद का लोप होने से धर्म मर्यादा ही नष्ट हो गयी। इससे देवताओं को बड़ा त्रास हुआ और वे ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी से उन्होंने हाथ जोड़कर कहा भगवन! मनुष्य लोक में जो सनातन वेद था, उसको लोभ, मोह आदि दूषित भावों ने नष्ट कर डाला है, इसमें हमें बड़ा भय हो रहा है। वेद का नाश होने से धर्म भी नष्ट हो गया है। मनुष्यों ने यज्ञ यागादि सभी शुभकर्म छोड़ दिये हैं इसलिए हम बडे संशय में पड़ गये हैं। आप हमारे लिए जो हितकर हो ऐसा कोई उपाय सोचिये। तब ब्रह्मा ने एक नीतिशास्त्र रचा। उसमें अर्थ, धर्म काम-इन त्रिवर्ग का वर्णन था। वह ग्रन्थ त्रिवर्ग नाम से विख्यात हुआ।
महाभारत में ही इसके बाद बताया गया है कि कालांतर में उसी त्रिवर्ग शास्त्र को सरल करके धर्मशास्त्र की रचना की गई और उसके अनुसार व्यवस्था को लागू करने के लिए एक राजा भी नियुक्त किया गया। इस प्रकार पहला राजा हुआ अनंग। राजा अनंग के बेटे अतिबल को भी राजा बनाया गया जोकि उससे कमजोर प्रशासक सिद्ध हुआ और उसका बेटा वेन बिल्कुल ही विलासी और देवताओं को कष्ट पहुंचाने वाला हो गया। प्रसिद्ध विचारक वैद्य गुरूदत्त अपनी पुस्तक प्रजातंत्र और वर्ण-व्यवस्था में लिखते हैं- वेन तो न केवल सुख भोग करता रहा वरन् अपने अधिकार से देवजनों को कष्ट भी देने लगा। इसके अत्याचार को देखकर तत्कालीन ऋषि एकत्रित हुए और उन्होंने मंत्र पूत कुशों द्वारा (मन्त्रपूतै: कुशैर्जध्नुऋषयो ब्रह्मवादिन:) वेन को मार डाला। उसका अभिप्राय यह कि मन्त्र अर्थात शुभ सम्मति देकर कुशों अर्थात प्रजाजनों को प्रेरणा देकर प्रजा से वेन राजा की हत्या करवा दी। वेन के कई पुत्र थे। उनमें से पृथु को ऋषियों ने राजा बनने के लिए निर्वाचित किया और कुछ शर्तों पर उसे राज्य गद्दी पर बिठा दिया गया। शर्तों में मुख्य था-
1. नियतो यत्र धर्मो वै तमशंक: समाचर।।
अर्थात, जिससे नियत धर्म की सिद्धि हो उसको निर्भय होकर करना।
2. प्रियाप्रिये परित्पज्य सम: सर्वेषु जन्तुषु।
कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरत:।।
अर्थात, प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर अभिप्राय यह कि अपने और पराये का विचार न करके काम, क्रोध, लोभ, मोह और मान को दूर हटाकर सब प्राणियों में समभाव रखना।
3. यश्च धर्मात् प्रविचलेल्लोके कश्चन मानव:।
निग्राहृास्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्मवेक्षता।।
अर्थात, लोक में जो कोई मनुष्य भी धर्म से विचलित हो, उसे परास्त कर सनातन धर्म के विचार से दण्ड देना। सनातन धर्म धृति इत्यादि दस हैं।
इस प्रकार पृथु से उक्त प्रतिज्ञाएँ कराकर अन्त में यह प्रतिज्ञा करायी-
प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा।
पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रहम इत्येव चासकृत।।
अर्थात, मैं मन, वाणी और कर्म से वेद की आज्ञा का निरन्तर पालन करुँगा।
जब पृथु ने इन सब बातों को स्वीकार किया तो इसका राज्याभिषेक कर दिया गया। पृथु ने बहुत वर्ष तक राज्य किया।
इस प्रकार हम पाते हैं कि राजा और राज्य व्यवस्था का निर्माण समाज में एक व्यवस्था लागू करने के लिए हुआ था। लोगों में लोभ-मोह-इष्र्या आदि के कारण होने वाले झगड़ों को समाप्त करने के लिए राजा नियुक्त किया गया था। राजा का काम था विद्वान और नि:स्वार्थी ऋषियों द्वारा समाज हित में बनाए गए धर्म या नियमों के अनुसार समाज के लोगों को चलाना। उसका उल्लंघन करने वाले लोगों को दंडित करना। यही कारण है कि बाद के स्मृतिकारों ने राजा को दंड की संज्ञा दी। यदि आज की भाषा में कहा जाए तो राजा यानी कि सरकार का कार्य है सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और न्याय। लंबे समय से व्यवस्था परिवर्तन पर काम कर रहे रामानुजगंज के बजरंग मुनि कहते हैं – राज्य का एक दायित्व होता है और एक कर्तव्य। दायित्व और कर्तव्य में अंतर होता है। दायित्व का पूरा होना आवश्यक है। उससे आप बच नहीं सकते। वह करना ही पड़ेगा, नहीं करने पर उसकी सफाई देनी होगी। कर्तव्य स्वैच्छिक होता है। वह आप कर भी सकते हैं और नहीं भी। राज्य का दायित्व है सुरक्षा और न्याय। इससे वह बच नहीं सकता और इसमें विफल रहने पर उसकी सार्थकता पर ही सवाल खड़े हो जाएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य आदि उसके कर्तव्य हैं। सुरक्षा और न्याय को छोड़ कर यदि आप शिक्षा और स्वास्थ्य में लगते हैं तो इसका मतलब है कि आप अपने दायित्व से भाग रहे हैं। वर्तमान संविधान की यह एक बड़ी कमी है कि उसमें ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। वास्तव में संविधान बनाने वालों को संविधान और मौलिक अधिकारों के बारे में कोई ज्ञान नहीं था।
मनुस्मृति में कहा गया है कि ‘स राजा पुरूषो दंड:, स नेता शासिता च स:’ अर्थात् जो दंड है, वही पुरूष राजा, नेता (न्याय का प्रचारक) और सबका शासनकर्ता है और वही चारों वर्णों व आश्रमों के धर्म का रक्षक व जिम्मेदार है। भारतीय चिंतन में राजा को दंड के रूप में देखा गया है। दुष्टों को नियंत्रित करके सज्जनों को सुख पहुंचाना ही राजा का प्रथम कर्तव्य कहा गया है। छांदग्योपनिषद में राजा अश्वपति की कथा आती है। उसमें राजा अश्वपति अपने राज्य के बारे में एक घोषणा करते हैं। इस घोषणा से राजा के कर्तव्य और जिम्मेदारियां स्पष्ट होती हैं। राजा अश्वपति कहते हैं कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है, न कंजूस, न मद्यप यानी कि नशा करने वाला, न अग्निहोत्र से हीन और न कोई अविद्वान है। कोई व्यभिचारी पुरूष नहीं है तो व्यभिचारिणी स्त्री कहां से होगी? यह एक आदर्श राज्य का वर्णन है। एक आदर्श यानी कि सुशासित राज्य में चोर, कंजूस यानी कि केवल अपने स्वार्थ में लीन, नशा करने वाला, व्यभिचारी, यज्ञ न करने वाला और अविद्वान नहीं होना चाहिए। इसमें चरित्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और संस्कृति आदि सारे आयाम आ गए हैं। आज देश का कोई एक भी कोना ऐसा नहीं है, जहां के प्रशासक ऐसी घोषणा कर सकें।
राजा और राजनीति की भरपूर चर्चा भारतीय शास्त्रों में पाई जाती हैं, परंतु वहां राजा के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों, उनके निर्वहन के तरीकों, राजा और उसके सहयोगियों के गुण, स्वभाव व चरित्र आदि की चर्चा है। उसमें कहीं भी राजा को चुने जाने की प्रक्रिया पर चर्चा नहीं पाई जाती। वास्तव में भारतीय ऋषि जानते थे कि चुनने की प्रक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण बात है राजा का धर्मानुसार आचरण और यही कारण था कि वे राजा के चरित्र, प्रजा के लिए प्रतिबद्धता और धर्मशास्त्र पर निष्ठा पर अधिक जोर देते थे। साथ ही धर्मशास्त्र की व्यवस्था कभी राजा के अधीन नहीं रही। राजा का काम धर्मशास्त्र यानी कि बनाए गए कानूनों का पालन करवाना था, कानून बनाना नहीं। कानून बनाना ऋषियों यानी कि निस्स्वार्थ विद्वानों का काम था। उसका उल्लंघन करने पर राजा को भी दंडनीय माना गया था। यदि हम आज के लोकतंत्र से इसकी तुलना करें तो आज का शासन तंत्र काफी निरंकुश और कमजोर प्रतीत होगा। आज चुनने की प्रक्रिया पर अधिक जोर है परंतु सांसदों व विधायकों रूपी राजा के चरित्र और कानून के प्रति निष्ठा पर नहीं। आज कानून का पालन करवाने के लिए जिम्मेदार संसद को ही कानून बनाने का भी अधिकार दे दिया गया है, जिससे वह निरंकुश हो गई है।
राजा को निरंकुश होने से रोकने के लिए भारतीय चिंतन में धर्मसभा की व्यवस्था थी। धर्मसभा का काम था समाज के लिए उचित धर्म की व्याख्या करना जिसे हम आज की भाषा में कानून बनाना कह सकते हैं। राजा का काम केवल उसे लागू करना और उसका उल्लंघन करने वालों को दंडित करना मात्र था। इससे राजा के ऊपर धर्मसभा का अंकुश हुआ करता था। इसके अतिरिक्त भारतीय चिंतन और व्यवस्था में विद्वानों की महत्ता सदैव राजा से अधिक मानी गई। इसलिए राजा को ब्राह्मणों यानी कि विद्वानों का संरक्षक घोषित किया गया। अथर्व वेद में तीन प्रकार की सभा और उनके द्वारा शासन के संचालन का वर्णन आता है। ये तीनों सभाएं एक दूसरे के नियमन का कार्य करें, वहां ऐसी अपेक्षा की गई है और तीनों सभाओं पर प्रजा की निगरानी हो, यह भी कहा गया है। मनु राजा के लिए कठोरतम दंड की व्यवस्था करते हैं। मनु कहते हैं कि समान अपराध के लिए राजपुरूष को साधारण मनुष्य की तुलना में हजार गुणा अधिक दंड होना चाहिए। राजपुरूष से मनु का अभिप्राय राजा और उसके सहयोगियों समेत सभी राज कर्मचारियों से है। भीष्म, याज्ञवल्क्य, आचार्य चाणक्य जैसे अन्य भारतीय राजनीतिक विचारकों ने भी अधर्माचरण करने पर राजा व राजपुरूषों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था दी है।
भारतीय मनीषियों ने राजधर्म में दंड को सर्वाधिक महत्ता दी है। यही कारण है कि लगभग सभी धर्मशास्त्रों में अपराधों के लिए कठोर दंडों का विधान किया गया है। परंतु इस दंड विधान में कठोरता के साथ-साथ समझदारी का भी पूरा समावेश किया गया है। मनु दंडों का विधान करने में अपराधी की पृष्ठभूमि का भी पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। वे कहते हैं-
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।। 8/337
ब्राह्मणस्य चतु:षष्टि: पूर्णं वाह्यपि शतं भवत।
द्विगुणा वा चतु:षष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि स:।। 8/338
अर्थ: जो कुछ जानकार (आज की भाषा में पढ़ा-लिखा कह सकते हैं) होकर चोरी करे तो उस शूद्र को चोरी से (सामान्य शूद्र को चोरी के लिए दिए जाने वाले दंड से) आठ गुणा अधिक, वैश्य को सोलह गुणा अधिक, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा अधिक और ब्राह्मण को चौंसठ गुणा या सौ गुणा या फिर एक सौ अ_ाइस गुणा (जितना अधिक विद्वान उतना अधिक दंड) अधिक दंड देना चाहिए।
स्पष्ट है कि मनु वर्णानुसार दंड व्यवस्था तो करते हैं परंतु जो जितना ज्ञानवान वर्ण है उसे उतना अधिक दंड देने का विधान करते हैं। इस समझदारी का यदि आज की व्यवस्था जिसमें अज्ञानता को अपराध का कारण नहीं बताया जा सकता, से तुलना करें तो ध्यान में आता है प्राचीन दंड व्यवस्था में कठोरता होते हुए भी एक प्रकार की मानवीयता है। अज्ञानी को निर्दोष के समान माना गया है और अधिक ज्ञानवान और जिम्मेदार होने को अपराध की गंभीरता से जोड़ा गया है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि निरंकुश समझे जाने वाले राजतंत्र में भी ऐसी उदात्त और तर्कसंगत व्यवस्थाएं रही हैं जो हमारे आज के लोकतंत्र में भी नहीं हैं। इसलिए अपने लोकतंत्र पर अनावश्यक अभिमान को त्याग कर भारतीय राजनीतिक परंपरा के इन सिद्धांतों को अपनी व्यवस्था में शामिल करना ही वर्तमान राजनीतिक संकट का एकमात्र समाधान है।